श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 258, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें२५२ । आनन्दरामायणे [ सर्गः १
श्रीराम उवाच
यत्प्रार्थितं त्वया शंभो तदेव हृदि मे स्थितम् । शृणुष्व वचनं मेऽद्य यत्पुनःप्रोच्यते शुभम् ॥ ९ ॥
सर्वेषामेव मासानां श्रेष्ठश्चायं मधुर्भवेत् । वैशाखात् कार्त्तिकः श्रेष्ठः कार्त्तिकान्माघ एव च ॥ १० ॥
माघमासाद्वरश्चायं चैत्रमासो भविष्यति ।
चैत्रमासेऽभवज्जन्म मम यस्मात्तथा पुनः ॥ ११ ॥
वाजिमेधावभृथेषु स्नानेनापि विशेषतः । सर्वेषामधिकश्चास्तु मधुस्ते वाक्यगौरवात् ॥ १२ ॥
चैत्रमासे कृतं दानं हुतं स्नानं विचिन्तितम् । सर्वं कोटिगुणं प्रोक्तमदोभ्यासां विशेषतः ॥ १३ ॥
सर्वासु प्रथमा चेयं पुरीषु नगरी मम । अयोध्या मुक्तिदात्री तु भविष्यति शिरा मम ॥ १४ ॥
अन्यत्र यत्कृतं पुण्यं षष्टिप्रवत्सरैः शुभम् । तदत्र दिवसेकेन भविष्यति नृणां सदा ॥ १५ ॥
पुरीणां मधुरा श्रेष्ठा गङ्गाध्मानो शुभप्रदा ।
त्वयाऽस्यै याचितो यस्माद्वरश्चेहसदागतः ॥ १६ ॥
तव वाक्याद्गौरवेण तव काश्याः शताधिका । भविष्यति पुरी चेयमयोध्या मम वल्लभा ॥ १७ ॥
नदीषु सरयूश्चेयं श्रेष्ठाऽस्तु वचनान्मम । सरयूसदृशी नान्या नदी भूता भविष्यति ॥ १८ ॥
अस्मादग्रे मया चेदं रामतीर्थं विनिर्मितम् । निजतेजःप्रभावेन तीर्थेषु मुकुटोपमम् ॥ १९ ॥
भविष्यति न सन्देहः सर्वपातकनाशनम् ।
तथा यानि पृथिव्यां हि मया तीर्थानि वै पुरा ॥ २० ॥
लिंगान्यपि स्वीयनाम्ना कृतानि तानि शंकर । स्नाने दर्शनावर्चामुक्तिदान्यत्र संतु वै ॥ २१ ॥
रामतीर्थे चैत्रमासे प्रत्यब्दं भुवि मानवै । स्नातव्यं विधिवता सम्यद्यतियमैर्यम व स्यतः ॥ २२ ॥
यत्फलं ह्यश्वमेधेन यद्गोमेधेन वै फलम् । यत्फलं सोमयागेन तच्चैत्रेऽत्रावगाहनात् ॥ २३ ॥
सूर्यग्रहे कुरुक्षेत्रे यत्पुण्यं स्नानदानतः ।
तन्पुण्यं स्यान्मधौ स्नानादयोध्यायां सुरेश्वर ॥ २४ ॥
नदियोंमे उत्तम सरयू नदी है । शिवजीका यह कथन सुनकर प्रसन्न हुए राम सदन विदुक्तोपकारिणी वाणी बोले ॥ ७ ॥ ८ ॥ श्रीरामने कहा-हे शम्भो ! आप जो चाहते हैं, वही मेरे भी मनमें है। अब मेरी बात सुनिये। मैं हर्षपूर्वक यह कल्याणमय वाक्य कहता हूँ । ९ । सम्पूर्ण मासोंमें श्रेष्ठ यह चैत्र मास होगा। वैशाखसे कार्तिक, कार्तिकसे माघ एवं माघ महीनासे भी चैत्र श्रेष्ठ होगा। इसी मासमें मेरा जन्म हुआ है। इसलिए भी यह चैत्र मास श्रेष्ठ है । १० । ११ । अश्वमेधका अवभृथ स्नान होने तथा आपके वाक्यगौरवसे भी यह महीना सबसे श्रेष्ठ होगा ॥ १२ ॥ चैत्र मासमें यहाँ स्नान-दान आदिमं कोटिगुण फल होगा। अभ्यासमें किया हुआ सुकर्म तो और भी अधिक पुण्यप्रद होगा ॥ १३ ॥ सब मेरी पुरी ममें यह शिरोरूप उत्तम है तथा मेरी वाणीसे यह मुक्तिदात्री भी अवश्य होगी । १४ । और जगह किया हुआ पुण्य ६० वर्षमें फलदायक होता है, किन्तु यहाँ किया हुआ पुण्य एक ही दिनमें फलद होता है ॥ १५ ॥ सब पुरियोंमें शुभप्रद पुरी मधुराको श्रेष्ठता क्योंकि आपने मुझसे वर मांगा है ॥ १६ ॥ अतएव आपके वाक्यगौरवसे यह मेरा प्रिया अयोध्यापुरी गुणोंमें आपकी काशीसे भी सौगुना श्रेष्ठ होगा ॥ १७ ॥ मेरे वचनसे सरयू श्रेष्ठ नदीयोंमें श्रेष्ठ होगी। सरयू जैसी नदी न है और न होगी ॥ १८ ॥ इसमें भी मेरा बनाया हुआ यह रामतीर्थ अपने प्रभावसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें मुकुट सदृश होगा ॥ १९ ॥ हे शङ्करजी ! मैंने अपने नामसे भूमिपर जितने भी तीर्थ एवं शिवलिंग स्थापित किये हैं वे सब स्नान-दर्शन एवं पूजनसे मुक्ति देनेवाले तथा सर्वपापनाशक होंगे। इसमें कोई सन्देह नहीं है। २० । २१ ॥ मनुष्योंको प्रतिवर्ष चैत्र मासमें विधिवतर्क, यम नियमादिके साथ रामतीर्थ में स्नान करना चाहिये । २२॥ अश्वमेध, गोमेध एवं सोमयाग करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही फल रामतीर्थपर स्नान करनेसे मिल जाता है ॥ २३ ॥ सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमें स्नान-दान करनेसे जो फल होता है, वही फल चैत्रम अयोध्यास्नान करनेसे