श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 259, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ९ ] २४३
अयोध्यायां रामतीर्थे सरय्वाप्लवनेन ये । दैवाद्यस्मिन् जनो मग्नास्ते नरा मोक्षभागिनः ॥ २५॥
यथा माघे प्रयागे हि स्नातव्यं सुखमिच्छता। काशिकायां तथा ज्ञेयं पंचगंगाजले स्मृतः ॥ २६॥
द्वारकायां यथा प्रोक्ता वैशाखे गोमती-नदी।
अयोध्यायां रामतीर्थे तथा चैत्रे समाह्वयम् ॥ २७॥
करणीयं नरैर्भक्त्या वचनान्मम सर्वदा। मासेषु च मासेषु प्रथमः सकलैर्जनैः ॥ २८॥
एतावत्कालपर्यन्तं मार्गशीर्षः प्रगीयते । अद्यारभ्य मधुश्चायं प्रथमः नृपतिष्वपि ॥ २९॥
यथा देवेषु प्रथमस्त्वं महेश्वरतथा मधुः।
मासेषु प्रथमश्चास्तु तथाऽयोध्या पुरीष्वपि ॥ ३०॥
चैत्रे मासे तु संप्राप्ते सर्वे देवाः सवासवाः। बहिर्न्नैव समाश्रित्य तिष्ठध्वं हि ममाज्ञया ॥ ३१॥
प्रत्यब्दं चैत्रमासेऽत्र मधेर्त्तानां समागताः। आगन्तव्यं तथा सर्वैर्लोकांस्त्वत्स्वामिभिः ॥ ३२॥
वार्द्धातुरैः स्त्रीभिर्येषां यन्मन्निधौ मम। रामतीर्थे प्रसव्यं सर्वत्र भुवि शङ्कर ॥ ३३॥
चैत्रमासेऽवगाहाथं वचनान्मम सर्वदा।
इति रामवचः श्रुत्वा गिरिजा प्राह जानकीम् ॥ ३४॥
सीते वरस्त्वया देया इदानीं वचनान्मम। नारीणां च हितार्थं हि सर्वलोकोपकारकाः ॥ ३५॥
पार्वत्या वचनं श्रुत्वा जानकी प्राह सादरम् । पृथिव्यां मम तीर्थानि यानि सन्ति सहस्रशः ॥ ३६॥
अत्रापि च महत्श्रेष्ठं यत्र स्नानं मयाऽधुना ।
तेषु चैत्रतृतीया या यावद्वैशाखसप्तमी ॥ ३७॥
सिता तृतीयाऽक्षय्याख्या तान्तस्त्रीभ्यस्तु मद्धरम्। स्नानार्थं शीतलंगौरीमंडपं स्थानमुत्तमम् ॥ ३८॥
सौभाग्यदं ममप्रेष्ठं पुत्रपौत्रप्रवर्द्धनम्। सर्वत्र रामतीर्थस्य वामे तीर्थं ममास्ति हि ॥ ३९॥
इति दत्त्वा वरन्सीताऽऽसीत्तूष्णीं रामसन्निधौ।
ततो गर्म गुरुः प्राह गन्तव्यं यत्नमूटमम् ॥ ४०॥
प्राप्त होता है ॥ २४ ॥ जो अयोध्याके सरयुजलके रामतीर्थमें स्नान करते हैं, वे मोक्ष प्राप्त करते हैं ॥ २५ ॥ जो फल माघमासमें प्रयागस्नानका है काशिका काशीका पंचगंगाके स्नान करनेका है और द्वारकामें चैत्रमासपर गोमतीस्नानका जो फल है, वही फल अयोध्याके रामतीर्थपर चैत्र मासमें स्नान करनेका है ॥ २६ । २७ ॥ आजसे जगत मेरे कहनेसे यह सब लोग चैत्रको पहला महीना समझें ॥ २८ ॥ आज तक मार्गशीर्ष ( अगहन ) सबसे प्रथम मास माना जाता था, पर आजसे चैत्र प्रथम मास समझा जायगा ॥ २९ ॥ जैसे देवताओंमें पहले आप ( शिव ) हैं, इसी तरह मासोंमें प्रथम चैत्र और पुरियोंमें प्रथम अयोध्या समझी जायगी ॥ ३० ॥ जैसे इस समय आप लोग यहाँ आये हैं उसी तरह प्रतिवर्ष चैत्र मासमें आवें और मेरी आज्ञासे सरयू तटपर आश्रम बनाकर निवास करें ॥ ३१ । ३२, बूढ़े आतुर ( रोगी ) एवं स्त्रियें भी जिसके पास जो कुछ हो, उसी वस्तुको श्रद्धाभक्तिसे भेट देने तथा चैत्रमासम स्नानार्थ यहाँ आया करें । ३३ ॥ ३४ ॥ इस प्रकार रामके वचन सुनकर पार्वती जी सीता से बोलीं- हे सीते ! आप भी इस समय मेरे कहनेसे सर्वलोकोप-कारक एव विशेष करके स्त्रियोंका हितकर वर प्रदान करें ॥ ३५ ॥ इस प्रकार पार्वतीके वचन सुनकर सीताजी बोलीं- पृथिवीपर जितने भी मेरे तीर्थ हैं और यहाँपर जो महाश्रेष्ठ तीर्थ है, जिसमें मैंने स्नान किया है, उन सब तीर्थों में चैत्रकी तृतीयासे लेकर वैशाखकी शुक्ल तृतीया पर्यन्त स्त्रियोंको स्नान करना चाहिये । यह अक्षय्ययोग स्नान कहाता है। यह स्नान सर्व मास होता है। यह स्नान सौभाग्य देनेवाला एवं पुत्रपौत्र वर्द्धक है। सब जगह रामतीर्थके वामभागमे मेरा तीर्थ है ॥ ३६-३९ ॥ इस प्रकार वर देकर सीताजी चुप हो गयीं, इसके बाद गुरु वशिष्ठ रामजीसे बोले