श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 263, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ९ ] यागकाण्डम् २४७
प्राप्याज्ञां रामचन्द्रस्य सावरोधैः सुगन्धिभिः ।
प्रस्थानं स्वस्थलं न्तु चकार नृपमण्डितः ॥८६॥
नृपस्त्रियोऽपि सीतायाः प्राप्याज्ञां पूजितास्तथा । यानान्यप्यारुरुहुः सर्वास्त्वयोध्याया विनिर्ययुः ॥८७॥
अथ ते पार्थिवाश्चाद्य प्राप्याज्ञां राघवस्य च । सावरोधाः ससैन्याश्च स्वकीयराज्यानि वै ययुः ॥८८॥
ययौ शिवोऽपि कैलासं सत्यलोकं विधिर्ययौ ।
इन्द्राद्या निर्जराः सर्वे स्वर्गलोकं ययुर्मुदा ॥८९॥
अथर्त्विजो महाशीलाः सदस्या ब्रह्मवादिनः । सर्वे मुनीश्वराश्चाथ स्वधामानि ययुस्तदा ॥९०॥
ततो रामः पूर्ववच्च शशास जगतीतलं । रेमे जनकनन्दिन्या चिरकालं यथासुखम् ॥९१॥
वर्षान्तरेण कालेन वाजिमेधाः पृथक् पृथक् ।
उत्तरोत्तरतः श्रेष्ठा विशद्रूपैः कृता दश ॥९२॥
इत्थं श्रीरामचन्द्रेण दशमे तुरगाध्वरे । प्रतिपाद्य गुरोर्वाक्यं सर्वस्वमपि भूसुरान् ॥९३॥
दत्तं किल महाराज्ञा तथा च दिक्षतुष्टयम् ऋत्विग्भ्यो दक्षिणार्थे हि दत्तं चेति मया श्रुतम् ॥९४॥
ऋत्विग्भिस्तत्पुनर्दत्तं राघवस्य सादरात् ।
कृपालुभिः पालनार्थमिति शिष्यानुश्रूयते ॥९५॥
एवं शिष्य त्वया पृष्टं राघवस्य मंगलम् चरितं तन्मया किंचित्प्रोक्तं यज्ञसंमतम् ॥९६॥
इदं यः प्रातरुत्थाय यागकाण्डं मनोरमम् । पठिष्यति नरः पुण्यं सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥९७॥
पुत्रार्थी प्राप्नुयात्पुत्रं धनार्थी धनमाप्नुयात् ।
यागकाण्डमिदं श्रुत्वा वाजिमेधफलं लभेत् ॥९८॥
होमकाले श्राद्धकाले चातुर्मास्यादिकेष्वपि । जपध्यानाच्चनारम्भे पूर्वं नित्यं पठेदिदम् ॥९९॥
पूजन कर लिया और जब वन्दनाओंके साथ मातृआज्ञाने रामस्तवराजसे रामचन्द्रकी स्तुति और पूजा कर ली। तब रामचन्द्रजीसे आज्ञा लेकर सब लोग अपने-अपने घरोंको प्रस्थान करने लगे । ७८-८६ ॥ राजाओंकी रानियां भी सीताजी की आज्ञा पाकर अपने-अपने रथोंपर सवार हुईं और अयोध्यासे अपने घरोंको जाने लगीं । इसी प्रकार सब राजे रामकी आज्ञा पाकर अपनी-अपनी राजधानीको लौटे । तब शिवजी अपने कैलासको, ब्रह्मा सत्यलोकको और इन्द्रादि देवता स्वर्गलोकको चले गये ॥ ८७-८९ ॥ इसके बाद शीलवान् ऋत्विक और सदस्य आदि भी अपने-अपने आश्रमोंको विदा हुए । रामचन्द्रजीने फिर पूर्वरीतिसे अपना राजकाज संभाल लिया और चिरकाल तक सीताजीके साथ विहार करते रहे । प्रति दूसरे वर्ष इसी तरह अश्वमेध यज्ञ करते हुए रामचन्द्रजीने बीस पदमें दस अश्वमेध यज्ञ किये । दसवें अश्वमेधमें गुरु वसिष्ठके आज्ञानुसार भगवान्ने अपनी सारी सम्पत्ति ब्राह्मणोंको दान दे दी । मैंने तो यहाँतक सुना है कि रामने चारों दिशाएं दक्षिणारूपमें ऋत्विजोंको दे डालीं थीं ॥ ९०-९४ । किन्तु उन दयालु ऋत्विजोंने फिर उसे बड़े आदरके साथ भगवान्को लौटा दिया और कहा-'हे प्रभो ! इसकी रक्षा आप ही कर सकते हैं-हम नहीं । इस कारण यह सब आप अपने ही पास रखिए' । इस प्रकार हे शिष्य ! जैसे तुमने रामचन्द्रजीके मङ्गल-कार्यका प्रश्न किया वैसे ही मैंने भी तुम्हें बतलाया और रामचन्द्रके यज्ञसम्बन्धी चरित्रोंको सुना दिया । जो कोई सबेरे उठकर इस सुन्दर यागकाण्डको सुनेगा, उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जायेंगी । वह यदि पुत्रार्थी होगा तो उसे पुत्र मिलेगा और धनार्थी होगा तो धन प्राप्त होगा । इस यागकाण्डको सुननेसे अश्वमेध