श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 268, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें२५२ आनन्दरामायणे [सर्गः १
भूतेशं भूपतिं भद्रं भूरिदं भूरिभूषणम्। सर्वदुःखहरं वीरं दुष्टदानवमर्दनम् ॥३९॥
श्रीनृसिंहं महाविष्णुं महान्तं दीप्ततेजसम्। चिदानन्दमयं नित्यं प्रणवं ज्योतिरूपकम् ॥४०॥
आदित्यमण्डलगं निखिलात्तिस्वरूपिणम्। भक्तिप्रियं पद्मनेत्रं भक्तानामभितप्रदम् ॥४१॥
कौसल्येयं कलामूर्त्तिं काकुत्स्थं कमलाप्रियम्। सिंहासने समासीनं नियमव्रतमकल्मषम् ॥४२॥
विश्वामित्रप्रियं दान्तं स्वदारनियतव्रतम्। यज्ञेशं यज्ञपुरुषं यज्ञपालनतत्परम् ॥४३॥
सत्यसन्धं जितक्रोधं शरणागतवत्सलम्। सर्वक्लेशापहरणं विभीषणवरप्रदम् ॥४४॥
दशग्रीवहरं रुद्रं केशवं केशिमर्दनम्। बालिप्रशमनं वीरं सुग्रीवेप्सितराज्यदम् ॥४५॥
नरवानरदेवैश्च सेवितं हनूमत्प्रियम्। शुद्धं सूक्ष्मं परं शांतं तारकब्रह्मरूपिणम् ॥४६॥
सर्वभूतान्तभूतस्थं सर्वाधारं सनातनम्। सर्वकारककर्त्तारं निदानं प्रकृतेः परम् ॥४७॥
निरामयं निराभासं निरवद्यं निरंजनम्। नित्यानन्दं निराकारमद्वैतं तममः परम् ॥४८॥
परात्परतरं नित्यं सत्यानन्दचिदात्मकम्। मनसा शिरसा नित्यं प्रणमामि रघूत्तमम् ॥४९॥
भूतोद्भवं वेदविदां वरिष्ठमादित्यचन्द्रानिलसुप्रभावम्।
सर्वात्मकं सर्वगतस्वरूपं नमामि रामं तमसः परस्तात् ॥५०॥
निरञ्जनं निष्प्रतिपं निरीहं निराश्रयं कारणमादिदेवम्।
नित्यं ध्रुवं निष्क्रियस्वरूपं निस्तरं राममहं भजामि ॥५१॥
भवद्विपौतं भवतापजं तं भक्तिप्रियं भानुकुलप्रदीपम्।
भूताधिनाथं भुवनाधिपत्यं भजामि रामं भवरोगवैद्यम् ॥५२॥
सर्वाधिपत्यं रणमध्यधीरं सत्यं चिदानन्दयुतस्वरूपम्।
सत्यं शिवं सजनहृन्निवासं ध्येयं परानन्दमहं भजामि ॥५३॥
मनको तृप्त किया करते हैं। जो मयूर कण्ठ भी हैं जो लवण के पात्र हैं जो एकवज्र, श्रीधर, श्रीकर, श्रीम, श्रीनिवास, परात्पर, भूतेश, भूपति, भद्र (कल्याणमय), भूरिद (सर्वसम्पत्तिका दाता), भूरिभूषण, (बहुत से भूषणोंको धारण करनेवाले), सर्व प्रकारके दुःखोंको हरनेवाले वीर और दुष्ट दानवोंका विनाश करनेवाले हैं, जो श्रीमन्नृसिंह महाविष्णु, महान् दीप्तिमान् चिदानन्दमय, नित्य, प्रणव, ज्योतिरूप, आदित्यमण्डलमें विराजमान्, निखिलात्तिस्वरूप, भक्तिप्रिय, कमललोचन, भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाले, कौसल्याके सुवन, कलामूर्त्ति, काकुत्स्थ, कमलाप्रिय, सिंहासन सीन, नियमव्रती और पापरहित हैं। जो विश्वामित्रके प्रिय, दान्त (जितेन्द्रिय और एकपत्नीव्रती) हैं। जो यज्ञेश, यज्ञपुरुष, यज्ञकी रक्षामें तत्पर, सत्यस्थ, जितक्रोध, शरणागतवत्सल, सब क्लेशोंको हरनेवाले विभीषणको वरदान देनेवाले, रावणका विनाश करनेवाले, रुद्र, केशव, केशिमर्दी, बालिवलनाशक, वीर सुग्रीवको ईप्सित राज्य देनेवाले, नर-वानर और देवताओंसे सेवित, हनुमान्से सेवित, शुद्ध, सूक्ष्म, शान्त ब्रह्मरूप, सब प्राणियोंके हृदयमें रहनेवाले, सर्वाधार, सनातन सब कुछ कर्ता धर्त्ता, प्रकृतिके मूल कारण, निरामय, निराभास, निरवद्य, निरञ्जन, नित्यानन्द, निराकार, अद्वैत, तमोगुणसे परे, सर्वश्रेष्ठ, नित्य, सत्य, आनन्द और चिन्मयस्वरूप हैं, उन श्रीरामचन्द्रजीको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ । ३७-४९॥ जो संसारके जन्मदाता हैं, विद्वानोंमें श्रेष्ठ हैं, सूर्य्य-चन्द्रमा और अग्निमें जिनका प्रकाश है, जीवात्मा सर्वव्यापी और तमोगुणसे परे हैं। ऐसे रामचन्द्रको मैं प्रणाम करता हूँ ॥५०॥ निरञ्जन, निष्प्रतिम निरीह, निराश्रय सर्वव्यापी आदिदेव नित्य, ध्रुव, निष्कृय और स्वरूपसे परे रामचन्द्रजीका मैं प्रणाम करता हूँ ॥५१॥ जो संसाररूप महासागरके लिए जहाजरूप सदृश हैं, जो भरतके बड़े भ्राता, भक्तिप्रिय, भानुकुल प्रदीप, भूताधिनाथ, भुवनरूपी जहाजके अधिपति और भवरूप रोगके वैद्य हैं, उन रामचन्द्रजीका मैं प्रणाम करता हूँ ॥५२॥ जो सबके अधिपति, युद्धविद्याम कुशल, सत्यस्वरूप