श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 267, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १ ] विलोमकाव्यम् २५१
यदेकं व्यापकं लोके यद्रूपं चिन्मयमहम् सर्वत्रलोकेऽप्यार्थं राममव्ययमद्भुतये ॥२५॥
विद्यामहेतुं विमलयताशं प्रज्ञानवन्दितमपूर्वरूपम् ।
श्रीरामचन्द्रं हरिमादिदेवं विश्वेश्वरं राममहं नमामि ॥२६॥
कविं पुराणं वृद्धञ्च सर्वेशं सनातनं योगिसमर्चिताशम् ।
अणोरणीयांसमनन्तवीर्यं प्रज्ञेश्वरं राममहं भजामि ॥२७॥
नरायणं जगन्नाथमभिरामं जगत्पतिम् । कविं पुराणं वर्णाशं रामं दशरथात्मजम् ॥२८॥
राजराजं रघुवरं कौसल्यानन्दवर्धनम् । भर्गं वरेण्यं विश्वेशं रघुनाथं जगद्गुरुम् ॥२९॥
सत्यं सत्यप्रियं श्रेष्ठं जानकीवल्लभं प्रभुम् सौमित्रिपूर्वजं शान्तं कामदं कमलेक्षणम् ॥३०॥
आदित्यं रविमीशानं शृङ्गिं सूर्यमनामयम् । आनन्दरूपिणं सौम्यं राघवं करुणाकरम् ॥३१॥
जामदग्न्यं नरोन्भूतिं शार्ङ्गं परशुधारिणम् । वाक्पतिं वरदं वाक्यं श्रीपतिं पक्षिवाहनम् ॥३२॥
धीराङ्गांशशचिं शर्मं चिन्मयानन्दावग्रहम् । हलधारिप्रभोशार्नं बलरामं कृपानिधिम् ॥३३॥
श्रीवल्लभं कलानाथं जगन्मोहनमच्युतम् । मत्स्यकूर्म्मवराहादिरूपधारिणमव्ययम् ॥३४॥
वासुदेवं अगयोनिसमार्त्ताशमनं हरिम् । गोविन्दं श्रीपतिं विष्णुं गोपीजनमनोहरम् ॥३५॥
गोपालं गोपरीवारं गोपकन्यासमावृतम् । विद्युत्पुञ्जप्रतीकाशं रामं कृष्णं जगन्मयम् ॥३६॥
गोपीविकायमाशीर्षं वेणुवादनतत्परम् । कामरूपं कलावंतं कामिनां कामदं प्रभुम् ॥३७॥
मन्मथं मधुशतार्यं माधवं भक्तवत्सलम् । श्रीधरं श्रीकरं श्रीशं श्रीनिवासं परात्परम् ॥३८॥
शिवजीने कहा—जो एक है, जिससे बढ़कर संसारमें और कुछ है ही नहीं। जो अनन्त, नित्य एवं अविनाशी है। जो अकेला रहता हुआ भी समस्त विश्वमें व्याप्त है, मैं भगवान्के उसी स्वरूपका ध्यान करता हूँ ॥२४। २५॥ जो विज्ञानके एकमात्र हेतु हैं, जिनकी निर्मल और विज्ञान शान्त हैं, जो पूर्ण ज्ञानकी अवस्थामें ज्ञानियोंको दिव्यरूप होकर दर्शन देते हैं ऐसे श्रीहरि, आदिदेव तथा विश्वेश्वर रामचन्द्रजी की वन्दना करता हूँ ॥२६॥ जो स्वयं कवि हैं, सबसे वृद्ध हैं, सबके स्वामी हैं, सनातन हैं तथा योगियोंके भी स्वामी हैं। जो सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म हैं, जिनमें अनन्त पराक्रम है, जो समस्त परापर जगत्के ईश हैं, उन रामचन्द्रका मैं भजन करता हूँ ॥२७॥ नागगणस्वरूप, समस्त जगत्के स्वामी, अतिशय सुन्दर विलास तथा दशरथजीके तनय श्रीरामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥२८॥ जो राजाओं के भी राज हैं, जो गुणगण सर्वश्रेष्ठ हैं, जो कौशल्याका आनन्द बढ़ानेवाले हैं, जो तेजोमय हैं, जो संसारके ईश्वरकर्ता हैं, जो संसारके गुरु हैं, जो सत्यस्वरूप हैं, जिनको सत्य ही प्रिय है, जो सीताजीके पति हैं, जो लक्ष्मणके बड़े भ्राता हैं, जिनका शान्त स्वभाव है, जो अपने भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करते हैं, कमल सदृश जिनके नेत्र हैं, जो अदितिके पुत्र हैं, जो सूर्यरूप हैं, जो शिवरूप और आरोग्यमयस्वरूप हैं, जो आनन्दके साक्षात् मूर्ति हैं, जो सौम्य प्रकृतिके हैं और जो करुणाके भण्डार हैं ॥२९-३१॥ जो जमदग्निके पुत्र (परशुराम) हैं, जो अभिलषित कामनाओंको पूर्ण करते हैं, जो लक्ष्मीपति हैं, जिनका पक्षी (गरुड़) वाहन है, जो पृथ्वी और शार्ङ्ग नामक धनुष धारण करते हैं, जिनका नित्य आनन्दमय शरीर है, जो हलको धारण करनेसे बलरामस्वरूप हैं, जो लक्ष्मीके प्रिय हैं, जो सब कलाओं- को जानते हैं, जो संसारके प्रलय करनेके समय हैं, जिनका कभी विनाश नहीं होता, जो मत्स्य-कूर्म-वराह आदि रूप धारण करते हैं और जो अविनाशी हैं ॥३०-३४॥ जो वसुदेवके पुत्र, समस्त प्रजाके जन्म-मरणसे रहित, इन्द्रियोंको प्रसन्न करनेवाले, रुक्मिणीके पति, विष्णुरूप, गोपियोंके मनको चुरानेवाले और गौओंके रक्षक हैं, ऐसे राम-कृष्ण तथा जगन्मय भाइयोंको मैं प्रणाम करता हूँ ॥३५ ॥ ३६॥ जो गौओं और गोपियोंसे घिरे रहते हैं, जो वंशी बजानेमें तत्पर रहते हैं, जो जैसा चाहते वैसा अपना स्वरूप बना लेते हैं, जो समस्त कलाओंसे पूर्ण हैं, जो कामनावाले मनुष्योंकी कामनाओंको पूर्ण करते हैं और कामदेवरूपसे सबकी...