श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 266, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें२६० आनन्दरामायणे [ सर्गः १
विज्ञानफलदं पुण्यं मोक्षैकफलदायकम् । नमस्कृत्य प्रवक्ष्यामि रामं कृष्णमनामयम् ॥ ९ ॥ अयोध्यानगरे रम्ये रत्नमण्डपमध्यगे । ध्यायेत्कल्पतरोर्मूले रत्नसिंहासने शुभे ॥ १० ॥ तन्मध्येऽष्टदलं पद्म नानारत्नोपशोभितम् । स्मरेन्मध्ये दाशरथिं सहस्रादित्यतेजसम् ॥ ११ ॥ पितृहासनमासीनमिन्द्रनीलसमप्रभम् कोमलाङ्गं विशालाक्षं विद्युद्वर्णांबरावृतम् ॥ १२ ॥ भानूकोटिप्रतीकाशं किरीटेन विराजितम् । रत्नग्रैवेयकेयूरवरकुण्डलमण्डितम् ॥ १३ ॥ रत्नकंकणमञ्जीरकटिसूत्रैरलं कृतम् श्रीवन्मर्कोस्तुभोरस्कं मुक्ताहारोपशोभितम् ॥ १४ ॥ चिन्तामणिप्रमायुक्तं रत्नमालारिराजितम् । दिव्यरत्नसमायुक्तं मुद्रिकाभिरलंकृतम् ॥ १५ ॥ कर्पूरागरुकस्तूरीदिव्यचन्दनानुलेपनम् । तुलसीकुन्दमन्दारपुष्पमाल्यैरलं कृतम् ॥ १६ ॥ गववं द्विसुनं वीरं राममीषत्स्मिताननम् । योगशास्त्रार्थमिश्रतं योगेशं योगदायकम् ॥ १७ ॥ सदा सौमित्रिभरतशत्रुघ्नैरुपसेवितम् । विद्याधरसुराधीशसिद्धगन्धर्वकिन्नरैः ॥ १८ ॥ वागीशैर्नारदाद्यैश्च स्तूयमानमहर्निशम् । विश्वामित्रवसिष्ठाद्यैऋषिभिः परिसेवितम् ॥ १९ ॥ सनकादिमुनिश्रेष्ठैर्योगिवृन्दैः समावृतम् । रामं रघुवरं वीरं धनुर्वेदविशारदम् । २० ॥ मङ्गलायतनं देवं रामं राजीवलोचनम् । सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञमानन्दमतिसुन्दरम् । २१ ॥ कौसल्यातनयं रामं धनुर्बाणधरं हरिम् । एवं संचिन्तयेद्विष्णुं यज्ज्योतिर्ज्योतिषां परम् ॥ २२ ॥ प्रहृष्टमानसो भूत्वा सभायां वृषभध्वजः । सर्वलोकहितार्थाय तुष्टाव रघुनन्दनम् ॥ २३ ॥ कृताञ्जलिपुटो भूत्वा चिन्तयञ्छ्रुवतं हरिम् ।
श्रीशिव उवाच
यदेकं तत्परं नित्यं यदनन्तं चिदात्मकम् ॥ २४ ॥
पापसमूहका नाशक, दारिद्र्य और दुःखका दमन करनेवाला तथा समस्त सम्पदाओंका दाता है ॥ ८ ॥ यह विज्ञान (ईश्वरसम्बन्धी ज्ञान) का फल देनेवाला, पवित्र और मोक्षका साधक है । मैं श्यामस्वरूपधारी राम-कृष्णका ध्यान करके इस स्तवराज रामको बतला रहा हूँ ॥ ९ ॥ श्रोताओं चाहिये कि वह अयोध्यानगरी-के रत्नोंसे सुसज्जित एक सुन्दर मण्डपमें कल्पवृक्षके नीचे, रत्नसिंहासनपर, जिसमें नाना प्रकारके मणियोंसे सुशोभित अष्टदल कमल है, उसपर बैठे हुए हजार सूर्यकी भाँति तेजोमय रामचन्द्रजीका ध्यान करे ॥ १०।११॥ रामचन्द्रजी अपने पिता (महाराज दशरथ) के आसनपर बैठे हैं, इन्द्रनील मणिकी भाँति जिनकी श्याम मूर्ति है, जिनके कोमल अङ्ग हैं, बड़ी बड़ी आँखें हैं, बिजलीकी तरह चमकता पीताम्बर पहिने हुए हैं, जिसमें करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाश है, मस्तकपर किरीट धारण किये हैं, उरस्थलमें श्रीवत्स तथा कौस्तुभ मणि है और गलेमें चिन्तामणि तथा कितने ही रत्नोंका जड़ाव हार है । उनकी अँगुलियां बहुमूल्य रत्नोंसे जड़ी अँगूठियाँ पड़ी हैं ॥ १२-१५ ॥ कपूर, अगर और कस्तूरी मिला हुआ चन्दन इनके सारे शरीरमें लगा हुआ है । तुलसी तथा कुन्द-मन्दार आदिके पुष्पोंसे जिनका शृङ्गार किया हुआ है, जिनके केवल दो भुजायें हैं, होठोंपर मन्द मुसकान है, जो योगशास्त्रके जानने वाले ईश्वर हैं, लक्ष्मण भरत-शत्रुघ्न जिनकी सेवामें लगे हुए हैं, विद्याधर, देवता, सिद्ध, गन्धर्व और नारदादि ऋषिगण दिन-रात जिनकी स्तुति किया करते हैं, विश्वामित्र-वसिष्ठादि महर्षि जिनकी परिचर्यामें लगे हुए हैं, सनक सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार आदि मुनि दर्शनार्थ खड़े हैं। जो रघुवंश-में सर्वश्रेष्ठ वीर तथा धनुर्वेदमें निपुण हैं । जो मंगलालय हैं, कमलके समान जिनके नेत्र हैं, जो सब शास्त्रोंके तत्त्वज्ञ, आनन्दमूर्ति, अतिशय सुन्दर कौशल्याके सुवन हैं और धनुष-बाण धारण किये हुए ऐसे भगवान् रामचन्द्रका ध्यान करे । जो सब ज्योतियोंमें श्रेष्ठ हैं। ऐसे अद्भुत स्वरूपका ध्यान करके हृष्ट संतुष्ट होकर शिवजीने संसारके कल्याणार्थ दोनों हाथ जोड़कर भगवान् राघवन्द्रकी स्तुति की ॥ १६-२३ ॥