भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 270

२८४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १

वर्णाश्रमस्तथा धर्मा वर्णधर्मास्तथैव च । नाग यक्षाश्च गन्धर्वा दिक्पाला दिग्गजा दिशः॥६५॥ वसवोऽष्टौ त्रयः काला रुद्रा एकादश स्मृताः । तारका द्वादशादित्यास्त्वमेव रघुनायक ॥६६॥ सप्त द्वीपाः समुद्राश्च नदा नद्यस्तथा द्रुमाः । स्थावरा जंगमाश्चैव त्वमेव रघुनन्दन ॥६७॥ देवतिर्यङ्मनुष्याणां दानवानां दिवौकसाम् । माता पिता तथा भ्राता त्वमेव रघुनन्दन ॥६८॥ सर्वेशस्त्वं परं ब्रह्म त्वद्रूपं विश्वमेव च । त्वमक्षरं परं ज्योतिस्त्वमेव रघुपूंगव ॥६९॥ शान्तं सर्वगतं सूक्ष्मं परं ब्रह्म सनातनम् । राजीवलोचनं रामं प्रणमामि जगत्पतिम् ॥७०॥ ततः प्रसन्नः श्रीरामः प्रोवाच वृषभध्वजम् । श्रीराम उवाच तुष्टोऽहं गिरिजाकांत वृणीष्व वरमुत्तमम् ॥७१॥ श्रीशिव उवाच यदि तुष्टोऽसि देवेश श्रीराम करुणानिधे । तवाद्य दर्शनेनैव कृतार्थोऽहं न संशयः ॥७२॥ धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं पुण्योऽहं पुरुषोत्तम । अद्य मे सफलं कर्म अद्य मे सफलं तपः ॥७३॥ अद्य मे सफलं ज्ञानमद्य मे सफलं श्रुतम् । अद्य मे सफलं सर्वं त्वत्पदाम्भोजदर्शनात् ॥७४॥ अद्वैतं विमलं ज्ञानं स्वमन्नामस्मरणं तथा । त्वत्पदाम्भोरुहद्वन्द्वे सद्भाक्तिं देहि राघव ॥७५॥ ततः परं सुसंप्रीतो रामः प्राह सदाशिवम् । गिरिजेश महाभाग पुनरिष्टं ददाम्यहम् ॥७६॥ श्रीशिव उवाच वरं न याचे रघुनाथ युष्मत्पदाम्बुजभक्तिः सततं ममास्तु । इदं प्रियं नाथ वरं प्रयच्छ पुनः पुनस्त्वामिदमेव याचे ॥७७॥ श्रीरामदास उवाच इत्येवमीडितो रामः प्रादानस्मै वरान्तरम् । तेनोक्तस्त्ववराजाय ददौ नानावरान् बहून् ॥७८॥

ऋषि, सिद्ध, साध्य, मुनि, विप्र, वेद, यज्ञ पुराण तथा धर्मोंके सहित ये सब तुम्हीं हो ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ हे रघुनायक ! वर्ण आश्रमधर्म, वर्णधर्म, नाग, यक्ष, गन्धर्व, दिक्पाल, दिग्गज, दिशाएं, वसु, तीनों काल, एकादश रुद्र ताराएं और द्वादश आदित्य ये सब तुम्ही हो ॥ ६५, ६६ ॥ सातो द्वीप, समुद्र, नद, नदियाँ तथा वृक्ष आदि स्थावर जङ्गम समस्त वस्तु तुम्ही हो । देव, तिर्यक् मनुष्य, दानव, देवता, माता, पिता, भ्राता, ये भी सब तुम्हीं हो । ६७ ॥ ६८ । तुम्हीं सर्वेश हो, परब्रह्मरूप ब्रह्म हो, यह संसार भी तुम्हारा ही रूप है, तुम अक्षर हो, परम प्रधान ज्योति हो । और मैं कहाँ तक बतलाऊं हे रघुपूङ्गव ! यह सब कुछ एकमात्र तुम्ही हो ॥ ६९ ॥ शान्त, सर्वगत, सूक्ष्म, परब्रह्म सनातन, जगत्पति और राजीवलोचन रामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ । इस प्रकारकी स्तुति सुनकर रामचन्द्रजीने शिवजीसे कहा-हे गिरिजाकांत ! मैं तुम्हारे ऊपर परम प्रसन्न हूँ। जो भी चाहो, सो उत्तम वर मांग लो ॥ ७० ॥ ७१ । श्रीशिवजीने कहा हे राम ! हे करुणानिधे ! यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो मैं आपको इस प्रसन्न मूर्तिको ही देखकर कृतार्थ हो गया ॥ ७२ ॥ हे पुरुषोत्तम ! मैं धन्य हूँ और अतिशय पवित्र हूँ । आज मेरे सब कार्य सफल हो गये । मेरी तपस्याएं सफल हुईं, मेरा ज्ञान सफल हो गया और शास्त्रोंका श्रवण करना भी सार्थक हो गया । आपके इन चरणकमलोंके दर्शनसे ही मेरा सब कुछ सफल हो गया ॥ ७३ ॥ ७४ ॥ हे रघुनाथ ! यदि आपको वर ही देना हो तो मुझे अपना अद्वैत तथा विमल ज्ञान दीजिए । मुझे अपने नामका कीर्तन करानेकी शक्ति और अपने इन चरणकमलोंका सद्भाक्त दीजिए ॥ ७५ ॥ इसके अनन्तर अतिशय प्रसन्न होकर रामचन्द्रजीने शिवजीसे कहा-हे गिरिजेश ! हे महाभाग ! मैं तुम्हारे अभिलषित वरोंको देनेके लिए प्रस्तुत हूँ, मांगों ॥ ७६ ॥ शिवजीने कहा-हे रघुनाथ ! मैं कोई वरदान नहीं चाहता । मैं चाहता यही हूँ कि सदा आपके चरणोंमें मेरी भक्ति बनी रहे । हे नाथ ! मुझे यही वर प्रिय है और यही देनेके लिए मैं आपसे बारम्बार अनुरोध करूँगा