श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 271, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः २ ] विलासकाण्डम् २५५
एवं शिवेन यः प्रोक्तः स्तवराजः शुभावहः स एवाद्य त्वया पृष्टस्तवाग्रे कथितो मया ॥७९॥
अयं श्रीरघुनाथस्य स्तवराजो ह्यनुत्तमः। सर्वसौभाग्यसंपत्तिदायको मुक्तिदः स्मृतः ॥८०॥
कथितो गिरिशेनेशा नेत्रादौ सारसंग्रहः गुह्याद्गुह्यतरो नित्यस्त्वत्र स्नेहान्प्रकीर्तितः ॥८१॥
यः पठेच्छृणुयाद्वापि त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः। ब्रह्महत्यादिपापानि तन्ममानि बहूनि च ॥८२॥
हेमस्तेयसुरापानगुरुतल्पयुतानि च। गोवधाद्युपपापानि चित्तान्यसंमथानि च ॥८३॥
सर्वैः प्रमुच्यते पापैः कल्पापुत्रशतोद्भवैः। मानसं वाचिकं पापं कर्मणा समुपार्जितम् । ८४॥
श्रीरामस्मरणेनैव व्यपोहति न संशयः इदं सत्यमिदं सत्यं सत्यं नैवान्यदुच्यते ॥८५॥
रामः सत्यं परं ब्रह्म रामात्किंचिन्न विद्यते । तस्माद्रामस्वरूपं हि रामः सर्वमिदं जगत् ॥८६॥
श्रीरामचन्द्र रघुपूङ्गव राजवर्य राजेन्द्र राम रघुनायक राघवेश ।
राजाधिराज रघुनायक रामचंद्र दामोऽहमद्य भवतः शरणागतोऽस्मि ॥८७॥
उत्फुल्लामलकोमलोत्पलदलश्यामाय रामाय चाकामाय प्रशमाय निर्मलगुणग्रामाय रामान्मज ।
ध्याना रूढमुनींद्रमानमगरो हंसाय संसारविध्वंसाय स्फुरदोजसे रघुकुलोत्तमाय पुंसे नमः ।८८ ।
एवं शिष्य मया प्रोक्तो यथा पृष्टस्त्वया मम । स्तवराजो राघवस्य श्रवणात्पापनाशनः ॥८९॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे विलासकाण्डे वाल्मीकीये
शंकरकृतरामस्तवराजो नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
द्वितीयः सर्गः
( राम द्वारा सीताके सौन्दर्यका वर्णन )
विष्णुदास उवाच
गुरो ते प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं मां वक्तुमर्हसि । अयोध्यायां राघवेण सीतयाऽतिसुरूपया ॥ १ ॥
॥ ७७ ॥ श्रीरामदासने कहा—इस प्रकार स्तुति करनेपर रामचन्द्रजी ने शिवजीके इच्छानुसार वर दिया और अपने मनसे भी उनको बहुतसे ऐसे वर दिये, जिनको शिवजीने माँगा ही नहीं था ॥ ७८ ॥ इस प्रकार शङ्करजी-का कहा हुआ शुभावहक 'रामस्तवराज' मैंने तुम्हारे पूछनेपर कह सुनाया ॥ ७९ ॥ यह रामचन्द्रजीका स्तवराज सब स्तोत्रोंमें श्रेष्ठ है यह सब प्रकारके सौभाग्य, सम्पत्ति और मुक्तिको देनेवाला है ॥ ८० ॥ शिवजीने वेदोंका सारांश निकालकर इसमें रख दिया है और यह अत्यन्त अलभ्य वस्तु है, किन्तु तुम्हारे सच्चे प्रेमके वशीभूत होकर मैंने तुमको बतलाया है ॥ ८१ । जो प्राणी सुबह शाम या तीनों कालमें इसका पाठ करता है, उसके ब्रह्महत्या जैसे महान् पातक तथा सुवर्णका चुराना मद्यपान गुरुके बिछौनेपर लेटना, गोवध, किसी प्रकारके मानसिक पाप आदि जो संकड़ों कल्पसे एकत्रित हो गये हों, वे सब श्रीरामस्तवराजके स्मरणमात्रसे नष्ट हो जाते हैं। यह बात बिल्कुल सच है। इसमें किसी प्रकारका धोखा न समझना चाहिए ॥ ८२-८५ ॥ रामचन्द्र सत्य परब्रह्म हैं। उनसे बढ़कर और कोई है ही नहीं। अतएव यह समस्त संसार रामका ही स्वरूप है ॥ ८६ ॥ हे रामचन्द्रजी ! हे रघुपूङ्गव ! हे राजाओंमें श्रेष्ठ ! हे रघुनायक ! हे राघवेश ! हे राजाधिराज ! हे रामचन्द्र ! मैं एक अकिञ्चन दास आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ८७ ॥ नवविकसित निर्मल नील-कमल-दल सरीखे जिनका श्याम स्वरूप है, जिनको किसी प्रकारकी कामना नहीं है, जो पूर्ण शान्तमूर्ति हैं, जो निर्मल गुणोंके राशिखरूप हैं जो ध्यानास्कूढ मुनियोंके मनमानसरूं हंस हैं, जो अपने भ्रूभङ्गमात्रसे संसारको विध्वंस करनेम समर्थ हैं, ऐसे रघुवंशभूषण तथा परम पुरुष रामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ८८ ॥ हे शिष्य ! इस तरह मैन तुम्हारे प्रश्नानुसार यह पापराशिनारक स्तवराज तुम्हे सुना दिया ॥ ८९ ॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासमन्विते विलासकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! मैं आपसे यह पूछना चाहता हूँ कि अयोध्या म परम रूपवती सीताके