भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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२५६                                 आनन्दरामायणे                                  [ सर्गः २

कथं भुक्ता वरा भोगाः किं क्रियाचरितं शुभम् । चरित्रं तस्य सकलं वद मंगलदायकम् ॥ १ ॥

श्रीरामदास उवाच

सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स सावधानमनाः शृणु । सर्वान्तां वाजिमेधांश्च च रघुनन्दनः ॥ २ ॥
निर्वर्त्य सीतया सार्धमयोध्यायां बन्धुभिः सुखम् । जानकीं रञ्जयामास नानाभोगैर्मनोहरैः ॥ ४ ॥
यत्किञ्चित् शृणु मांत्सर्यं विलासचन्द्रितं शुभम् । शृण्वतां कर्णपेयञ्च श्रवणाद्मङ्गलप्रदम् ॥ ५ ॥
कः कृत्स्नं चरितं वक्तुं तयोः क्रीडान्वितं क्षमः । अतः संक्षेपतः किञ्चिद्वक्ष्यामि तव सन्निधौ ॥ ६ ॥
अथ सौतयुतो रामः पार्वत्या शङ्करो यथा । क्रीडां चकार कन्दर्पलीला यावत्समाऽकरोत् ॥ ७ ॥
हेमरत्नमये दिव्यगेहे वैकुण्ठसन्निभे । विद्याधरान् गन्धर्वस्य मनोज्ञं शशिमन्निभम् ॥ ८ ॥
भित्तौ रत्नोपला यत्र हेम्नः पंकीकृता यत्र हि यत्र स्तंभाः स्फाटिकाश्च यत्र मारकतोद्गमाः ९ ॥
प्रतोल्यः शतशो रम्याः हेमनीलादिनिर्मिताम् । मुक्तागुञ्ज्यवला यत्र भित्तयश्चित्रविचित्रिताः । १० ।
यत्र हेममयी भूमियंत्र मुक्तामयं शुभम् । वितानं पुष्पहारैश्च मुक्तागुच्छैर्विराजितम् । ११ ॥
हेमतंतुमयास्तत्र भित्तिवस्त्राण्यनेकशः । यथायूनमनुष्यैश्च समदो नैव जायते ॥ १२ ॥
एवं तद्विस्तृतं रम्यं गन्धद्विपे रराजितम् । हेमकूटा विशाजन्ते प्रभायाश्त्रेषु चित्रिताः । १३ ॥
यत्र चित्राण्यनेकानि मोहयन्ति मृगीदृशाम् । यत्र हेममया रम्याः पर्यङ्काश्चतुर्विंशतः ॥ १४ ॥
हेमकौशेयसूक्ष्मतंतुपट्टैर्विगुम्फिताः । महाहंसमनैः पुष्पजालैर्गन्धान्विताः शुभाः ॥ १५ ॥
चतुष्कोणे लम्बमानमुक्ताजालैर्विराजिताः । येषु दिग्याः कशिपवस्तथोपकधेशानि च ॥ १६ ॥
केचिच्छयनान्येषु रामराणि महान्ति च । गोपुच्छाद्वलस्त नैर्हंसभवादीनि मन्ति हि १७


सत्य पूछते हुए रामचन्द्रजीने किस प्रकारके भोगोंको भोगा और कौन-कौनसे शुभ कार्य किये । उस प्रकारके समस्त मङ्गलदायक रामचरित्र आप मुझको सुनाइए ॥ १ ॥ २ ॥ श्री रामदासने कहा— हे वत्स ! तुमने बहुत ही उत्तम प्रश्न किया है, सावधान होकर सुनो । रामचन्द्रजीने सब अश्वमेधादि की अश्वमेध यज्ञकी दीक्षा देकर दीक्षा-दीक्षाका काम पूरा कर दिया। सब सीता तथा अपने सब भाइयोंके साथ राम सुखपूर्वक रहने लगे। उन्होंने विविध प्रकारके भोगोंसे माताको प्रसन्न किया । ३ ॥ ४ ॥ उनके विलासोंकी कथाओंका जो परम मङ्गलदायक है हे मुने सुनाता हूँ सो रामका यह चरित्र श्रवण करनेके कारण अमृत होता है ॥ ५ ॥ सीता तथा रामके समस्त चरित्र कहनेका शक्ति ना हममें अथवा किसीमें भी नहीं है । अतएव मैं संक्षेपस सहित चरित्र तुम्हें सुनाऊँगा ॥ ६ ॥ अश्वमेधयज्ञके अनन्तर रामचन्द्रजी, शङ्कर-पार्वतीके समान सीताजीके साथ कन्दर्पके सदृश अपनी-अपनी इच्छानुसार क्रीड़ा करने लगे ॥ ७ ॥ सुवर्ण तथा अनेक प्रकारके रत्नोंसे रचित एवं वैकुण्ठके समान दिव्य भवनमें चन्द्रमा सदृश स्वच्छ तथा सुन्दर रामचन्द्रजीका प्रमदगृह था ॥ ८ ॥ जिसकी दीवालमें रत्नोंके पन्नोंके जड़के दरस जड़े हुए थे । जिसमें चारों ओर स्फटिक और मरकत मणिके खम्भे लगे हुए थे ॥ ९ ॥ जिसमें वारय ज ड़ि तणियां प ङ्कि त बद्ध हुई थीं । जिसमें आने जाने वाले मार्गोंके दोनों ओरसे वह भवन विद्युत्के खंबेके समान दिखायी देता था । दीवारोंमें कितने ही चित्र लगे हुए थे ॥ १० ॥ उस भवनकी भूमि सोनेकी थी, जिसमें मोतियोंकी झालरसे ढके हुए चाँदनी लगी थी । ११ ॥ जिसमें सोनेके तारसे बने हुए कपड़ोंके चादरें जगह-जगह टॅगी हुई थीं । वह भवन इतना विशाल था कि उसमें दस हजार मनुष्योंको भी दुःसहधूप लग जाता था ॥ १२ ॥ उस प्रकार वह भवन बड़ा घमण्ड तथा मार-सुन्दर था और उसमें रत्नके दीपक जला करते थे । प्रासादके अग्रभागमें सामने कलश चित्रित किये हुए थे ॥ १३ ॥ अनेक हजारों चित्र स्त्रियोंका मुग्ध कर देते थे और उसे देखकर स्त्रियोंको अपने स्तन-वस्त्रोंतकी भी सुधि नहीं रह जाती थी । वहां सुवर्णके पच्चीसोंपच्चीस बिस्तरे बिछे हुए थे ॥ १४ ॥ जिनपर सुवर्णके तार और रेशमकी बनी हुई चादरें पड़ी थीं । जो भवन कीमती कपड़ा और फूलोंसे सजा हुआ था ॥ १५ ॥ जिसके चारों ओरके चारों कोनेमें मोतियोंके बड़े-बड़े झुम्के लटके हुए थे, जिसमें मखमलकी जड़ाऊ तकियाये लगी हुई थीं ॥ १६ ॥ रुई गौपोंके पश्चनोंके बड़े-बड़े