श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 274, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| २६८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ९ |
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जयतु स विराधस्य घातकृज्जयतु दूषणादित्रमर्द्दनः ।
जयतु यो मृगं मोचयद्द्रवाज्जयतु यः कबन्धं क्षणाज्जहौ ॥३१॥
जयतु वालिहा सेतुकारको जयतु रावणदिमर्दकः ।
जयतु स्व पदं प्राप सीतया मगलस्नानकृन्मुदा ॥३२॥
जयतु वाक्यतो भृगुम्प यः सकलभूतल पर्यटन् चिरम् ।
जयतु यात्रकृल्लोकशिक्षया जयतु जानकीं रंजयन् स्थितः ॥३३॥
श्रीरामदास उवाच
रघुवरस्य यन्महर्षिभिः कृतं नवकमुत्तमं यः पठिष्यति ।
तपर्नान्तर्गये भक्तितत्परो निजमनोऽर्थितं संगमिष्यते ॥३४॥
एतादृशे रम्यगेहे मयः शिष्य प्रवर्जिते । सीतया स सुखं रेमे चैकपत्नीव्रतस्थितः ॥३५॥
अथ सा जानकी देवी रंजयामास राघवम् । स्थित मंचकवर्ये तं चित्रक्रीडादिकौतुकैः ॥३६॥
मंचकस्थश्च श्रीरामस्त्वेकदा सुखनिर्भरः । सीतासौंदर्यमालोक्य वर्णयामास तां मुदा ॥३७॥
हे सीते कञ्जनयने ब्रह्मणा त्वं कथं क्षिता । जानाम्यहं वितर्केण तेन त्वं निर्मिताऽसि न ॥३८॥
त्वद्रूपमद्दशी नान्यां पश्यामि जगतीतले । प्रतिपच्चन्द्रकलया स्पर्धयंति नखानि ते ॥३९॥
नखसंख्या रक्तवर्णाः शुभा दाडिमबीजवत् । अगुल्यो वर्तुला रम्यो त्रियंगुष्ठोपमो तव ॥४०॥
मृदुले ते पादतले कञ्जपत्रततोपमे । समे रेखाप्रत्रजयुते स्वस्तिकादिसुचिह्निने ॥४१॥
सीते तेऽग्युर्ध्वभागौ तौ निर्लोमौ मांसलो शुभौ । अङ्घ्री मृद्लो पीतो नृपस्त्रीवदनोचितौ ॥४२॥
पादमूले दधिजेन स्पर्द्धेते रक्तवस्तुले । पादपृष्ठ मये पीने कोमले लोमवर्जिते ॥४३॥
करनेवाले, अत्रि आदि ऋषियोंसे पूजित रामचन्द्रजीकी जय हो ॥ ३० ॥ जिन्होंने विराधको मारा था और दूषणादि राक्षसोका संहार किया था। जिन्होंने मृगरूपधारी मारीचको मुक्ति दी थी और बाणमात्रसे कबन्धका विनाश कर दिया था, ऐस रामचन्द्रका जय हो ॥ ३१ ॥ वालिको मारनेवाले, समुद्रमें सेतु बाँधनेवाले, रावणादिके नाशक सीताको लंकासे वापस लाकर अपने राजसिंहासनपर सुशोभित और मगल-स्नान करके पवित्र रामचन्द्रकी जय हो । ३२ ॥ कुम्भोदर ब्राह्मणकी आज्ञासे चिरकालतक समस्त पृथ्वीका पर्यटन करनेवाले लोकशिक्षके निमित्त बहुप्रथ यज्ञ करनेवान और सीताजीको प्रसन्न करते हुए स्थित रामचन्द्रकी जय हो ॥ ३३ ॥ श्रीरामदासजी कहन लगे- यह ऋषियों द्वारा किय हुए नौ श्लोकोंका स्तोत्र वर्षान्तगेमे जो कोई पाठ करेगा, उसकी मनाभिलषित कामना पूर्ण होगी । जैसा मैं ऊपर कह आया हूँ, ऐसे सुन्दर भवनम् रामचन्द्रजी सीताके साथ सुखपूर्वक एकपत्नी व्रत धारण करके विहार करते थे । उसी प्रकार सीताजी भी नाना प्रकारके कौतुक कराकरके रामचन्द्रजीको प्रसन्न करती थी ॥ ३४-३६ ॥ एक दिन रामचन्द्रजी पर्यंगपर बैठे थे। सहसा वे सीताके सौन्दर्यको देखकर कहने लगे-हे कमलनयने सीते ! मैं अपने मनम बार-बार यही सोचता रहता हूँ कि तुम्हे ब्रह्माजीने कैसे बनाया होगा। मेरा तो जहाँतक ख्याल है कि तुम्हारी रचना ब्रह्माजाने नहीं की है ॥ ३७ ॥ ३८॥ बल्कि कोई दूसरा कारीगर तुम्हारी इस कायाको बनानके लिए नियुक्त किया गया होगा। क्योंकि तुम्हारे सदृश रूपवती नारी मैने संसारमें कहीं देखी ही नहीं। तुम्हारे पैरोंके नाखून अपनी अनुपम छता द्वारा चन्द्रकलासे बाजा मारनेके लिए उतावने हो रहे हैं ॥ ३९ ॥ नाखूनोंकी लाली अनारदानेकी तरह झलक रही है। तुम्हारे वर्तुलाकार और सुन्दर अंगूठे बच्चोंके अंगूठोका नाई कोमल दीखते है ॥ ४० ॥ तुम्हारे चरण कमलकी पंखुडियांक सदृश कोमल और सुन्दर हैं। उनम ध्वजादिकी शुभ रेखाएँ खिची हैं और मेहावर लगी हुई है पैरोंके ऊपरका भाग सुन्दर तथा सुडौल है। उनमे नर्से नहीं दिखाई देतीं। इसीसे तो वे चरण बड़ी-बड़ी रानियोंके पूज्य हो रहे हैं ॥ ४१॥ ४२ ॥ तुम्हारे पैरके नीचेका हिस्सा मक्खनकी तरह मुलायम है, दोनों गुल्फ लाल-लाल वर्तुलाकार और माँडे