श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
| २६८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ९ |
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जयतु स विराधस्य घातकृज्जयतु दूषणादित्रमर्द्दनः ।
जयतु यो मृगं मोचयद्द्रवाज्जयतु यः कबन्धं क्षणाज्जहौ ॥३१॥
जयतु वालिहा सेतुकारको जयतु रावणदिमर्दकः ।
जयतु स्व पदं प्राप सीतया मगलस्नानकृन्मुदा ॥३२॥
जयतु वाक्यतो भृगुम्प यः सकलभूतल पर्यटन् चिरम् ।
जयतु यात्रकृल्लोकशिक्षया जयतु जानकीं रंजयन् स्थितः ॥३३॥
श्रीरामदास उवाच
रघुवरस्य यन्महर्षिभिः कृतं नवकमुत्तमं यः पठिष्यति ।
तपर्नान्तर्गये भक्तितत्परो निजमनोऽर्थितं संगमिष्यते ॥३४॥
एतादृशे रम्यगेहे मयः शिष्य प्रवर्जिते । सीतया स सुखं रेमे चैकपत्नीव्रतस्थितः ॥३५॥
अथ सा जानकी देवी रंजयामास राघवम् । स्थित मंचकवर्ये तं चित्रक्रीडादिकौतुकैः ॥३६॥
मंचकस्थश्च श्रीरामस्त्वेकदा सुखनिर्भरः । सीतासौंदर्यमालोक्य वर्णयामास तां मुदा ॥३७॥
हे सीते कञ्जनयने ब्रह्मणा त्वं कथं क्षिता । जानाम्यहं वितर्केण तेन त्वं निर्मिताऽसि न ॥३८॥
त्वद्रूपमद्दशी नान्यां पश्यामि जगतीतले । प्रतिपच्चन्द्रकलया स्पर्धयंति नखानि ते ॥३९॥
नखसंख्या रक्तवर्णाः शुभा दाडिमबीजवत् । अगुल्यो वर्तुला रम्यो त्रियंगुष्ठोपमो तव ॥४०॥
मृदुले ते पादतले कञ्जपत्रततोपमे । समे रेखाप्रत्रजयुते स्वस्तिकादिसुचिह्निने ॥४१॥
सीते तेऽग्युर्ध्वभागौ तौ निर्लोमौ मांसलो शुभौ । अङ्घ्री मृद्लो पीतो नृपस्त्रीवदनोचितौ ॥४२॥
पादमूले दधिजेन स्पर्द्धेते रक्तवस्तुले । पादपृष्ठ मये पीने कोमले लोमवर्जिते ॥४३॥
करनेवाले, अत्रि आदि ऋषियोंसे पूजित रामचन्द्रजीकी जय हो ॥ ३० ॥ जिन्होंने विराधको मारा था और दूषणादि राक्षसोका संहार किया था। जिन्होंने मृगरूपधारी मारीचको मुक्ति दी थी और बाणमात्रसे कबन्धका विनाश कर दिया था, ऐस रामचन्द्रका जय हो ॥ ३१ ॥ वालिको मारनेवाले, समुद्रमें सेतु बाँधनेवाले, रावणादिके नाशक सीताको लंकासे वापस लाकर अपने राजसिंहासनपर सुशोभित और मगल-स्नान करके पवित्र रामचन्द्रकी जय हो । ३२ ॥ कुम्भोदर ब्राह्मणकी आज्ञासे चिरकालतक समस्त पृथ्वीका पर्यटन करनेवाले लोकशिक्षके निमित्त बहुप्रथ यज्ञ करनेवान और सीताजीको प्रसन्न करते हुए स्थित रामचन्द्रकी जय हो ॥ ३३ ॥ श्रीरामदासजी कहन लगे- यह ऋषियों द्वारा किय हुए नौ श्लोकोंका स्तोत्र वर्षान्तगेमे जो कोई पाठ करेगा, उसकी मनाभिलषित कामना पूर्ण होगी । जैसा मैं ऊपर कह आया हूँ, ऐसे सुन्दर भवनम् रामचन्द्रजी सीताके साथ सुखपूर्वक एकपत्नी व्रत धारण करके विहार करते थे । उसी प्रकार सीताजी भी नाना प्रकारके कौतुक कराकरके रामचन्द्रजीको प्रसन्न करती थी ॥ ३४-३६ ॥ एक दिन रामचन्द्रजी पर्यंगपर बैठे थे। सहसा वे सीताके सौन्दर्यको देखकर कहने लगे-हे कमलनयने सीते ! मैं अपने मनम बार-बार यही सोचता रहता हूँ कि तुम्हे ब्रह्माजीने कैसे बनाया होगा। मेरा तो जहाँतक ख्याल है कि तुम्हारी रचना ब्रह्माजाने नहीं की है ॥ ३७ ॥ ३८॥ बल्कि कोई दूसरा कारीगर तुम्हारी इस कायाको बनानके लिए नियुक्त किया गया होगा। क्योंकि तुम्हारे सदृश रूपवती नारी मैने संसारमें कहीं देखी ही नहीं। तुम्हारे पैरोंके नाखून अपनी अनुपम छता द्वारा चन्द्रकलासे बाजा मारनेके लिए उतावने हो रहे हैं ॥ ३९ ॥ नाखूनोंकी लाली अनारदानेकी तरह झलक रही है। तुम्हारे वर्तुलाकार और सुन्दर अंगूठे बच्चोंके अंगूठोका नाई कोमल दीखते है ॥ ४० ॥ तुम्हारे चरण कमलकी पंखुडियांक सदृश कोमल और सुन्दर हैं। उनम ध्वजादिकी शुभ रेखाएँ खिची हैं और मेहावर लगी हुई है पैरोंके ऊपरका भाग सुन्दर तथा सुडौल है। उनमे नर्से नहीं दिखाई देतीं। इसीसे तो वे चरण बड़ी-बड़ी रानियोंके पूज्य हो रहे हैं ॥ ४१॥ ४२ ॥ तुम्हारे पैरके नीचेका हिस्सा मक्खनकी तरह मुलायम है, दोनों गुल्फ लाल-लाल वर्तुलाकार और माँडे
सर्गः ९ ] विलासकाण्डम् २९९
सर्गः ९ ] विलासकाण्डम् २९९
तत्र गुल्फौ रक्तवर्णौ वर्तुलौ मांसलौ शुभौ । जंघे गोपुच्छसदृशे वर्तुले मांसले शुभे ॥४४॥
निलोमे मृदुले पीने रुचिरे श्लक्ष्णनेत्रे वरे । रन्तू नौ ने महाजानू मांसलौ बीजपूरवत् ॥४५॥
।मास्तंभोपमं चोरू मांसलौ न्वतिकोमलौ । पीनौ घनौ वर्तुलौ तौ विलासी मे मुखोचितौ ॥४६॥
जघनं मांसलं रम्यं वर्तुलं गजकुंभकत् । पीतं विलोम सुस्निग्धं मम चित्तैकमोहनम् ॥४७॥
नाहं ते वर्णने शक्तो रतिस्थानस्य भामिनि । गंभीरं वर्तुला नाभिस्त्वहृद्या प्रदश्यते ॥४८॥
वलित्रय तु जठरे दृश्यते त्रिमुखेशिवत् । सुराजमध्यं कठिना तन्वयस्ते कटिस्तथा ॥४९॥
रम्यं तथोदरं सूक्ष्मं मृदुलं मांसल शुभम् । विलोमं पीतवर्णं च पुत्रोत्पत्तिसमुद्भवम् ॥५०॥
शङ्खस्य शकलेनेव स्पष्टने तद मांसलः । पृष्ठस्तंभः कोमलश्च निम्नौ लोमविवर्जितः ॥५१॥
पार्श्वेऽतिमुदुले पीने मांसले लोमवर्जिते । कुक्षी पीने लोमहीने मांसले किंचिदुन्नते ॥५२॥
हृदयं कोमलं रम्यं मांसलं पीनमुन्नतम् । विस्तीर्णं लोमहीनं च सुस्नेहञ्च मौरुयदं मम ॥५३॥
हेमकुंभसमानौ द्वौ कुचौ पीनौ घनौ शुभौ । गजशुंडादंडतुल्यौ पीनौ ते कोमलौ भुजौ ॥५४॥
कृशा रम्भाः कोमलाश्च तेऽङ्गुल्यो जनकात्मजे । रक्ते पाणितले शंखध्वजमत्स्यादिचिह्निते ॥५५॥
मांसले कोमले प्रोच्चैः सुरखाणपिण्डने वर । करपृष्ठं लोमहीनं मांसल कोमले शुभे ।५६॥
पीनौ स्कंधौ वर्तुलौ ते जनुस्ते मांसपूरितः । कण्ठस्तंऽतिपीनश्च मवलित्रय उत्तमः ॥५७॥
मध्ये निम्नं सुपीनं ते चिबुकं वतुल मृदु । प्रवालविम्वसदृशारक्तः कोमलो, घनः । ५८।
सीते तेऽधोऽधरो भाति मधुरोऽमृतमखिमः । कुंदपुष्पकलिकाया स्पर्द्धन्ते दशनास्तव ।५९॥
सांद्राः कृत्रिमवर्णेश्च कृष्णाञ्जा मनोहरः । हेमपुष्पैरिवैततवत्तैश्चित्रविचित्रिताः । ६०॥
हैं। जंघायें तौकी पूंछके समान वरतुलम एवं गाढ़ी ताजी हैं । ४३ । ४४ ॥ उनमें न तो कहीं एक भी रोम दिखाई देते हैं न शरीरकी नसें हों। दोनो जघन जानू (बिजौरे नींबू) की तरह मोटे और बर्तुलाकार हैं ॥ ४५ ॥ तुम्हारे दोनो ऊरु कदली खम्भकी नाईं मट और कोमल हैं। उनका सुन्दर वर्ण और उनकी सुन्दर छटा मुझे बहुत अच्छी लगती है ॥ ४६॥ जघनभाग भी मोटा, सुन्दर और हाथीक मस्तकी तरह वर्तुल है। यह पीतवर्ण, लोमहीन, सुचिक्कण तथा मनोमोहक है ॥ ४७ । हे भामिने ! तुम्हारे रतिस्थानका वर्णन करनेमें मैं सर्वथा असमर्थ हूँ। तुम्हारी नाभी भी गहरी वर्तुलाकार और सुन्दर है । ४८ ॥ तुम्हारे पेटमें तीन रेखाएँ शांत वेणीके समान दिखाई पड़ती हैं। तुम्हारी कमर मृगराज (सिंह) की तरह पतली है ॥ ४९ ॥ तुम्हारा उदर सूक्ष्म, मृदुल और मांसल है। उसम कहीं भी लोम नहीं दिखाई पड़ता। वह तीन वर्णका है और उसकी देखने से भावी पुत्रोत्पत्तिका सूचना मिलती है ॥ ५० ॥ शङ्खखण्डकी तरह माटी ताजी तुम्हारी पीठकी रीढ़ है। दोनों पार्श्वभाग ही अतिकोमल होनेसे दीप्त ही बनते हैं। कुक्षि भी पीतवर्ण, लोमहीन, कुछ ऊँची एवं मोटी ताजी है । ५१ ।। ५२ ॥ हृदय कोमल, रम्य, मांसल, पीला और ऊँचा है। वह लोमहीन है और बहुत दूर तक फैला हुआ है। वह छूनेमें चिकना मालूम होता है । इसलिए मुझे वह बहुत सुन्दर जंचता है । ५३ ॥ स्वर्णकलशकी नाईं मोटे और कठोर तुम्हारे दोनों कुच हैं। तुम्हारी दोनों भुजाएँ हाथीकी सूंडकी तरह मोटी, कोमल और सुन्दर हैं ॥ ५४ ॥ पतली सुन्दर और कोमल तुम्हारे हाथोंकी उँगलियाँ हैं। शंख, ध्वज, मकर तथा मत्स्यादि चिह्नों युक्त लाल-लाल तुम्हारी दोनों हथेलियाँ हैं ॥ ५५ ॥ उसी तरह उनका पृष्ठभाग भी लोमहीन, मांसल, कोमल और सुन्दर है ॥ ५६ ॥ बर्तुलाकार, मोटे ताजे, मांससे अच्छी तरह भरे हुए और शङ्खकी नाई तुम्हारे दोनों कन्धे हैं। ग्रीवामें तीन सुन्दर रेखाएँ हैं । ५७ ॥ तुम्हारा मध्यभाग भी निम्न, पीन एवं कोमल है। प्रवाल और बिम्बफलका तरह लाल, कमल और रसभरा तुम्हारा चिबुक है ॥ ५८ ॥ हे सीते ! अमृतको तरह मधुर तुम्हारा अधरोष्ठ है। कुन्दकी कलिकाकी लज्जित करनेवाले तुम्हारे दाँत हैं ॥ ५९ ॥ उनमें बत्तीसी पड़ी हुई है। पान खाने खाते वे काले हो गये हैं। उनमें जहाँ-तहाँ सुवर्णके तारकी
| २६० | आनन्दरामायणे | [ सर्ग २ |
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ऊर्ध्वाधरः कोमलस्ते रक्तवर्णो विभाव्ययम् । ऋजु घ्राणमुन्नसं ते दिव्यं भाति मनोहरम् ॥६१॥
तव नेत्रे कंजपत्रतुल्ये दीर्घे मनोहरे । हरिणानेत्रसदृशे कामबाणान्विव प्रिये ॥६२॥
तव कर्णौ घनौ पीनौ बहुभारमहौ वरौ । तव सीतेऽतिसुस्निग्धे प्रोच्चे गंडस्थले शुभे ।६३।
कृशे भ्रुवौ चापतुल्ये कृष्णवर्णे सुकोमले । ललाटं तव विस्तीर्णं मांसलं हि समं मृदु ।६४।
गङ्गाकूलोपमः सीते सीमन्तस्तव सुंदरः । हेमवत्प्रतभानास्ते केशाः स्निग्धाः सुकोमलाः । ६५ ।
मस्तकस्तव सूक्ष्मश्च वर्तुलो मांसलः शुभः । वेणीबन्धो वरः सीते जघने पतितस्तव ।६६।
चंपपुष्पोपमो वर्णः सौकुमार्यमपि प्रिये । माते त्वानानस्पर्द्धा शशांकः क्षयमाप सः ॥६७॥
त्वन्नेत्रविजिता सीते मृगी धावति कानने । सीते त्वद्भ्रुकुटिस्पर्द्धि चाप भग्नं मया पुरा ॥६८॥
तव नेत्रकटाक्षेण मुनीनां मदनोद्भवः । नेत्रयोश्च चांचल्यं मकरान् लज्जयत्यहो ।६९॥
तव नासं शुको दृष्ट्वाऽऽत्मानं धिक्करोति हि । दृष्टिष्टयोः श्रोणिमी ते सौकुमार्यमपि प्रिये ॥७०॥
सहकारतरोश्चापि रक्तः कोमलपल्लवः । लज्जया हरितो भाति त्यक्त्वा स्त्रीयां सुरक्तताम् । ७१ ।
सौकुमार्यं तथा त्यक्त्वा लज्जया तेयतोऽपिसः । एवं किं कि मया कान्ते सौदर्यं तव जानकि ।७२॥
वर्णनीयं महद्दिव्यं तत्र ब्रह्माऽपि कुंठितः । इत्युक्त्वा राघवः सीतां प्रीतया तां परिषस्वजे ।७३।
तच्छ्रुत्वा वर्णनं स्वाय लज्जयाऽधः कृतानना । किंचिन्स्मितताननं कृत्वा तस्याथंके पवेश सा ।७४॥
इति श्रीमत्कोटीरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे विलासकाण्डे वाल्मीकीये सीतावर्णनं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
चित्रकारी की हुई है। इससे वे और भी सुन्दर मालूम होते हैं ॥ ६० ॥ तुम्हारा ऊपरका होठ भी कोमल और रक्तवर्ण है। कोमल और ऊँची तुम्हारी नासिका है, जो बड़ी सुन्दर दीखती है । ६१ । कमलकी पंखड़ियोंकी नाईं सुन्दर तुम्हारे दोनों आंख हैं। उन्हें चाहे हरिणीके नेत्रोंकी तरह कह लो या कामबाणकी भाँति चित्ताकर्षक कहो । ६२ ॥ तुम्हार दोनों कान भा घन और पीन हैं। वे बहुतसे गहनोंका बोझ सह सकते हैं। तुम्हारे गंडस्थल अति कोमल और ऊंचे हैं । ६३ । पतली-पतली और काले रंगकी तुम्हारी दोनों भौंह धनुषाकार दीखती हैं तुम्हारा ललाट खूब चौड़ा और बराबर है ॥ ६४॥ तुम्हारी माँग गंगाके तटकी तरह सुन्दर दीखती है। सोनेके तारकी भाँति सुन्दर, चिकन और कोमल तुम्हारे केशोंका कलाप है ॥ ६५ ॥ तुम्हारा मस्तक सूक्ष्म, वर्तुल, मांसल और सुन्दर है। तुम्हारे केशोंका वेणीबन्ध जंघनतक झूलता है ॥ ६६ ॥ चम्पाके फूलकी तरह तुम्हारा सुन्दर वर्ण है। उसी तरह उसमें कोमलता भी है। हे सीते ! तुम्हारे मुखसे होड़ करनेके कारण चन्द्रमाको क्षयरोग हो गया ॥ ६७ ॥ तुम्हारी आँखाम हार मानकर मृगियों वनको भाग गयीं और इधर-उधर दौड़ती फिरती हैं। हे जनकात्मजे सच पूछो तो उस समय धनुषयज्ञमें तुम्हारी इन भौंहोंसे स्पर्धा करनेके ही कारण मैंने धनुषको तोड़कर उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये थे ॥ ६८ । मुझे पूरा विश्वास है कि तुम्हारे नेत्रोंके कटाक्षसे बड़े बड़े तपस्वियोंके हृदयम भी कामका वेग प्रादुर्भूत हो जायगा। तुम्हारे नेत्राकी चंचलता मछलियोंको भी मात कर रही है तुम्हारी नाक देखकर तोते अपनेको बार बार धिक्कारते हैं। तुम्हारे होठोंकी लालिमा ओद कोमलता देखकर आम्रवृक्षका लाल और नया पत्ता लज्जाके मारे हरा हो गया है। तुम्हारी लालिमाके आगे उसकी लालिमा नहीं ठहर सकी। हे कान्ते ! मैं तुम्हारी सुन्दरताका कहाँ तक वर्णन करूँ, ६९-७२ ॥ इसके वर्णनमें चतुर्मुख ब्रह्मा भी हार मान लेंगे। ऐसा कहकर रामचन्द्रजीने सीताको अपने हृदयसे लगा लिया ॥ ७३ ॥ इस तरह अपनी बड़ाई सुनकर सीता भी लज्जासे नीचा मुंह करके बैठ गयीं। फिर थोड़ा मुसकाकर पतिदेवकी गोदन जा बैठीं ॥ ७४ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्द-रामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित ज्योत्स्ना भाषाटीकायां सीतावर्णनं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
सर्गः ३ ] विलासकाण्डम् २६१
सर्गः ३ ] विलासकाण्डम् २६१
तृतीयः सर्गः
(सीताकृत आध्यात्मिक प्रश्नके उत्तरमें रामका देहरामायण-वर्णन)
श्रीरामदास उवाच
अथ सा जानकी रामं विनयाल्लज्जिताऽब्रवीत् । राम राजीवपत्राक्ष किञ्चित्प्रष्टुं मम प्रभो ॥ १ ।
वांछाऽस्ति चेत्कृपोपन्नाऽज्ञां तर्हि पृच्छाम्यहं नवं । तन्माताऽचनं श्रुत्वा राघवः प्राह जानकीम् ॥ २ ।
पृच्छस्व सीते यत्तेऽस्ति प्रष्टव्यं मां सुखेन ननु । मा शङ्कां मन रम्भोरो गुह्यं चापि वदामि ते ॥ ३ ।
तद्रामवचनं श्रुत्वा नव्या न प्राह जानकी । राम राम महाबाहो किञ्चिदुपदिशस्व माम् ॥ ४ ।
येन मां नव महान् भवेदर्थश्च महोज्ज्वलम् । तन्सीतावचनं श्रुत्वा रामचन्द्रोऽब्रवीद्वचः ॥ ५ ॥
सम्यक् पृष्टं त्वया गीते शृणुष्वैकाग्रमानसा । मम ज्ञानाथ ते वच्मि परं कौतूहलं शुभम् ॥ ६ ।
श्रीरामचन्द्र उवाच
सच्चिदानन्दरूपाब्धेरात्मसागरस्य तदिच्छया । जगद्रूपस्याऽऽभांशबिंदुः शुद्धो विनिर्गतः ॥ ७ ॥
आत्मनामा मातृभूतबुद्धेर्नारायणात्परः । शुद्धसत्त्वान्तःकरणं पिता चान्यन्न इंगितः ॥ ८ ॥
तस्यात्मनश्च चत्वारो भेदास्ते प्रथयः स्मृताः । तुर्यावस्थस्तत्र वरस्तो जाग्रदवस्थकः । ९ ॥
स्वप्नावस्थस्तृतीयश्चावरः सुषुप्त्यवस्थकः । हृदयाकाशस्तस्थानं मनोवेगो बहिर्गमः ॥१०॥
मनोदुर्वृत्तिपातश्च मनोवेगस्य खंडनम् । मायायोगस्ततस्तस्य पूर्वसंस्कारनिग्रहः । ११॥
ततः कुबुद्धिहेतोर्हि भवारण्यऽटनं चिरम् । दम्भस्य निग्रहस्तत्र पंचभूतात्मिका स्थिरा ॥१२॥
आत्मनः पर्णकुटिका विश्रान्तिस्थानमीरिता । कामक्रोधलोभप्रमत्तशत्रूणाकृन्तनं स्मृतम् ॥१३॥
मोहस्य निग्रहस्तत्र शुद्धमायाश्रयन्वतः । रजोरूपा तु या माया जठराग्नी तदा स्मृता ।१४।
श्रीरामदास कहने लगे-कुछ देर बाद लज्जा और विनयसे सकुचाती हुई सीताजी रामचन्द्रसे बोलीं- हे प्रभो ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ ॥ १ ॥ यदि आप आज्ञा दें तो पूछूं । सीताकी वाणी सुनकर राम-चन्द्रजीने कहा-॥ २ । हे प्रिये ! जो कुछ भी तुम्हारी इच्छा हो, आनन्दपूर्वक पूछो । किसी प्रकारकी शङ्का मत करो । यदि कोई गुप्त बात होगी, वह भी मैं तुमसे बतलाऊंगा । ३ ॥ इस तरहकी बात सुनकर सीताजी कहा- हे महाबाहो राम ! मुझे आप कोई ऐसा उपदेश दें, जिससे मैं आपको अच्छी तरह समझ लूँ । इस बातको सुनकर रामने सीतासे कहा ॥ ४ । ५ ॥ हे देवि सीते ! तुमने बहुत ही अच्छी बात पूछी है मैं अपने वास्तविक तत्त्वको तुम्हें अच्छी तरह समझाता हूँ मन एकाग्र करके सुनो । आत्मज्ञान-प्राप्तिके लिए मैं तुम्हें कौतूहलजनक बात बता रहा हूँ । ६ । रामचन्द्रजी कहने लगे- सत्, चित् और आनन्दरूपी एक महान् सागर है। उसकी इच्छारूपी तरङ्गसे एक परम पवित्र आत्मारूपस्वरूप बिन्दु निकला । उसका नाम पड़ा 'आत्मा' उसकी माता हुई शुद्ध, बुद्ध और सत्त्वमय अन्तःकरण उसका पिता हुआ ॥ ७ ॥ ८ ॥ उस आत्माके चार भेद हुए वे ही आत्माके चार भाई कहलाये । उनमें सबसे श्रेष्ठ हुई तुरीयावस्था, उससे कुछ न्यून जाग्रदवस्था, फिर स्वप्नावस्था और सबसे निम्न श्रेणीकी सुषुप्ति अवस्था हुई इन सबका हृदयाकाश स्थान है और मनकीगति ये अवस्थायें कभी कभी बाहर भी हो जाती हैं ॥ ९ ॥ १० ॥ मनकी दुष्ट वृत्तियोंका खण्डन, मनके आवेगपर आघात और मायाके प्राबल्यसे पूर्वसंस्कारोंका दमन करना होता है ॥ ११ ॥ यदि बुद्धि किसी तरह दूषित हुई तो इस संसाररूपी घोर जङ्गलमें बहुत दिनों तक आत्माको भटकना पड़ता है । उस समय पञ्चभूतात्मक आत्माको स्थिर करके दम्भका निग्रह करनेकी आवश्यकता होती है । १२ ।। केवल आत्मा-रूपिणी ही एक ऐसी पर्णकुटी है जहाँ कि शान्ति मिलती है । अन्यत्र सब जगह क्लेश ही है। उस पर्णकुटीमें काम, क्रोध, लोभ माह्लादि शत्रु नहीं जाने पाते । मायाकी भी वहाँ गति नहीं है। वहाँ मोहका भी निग्रह हो जाता है वहाँ ही शुद्ध-सात्त्विकी मायाका आश्रय प्राप्त होता है उस समय जब कि रजोगुणमयी
२६२ अलिन्दरामायणे [ सर्ग ३
नामव्याप्तिश्च मायाया वियोगश्च ततः स्मृतः । सुखाभावो महाक्लेशः शोकभग्नस्ततः परम् ।।१५।। विवेकस्याश्रयस्तत्र मत्स्मृतेश्च समागमः । अविवेकवधश्चापि सुन्मुखेन समागमः ।।१६।। अज्ञानतन्मोहश्च त्रिगुणाश्रयवर्त्तनम् । लिङ्गत्रयनिग्रहस्तत्र मदस्य स्मृतिकीर्त्तनम् ।।१७।। निग्रहो मन्मथस्यापि तमोऽहंकारनिग्रहः । वियोगो लिङ्गदेहस्य मायाशर्मव्यहा हतः ।।१८।। हृदयाकाशगमनमानन्दैकसुखं ततः । मायान्यामलसत्त्वैश्च सान्निध्यस्य ग्रणं स्मृतम् ।।१९।। शान्त्विक्या मायया सार्ध हृदयाकाशमुत्तमम् । महाकाशे प्रगयनं सच्चिदानन्दसंग्रहे ।।२०।। प्रवेशनं सागर हि मुक्तिर्ब्रह्माण्डमनः शुभा । सायुज्या सा परित्रेया मुक्तिर्मुक्तेश्वतुष्टये ।।२१।। एवं मयेय मे प्रोक्ता सीते सञ्ज्ञानपेटिका । वेदरत्नैर्गूढार्थैश्चामलमविनाशकैः ।।२२।। मन्वानन्दैः पंचदशश्लोकरत्नैः प्रपूरिता । मयार्पिता गृहाण त्वमस्यां बुद्ध्याऽवलोकय ।।२३।। भविष्यति मम ज्ञानमस्याः सम्यग्विचारतः । तद्रामवचनं श्रुत्वा सीता संज्ञानपेटिकाम् ।।२४।। निजहृन्मन्दिरे स्थाप्य बुद्धिवृष्ट्या मुहुर्मुहुः । मय्यनुद्धातय तूष्णीं मा मुहुर्त्तमवलोकयत् ।।२५।। तदा ज्ञात्वऽथ सकलां निजक्रीडां विदेहजा । विहस्य रघुशिष्यं मा ननाम्रांघ्रिपकंजे ।।२६।। आनंदनिमग्ना जाता सानराघवसन्विता । आनशेन्दुर्मुखीमाद्धा तूष्णीमासीत्तदा क्षणम् ।।२७।। आनन्दनिव्भैरीं सीतां दृष्टा तां राघवोऽब्रवीत् । पेटिकाया त्वया सीते किं दृष्टं तोषकारकम् ।।२८।। कच्चिद्रत्नं ददृश्यारं कच्चिच्छुद्धं मम त्वया । सत्वानं वद मां सीते यथा ज्ञातं त्वया हृदि ।।२९।।
माया अलगभित्र रहती है ॥ १३ ॥ १४ ॥ तब तमोगुणयो मायाका वियोग हो जाता है। इसमें सुखका नाम नही रहता और चारो ओर केवल दुःखकी घटाएं घिरी दिखाई देती हैं। उसके आगे शोकभग्नका दर्जा आता है ॥ १५ ॥ उसी समय हृदयमें विवेक उपजता है। साथ ही भक्तिका भी उद्रेग होता है। अज्ञान मष्ट हो पड़ता है। उन्मादसे स्नेह हो जाता है। तीन गुणवाला इस शरीरिका सबसे प्रधान कर्त्तव्य यह है कि जिस तरह भी हो सके अज्ञानसे जबको दुःखसेवा चाककरे। जब प्राणी मदका निग्रह कर लेता है तब वह लिङ्गनिग्रह कहलाने लगता है ॥ १६ ॥ १७ ॥ मन्मथ निग्रह करके मत्सरका और मत्सरके बाद अहङ्कारका निग्रह करना चाहिए। जिस समय मन्मथ लिङ्गनिग्रही हो जाता है अर्थात् मदको वशमें कर लेता है। उसी समय मायाके पराभव होनेका समय आता है ॥ १८ ॥ शब्दमय माया और है ही क्या, इन्हीं काम-आदिकोंके संघसे मायाका निर्माण हुआ करता है। इनका परास्त हो जानेपर प्राणीका आनन्द ही आनन्द रहता है। जब मायाका त्याग हो जाता है, उस समय सात्विका मायाका प्रादुर्भाव होता है। उस सात्विकी मायाके साथ प्राणी उत्पन्न हृदयाकाशका मुख अनुभव करने लगता है। उससे भी उत्कर्ष होनेपर महाकाशका निर्माण होता है । सत्, चित और आनन्द ये तीनों वहाँ सदा विद्यमान रहते हैं ॥ १९ ॥ २० ॥ इसी महान् समुद्रम भूत कामका ज्ञानवाली कल्याणदायिनी मुक्ति कहते है । चार प्रकारकी कही हुई मुक्तियोंमेसे उसका सायुज्य युक्ति कहते हैं। हे सीते ! तुम्हारे संदेहवश मैंने यह ज्ञानका पिटारी खोलकर रख दी। इसमे गूढ अर्थवाले वेदके सात्वक परिपूर्ण तथा अज्ञानादिकोंको नष्ट करनेवाले पन्द्रह श्लोकरूपी रत्न भरे हुए हैं। इसीके द्वारा मेरा मुख्य सत्व जाना जा सकता है। यह पिटारी मैं तुम्हे अर्पण करता हूँ। इसे सम्हालो और ज्ञानदृष्टिसे देखो । बार-बार इन बातोंका मनन करो तो मुझे अच्छी तरह समझ लोगी ॥ २१-२४ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर सताने उस ज्ञानकी पिटारीको अपने हृदयमे रख लिया। फिर उसे खोलकर बुद्धिवृष्टिसे कुछ देर देखती रही ॥ २५ । तब सीता,ने अपनी सब क्रीडाओका मद जाना और हँसकर रामचन्द्रजीको प्रणाम किया ।। २६ ।। सीताको उस समय एक महान् आनन्दका अनुभव हुआ । उनकी आंखोंमें आँसू आ गये, शरीरके रोग्टे खडे हो गये और थोड़ी देरके लिए सीताजी अपने आपको भी भूलकर चुप हो गयीं ॥ २७ ॥ इस प्रकार सीताकी आनन्दित देखकर रामचन्द्रजान पूछे-हे सीते ! तुमने उस पेटीमे क्या क्या तुष्टिदायक बातें देखी ? जिससे तुम्हें ऐसी प्रसन्नता प्राप्त हुई ॥ २८ ॥ क्यों, क्या ता तुम्हारा मज्ञान दूर
सर्गः १ ] विलासकाण्डम् २६१
सर्गः १ ] विलासकाण्डम् २६१
ज्ञातं त्वया वा न ज्ञातं वेत्तुमिच्छामि तन्मुखात् । यदि किंचिद्वया नाशां ज्ञानं तद्बोधयाम्यहम् ॥ ३० । इति रामवचः श्रुत्वा निमग्नानन्दसागरे । मंचारूढ्या रामचन्द्रं जानकी वाक्यमब्रवीत् ॥ ३१ । श्रीसीतोवाच राम रावणदर्पघ्न त्वद्दत्ता ज्ञानपेटिका। मयाऽवलोकिता बुद्ध्या लब्धं ज्ञानं तत्र प्रभो । ३२। निर्गुणो निर्विकारस्त्वं क्रीडेयं सकला त्वया । मत्सङ्गेनैव भूम्यां कृत्वा लोकहिताय हि ॥३३॥ पेटिकायां यथा ज्ञानं मया तत्प्रवदामि ते त्वया पञ्चदशश्लोकैर्युक्तं गुह्यमनुत्तमम् ॥३४। प्रकटं तन्करोम्यद्य तवाग्रे रघुनन्दन। सर्वेषां मन्दबुद्धीनां हिताय ज्ञानमिद्धये ॥३५। जनानां सम्बोधयितुं चरित्रं भवताऽत्र यत् । कृतं तस्य विचारेण ह्यात्मज्ञानं लभेश्वरः ॥३६॥ सच्चिदानन्दरूपी यो विष्णुर्ज्ञेयः स सागरः। भूभारहरणादीच्छा विष्णोर्या जायते शुभा ॥३७॥ स वै श्रेयस्तरङ्गोऽत्र तथाऽऽत्मांशुलवः शुभः । बहिःकृतः सागरात्तं प्रान्तात्म्यः कथ्यते भुवि ॥३८॥ बुद्धिस्तु जननी चैव कौसल्या साऽत्र कथ्यते। शुद्धसत्त्वांतःकरणं पिता तस्यात्मनः स्मृतः ॥३९॥ राजा दशरथो ज्ञेयः श्रीमानन्त्यपरः क्रमः । तस्यात्मनश्च चत्वारो भेदास्ते बान्धवाः स्मृताः । ४०॥ रामसौमित्रिभरतशत्रुघ्ना एव चात्र हि । तुर्यावस्थस्तनु वाः स त्वं दशरथान्मजः ॥४१॥ ततो जाग्रदवस्थश्च लक्ष्मणः सोऽत्र कथ्यते । स्वप्नावस्थस्तृतीयश्च भरतोऽपि निगद्यते ॥४२॥ अपरः सुषुप्त्यवस्थस्तु ज्ञेयः शत्रुघ्न एव सः । हृदयाकाशं सन्धानमयोध्याऽत्र स्मृता तु सा ॥४३॥ मनोवेगो बहिर्यात्रा विश्वामित्राध्वरे गमः मनोवृत्तिनिघातश्च ताडिकाया वधोऽत्र सः ॥४४॥ मनोवेगस्य यो भङ्गः स धनुर्भङ्ग उच्यते । मायायोगस्तनस्तस्य मम्पाणिग्रहणं स्मृतम् । ४५॥ पूर्वसंस्कारनिग्रहो जामदग्न्येनिग्रहः । ततः सुषुद्दिरेवेहि कैकेय्या वरदानतः ॥४६॥
हुआ ? अन्या, अब बताओ कि मैं कौन हूँ मुत्र तूमन जगत मन्म क्या समझा है ? मैं तुम्हारे मुखसे यह सुनना चाहता हूँ । तुमने मुझे जाना या नही ? यदि तुम्हे हमको जाननेम अब भी कुछ कसर होगी तो मैं समझाऊँगा ॥ २६ । ३० ॥ इस प्रकार रामचन्द्रजीके बचनं सुनकर माताजी मौर भी आनन्दित हो गयीं और रामचन्द्रसे कहने लगीं ॥ ३१ ॥ माताजी बोली-हे रघुनन्दन ! हे रावणके गर्वको नष्ट करनेवाले राम ! आपने मुझ जो यह ज्ञानकी पिटारी दी है, उसे मैंने अपनी आत्मदृष्टिम खूब गौर करके देखा और मुझे आपका ज्ञान-प्राप्त हो गया । ३२॥ आप निर्गुण और निर्गकार है । फिर भी मेरे साथ संसारम आपन जा जा लीलाएं की हैं, उनका उद्देश्य एकमात्र लोकहित है। मैंने इस पिटारीमें जा जो देखा है, वह बतलाती हूँ। आपने पन्द्रह श्लोकोंमें मुझे जो उत्तम ज्ञान दिया है उसे मै आपके सम्मुख प्रकट करती हूँ ॥ ३३ ॥ ३४॥ उससे संसारके समस्त अज्ञानियोंका उपकार होग अर्थात् उन्ह का ज्ञानकी प्राप्ति हो जायगी । ३५ ॥ मंदबुद्धाको समझानेके लिए आपन इस जगतीतलमे जा जो चरित्र किये है उनपर अच्छी तरह विचार करनेसे नि सन्देह आत्मज्ञानकी प्राप्ति हो सकती है ॥३६॥ सच्चिदानन्दस्वरूप विष्णु भगवान् ही सागर हैं । भगवान् भीपृथ्वीका भार उतारनेकी इच्छा करते हैं, वही उस सागरकी तरंग है। उसमेंसे एक बिन्दु आत्माशरूप होकर बाहर आ जाता है । वही आत्मा कहलाता है। उसकी बुद्धिरूपा जननी कौशल्या है। शुद्ध और सत्वगुणमय अन्तःकरण उस आत्माका पिता होता है, सो साक्षात् श्रीदशरथजी हैं । उस आत्माके चार भेद आपने बतलाये हैं। वे चार भाई राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नस्रप होकर विद्यमान हैं। उनम् तुरीयावस्थाका अंश कहा है। सो इन चारों भाइयोंम बड आप हीं हैं ॥ ३७-४१ ॥ ज पदवस्थास्वरूप लक्ष्मणजी हैं, जाग्रतावस्थास्वरूप भरतजी तथा सुषुप्तिअवस्थास्वरूप शत्रुघ्नजी हैं। हृदयाकाश स्थान जो आपने बतलाया है, वह यही अयोध्या है ॥४२-४३॥ मनोवेगका दूर होना जो आपने कहा, वही मानो विश्वामित्रके यज्ञमें आपकी यात्रा है। मनकी दुर्वृत्तियोंका घात ही ताड़का-वध है ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ मनोवेगका भंजन ही जनकपुरमे धनुष टूटना है। वही मेरा पाणिग्रहण होना ही मायाका
२६४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
भवारण्येऽटनं प्रोक्तमटनं दंडकेऽत्र ते । दंभस्य निग्रहश्चात्र विराधस्यात्र निग्रहः ॥ ४७ ॥ आत्मनः पर्णकुटिका पंचभूतात्मकश्च सः । देहोऽयं पञ्चवटिका विश्रान्त्यर्थं तवात्र मा ॥ ४८ ॥ कामस्य निग्रहः प्रोक्तः खरस्यात्र विनिग्रहः । क्रोधस्य निग्रहश्चापि दूषणस्यात्र निग्रहः ॥ ४९ ॥ लोभस्य मर्दनं तत्र त्रिशिरोनिग्रहोऽथ हि । तत्राशाकृन्तनं प्रोक्तं घ्राणेनात्र विरूपणम् ५०। तस्याः शूर्पणखायाश्च मोहस्य निग्रहः स्मृतः । मृगमार्गीचघातोऽत्र शुद्धमायाश्रयन्मनः । ५१। ममाश्रयस्ते वामांगे मात्स्थिता दंडके वने । उत्सृष्टान्नु या माया जठराग्नौ स्मृता शुभा । ५२। मम रजःस्वरूपायाः प्रवेशश्चानलेऽत्र मः । तामस्याश्चैव मायाया नियोगश्च तदा स्मृतः । ५३। मम तमःस्वरूपाया हरणं रावणेन हि । सुखालाभो महान्क्लेशतत्त्वतो मद्धियोगस्ततः । ५४। शोकवेगस्ततः प्रोक्तः कबन्धस्य वधोऽत्र सः । विवेकस्याश्रयस्त्वत्र सुग्रीवस्याश्रयोऽत्र मः ॥ ५५। मन्युद्रेकलाभश्च तव लाभो हनूमतः । अविवेकवधः प्रोक्तश्चात्र बालिवधस्तथः । ५६। उत्साहेन यतः संगः सा विभीषणमैत्रिकी । अज्ञानतरणोपायः सेतुबंधो महोदधौ ॥ ५७॥ त्रिगुणाश्रयगेहे वै लिंगदेहाह्वये शुभे । त्रिकूटाचलगम्यायां लङ्कायां रघुनन्दन । ५८। मदस्य निग्रहश्चात्र कुभकर्णवधस्त्वया । निग्रहो मत्सरस्यापि मेघनादवधोऽत्र मः ५९॥ तत्राहंकारघातश्च रावणस्य वधस्त्वया । मायानामैक्यतान्यपि त्रिविधा या मयैक्यता ६०॥ वियोगो लिंगदेहस्य लङ्कात्यागस्त्वयाऽत्र मः । हृदयाकाशगमनमयोध्यागमनं पुनः ॥ ६१ ॥ आनन्दैकसुखं तत्र राज्यभोगस्त्वया सौऽत्र हि । मायात्यागस्त्वनन्तरैर् वाल्मीकेराश्रमे मम । ६२ । त्यागोऽथ भावि श्रीराम त्वया सोऽत्रप्रकाशितः । सात्त्विक्या ग्रहणं यच्च पुनर्मे ग्रहणं स्मृतम् । ६३॥ सात्त्विक्या मायया सार्द्धं तवोद्योगो मया सह । ततश्च हृदयाकाशे महाकाशे विलापनम् ६४।
भाग है ॥ ४५ ॥ परशुरामका दर्पभञ्जन ही अहंकारका निग्रह है। इसके अनन्तर कार्यरूपिणी कैकेयीके वरदानसे आपका दण्डकारण्यमे घूमना ही भवरूपमे भटकना है। दम्भका रुक जाना ही विराधवध है ॥ ४६ ॥ ४७ ॥ पञ्चभूतात्मक आत्मरूपीका पर्णकुटी जो आपने बतलायी, वह यह शरीर ही है। जो आपके विश्राम करनेके लिए एक उपयुक्त स्थान है। ४८ । कामका निग्रह करना ही खर राक्षसका वध है और क्रोधका निग्रह दूषणका वध है ॥ ४९॥ लोभका निग्रह त्रिशिराका वध कहा गया है। आशाका विच्छेद जो आपने बतलाया, वह ही शूर्पणखाका विरूप करना है मारीच मृगका वध करना ही मोहका निग्रह है। दण्डकवनम आपने जो सत्त्वगुणमयी मुख्य अपना वामभागमे रक्खा था वह ही शुद्ध माया का आश्रय है। रजोगुण-रूपसे मेरा अग्निमे प्रवेश करना ही तमयी मायाका वियोग है। तामस रूप रावणके द्वारा हरण होना ही सुखाभाव है तुम्हारा-हमारा वियोग होना ही महाक्लेश है॥ ५०-५४ । इसके बाद कबन्धका वध करना ही शोकभङ्ग है। सुग्रीवका मित्रता ही आश्रय है। ५५ ॥ भालूके कटकका लाभ आपकी उत्साहशक्ति मिलना है। बालिका वध करना ही अज्ञानका वध करना है । ५६ उसके बाद विभीषणके साथ मैत्री होना ही उत्साहका सङ्ग है । समुद्रमे सेतुबन्धन ही अज्ञानसे तरनका उपाय है ॥ ५७॥ आपका त्रिकूट पर्वतपर पग डालना ही लिङ्गशरीर रूपमे त्रिगुणका आश्रय करना है ॥ ५८ ॥ कुम्भकर्णका वध ही मदका निग्रह है। मेघनादका वध मत्सरका निग्रह है ॥ ५९ ॥ आपने जो रावणका वध किया है वह ही अहंकारका नाश है, मायाकी एकता जो आपने कही, वह हम दोनोंका एकत्र हो जाना है ॥ ६० । लङ्काका त्यागना ही लिङ्गदेहका वियोग है। फिर अयोध्याके लिए प्रयाण करना ही हृदयाकाशका भजन है ६१ । आपका राज्यभोग करना ही एकमात्र आनन्दका अनुभव करना है फिर मायाका त्याग जो आपने बतलाया सो भविष्यमे वाल्मीकिके आश्रममे मेरा त्याग देना ही होगा। सात्त्विकी मायाका ग्रहण जो श्रीपने बतलाया सो मेरा पुनर्ग्रहण कर लेना होगा । ६२ ॥ ६३ । सात्त्विकी मायाके साथ उद्योग जो आपने कहा, सो मेरे साथ आपका
सर्गः ३] विलासकाण्डम् २६५
अयोध्यानागरीमग्रे वैकुण्ठं प्रति नेष्यसि। प्रवेशत नगरे ऽस्मिन्सच्चिदानन्द्यंशके ॥६५॥
स्वरूपं परित्यज्य विष्णुरूपमभीप्सितम्। नृणां त्वया नैव मुक्तिर्व्यापुर्यामवनीदिना ॥६६॥
एवं यद्यत्त्वया राम कृतं कर्म शुभाशुभम्। तत्सर्वं ज्ञानबोधाय लोकानां च हिताय हि ॥६७॥
कर्तव्यमपरञ्चान्यत् कर्मातः परतः क्वचित्। निर्गुणस्याप्रमेयस्य सच्चिदानन्दरूपिणः ॥६८॥
इत्थं त्वयोपदिष्टा मे ह्यज्ञा मज्ञानभेदिका। अत्र लब्ध्वा विचारं तु जीवन्मुक्ता न संशयः ॥६९॥
देहे रामायणं सर्वं यत्त्वया मयि दर्शितम्। पञ्चदशाक्षराकारं कण्ठे तद्भास्करप्रदम् ॥७०॥
श्लोकरत्नमयं यो वै कण्ठे हारं बिभर्ति हि। जीवन्मुक्तः क्षणदेव भविष्यति नरोत्तमः ॥७१॥
देहरामायणं नाम राम यत्कथितं त्वया। नेदृशं कथितं केन न कोऽप्यग्रे वदिष्यति ॥७२॥
मम प्रीत्योपदिष्टं हि त्वयैतद्रघुनन्दन। इत्थं कोऽपि न जानाति ब्रह्मद्यानामगोचरम् ॥७३॥
गूढं रम्यं सुदुर्बोधं ज्ञानदं ज्ञानभास्करम्। देहरामायणं चैतच्छृण्वन्पातकनाशदम् ॥७४॥
इति सीताकृतः स्तुत्वा प्रहस्य रघुनन्दनः। विदेहतनये साध्वि धन्याऽसि गजगामिनी ॥७५॥
सम्यग्ज्ञानाग्निका बुद्ध्या मया यत्नेनरोधिता। विचिन्त्यूननयत्या नैव स्वरूपंयां यथास्थितम् ॥७६॥
बुद्ध्या ज्ञानं मयि ज्ञानं मोहनाशविदूताह। कथनीयमिदं देहरामायणं न कस्यचित् ॥७७॥
मदनुग्रहतमं प्रोक्तं त्वं प्रीत्या विद्धिते। दाम्भिकाय न दातव्यं नास्तिकाय शठाय च ॥७८॥
असत्काय द्विजद्वेषे परघाताय च। मलिनायातिक्रूराय निन्दकाय जडाय च ॥७९॥
कलौ नैतत्तु वै गुह्यं भविष्यति न संशयः। सहस्त्रेषु नरः कश्चित्प्राप्स्यतेऽत्र संशयः। ॥८०॥
सर्ववेदान्तसारं हि मया ते समुदीरितम्। देहरामायणं चैतद्भुक्तिमुक्तिप्रदं परम् ॥८१॥
बिहार करना है। उसके बाद आपने हृदयाकाशको महाकाशमें मिला देनेको जो कहा है, वह ही आपका देवलोक अपने धाम वैकुण्ठ में गमन न जाना होगा। इस स्वरूपका परित्याग करके फिर आपने विष्णुरूपस्वरूपको रूप धारण ही सच्चिदानन्दघन ब्रह्मस्वरूप नगरमें वास होगा ॥ ६५ ॥ आपके द्वारा छोड़कर विष्णुका दिखाया है आत्माका सम्पूर्णता मुक्ति है ॥ ६६ ॥ इस प्रकार हे रामचन्द्रजी आपने इस संसारमें जो जो कर्म किये हैं, वे सब जीवोंके हितके बानाय और उनका कल्याण करनेके लिये ही किये हैं ॥ ६७ ॥ इसके सिवाय आप जो कुछ भी कर्म करते वह ही ठीक है। प्रमेयत्व जो आपके लिए सम्भव ही है। क्योंकि आप सबसे अतीत हैं, निर्गुण हैं, व सच्चिदानन्दरूप हैं ॥ ६८ ॥ इस प्रकार आपके द्वारा उपदिष्ट यह ज्ञानकी पिटारी है। इसपर बार-बार विचार करनेसे मैं तो जीवन्मुक्त हो गयी, इसमें कोई भी संशय नहीं है ॥ ६९ ॥ इस शरीरमें आपने जो १५ अक्षरोंके रामायण दर्शन दिया, उस मैंने कण्ठ में प्रकाश करने गलेमें डाल दिया है ॥ ७० ॥ इस श्लोकरूपी रत्नोंकी मालाको जो प्राणी अपने गलेमें डालेगा, वह पुरुषश्रेष्ठ क्षणमात्रमें जीवन्मुक्त हो जायगा ॥ ७१ ॥ हे राम ! आपने यह जैसा देहरामायण कहा है, वैसा न अब तक किसीने कहा है और न भविष्यमें कोई कहेगा ॥ ७२ ॥ हे रघुनन्दन ! इसे आपने केवल मुझपर अनुग्रहम प्रकट किया है। इस देहुरामायणको कोई भी नहीं जानता। क्योंकि यह ब्रह्मादिक देवताओंका भी अलभ्य है ॥ ७३ ॥ यह गूढ़, रम्य और दुर्बोध ज्ञान था, उसे आपने ज्ञानामृत बतलाया है, इस देहरामायणके श्रवणसे सब पातक नष्ट हो जाते हैं ॥ ७४ ॥ इस तरह सीताकी बात सुनकर रामचन्द्रजी हंसकर बोले हे विदेहतनये तुम साध्वी हो, धन्य हो। तुमने मेरी ज्ञानकी पिटारीको देख लिया और इसका जो वास्तविक स्वरूप था, सो भी जान लिया। बुद्धिदृष्टिमं देखनेवालोंके लिये यह देहरामायण मोहका नाश करनेवाला है। यह रामायण जैसे तैसे मनुष्योमं कहनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ७५-७७ ॥ हे प्रिये सीते ! तुम्हारे अनुरागमं ही मैंने छात्र इसे तुम्हें बतलाया है। इसे पाखण्डी, नास्तिक तथा दुष्ट पुरुषास मत कहना ॥ ७८ । उस मनुष्य न बतलाना, जो ब्राह्मणों से द्वेष करते हैं, दूसरोंके बहार-घटियोंको छिपी दृष्टिसे देखते हैं जो मलिन प्रकृतिके क्रूर, निन्दक एवं जड़ स्वभावके हैं ॥ ७९ ॥ कलियुगमें यह गुप्त रहेगा। हजारों प्राणियोंमें एक-आध मनुष्य ही इसे जान सकेंगे। इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ ८० ॥ यह समस्त
| २७६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ४ |
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इत्युक्त्वा राघवः सीतां पर्यङ्के रत्नमण्डिते । सुष्वाप सीतया रात्रीं दामीभिर्वीजितः सुखम् ॥८२॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विलासकाण्डे देहरामायणं नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
चतुर्थः सर्गः
( सीताके विविध अलङ्कारोंका वर्णन )
श्रीरामदास उवाच
चतुर्थावशिष्टायां निशायां रघुपायकम् । उत्थोत्थानार्थं सन्नाहा रणित्राद्यबहिःस्थिताः ॥ १ ॥
वन्दिनो मागधाः सूता नर्त्तक्यश्च नटादयः । वादयामासुर्वाद्यानि ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ २ ॥
जगुरुच्चैर्गीतानि स्तोत्राणि विविधानि च । प्रभातिकीं स्तुतिं प्रोचुः कलकण्ठैर्मनोरमैः ॥ ३ ॥
विघ्नेश्वरः सकलविघ्नविनाशदक्षो दक्षस्त्वजा भगवती हि सरस्वती च
दृष्टाष्टभैरवगणा नव दिव्यदुर्गा देव्यः सुशम्भु नृपते तव सुप्रभातम् ४॥
भानुः शशी क्षितिसुतो बुधशुक्रमन्दा राहूः सकेतुरदितिर्दितिराजितेयाः
शक्रादयः कमलभूः पुरुषोत्तमेन्द्रो, रुद्रः करोतु सततं तव सुप्रभातम् ५॥
पृथ्वी जलं ज्वलनमारुतपुष्कराणि सप्ताद्रवोऽपि भुवनानि चतुर्दशैवं ।
शैला वनानि सरितः परितः पवित्रा गङ्गादयो विदधतां तव सुप्रभातम् । ६ ।।
दिक्संक्रमं तदखिलं दिग्गभा दिगीशा नागाः सुपर्णभुजगा नगरोश्चवृक्षा ।
पुण्यानि देवसदनानि बिलानि दिव्यान्यप्याहतं विदधतां तव सुप्रभातम् ॥ ७॥
वेदाः षडङ्गमहिताः स्मृतयः पुराणं काव्यं मदागमपथो मुनयोऽपि दिव्याः।
व्यासादयः परमलारुणिका ऋषीणां गात्राणि वै विदधतां तव सुप्रभातम् ॥ ८॥
चंडालका निचाड मैंने तुम्हें बतला दिया। यह देहरामायण मुक्ति तथा मुक्ति दोनों का फल देनेवाला है ॥ ८१ ॥ इतना कहकर रामचंद्रजी सीताके साथ रत्नजटित पलङ्गपर सो गए और दासियाँ पंखा झलने लगीं ॥ ८२ ॥
इति श्रीमत्कोविदानन्दघनजीवन श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पद गम्भीरस्वादविदितज्ञ'ज्योत्स्ना'-मराठीटीकासमन्विते विलासकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
श्रीरामदासजी कहने लगे — जब चार घड़ी रात बाकी रह जाती थी, तभी भगवान्को जगानेके लिए बंदीजन, मागध, सूत, नाचनेवाली वेश्यायें और नट आदि लोग रनिवासके बाहर आकर बाजे बजाते थे और नर्तकियां नाचती थीं ॥ १ ॥ २ । अन्य लोग सामङ्ग-गायन विविध प्रकारके स्तोत्र व उनका अपने कोमल कण्ठसे प्रातःकालकी स्तुतियां किया करते थे। वे कहते थे ॥ ३ हे नृपते ! समस्त विघ्नसमुहको नष्ट करनेमें निपुण विघ्नेश्वर (गणेशजी), दक्षकन्या भगवती पार्वती, सरस्वती, अभिमानकी मूर्ति अष्टभैरव-गण, नौ दिव्य दुर्गायें तथा अगणित देवतागण ये सब आपका प्रभात मङ्गलमय करें ॥ ४ । सूर्य, चंद्रमा, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु, दिति तथा आदितिके पुत्र इंद्रादि देवता, ब्रह्मा, विष्णु और महेश ये सब आपका प्रभात मङ्गलमय करें । ५ । पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, तड़ाग, सप्त पर्वत, चतुर्दश भुवन, शैल, वन और भुवनविख्यात गङ्गा आदि नदियां आपका प्रभात मङ्गलप्रद करें ॥ ६ । समस्त दिक्चक्र (दसों दिशाएँ), दिग्गज, दिक्पाल, नाग, सुपर्ण, पर्वतके लतातें, पवित्र देवायतन और गिरिकन्दराएँ, ये सब सर्वदा आपका प्रभात मङ्गलमय करें ॥ ७ । षडङ्ग सहित चारों वेद, स्मृति, पुराण, काव्य, अच्छे अच्छे मताय, ब्राह्मण आदि ग्रन्थ, व्यास आदि दिव्य मुनिगण तथा ऋषियोंके गात्र आपका प्रभात मङ्गलमय करें । ८ ॥
सर्गः ४ ] विलासकाण्डम् २६७
इति बन्दिजनैः सूतैः स्तोत्रैश्च गाथकैः स्तुतः । नानापक्षिसमूहैश्च शुकैः पञ्जरस्थितैः ॥ ९ ॥
स्तुतो वादित्रनिनादैर्वाद्यमानैस्तथैव च । सुप्रबुद्धो बभूवाथ रामचन्द्रः ससीतया ॥ १० ॥
आदौ प्रबुद्धा सा सीता पश्चात्प्रबुद्धो रघूत्तमः । रामः सुरानृषींस्तातं मातरं मार्ग्यं गुरुम् ॥ ११ ॥
चिन्तामणिं कामधेनुं चिन्तयामास चेतसि । ततः सीताऽपि च दुर्गा गङ्गां च दीप्तमण्डलम् ॥ १२ ॥
चिन्तयामास कौसल्यां गुरुपत्नीं स्वमातरम् । ततो नत्वा रामचन्द्रं नियतानन सङ्गता ॥ १३ ॥
आवश्यकं तु संपाद्य कृत्वा शौचविधिं क्रमात् । दंतशुद्धिं चकाराथ रामचन्द्रः सविस्तरम् ॥ १४ ॥
आवश्यकं तु संपाद्य कृत्वा शौचविधिं क्रमात् । हुताशनेऽर्चयित्वा कृत्वा हवार्तेन गृहे ॥ १५ ॥
ददौ दानान्यनेकानि ब्राह्मणेभ्यो यथाक्रमम् । एतस्मिन्नन्तरे स्नात्वा सीता देवीं प्रपूज्य च ॥ १६ ॥
देवानग्नीन् द्विजांस्तन्त्राः श्वश्रूश्चैव यथाक्रमम् । ततो नत्वा रामचन्द्रं तत्पार्श्वे यत्नतः स्थिता ॥ १७ ॥
अथ रामो वसिष्ठस्य मुखात्पौराणिकीं कथाम् । शांतया मातृभियुक्तो बन्धुभिश्च सहह्रजैः ॥ १८ ॥
सम्यक श्रुत्वा कवितेन पूजयामास तं गुरुम् । ततो नत्वा गुरुं रामो गुरुपत्नीं च मातरम् ॥ १९ ॥
सर्वां मातश्च विप्रांश्च पंडितान वैदिकान् मुनीन् । योगनिष्ठान्स्तपोनिरूपाने विप्रान ज्योतिर्विदंस्तथा ॥ २० ॥
मीमांसकांस्तार्किकांश्च मन्त्रशास्त्रविशारदान् । धर्मशास्त्रविदंश्चैव तथान्यान्यान वयोधिकान् ॥ २१ ॥
पूजयामास श्रीरामः शांतया प्रमदास्तथा । अथ साता हेमपात्रे पूजोपकरणानि सा ॥ २२ ॥
गृहीत्वा स्वसखीभिश्च नत्वा मुनिमितैः सह । नवोदधिः सम्पूज्य पक्वान्नैर्नानानिर्मितैः ॥ २३ ॥
विचित्रैः पायसार्यैश्च माता धेनुमतोषयत् । ततः प्रदक्षिणां कृत्वा प्रार्थयानन्द आनर्त्त ॥ २४ ॥
कामधेनो नमस्तुभ्यं पक्वान्नादीनि वेगतः । दियान्नानि भूसुरेभ्यो गवां दिव्यसमर्पय ॥ २५ ॥
इति सा प्रार्थनां कृत्वा कामधेनोस्तु जानकी । ददयो रत्नपात्राणि स्थापयामास कोटिशः ॥ २६ ॥
इस प्रकार बहुतसे बन्दीजन, मगध, भट आदि तथा पालतू पक्षिकुल मृदु वचनों द्वारा जगाये जानेपर सीताके साथ-साथ रामचन्द्रजी सादर उठ जाते थे ॥ ९, १०॥ परन्तु सीताजी उठतीं, फिर रामचन्द्रजी जागते थे। उठनेपर रामचन्द्रजी देवताओंका, मुनियोंका, पिताका, माताका, सूर्य, गुरु (वसिष्ठ), चिन्तामणि और कामधेनुको मन ही मन स्मरण करते थे। पश्चात् सीताजी भी दुर्गा, गङ्गा, सरस्वती, सूर्य ... अपनी माता गुरुपत्नी अरून्धती और अपना नाम कौसल्या आदिका सवेरे सो उठकर स्मरण किया करती थीं। इसके अनन्तर नम्रतापूर्वक रामचन्द्रजीको प्रणाम करके वे अपने नित्यकर्ममें लग जाती थीं ॥ ११-१३॥ उधर रामजी भी शौचादि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर अच्छी तरह दातौन करते थे ॥ १४ ॥ तदनन्तर ... पर जाकर स्नानादि ... करके घरपर लौट आते और अग्निहोत्रविधिके साथ देवताओंका पूजन करते थे ॥ १५ ॥ तत्र बह्मादिके दान देते थे। इसी बीच माताजी भी स्नान करके देवीपूजनसे निवृत्त होकर देवता, अग्नि, ब्राह्मणी और कौसल्या आदि सासुओंको क्रमशः प्रणाम करके पश्चात् रामचन्द्रजीकी पदवन्दना करतीं और उनके पास जा बैठती थीं ॥ १६, १७॥ तदनन्तर रामचन्द्रजी गुरु वसिष्ठके मुखसे पुराणोंकी कथाएँ सुनते थे; उस समय सब माताएँ, भाई तथा मित्रमण्डल रामचन्द्रजीके साथ ही रहता था ॥ १८ ॥ खूब सावधानीके साथ कथा सुनकर राम गुरुवसिष्ठकी पूजा करते थे। फिर गुरु, गुरुपत्नी तथा अपनी माताओंका प्रणाम करके माताओं, ब्राह्मणों, पण्डितों, वैदिकों, मुनियों, योगनिष्ठ तथा तप निष्ठ ब्राह्मणों, ज्योतिषी, मीमांसक, तार्किक, मन्त्रशास्त्रमें निपुण विद्वान् और वयोवृद्ध धर्माशास्त्रियोंका सीताके साथ-साथ रामचन्द्रजी विधिवत् पूजा करते थे। इसके पश्चात् सीताजी एक स्वर्णके पात्रमें पूजनकी सामग्रियाँ लेकर ॥ १९-२२॥ सखियोंके साथ सुरभी (कामधेनु) की पूजा करती थीं और उनके पकवान तथा विचित्र रीतिसे तैयार किये गये हविष्यान्नोंको खिलाकर उसे प्रसन्न करती थीं। फिर प्रदक्षिणा करके इस प्रकार कामधेनुकी स्तुति करती हुई कहती थीं—॥ २३॥ २४॥ हे कामधेनो ! आपको...
२६८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
दिव्यान्नैः परिपूर्णानि चकार सुरभिस्त्विति । ततः शीघ्रं हेमपात्रैर्गृहीत्वान्नानि पृथग्विधान् ॥ परिवेषणार्थं सन्तुष्टा ययौ नूपुरगुञ्जिता ॥२७॥ एतस्मिन्नन्तरे रामश्चोपाहारार्थमादरात् । विप्रानिष्टान्मन्त्रिणश्च समाहूय सहस्रशः ॥२८॥ उपाविशद्भोजनस्य शालायां तैः समन्वितः । रुक्मपीठे सुवर्णे ने मणिरत्नैरूषमाः स्थिताः ॥२९॥ पीतक्षीरोल्लसत्समन्विता रुक्ममण्डनैः । पूजिता गन्धवेणापि गन्धसन्नन्तादिभिर्मुदा ॥३०॥ स्त्रीणां रुक्म-पदस्थु रुक्मपात्राणि च पृथक् रंगावलि विचित्राणि भूमौ न्यस्तानि तत्पुरः ॥३१॥ हेमोद्भवं नि पानीयपात्राण्यपि पृथक् पृथक् । सोपपत्राणि चित्राणि रत्नदीप्तियुतानि च ॥३२॥ स्थापयामासुः श्रीरामबन्धुवन्ध्वस्त्रगान्विताः । एतस्मिन्नन्तरे सर्वैः श्रुतो मञ्जुलनिस्वनः ॥३३॥ नूपुराणां किंकिणीनां कङ्कणानां मनोरमः । रत्नौघां कङ्कणानानां घर्षणादुत्थितो महान् ॥३४॥ स मञ्जुलस्वनं श्रुत्वा कथमेषं श्रूयते स्वनः । इति मतिश्चित्ताचन्ते व्यग्रनेत्रैरितस्ततः ॥३५॥ अपश्यन् ब्राह्मणाद्याश्च तावत्सीतां व्यलोकयन् । तडिद्गुणोपमां दिव्यां शतकोटिरविप्रभाम् ॥३६॥ यस्याङ्गुलिषु सर्वत्र पादयोर्विविधानि च । मत्स्यकच्छपनाकादिविहिताम्युज्ज्वलन्ति च ॥३७॥ ददृशु रत्नचित्राणि हेमाभ्याभरणानि ते । तत ऊर्ध्वं किंकिणीनां पादयोनूपुराणि च ॥३८॥ शृङ्खला विविधा रम्यास्तथा गुर्जरीयन्त्रताः । नानानुपुरभेदाय कङ्कणान्युज्ज्वलानि च ॥३९॥ रत्नकङ्कणसंघांश्च दिव्यवस्त्रकोत्रवानि च । मट्टशूम्ने हि सीताया म शिक्यचित्रितानि च ॥४०॥ तस्याः कट्यां ददृशुस्ते पीतकीशेयमुज्ज्वलम् । मुक्ताजालकघनतुपुष्परञ्जितिचितम् ।४१॥ नवीन गतिचांचल्यात्कृतमंजुलनिःस्वनम् । आदर्शादर्शसंयुक्तं सुगन्धा मोद मोदितम् ॥४२॥ वक्षोपरि ददृशुस्ते रशनां रुक्मतन्तुताम् । रत्नकङ्कणशोभाभिः किंकिणीभिर्विराजिताम् ॥४३॥
नमस्कार है कृपा करके आप साधु-ब्राह्मणोंके लिए अन्न-वस्त्र तथा दिव्य अन्नका प्रबन्ध कर दें जानकीजी इस प्रकार प्रार्थना करके कराहा मृदङ्गके पात्र कामधेनुके पास भिजवाकर रखवा देती थी और कामधेनु उन सबको विविध प्रकारके पकवानोंस भर दिया करती थी। उह्नो हेमपात्रेर्मंस सब पदार्थों ले लेकर युवतियां नूपुरके शब्दसे उस यज्ञमण्डपको शब्दायमान करती हुई अन्नदाताको परोसती थीं। २४-२७॥ इसके अनन्तर रामचन्द्रजी अपने साथ हजारों ब्राह्मणों तथा हित-मित्रोंको सादर बुलाकर पाकशालामें सुवर्णके पीढ़ापर बिठलाकर अनेक उपचारोंसे पूजन करते थे ॥२८-३०॥ वहाँ सुवर्णकी तिपाइयोपर घड़ोंमें जल भर भरकर रक्खा था। पास ही जल पीनेके लिए छोटे-छोटे बहुतसे सुवर्णके बर्तन रक्खे हुए थे। उनकी झटपट उठा उठाकर रामचन्द्रजीकी भ्रातृवधुओंस लाकर उनके सामने रख दिया। इतनेम सबको एक मनोहर ध्वनि सुनाई दी। जो नूपुर, किंकिणी और कंकणके संघर्षसे निकला हुआ शब्द मालूम पड़ता था ॥३१-३४॥ उस मञ्जुल शब्दको सुनकर यह कैसा शब्द सुनाई दे रहा है इस तरह सोचते हुए व्यग्र नेत्रांसे लोग इधर-उधर देखने लगे ॥ ३५ ॥ ३६ . कुछ देर बाद लावान सीताजीको आते देखा। जा अनेक विद्युत्तुल्य एवं सैकड़ो सूर्यकी भाँति प्रकाशमयी थी। जिनके पाँवोंको अंगुलियोंमें मछली-कछुए आदिके आकारवाले हेमामयमान आभूषण परे थे॥ ३७॥ रत्नोंके चमकसे विचित्रविचित्र सुवर्णके आभूषण सुशोभित हो रहे थे। किंकिणीके ऊपर दोनों पैरोंमें नूपुर थे। इसके ऊपर विविध प्रकारका सुन्दर मेखलाये पड़ी थीं। अनेक तरहके नूपुर और नाना प्रकारके उज्ज्वल कंकण हाथोंमें पड़े हुए थे। सीताजीकी कमरपर एक रेशमी वस्त्र था जिसमें मोतियाकी झालर लगी हुई थी और सुवर्णके तारों म फूल-पत्तीकी चित्रकारी बनी हुई थी ॥३८-४१॥ गतिको चंचलतावश उसमेंसे एक मधुर ध्वनि निकल रही थी। उनकी साड़ीमें जगह जगह मयूर, सिंह, धूप,
सर्गः ९ ] विलासकाण्डम् २६९
सर्गः ९ ] विलासकाण्डम् २६९
केसिंहेभपृषव्याघ्रनृगचित्रविचित्रितान् । पीतरक्तहरिच्छयामकृष्णरत्नमण्डितान् ॥४४॥ तत ऊर्ध्वं ददृशुस्ते पदकान्युज्ज्वलानि हि । शृङ्खलापमान्येव हेमजातान्यथानि च ॥४५॥ मद्वांचनशृङ्खलानि काञ्चनग्रथितानि च । नानाग्रन्थिविचित्राण्ये मुक्तेर्मण्डिततान्यपि ॥४६॥ नानामाणिक्ययुक्तानि दीप्तिमन्तपुत्तल विधि तत'ददृशुस्ते विख्यातं समानान्तरविचित्रितान् ॥४७॥ नवरत्नयुतान्दान्गगुच्छांस्तारानुश मुक्ताः । मुनिमाला रुक्मपत्र चम्पमाला विचित्रिताः । ४८। पुष्पमालाः कांचनजाः मणिकारत्नमण्डिताः रुक्मगुच्छान्विता माला हेमपत्रिकातन्विताः ॥४९॥ प्रवालमणिमुक्तामिश्रिचित्रविचित्रिताः । चम्पकूप्रकलिकार मण्डिता हेममालिकाः ॥५०॥ कण्ठे मंगलसूत्रं च पेटिका रत्नभूषिता । कांचनानां सुवृत्तानां मणीनां विविधानि च ॥५१॥ गुच्छैः कण्ठभूषणानि मुक्तागुच्छोथतान्यपि ददृशुस्ते हि सीतायाः कण्ठे हेमन्तनेकशः ॥५२॥ रत्ननामट्टताम्येव ग्रीवाया भूषणान्यपि । प्रवालमणिशणिक्यग्रचित्ताम्युज्ज्वलानि च ॥५३॥ मुक्तागुच्छान् काञ्चगुच्छान् माणगुच्छैर्विचित्रितान् । प्रवालमणिगुच्छांश्च रत्नपुष्पविभूषितान् ॥५४॥ ततो ददृशुस्ते सर्वे थैथीलारुचकञ्चुकैम् । हेमन्तन्तुमयं चित्रो मुक्तामाणिक्यगुंफितम् ॥ ५५॥ आदर्शबिंबसंयुक्तो पुष्टताजिर्विराजितम् । मयूरशुकहंसैश्च लवगैस्तन्तुनिर्मितैः ॥५६॥ विचित्रां श्रमणभणौर्दो गलन्तों रुई नत्री । ततो ददृशुर्भूपत्योः केयूरे रत्नमण्डिते ॥५७॥ वज्रकंकणसादृश्ये हेममाणिक्यनिर्मिते । रत्नविचित्रित्राश्च भूजशोः पेटकाः शुभाः ॥५८॥ हेमतन्तुमवैर्लंबमानगुच्छैः सुमंडिताः प्रवालमणियुक्तानां नानागुच्छैर्युक्ता अपि ॥५९॥ तदधः करयोः सर्वे ददृशुर्भूषणानि ते । रत्नमाणिक्यमुक्ताभिविचित्री हेममम्बवौँ ॥६०॥ करचूडी दाभिमनी हेमपुष्पादिचित्रिती । काचकङ्कणघण्टाशी चन्द्रार्धार्था विधा ॥६१॥
व्याघ्र और मृग आदिके चित्र बने थे। पीले, लाल, हरे, नील और काले मणि स्थान-स्थानपर जड़े हुए थे ॥४२-४४॥ इसके ऊपर सामान देखा कि भांति-भांतिके आभूषण पड़े हैं। कहीं सोनकी जंजीरें हैं, कहीं काञ्चन काम बना है और कहीं लटकनयुक्त रत्नोंकी सजावट है ॥४४॥४६॥ कई तरहक मणियोंके आभूषण देदीप्यमान हो रहे हैं। नौ रत्नोंस जड़ा हुआ हार है। मोतियोंका माला है। सोनेकी जंजीर हैं। मणियमाला, नलुण एवं पत्का माला भी पड़ा हुआ है ॥४७॥४८॥ फूलोंका माला, कञ्चनकी माला, कञ्चन और मुक्ताओं मिश्रित माला, सुवर्णकम्पित मणियोंका माला, पल्लव तथा अन्यान्य मणियोंसे मिश्रित माल चंपाकी कलीके समान बने हुए सुवर्णकी माला, पेटिका मंगलसूत्र, रत्न-जटित पेटो, सुवर्ण तथा मूक्षा मणियोंके बने हुए गुच्छ और मोतियोंके गुच्छोंको उन्होंने सीताके गलेमें देखा । ४९-५२॥ ठीक कण्ठके समान ही सीताका अनेक आभूषण भी दख पड़ते थे। उनम भी प्रवाल और मणि माणिक्य आदि जड़े थे। मोतियोंके गुच्छे काँचके गुच्छे और रत्नाके गुच्छोंस वे रंग-बिरंगे मालूम होते थे। इसके अनन्तर लगान सीताजीका चोली देखा। वह भा सुवर्णके तारामे बनी, मुक्ता-मणि-माणिक आदिसे सजा और प्रकाश युक्तम था जिसम मयूर और तोतोंके चित्र बन थे, वृक्षोंस चित्रित एवं चंद्रबिन्दुओंसे भीगी तथा अत्यंत विस्ती हुई वह सोभा थी। इसके बाद सतारू रत्नमण्डित बाजूबन्दपर लोगोंकी दृष्टि पड़ी ॥५३-५७॥ यह भी विचित्र प्रकारके रत्नोंसे जटिल थी और उनकी आभा स भिन्न-विचित्र मालूम देती था। फिर जिसमें जरीके काम किये हुए थे मणिका उस कमर्पट्टिकापर लोगोंकी दृष्टि पडी ॥५८॥ उसमें भी सुवर्णके तारोंके बड़े-बड़े गुच्छे लटक रहेथ । जगह-जगहपर प्रवालमणि-मुक्ता आदिकोंके गुच्छे लटक इस रहे थे ॥५९॥ फिर दोनों हाथांम जो और आभूषण थे उन्हें लोगोंने देखा। वे भी रत्न-माणिक और मोती आदिसे चित्रित सुवर्णके बने थे ॥६०॥ हाथोंके दोनों कंकण सुवर्णके पुष्पसे सजे हुए
२७० आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
तदूर्ध्वः कङ्कणानि हेमजानि घनानि च । रत्नमाणिक्यमुक्ताभिश्चित्रितान्युज्ज्वलानि च ॥ ६२॥
प्रवालमयी मुक्तानां कङ्कणानिर्विचित्रितान् । कर्णयोः सारिके दिव्ये शुशुभाथे रत्नमण्डिते ॥६३॥
तदूर्ध्वं कङ्कणान्येव पुष्पवल्ल्यङ्कितानि हि । दंतराड्युपमार्थानि रत्नहेमोज्ज्वलानि च ॥६४॥
अंगुलीषु ददृशुस्ते मुद्रिका रुक्मनिर्मिताः । रत्नमाणिक्यमुक्ताभिर्नीलपार्वतसंज्ञिषु ॥६५॥
प्रवालचन्द्रकांतैश्च सूर्य्यकांतैर्विचित्रिताः । नानापुष्पोपमा दिव्याः प्रतिपर्वमथाश्रिताः ॥६६॥
ततो ददृशुः सीताया रम्यं गण्डेऽतिमोऽज्ज्वलम् । दिव्यं मयूरं चित्रं च वररुक्मविनिर्मितम् । ६७ ।
मणिमाणिक्यमुक्ताभिर्नानारत्नैः सुमण्डितम् । लंबिनं मौक्तिकादीनां वरगुच्छैः सुवेष्टितम् । ६८।
ततो ददृशुः सीतायाः कर्णयोर्भूषणानि ते । मकरध्वजसादृश्ये ताटंके रत्नचित्रिते ॥६९॥
मणिमाणिक्यमुक्ताभिर्गुम्फिते सोऽज्ज्वले वरे । रत्नपुष्पादिभिश्चित्रैर्विचित्रिते रविभास्वरे । ७०॥
ततो भ्रमरिके दिव्ये रुक्मरत्नविचित्रिते । मुक्ताभिर्गुम्फिते रम्ये हेमपुष्पाणि वै तथा ।७१॥
कर्णयोः शृङ्खलाश्चित्रा ददृशू रुक्मनिर्मिताः । मुक्तागुच्छैर्गुम्फिताश्चरत्नमाणिक्यमण्डिताः ॥७२॥
आकर्णाभ्यां च सीमन्तपर्यन्तं मालपासयोः । हार्यद्रुक्मवालानि माणिक्यरमहितानि हि ॥७३॥
मुक्तागुच्छैर्गुम्फितानि वैदूर्य्यविचित्रितान्यपि । ततस्तदूर्ध्वं सभाया ददृशुः शिरसि द्विजाः ॥७४॥
सीमन्तयोरुत्तरे याम्ये केशेषु सूर्य्यभास्करौ । रुक्मजौ रत्नवैदूर्यमणिमुक्ताविचित्रितौ ॥७५॥
नीलकान्तींग्रकांतैश्च विद्रुमैर्विद्योतिनौ । चन्द्रसूर्य्याविव स्वायभासा दारयन्तौ दिशः । ७६॥
निटिले तिलकं रत्नमणिमुक्ताविराजितम् । दैवं दिव्यमुज्ज्वलं च कोटिसूर्य्यसमप्रभम् ॥७७॥
ततो ददृशुः सीमन्तं मुक्ताहारं महोज्ज्वलम् । नानारत्नविचित्रं च सर्वांगतिलकावधि । ७८।
चूडामणिं च ददृशुस्ते जनकेन समर्पितम् । नानारत्नविचित्रं च मुक्तागुच्छविराजितम् ॥७९॥
थे। काँचकी बनी हुई चूड़ियोंके मध्यम में सूर्य और चन्द्रमाकी नाईं मालूम पड़ते थे ॥ ६१॥ उनके ऊपर- पाँच सुवर्णके गाढ़े मटकड़े पड़े थे, वे भी नाना प्रकारके रत्न'स विचित्र दाप्ति धारण कर रहे थे ॥ ६२॥ उन्हींके ऊपर प्रवालमणि मुक्ता आदि मण्डीत एक-एक दिव्य सारिकाएं बनी थीं ॥ ६३॥ उनके भी ऊपर रत्ननिर्मित फूलों और लताओंसे जटित कंकण पड़े थे ॥ ६४॥ उँगलियोंम सुवर्णकी बनी रत्न, माणिक्य, नीलम, मरकत मणि आदिसे जटित अनेक अंगूठियां थीं। वे भी प्रवाल, चन्द्रकान्त और सूर्यकान्त आदि मणियांस विचित्र मालूम होती थीं । ६५ ॥ ६६ ,, इसके अनन्तर सब लोगोन सीताकी नासाग्रणिको देखा, जिसमें एक दिव्य स्वर्णमयूर बना हुआ था। वह भी नाना प्रकारके मणियोंसे अलंकृत था ॥ ६७ ॥ उसमें भी मणि-माणिक और माणिक्य शुभ्र लटक रहे थे ॥६८॥ इसके बाद लोगोने सीताके कर्णभूषणोंको देखा। जिनमें मकरध्वजके सदृश विविध रत्नोंसे चित्रित झुमके थे। उनमें भी मणि-माणिक और मोतियोंके झुच्छे लटक रहे थे। रत्ननिर्मित पुष्पोंसे वे सूर्यके समान देदीप्यमान हो रहे थे। ६९ ॥ ७० ॥ फिर लोगोंने सीताके कानोंमें पड़ी हो भ्रमरिकाओंको देखा। वे भी सुवर्णकी बनी तथा रत्नोंके जड़ वमें चित्र विचित्र मालूम होती थीं ॥ ७१ ॥ फिर सबोने सीताकी उस कणशृङ्खलाको देखा, जो सुवर्णकी बनी तथा रत्नजटित थी और उसमें भी माणिक्यके गुच्छे लटक रहे थे ॥ ७२ ॥ कानसे लेकर सीमन्त पर्यन्त ललाटके बगल-बगल स्वर्ण मणियमयके आभूषण हारके समान मालूम पड़त थ ॥ ७३ ॥ इसके अनन्तर सबन्न नांताक मस्तककी ओर देखा, जहाँ केशमें सूर्य और चन्द्रमा दिखाई पड़ते थे। वे भी सुवर्ण-रत्न-वैदूर्यमणि-मुक्ताम विचित्र थे ॥७४-७५॥ नीलम कन्मारे कांत्यादिक मणियाने वे कतिबय शोभित हो रह य, वे अपनी अनुपम कान्तिसे दूसरे सूर्य-चन्द्रमाके समान दसों दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे ॥७६॥ ललाटम रत्नों और मणि-मुक्ताओंस बना हुआ तिलक था। वह भी सुवर्णका बना था और कोटि सूर्यक समान उसका प्रकाश था ॥ ७७ ॥ इसके अनन्तर उन्होंने सीताके सीमन्तमें अतिशय दीप्तिमान् एक चूड़ामणि देखा, जो वेणीसे लेकर तिलक पर्यन्त अपनी छटा दिखा रहा था ॥ ७८ ॥
सर्गः ४] विलासकाण्डम् २७१
ततो ददृशुः शिरसि मुक्ताजालानि भूसुराः। हेमन्ततन्तुगुम्फितानि रत्नपुष्पयुतान्यपि ॥८०॥
मणिवैदूर्यकाश्मीरविद्रुमैश्चित्रितानि हि। तदूर्ध्वं पुष्पजालानि सुगन्धीनि व्यलोकयन् ॥८१॥
ततो वेण्यां भूषणानि ददृशुस्ते वराणि हि नानापक्ष्युपमान्येव माणिक्यचित्रितानि हि ॥८२॥
पल्लवान्तरवर्तीन्यतिदीप्यदुज्ज्वलानि च। हेमन्ततन्तुमान् गुच्छान् मुक्ताहारविमिश्रितान्॥८३॥
लम्बमानान् ददृशुस्ते मणिमाणिक्यसंयुतान्। वेण्यग्रेमंस्थितानरम्यन्नपुष्पापाडममन्वितान् ८४॥
एवं सीतां ददृशुस्ते श्रान्त्यस्तविभूषयाम्। सर्वांलङ्काररहितां तां द्रष्टुं कोऽपि न क्षमः। ८५॥
दिव्यालङ्काररत्नानां प्रभया हतलोचनाः। वामहस्तेन पात्रं च दर्वों दक्षिणसत्करे। ८६॥
दधानां पद्मचरणां रत्नोत्पलकरां वराम्। पद्मास्यां पद्मपत्रक्षीं पद्मगर्भस्वरूपिणीम्। ८७॥
दिव्यकर्पूरगन्धैश्च चन्दनैरपि चर्चिताम्। स्फुरन्मञ्जीरचरणां दिव्यकङ्कणमण्डिताम् ।८८॥
स्तपदालक्तवर्णेन गतिं दर्शयतीं निजाम्। रत्नांगदधरां सीतां ददृशुस्ते द्विजादयः ॥८९॥
गजेंद्रगमनां रम्यां दिव्यपुष्पैः सुशोभिताम्। दिव्यमन्दारकुसुममालाभिश्च सुशोभिताम् ॥९०॥
कस्तूरीकृततिलकां कुंकुमेन सुशोभिताम्। हरिश्रिया कज्जलाद्यैर्मण्डितां च स्मित्ताननाम् ९१॥
इति दृष्ट्वा जानकीं तेऽभूवन् चित्रोपमास्तदा। आत्मानं न विदुः सर्वे सीतासौंदर्यविस्मिताः ॥९२॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विलासकाण्डे
सीतालङ्कारवर्णनं नाम चतुर्थः सर्गः ॥४॥
इसके अनन्तर उन राजाओंने सिरपर सुशोभित मोतियोंको देखा, जो सुवर्णके तारमें गुँथे थे और उनके बीच-बीचमें रत्ननिर्मित पुष्प पड़े हुए थे, ७९॥ ८०। वे भी मणि वैदूर्य काश्मीर-विद्रुम आदिस चित्रित थे। उसके बाद उनके ऊपर लगे हुए सुगन्धित फूलोंको देखा ॥ ८१ ॥ तदनन्तर वेणीमें लगे हुए सुन्दर आभूषणोंके ऊपर लोगोंकी दृष्टि पड़ी जो विविध प्रकारके उन माणिक्य-चित्रित पक्षियों जैसे दीखते थे, जो पत्तोंके भीतर बैठे हुए अतिशय दीप्तिमान् हो रहे हों सुवर्णके तारोंसे बने गुच्छ मोतियोंके हारसे मिले तथा मणि-माणिक्यसंयुक्त थे। वे वेणीके अग्रभागमें लटक थे और उनमें नाना प्रकारके फूल गँथे हुए थे ॥ ८२ ८४ । सीताने बोझके डरसे बहुतसे आभूषणोंको निकाल दिया था। फिर भी सब प्रकारके अलङ्कारोंको धारण किये हुएके सदृश दीखनेवाली सीताको लोगोंने देखा सही, किन्तु कोई भी अच्छी तरह नहीं देख सका ॥ ८५ ॥ क्यों कि उन अलंकारोंके प्रभावके आगे लोगोंकी दृष्टि ही नहीं ठहरती थी। सीताके बाएँ हाथमें एक पात्र था और दाहिने हाथमें कलछी थी ॥ ८६ ॥ उनके चरण कमलसराखे थे। रत्नोंसे बने हुए कमलकी नाईं सीताके हाथ थे। कमलके समान मुख, पद्मपत्रके समान आँखें तथा कदलीके खम्भेके भीतरी भागके समान कोमल स्वरूप था। दिव्य कर्पूर तथा चन्दनसे उनका समस्त शरीर चर्चित था। झमझम करता हुआ मंजीर पाँवोंमें था और दिव्य कंकण सीताके पाँवोंमें पड़े थे। ८७-८८ ॥ रक्तवर्णके चरणोंसे वे अपनी मन्द गति दिखा रही थीं। रत्ननिर्मित विजायठ हाथमें पड़े थे। इस प्रकारकी सीताको लोगोंने देखा ॥ ८९ ॥ गजेन्द्रके समान उसकी मन्द गति थी। दिव्य पुष्पोंसे सुशोभित तथा दिव्य मंदार विरचित मालाओंसे अलंकृत होकर कस्तूरीका तिलक लगाये हुए थी, उनकी आँखोंमें काजल लगा था और वे मन्द-मन्द मसका रही थीं। इस प्रकारकी सीताको देखकर देखनेवाले चित्रलिखित जैसे हो गये और उनके सौन्दर्यसे विस्मित होकर वे सब अपने आपको भूल गये। ९०-९२॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे 'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासमन्विते विलासकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
२७२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ५
पञ्चमः सर्गः
( रामसीताका जलविहार )
श्रीरामदास उवाच
अथ सीता क्षणेनैव चकार परिवेषणम् । हेमपात्रेषु सर्वेषां पक्वान्नैर्विविधैर्मुदा ॥ १ ॥
कामधेनुदुग्धैश्च मण्डकान् पूर्णपूरितान् । वटकान्फेनिकांश्चापि पायसान्युज्ज्वलानि च ॥ २ ॥
पर्पटकान् लड्डुकांश्च कूष्माण्डवटकांस्तथा । घृष्टपर्पटदुग्धान्नं दधिक्षीरं घृतं मधु ॥ ३ ॥
पृथक्कांञ्चनद्रोण्यां जानकी पर्यवेषयत् । शर्कराः श्वेतवर्णाश्च तथैव गुडशर्कराः ॥ ४ ॥
मरिचायुपनागैश्च संस्कृतं तक्रमुत्तमम् । घृतपक्वविविधशाकांश्च सुस्वादूंश्च क्वचित्कदाः ॥ ५ ॥
तिलसम्मिश्रवटकानाद्रकं बीजपूरकम् । आम्रादीनां रसांश्चापि रम्भादीनि फलान्यपि ॥ ६ ॥
एवमादीन्यनेकानि चोष्याणि विविधानि च । तथा लेह्यानि पेयानि जानकी पर्यवेषयत् ॥ ७ ॥
ततो रामः सहमित्रैः कथां कुर्वन् सुखेन सः । अकरोदुपहारं च करशुद्धिं विधाय सः ॥ ८ ॥
सर्वेषां निजहस्तेन ददौ तांबूलमुत्तमम् । स्वयं भुक्त्वाऽथ ताम्बूलं वाससि परिधाय सः ॥ ९ ॥
बध्वा शस्त्राणि सर्वाणि दृष्ट्वाऽऽदर्शं निजं मुखम् । आरुह्य शिविकां दिव्यां मुक्तागुच्छविराजिताम् ॥ १० ॥
हैमीं रत्नादिमिश्रितां ययौ निजगृहाद्वहिः । वन्धुभिः सचिवैर्हस्त्यश्वैस्तैः सर्वत्र वेष्टितः ॥ ११ ॥
स्तुतो वन्दिजनैः सर्वैर्ययौ स जानकीगृहम् । तत्र नत्वाऽथ कौसल्यां तथा मान्यार्यथाक्रमम् ॥ १२ ॥
आशीर्भिरभिनन्दितास्ताभिर्ययौ रामः सभां वरम् । तत्र सिंहासने स्थित्वा मन्त्रिभिर्लक्ष्मणादिभिः ॥ १३ ॥
राजकार्याणि सर्वाणि चकार नीतिमान्नरः । शशास राज्यं धर्मेण बुद्धिमांश्चारुलोचनः ॥ १४ ॥
चारैर्ज्ञात्वा स्थितिं सर्वो स्वगणस्य च सर्वथा । शशास राज्यं धर्मेण राघवो दीर्घलोचनः ॥ १५ ॥
अथ सीतोपहारं स्वसखीभिश्चोर्मिलादिभिः । देवरणां कामिनीभिः स्वसृभिश्चाकरोत्सुखम् ॥ १६ ॥
करशुद्धिं विधायाथ भुक्त्वा ताम्बूलमुत्तमम् । परिधाय हरिद्वस्त्रं तथा रक्तं तु कञ्चुकम् ॥ १७ ॥
श्री रामदासने कहा—हे शिष्य ! इसके अनन्तर सीताने क्षण भरमें सबोंके अर्थ रक्खे हुए सुवर्णके पात्रोंमें विविध प्रकारके पक्वान्न परोसे । वे पक्वान्न कामधेनुके दुग्ध उत्पन्न किये हुए थे। उत्तम मण्डक, पूरनपूरी, वटक फेन, टम्पुका दनी खीर आदि, पापड़, लट्टू, कूष्माण्डाप, निम्बूड़ा, दही, दूध घी, शहद आदिकोंको जानकीजीने अलग-अलग स्वर्णनिर्मित पात्रोंमें परोसा ॥ १-३ ॥ सफेद शक्कर, लाल शक्कर, जीरा मिर्चे आदि मसाला डालकर बना हुआ रायता, घृत छोड़ हुए नाना प्रकारके शाक, चटनी तिलकी बना हुई टिकिया, मूला बात्रापूरक, अमरक रस, कन्द आदिक फल, इसी प्रकार चूसने लायक तरह-तरहके अचार, चाटने लायक कितनी ही तरहकी चटनी और पीने लायक तन्मई आदि वस्त्रभोजोंको माताजीने परोसा ॥ ४-७ ॥ इसके बाद रामचन्द्रजीने मित्रोंके साथ बातचीत करते हुए भोजन किया और हाथ धोकर सबका अपने हाथसे पान दिया। फिर स्वयं भी पान खाया और कपड़े बदले ॥ ८-९ ॥ इसके बाद सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र बाँधकर आदर्शमे मुख देखा और मणियोंके गुच्छामें सजाई हुई पालकीपर सवार होकर घरसे बाहर निकले । बान्धव, मन्त्री मित्र तथा दूत, वे सब चारों ओरसे रामचन्द्रजीको घेरे हुए थे ॥ १०-११ ॥ वंदीजन गच्छी भावावली स्तुति करते चलत थे। इस तरह सबको अपने साथ लिये हुए वे माताके भवनमें न पहुंचे, वहाँ माता कौसल्या तथा अन्य माताओंको प्रणाम करके उनसे आशीर्वाद लिय और उन माताओं का भी साथ लिये हुए सभामवन पहुंचे । वही मन्त्रियों तथा लक्ष्मणादिक भ्राताओंके साथ सिंहासनपर बैठे ॥ १२ ॥ १३ ॥ वहाँपर राज्यसम्बन्धी समस्त कार्योंको खूब अच्छी तरह सोच-विचारकर किया । रामचन्द्रजी गुप्तचरों द्वारा आने राज्यके सब समाचार मालूम करके धर्मपूर्वक शासन करते थे ॥ १४ ॥ उधर सीताजीने भी अपनी देवरानियो बहिनों तथा सखियोंके साथ भोजन किया, हाथ धोया और ताम्बूलका उत्तम बीड़ा खाया । हरे रंगकी साड़ी तथा लाल रङ्गकी चाली जिसमें सुवर्णके
सर्गः ५ ] विलासकाण्डम् २७३
हेमतन्तुमपुष्पाढ्यां मुक्ताजाल बगुम्फिताम् । गेहान्तर्वर्त्युपवनशालायां संस्थिताऽभवत् ॥१७॥
सखीभिर्वेष्टिता रम्या धृतऽधौतोत्तरीयेणा ततो दिव्यामलङ्कारामिजदेहे दधार सा ॥१८॥
ये मया कथिता नैव पूर्वन्त्येस्तान् क्रमेणतान्। करोतुं वर्णने शक्तो भवेदत्र नरोत्तमः ।१९।।
चतुर्रास्यः कुण्ठितोऽभूत्पञ्चास्यश्च षडाननः । ऊर्ध्वःश्रवाश्च सम्प्राप्यः सहस्रास्योऽपि वर्णने ॥२०॥
श्रुत्वा सीतामुपवने गतां ते जल्यन्त्रिणः । जल्यन्त्राणि सर्वाणि चतुर्मुक्तानि वेगतः ॥२१॥
रत्नमञ्चकसंस्था सा सीता चामरचीजिता। जल्यन्त्रकौतुकानि ददर्श नगरीरुहः ॥२२॥
एतस्मिन्नन्तरे रामो राजकार्याणि कृत्स्नशः । कृत्वा ययौ समाशः स निजगृहं तु बन्धुभिः ॥२३॥
तदा दुन्दुभिनिर्घोषा नववाद्यस्वना अपि। शङ्खानां गोमुखानां च भेरीणां तुमुलस्वनाः ॥२४॥
बभूवुर्वंश वृन्दाश्च तूरादीनां स्वनाः शुभाः । ननृतुर्नारनायैव तुष्टुवुर्मगधादयः ।।२५।।
तं स्वनं जानकी चापि श्रुन्वा चोपवने स्थिता । सम्भ्रमेण समुत्तीयं मञ्चकाद्यो वरानना ।।२६।।
वामहस्ते समा री तां धूपपात्रं च दक्षिण । धृन्वा करे सा वैदेही रामं प्रत्युज्जगाम वै ॥२७॥
एतस्मिन्नंतरे रामस्त्यक्त्वारूढां शिबिकां बहिः । विसृज्य सकलाँल्लोकान् विवेश बन्धुभिर्गृहं ॥२८॥
एतस्मिन्नन्तरे दास्यः शतशो रत्नभूषिताः । गृध्ररात्रे द्रुतुमुत्ना स्वस्वकर्मसु तत्पराः ॥२९॥
काचित् व्यजनेनैव वीजयामास वेगतः । दधार चामरं काचित्काचिदासनमुत्तमम् ॥३०॥
काचित् फलपात्रं सा काचिन्निष्ठीवन्तस्य च । पात्रं दधार काचित्तु जलकुम्भं मनोरमम् ॥३१॥
काचिद्दधार वस्त्राणां कोशं काचित्तु कार्मुकम् । काचिद्दधार तूणीरं काचिन्खङ्गं दधार सा ॥३२॥
एवमादीन्यनेकानि तदोपकरणानि ताः । जगृहु रामचन्द्रं तं वेष्टयामासुरादरात् ।।३३।।
ततो रामः सुनैःपद्मयां ययौ जनकनन्दिनीम् । स्थितां तत्र प्रतीक्षन्तीं पतिं जलरुहेक्षणम् ॥३४॥
तारोंसे जगह जगह बेल-बूटे बने थे, उसे पहिना और सबके साथ भवनके भीतर ही बने हुए उपवनमें जाकर बैठो ॥ १५-१७ ॥ वहाँ सखियोंने उन्हें चारों ओरसे घेर लिया और सीताने विविध प्रकारके आभूषण पहने ॥ १८ ॥ जिन षोडश संस्कारोंको मैं बडे परिश्रमके साथ लिखकर पहले कह आया हूँ, उन यहाँ पूर्णरूपसे वर्णन करनेमें कौन श्रेष्ठ पुरुष समर्थ होगा ॥ १९ ॥ सीताकी उस अलौकिक शोभाका वर्णन करनेमें चतुरानन ब्रह्मा, पञ्चवक्त्र शिव, षडानन स्वामिकार्त्तिकेय, गान सुखवाले ऊर्ध्वःश्रवा और हजार मुखवाले शेषनागके भी बुद्धि कुण्ठित हो गया ॥ २० ॥ जलयन्त्रके अधिकारियोंने जब सुना कि माताजी उपवनमें आ गयी हैं, तब उन्होने सब फौवारोंको बड़े वेगके साथ छोड़ दिया ॥ २१ ॥ तदनन्तर मणिकी बनी हुई चौकीपर बैठकर सीता फौवारोंके कौतुक तथा वृक्षोंकी शोभा देखने लगीं और दासियाँ मस्तक ऊपर चँवर डुलाने लगीं ॥२२॥ इतनेमें रामचन्द्र भी राज्यसम्बन्धी सब काम करके पाषर्दोंके साथ अपने भवनमें आये ॥ २३ ॥ उस समय दुन्दुभीके शब्द, नवीन बाजोकी ध्वनि और शङ्ख, गोमुख, भेरी आदिका घनघोर शब्द होने लगा ॥ २४ ॥ विविध वाद्ययन्त्रोंके शब्द और तुम्बी आदिकी ध्वनि सुनाई देने लगी, वेश्याएं नाचने लगीं और बन्दीजन महाराजकी स्तुति करने लगे ॥ २५ ॥ उन बाजोंके स्वर सुनकर सीता भी घबड़ाहटके साथ चौकीपरसे उतरकर बांये हाथमें तारी तथा एक अर्घपात्र लेकर रामकी ओर चलीं ॥ २६ ॥ २७ ॥ हेवतक रामचन्द्रजी भी पालकीसे उतरे और सब लोगोंको बिदा करके भ्राताओरु साथ घरके भीतर गये ।। २८ ।। इतनेमें विविध प्रकारके अलङ्कारोंको पहने हुए सैकड़ों दासियाँ अपना अपना काम करनेके लिये दौड़ पड़ीं ॥ २९ ॥ कोई भगवान्को पंखा झलने लगी, किसी ने चमर ले लिया। कोई आसन बिछाने लगी। किंचित् पानदान किसीने उग़ालदान किसीने सुन्दर जलपात्र और किसीने कपड़े रखनेकी पेटी सम्हाल ली । एकों दासीने रामजीका धनुष ले लिया । किसीने तरकस लिया और किसीने तलवार ले ली ॥३०-३२॥ इस तरह रामकी सब वस्तुओंको सब दासियोंने चारों ओरसे घेरकर सम्हाल लिया ॥ ३३ ॥ इसके बाद
२७४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ५
गृहांगणागममध्ये संस्थितां सस्मिताननाम् । दृष्ट्वात्मानं विसृजन्तीं सुतं मां चारुलोचनाम् । ३५। कटाक्षांश्च पडयन्तीं सखीभिः परिवेष्टिताम् । तां दृष्ट्वा गण्डवस्त्रापि किञ्चित् कृत्वा स्मिताननम् । ३६॥ चक्राताचमनं सम्यक् सीतापर्पितजलेन सः । ततः स्निग्धाऽऽसने पीत्वा जलमने ययौ पुनः । ३७ । जलपन्त्रगृहं पश्या झालां संख्यासमन्वितः । तस्यां सिंहासने स्थित्वा लक्ष्मणं प्राह राघवः ॥३८॥ गच्छ भोजनशालां त्वं सर्वानह्वय वेगतः । ब्राह्मणादीन्नृपँश्चित्रवर्गीयां स्वयमत्र हि ॥३९॥ सर्वं कृत्वा यथायोग्यं ततो मां कुरु मूरनाम् । तथेति राघवेनाज्ञास्तेन स शत्रुहा । ४०॥ लक्ष्मणस्त्वरितो गत्वा सर्वनाहूय वेगतः । वसिष्ठ दिनमुनीन्मित्रमंत्रिणः सुहृदस्तथा ॥ ४१॥ त्वय्यामासोर्मिलां च मांडवीं भरतप्रियाम् । श्रुतकीर्ति च सौमित्रि श्रीरामवचनात्तदा । ४२॥ एतस्मिन्नन्तरे रामः केसरादिर्विनांमतेः । चित्ररंगैः पूरितानि जलयन्त्रान्यनेकशः ॥४३॥ कारयित्वा तेषु सीतां बाहुपार्श्वदृढं मुदा । धृत्वाऽक्षिपत्तृपङ्कवत्यादिषु पदन्मुवैमुहुः ॥४४॥ ततः स्वयं पपातोर्ध्वर्जलगेषु वै पृथक् । जलक्रीडां स मैथिल्या चकार रघुनन्दनः ॥ ४५॥ भुजाभ्यां म ममालिग्य तां मुहुः प्राक्षिपन्मुदा । रञ्जवाद्यम वैदर्दी सुगन्धाञ्जलिसञ्चनैः ॥४६॥ ततः सुगन्धतैलानि तथा परिमलानि हि । नानामुगन्धद्रव्याणि मङ्गल्यानि बहूनि च ॥४७॥ दासीभिः प्रोद्यमानीय तानुभौ हि परस्परम् । वर्पयतुः सुगंधैश्च काह्लाद्यैर्व्यमनोरमैः ॥४८॥ कराभ्यां जलपंत्राणि मिथस्तो मधुमानतुः । रामाऽक्षिमत्तया दास्यः संतास्तलयोऽपि सूचिताः । ४९॥ बस्त्रमिश्रिवहिदूरं गत्वा तस्थुर्बिलज्जिताः । काश्चिदुद्दारैषु तस्थुस्ताम्बूलीं प्रमुदिताननाः ॥५०॥ अदृष्ट्वाऽथ नराः सीताराभौ रहसि सादरम् । जलपन्त्रेषु तौ क्रीडां चक्रतुः सुचिरं मुदा ॥५१॥ मुष्टिभ्यां जानकी राम ताडयामास कौतुकात् साश्चेप तां ताडयामास मुष्ट्या पुष्पमयात्तथा । ५२॥
रामजी धीरे धीरे सीताजी की ओर चले, जा पहले ही से उस गरुड़ा रामचन्द्रजक बालको प्रशक्षा कर रही थी। जिसका मस्तक रामको देखकर लज्जा से झुक चुका था, वे सीता गृहाङ्गणके बने उस खंभे बैठी थीं। मुसकराता हुआ उनका मुख था। रामचन्द्रजीने देखा कि, इन दासीओ और सुडौल नामिवाळ की सीम हम देखकर लज्जा रही है। उनके चारों ओर सखीयां घेरा खड़ा है और यह रहकर माता अपना कटाक्षावाण हमपर दबाती आता है। इस प्रकारकी चालाकी देखकर रामचन्द्रजी मुसकाने हुए उनके पास पहुचे और सीता के हाथसे प्राप्त जलको लेकर आचमन किया। फिर आसनपर बैठ, उस दिशा ओर सखीके साथ उस बंगलाकी तरफ चले, जो फोवराक बीचम बना हुआ था। वहाँ पहुंचकर राम एक दिव्य सिहासनपर बैठे ओर लक्ष्मणसे कहने लगे-, ३४-३७ ॥ हे लक्ष्मण तुम भोजनशाला जाओ ओर सत्र ब्राह्मण तथा सितादिक क्षत्रियोंसे कहो कि जल्दी भोजन तैय्यार करे जैसा मैने बतलाया है, वैसा कराकर बाद फिर हम सूचना दा । 'बहुत अच्छा' कह-कर लक्ष्मण शत्रुघ्न तथा भरतका साथ लेकर भोजनशाला पहुचे, वह वशिष्ठादि मुनियों, मन्त्रियों तथा मित्राको बुलाकर शीघ्र तैयार होनेको कहा ॥ ३८-४१ ॥ तदनन्तर लक्ष्मण मांडवी, श्रुतकीर्ति, उर्मिला आदिको रामचन्द्रजीके अनुसार वहापर दिया कि तुम शीघ्र ही भोजनका तथ्यारा कराओ ॥४२॥ इसके अनन्तर रामचन्द्रजीने कमसर आदि नानाप्रकारके जलसे भरे हुए अनेक कूपोंके भीतर सुन्दरीको गोदमे लेकर फक दिया सखी जिसको फुहारे के पानी से मुँह धोया था ॥ ४३,४४ ॥ इसके अनन्तर वे ऊपरका रास्ता ढूढ़कर और सीताके साथ जलक्रीड़ा करने लगे। सीताजीके शरीर पर बार बार जल उड़ा उड़ाकर जलमे फेंकते, फिर स्वयं फूल और सीता-पर जल उछालते थे। तदनन्तर सुगन्धित तेल, सुगन्धित तैल तथा विविध प्रकारके परिमल मँगाकर जलममं एक दूसरेपर डालते लगे। वे हाथमें पिचकारी लेकर एक दूसरेका मजा ले रहे थे मिले हुए जलकी वर्षा करते थे। ४५-४८॥ रामचन्द्रजीके संकेतसे सखियां लज्जाके मारे बहाँसे हट गयी और दूसरी जगह जा बैठी उनमें से कुछ स्त्रियां प्रसन्नतापूर्वक ताम्बूल धरे हुए उनके फाटकपर जा बैठी इस प्रकार एकान्तम सीताके साथ राम-चन्द्रजी बहुत देरतक क्रीड़ा करन रहे ॥५०। ५१ । कभी खेल खेलमे सीताजी रामचन्द्रक। मुक्का मार देती थीं,
सर्गः ५ ]
सर्गः ५ ] विलासकाण्डम् २७५
चुचुम्ब ताञ्च द्वित्रीन् पूर्णयामास तन्मुखे । मुखान्तो तन्मखंलग्नमाश्लिष्य हृदयेन ताम् ॥५३॥ मुमोच कञ्चुकं श्रीरामः सीतायाः स्वकरेण सः । दृष्ट्वैव तन्मुखं स्तनौ तन्त्रभोक्त्रं ददर्श सः ॥५४॥ ततः करेण सर्वाङ्गे रामश्चाकंपयन्मुदा । मानापशक्यैधुग्भावात्तन्वी स्मितमुखी ॥५५॥ एवं पम्पारू क्रीडां चक्रतुर्दम्पती मुदा । कः समर्थस्तयोः क्रीडामविस्तारं निवेदिंतुम् ॥५६॥ एतस्मिन्नन्तरे रामं भोजनार्थं तु सूचकः । कर्तुं ययौ स सौमित्रिः समाहूय सुहृज्जनान् ॥५७॥ निषेधितः स दासीभिर्नावकाशोऽहिः स्थितः । नावबुद्धः समयो नायं रामं गन्तुं च न क्षणम् ॥५८॥ स्थिरो भवार्थ सौमित्रे रामो ऽहसि सीतया । करोति जलरन्ध्रेषु जलक्रीडां यथामुखम् ॥५९॥ पुनस्ताः प्राह सौमित्रियुष्माभिर्वचनेन मे । निवेद्यतांयं रामार्थ भोजनार्थं हि लक्ष्मणः ॥६०॥ समागतश्चाग्रतःस्थितो यास्याम्यहं गृहम् । ततस्तासु तदा त्वेका दासी गत्वा रघूत्तमम् ॥६१॥ वस्त्रमितैर्बहिः स्थित्वा भर्त्राज्ञानेनविज्ञिता । छद्मवाक्यैः सौमित्रिर्हि द्वारमत्र मुनेः ॥६२॥ तद्दामीवचनं श्रुत्वा जनयन्मत् जनकीम् । वहिःकृत्वा निर्गत्य मयमुद्धन्तः स्वयम् ॥६३॥ जलैरुष्णैः प्रभुः स्नात्वा देहमुद्वर्तनादिभिः । सुगन्धद्रव्यगन्धादीन् कृत्वा दूर विपाडितः ॥६४॥ पीतकौशेयवासांसि परिधायाथ दम्पती । ददुश्चाग्रेऽपरान् वस्त्रान् हेमन्तव्यतितानि च ॥६५॥ दासीभ्यश्चाथ दासेभ्यो गगार्दैश्चित्रितानि हि । तौ जग्मतुः सुपर्णग्रमगाणाञ्चाशनगृहम् ॥६६॥ तत्र शूर्पोत्तरस्रैर्नानावणैकरैः । उर्मिलादामसर्वे पञ्चामृतैदुग्धसुद्रवम् ॥६७॥ देवीभिः स्वर्णकम्बिषे षड्रेषु परिवेषितम् । मुनीश्वराथ गुरुणा सहनिग्रयमन्वितः ॥६८॥ मन्त्रिभिर्मित्रेणोभ्यादि रामोऽशन्स्तोषदाप यः । तत्पात्रे वीजयन्त्याम आनक्षी चामरेण सा ॥६९॥ प्रविनोदैर्शाद्रुकदेवी शुश्रूषादाम राघवम् । एवं कृत्वा भोजनं तु कृत्वा तांबूलचर्वणम् ॥७०॥
तब राम भी हँसते हुए फुत्कार समान शब्द मुखसे सीताको मार देते थे ॥५२॥ सीता के विम्बसदृश लाल ओठोंको रघुनन्दन ने कई बार चूमा, और मुखका फेर दिया और बाँहोंका बन्द खोलकर अपनी छातीसे निपटाया ॥५३॥ रामने सीताकी चोली को अपने हाथोंसे हटा दिया जिससे कन्दुकके सम्मुख समान उनकी काञ्चन कान्ति दिखाई पड़ने लगी ॥५४॥ तब सीताजी लज्जावश रामका छातीपर हाथ डाल दी। इस तरह राम और सीताजी विविध प्रकारका जलकेलि कर रहे थे। सीता और रामकी क्रीड़ाके सविस्तार वर्णन करनेको सामर्थ्य भला किसमें है ? द्विज ... बृहत् संकलनमें ऐसा वर्णन किया गया है ॥५५॥ ५६ ॥ इसके अनन्तर भोजन के लिए हाथकी सूचना देनेके लिए तब लक्ष्मणजी रामचन्द्र के लिए ऋषियोंको बुलवा लिया ॥५७॥ लक्ष्मण रामको बुलानेके लिए केंचुलीके मण्डल के निकट पहुंचे, तैसे ही सखियोंने उन्हें रोका और कहा कि अभी रामचन्द्रजीके पास जानेका आज्ञा नहीं है। क्योंकि वे इस समय जलक्रीडा कर रहे हैं ॥५८॥५९॥ उनसे लक्ष्मणने कहा-अच्छा, तुम्हीं जाकर उनसे कहो कि द्वारपर लक्ष्मण भोजनकी सूचना देनेके लिए खड़े हैं ॥६०॥ तुम्हारे ऐसा कह देनेपर मैं अन्दर चला जाऊँगा, उससबके वाक्यानुसार उनमें से एक दासी रामके समीप गयी और लजाती हुई परदेकी ओटमें धीरे-धीरे उनसे लक्ष्मणके आनेकी खबर सुनायी ॥६१॥६२॥ दासीकी बात सुनकर राघव प्रसङ्गवश सीताको जलयन्त्रके बाहर निकाला और स्वयं भी निकल आये ॥६३॥ तब गरम जलसे सीता और रामने शरीरमें लगे हुए सुगन्धित उबटन आदिको धोया ॥६४॥ उसके बाद रेशमके पीले कपड़े पहने। उस बहुमूल्य वस्त्र कपड़ोंको दास-दासियोंको दे दिया। फिर पुष्पोंसे सुशोभित मार्गसे चलकर दोनों भोजनगृहमें जा पहुंचे ॥६५॥६६॥ वहाँ पूर्वोक्त भोजन-सामग्रीके व्यञ्जन कामधेनुके दुग्ध तथा ऊर्मिला आदिके द्वारा सुवर्ण-पात्रोंमें सुरुचिसे ही सबपरोसे परोसते हुए वसिष्ठजीके अनेक मुनियों, मित्रों, मन्त्रियों एवं बन्धु-बान्धवोंके साथ खाते हुए रामचन्द्रजी बहुत प्रसन्न हुए। भोजन करते समय सीताजी पंखा झलती हुई द्रौपदीजल बिन प्रसन्न करनेवाली कितनी
| २७६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ६ |
|---|
दीनानामर्पयत् पश्चात्सख्या शृण्वन् कथाः सुखम् । मन्त्रिभिर्बन्धुभिर्मित्रैर्गोष्ठ्या सदसि प्रभुः ॥ ७१॥
सीताऽपि भोजनं कृत्वा दिव्यलङ्कारमण्डिता । निद्राशालां समासीना सखीभिः परिवेष्टिता ॥७२॥
चकार सारिभिः क्रीडां दासीभिर्वीजिता मुदा । कुर्वन्ती रघुनाथस्य प्रतीक्षां द्वाग्लोचना ॥७३॥
इति श्रीमत्कविकलितरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे बलकीर्तिवर्णनं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
षष्ठः सर्गः
( राम तथा सीताकी दिनचर्या )
श्रीरामदास उवाच
अथ रामो बंधुमित्रैर्निद्राशालां ययौ मुदा । स्तुतो बंदिजनाद्यैश्च विवेशैकांतमन्दिरम् ॥ १ ॥
विसृज्य लक्ष्मणादींश्च दासीभिः परिवेष्टितः । ददर्श जानकीं निद्राशालायां रघुनंदनः ॥ २ ॥
साऽपि ज्ञात्वाऽऽगतं रामं सारिक्रीडां विहाय च । प्रत्युज्जगाम गम्भीरं सखीभिर्दू रमुत्सृजन् ॥ ३ ॥
नत्वा रामं करे धृत्वा मञ्चके सन्न्यवेशयत् । दत्त्वा पातुं जलं तस्मै ददौ तांबूलमुत्तमम् ॥ ४ ॥
ततश्चक्रे श्रीरामो निद्रां सीतासमन्वितः दासीभिर्वीजितश्चापि पर्यङ्के रत्नभूषिते ॥ ५ ॥
मुहूर्तमात्रादुत्थाय घूर्णार्थात्कम्पवर्हणा । तस्थौ सीता मंचकादधस्ताद्रामोऽप्यबुध्यत ॥ ६ ॥
दृष्ट्वा समुत्थितं रामं दत्त्वा पातुं जलं पुनः । ददौ सीताऽथ तांबूलं राघवायातिहर्षिता ॥ ७ ॥
रामदास्यस्तथा रामं वीजयामासुरादरात् । केकिपक्षसमुद्भूतैश्चामरै रुक्मभूषितैः ॥ ८ ॥
सीतादास्यस्तथा सीतां वीजयामासुरादरात् । धेनुपुच्छोद्भवैर्दिव्यैश्चामरैर्हेममंडितैः ॥ ९ ॥
ततः सीताकरं धृत्वा द्राक्षावल्या सुमण्डपम् । ययौ रामोऽङ्कणोद्भूतं तस्थौ तदध आसने ॥१०॥
ही बातें भी करते जाते थे। इस प्रकार भोजन करके रामने सीताके हाथोंको दिया हुआ दान खाया ॥ ६७-७०॥ तदनन्तर मन्त्रियों बन्धुओं तथा नित्यमित्रोंके साथ विविध प्रकारकी बातें कहते-सुनते हुए सभाभवनमें पधारे ॥ ७१ ॥ तदनन्तर सीताने भी भोजन किया कपड़े बदले और नाना प्रकारके अलंकारोंको पहनकर अपने शयनागारमें जा बैठीं। वहाँ सीताकी सखियाँ भी उन्हें चारों ओरसे घेरकर बैठ गयीं ॥ ७२ ॥ सीता वहाँ बैठी हुई सारिका (मैना) के साथ खेलतीं तथा इधर-उधरकी बातें करती हुई रामचन्द्रजीके आगमनकी प्रतीक्षा कर रही थीं। यह सब करते हुए भी सीताकी आँखें रामको देखनेके लिए द्वारपर ही लगी हुई थीं ॥ ७३ ॥ इति श्रीमत्कविराजचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये 'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां विकासकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
श्रीरामदासने कहा—सभाभवनमें कुछ देर बैठनेके अनन्तर राम अपने बन्धुओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक शयनगारकी ओर चले। बंदीजन भगवान्की स्तुति करने लगे। निद्राशालाके पास जाकर रामने लक्ष्मण आदिको बिदा कर दिया। दासियोंके साथ वे भीतर गये और वहाँ बैठी हुई सीताको देखा ॥ १ ॥ २ ॥ सीताने भी जब देखा कि रामजी आ गये हैं, तब अपनी मैनाके साथका खेल बन्द करके धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ीं। उन्हें प्रणाम किया और हाथ पकड़कर पलंगपर बैठा लिया। फिर पीनेके लिए जल दिया और उत्तम ताम्बूल खिलाया ॥ ३ ॥ ४ ॥ इसके बाद रामचन्द्रजी रत्नभूषित पलंगपर सो गये और दासियाँ पंखा झलने लगीं ॥ ५ ॥ क्षण भरके बाद सीता पलंगसे नीचे उतरीं, तब रामजी भी जाग गये ॥ ६ ॥ सीताने जब देखा कि वे भी उठ हैं, तब फिर पीनेके लिए जल और खानेको पान दिया ॥ ७ ॥ रामकी दासियाँ रामको और सीताकी दासियाँ सीताको पंखा झल रही थीं। उन दासियोंके हाथमें मोरके पंखोंका बना हुआ पंखा था और उसमें सुवर्णकी मूठ लगी हुई थी ॥ ८ ॥ कुछ देर बाद रामचन्द्रजी सीताका हाथ अपने हाथमें पकड़े हुए एक अंगूरी लताओंके बने सुन्दर मण्डपमें पहुंचे और उसके आंगनमें एक आसनपर बैठे
सर्गः ६ ] विलासकाण्डम् २७७
सर्गः ६ ] विलासकाण्डम् २७७
उपबर्हणसंस्पृष्टः सीतारामाश्रितो मुदा । हस्त्यश्वोष्ट्रमृगैर्गजदन्तैः कृत्रिमनिर्मितैः ॥ ११॥ हेमरत्नहस्तिदन्तमधुरैर्गजचित्रितैः । क्रीडो मृदुवनेनैव चकार सीतया सुखम् ॥ १२॥ ततः पक्षिगणैः सर्वैः पञ्जरस्थैः समानया । क्रीडां चकार श्रीरामौ दासीभिर्वीजितो मुहुः ॥ १३॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र सीतयाऽऽकारिताः पुरः । समावपुर्वरनार्यो ननृतुः शतशस्तदा ॥ १४॥ चक्रुर्गीतं सुस्वरं ताः षड्जस्वरमयन्वितम् । ततस्ताभ्यो ह्यलङ्कारान् दत्त्वा स्वमञ्चितं जनकी १५॥ विसर्जयामास ताः सर्वास्ततो राममब्रवीत् । स्थिता प्रासादपर्येऽद्य कौतुकं द्रष्टुं त्वया ॥ १६॥ द्रष्टुमिच्छाम्यहं राम शीघ्रमुत्तिष्ठ गच्छ । तत्सीतासहितोरामः प्रासादं प्रति नीतया ॥ १७॥ गत्वा दिव्यासने स्थित्वा गवाक्षे रुक्मभूषितेः । रत्नोद्भवकपाटैश्च मुक्ताजालविराजिते ॥ १८॥ राजवीथ्यां दृष्टवान् दृश्यं जनौघौसुकम् । सीतायै दर्शयामास कौतुकानि स राघवः ॥ १९॥ स्वीयदक्षिणहस्तस्य तर्जन्या मुदिताननः । एतस्मिन्नन्तरे दृष्टे द्विजपत्नी तु सीतया ॥ २०॥ दृष्ट्वालङ्कारवस्त्रार्थैर्रहीना कटिपृष्ठायका । गच्छन्ती राजमार्गेण कृशा भिक्षार्थमुद्यता ॥ २१॥ तां तादृशीं निरीक्ष्याथ दास्याह्वय विदेहजा । प्रप्रच्छ भूषणाद्यैस्त्वं किमर्थं रहिता ह्यसि ॥ २२॥ सा प्राह तीर्थयात्रार्थ त्यक्त्वा मां तानकालिना । गतोगेहे गतो भर्ता ततोऽपि जरठो मृतः ॥ २३॥ गुरुगेहेऽवंतिकायां वर्त्तते भ्रातरो मम । न पोषकः कोऽपि गेहेऽधुना सीतेऽस्ति वै मम । २४॥ तस्मान्न सन्त्यलङ्कारावासांसि जनकात्मजे । इति तस्या वचः श्रुत्वा रामरूप सन्निरीक्ष्य सा २५॥ निजालङ्कारवासांसि ददौ तस्यै विदेहजा । ब्राह्मणी सा पुनः प्राह गच्छ त्वं लक्ष्मणं प्रति ॥ २६॥ हेममुद्रा लक्ष्मितस्त्वं गृहाण शमतपा । तथेति जानकी पृष्टा सा ययौ लक्ष्मणं तदा ॥ २७॥
६ ॥ १० ॥ रामकी पीठपर तकिया लगा था और सीता रामके वामभागमें बैठी थीं। वहाँ नकली हाथी, घोड़े, ऊँट मृगी और राजदूत आदिके खिलौने रक्खे हुए थे इनके साथ राम तथा सीताने बहुत देरतक खेल-कूद किया। इनमे बहुतसे खिलौने सुवर्ण, हाथीदाँत एवं रत्नोंके बने हुए थे और उनपर बढ़िया नक्काशी की हुई थी ॥ ११ ॥ १२ ॥ इसके अनन्तर पिंजड़ामें बैठे हुए बहुसंख्यक पक्षियोंके साथ रामने क्रीड़ा की उस समय भी रानियाँ पंखा झल रही थीं ॥ १३ ॥ इसके बाद सीता द्वारा बुलाई हुई बहुसंख्यक नर्तकियाँ आकर वहाँ नाचने-गाने लगीं । १४ ॥ वे सबबार षड्जस्वरमय सुन्दर गीत गा-गाकर बहुत देर तक उन्हें लुभाती रहीं। इसके बाद सीताने उनको बहुतसे वस्त्र-अलंकार आदि देकर विदा किया ॥ १५ ॥ उनको विदा करके सीता रामसे कहने लगीं - आज हमारी यह इच्छा है कि आपके साथ छतपर बैठकर बाजारका कौतुक देखूँ ॥ १६ ॥ उत्तिए और जल्दी चलिए। तदनुसार राम सीताके साथ प्रासादपर गये । १७ । वहाँ एक दिव्य आसनपर बैठकर स्वर्णके बने हुए झरोखोंमें जिसमें विविध प्रकारके रत्नोंके दरवाजे लगे थे और मोतियोंकी झालरें लटकी हुई थीं ॥ १८ । उनमेंसे ही वे राजमार्गके जनसमुदायका कौतुक देखने लगे और सीताको भी दाहिने हाथकी तर्जनी अंगुलीके संकेतसे दिखाने लगे ॥ १९ ॥ इसी बीच सीताने देखा कि एक ब्राह्मणकी पत्नी वस्त्र, अलङ्कारकी त्यागे नङ्गी चली आ रही है। उसकी कमरपर एक बच्चा है, उसकी दुबली-पतली देह है और उसके हावभावसे मालूम पड़ता है कि वह भिक्षा माँगनेके लिए बाजार आयी है ॥ २० ॥ २१ ॥ उसकी यह दशा देखकर सीताने दासी द्वारा उसे अपने पास बुलवाया और पूछा कि तुम इस तरह बिना वस्त्र और आभूषणके हजारमें किसलिए घूम रही हो ? ॥ २२ ॥ उसने कहा कि मेरे पतिदेव घरमें मुझे अकेली छोड़कर तीर्थयात्राके लिए चले गये। मैं अपने पिताकी बड़ी दुलारी बेटी थी । इसलिए अपना घर छोड़कर पिताके पास गयी तो वहाँ पिताजी वृद्धावस्थाके कारण परलोक चले गये थे ॥ २३॥ अवन्तीपुरीम मेरे पिताके कई छोटे छोटे बच्चे अर्थात् मेरे भाई हैं, किन्तु मेरा तथा बच्चोंका पालन करनेवाला इस संसारमें कोई नहीं है २४ ॥ इसी कारण हे जनकात्मज ! मेरे पास वस्त्र और आभूषण नहीं हैं जिन्हें मैं पहनूँ। इस प्रकार उसकी बातें सुनकर सीताने एक बार रामको ओर देखा और अपने सब वस्त्राभूषण उतारकर उस विप्रपत्नीको