श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 280, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें२६४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
भवारण्येऽटनं प्रोक्तमटनं दंडकेऽत्र ते । दंभस्य निग्रहश्चात्र विराधस्यात्र निग्रहः ॥ ४७ ॥ आत्मनः पर्णकुटिका पंचभूतात्मकश्च सः । देहोऽयं पञ्चवटिका विश्रान्त्यर्थं तवात्र मा ॥ ४८ ॥ कामस्य निग्रहः प्रोक्तः खरस्यात्र विनिग्रहः । क्रोधस्य निग्रहश्चापि दूषणस्यात्र निग्रहः ॥ ४९ ॥ लोभस्य मर्दनं तत्र त्रिशिरोनिग्रहोऽथ हि । तत्राशाकृन्तनं प्रोक्तं घ्राणेनात्र विरूपणम् ५०। तस्याः शूर्पणखायाश्च मोहस्य निग्रहः स्मृतः । मृगमार्गीचघातोऽत्र शुद्धमायाश्रयन्मनः । ५१। ममाश्रयस्ते वामांगे मात्स्थिता दंडके वने । उत्सृष्टान्नु या माया जठराग्नौ स्मृता शुभा । ५२। मम रजःस्वरूपायाः प्रवेशश्चानलेऽत्र मः । तामस्याश्चैव मायाया नियोगश्च तदा स्मृतः । ५३। मम तमःस्वरूपाया हरणं रावणेन हि । सुखालाभो महान्क्लेशतत्त्वतो मद्धियोगस्ततः । ५४। शोकवेगस्ततः प्रोक्तः कबन्धस्य वधोऽत्र सः । विवेकस्याश्रयस्त्वत्र सुग्रीवस्याश्रयोऽत्र मः ॥ ५५। मन्युद्रेकलाभश्च तव लाभो हनूमतः । अविवेकवधः प्रोक्तश्चात्र बालिवधस्तथः । ५६। उत्साहेन यतः संगः सा विभीषणमैत्रिकी । अज्ञानतरणोपायः सेतुबंधो महोदधौ ॥ ५७॥ त्रिगुणाश्रयगेहे वै लिंगदेहाह्वये शुभे । त्रिकूटाचलगम्यायां लङ्कायां रघुनन्दन । ५८। मदस्य निग्रहश्चात्र कुभकर्णवधस्त्वया । निग्रहो मत्सरस्यापि मेघनादवधोऽत्र मः ५९॥ तत्राहंकारघातश्च रावणस्य वधस्त्वया । मायानामैक्यतान्यपि त्रिविधा या मयैक्यता ६०॥ वियोगो लिंगदेहस्य लङ्कात्यागस्त्वयाऽत्र मः । हृदयाकाशगमनमयोध्यागमनं पुनः ॥ ६१ ॥ आनन्दैकसुखं तत्र राज्यभोगस्त्वया सौऽत्र हि । मायात्यागस्त्वनन्तरैर् वाल्मीकेराश्रमे मम । ६२ । त्यागोऽथ भावि श्रीराम त्वया सोऽत्रप्रकाशितः । सात्त्विक्या ग्रहणं यच्च पुनर्मे ग्रहणं स्मृतम् । ६३॥ सात्त्विक्या मायया सार्द्धं तवोद्योगो मया सह । ततश्च हृदयाकाशे महाकाशे विलापनम् ६४।
भाग है ॥ ४५ ॥ परशुरामका दर्पभञ्जन ही अहंकारका निग्रह है। इसके अनन्तर कार्यरूपिणी कैकेयीके वरदानसे आपका दण्डकारण्यमे घूमना ही भवरूपमे भटकना है। दम्भका रुक जाना ही विराधवध है ॥ ४६ ॥ ४७ ॥ पञ्चभूतात्मक आत्मरूपीका पर्णकुटी जो आपने बतलायी, वह यह शरीर ही है। जो आपके विश्राम करनेके लिए एक उपयुक्त स्थान है। ४८ । कामका निग्रह करना ही खर राक्षसका वध है और क्रोधका निग्रह दूषणका वध है ॥ ४९॥ लोभका निग्रह त्रिशिराका वध कहा गया है। आशाका विच्छेद जो आपने बतलाया, वह ही शूर्पणखाका विरूप करना है मारीच मृगका वध करना ही मोहका निग्रह है। दण्डकवनम आपने जो सत्त्वगुणमयी मुख्य अपना वामभागमे रक्खा था वह ही शुद्ध माया का आश्रय है। रजोगुण-रूपसे मेरा अग्निमे प्रवेश करना ही तमयी मायाका वियोग है। तामस रूप रावणके द्वारा हरण होना ही सुखाभाव है तुम्हारा-हमारा वियोग होना ही महाक्लेश है॥ ५०-५४ । इसके बाद कबन्धका वध करना ही शोकभङ्ग है। सुग्रीवका मित्रता ही आश्रय है। ५५ ॥ भालूके कटकका लाभ आपकी उत्साहशक्ति मिलना है। बालिका वध करना ही अज्ञानका वध करना है । ५६ उसके बाद विभीषणके साथ मैत्री होना ही उत्साहका सङ्ग है । समुद्रमे सेतुबन्धन ही अज्ञानसे तरनका उपाय है ॥ ५७॥ आपका त्रिकूट पर्वतपर पग डालना ही लिङ्गशरीर रूपमे त्रिगुणका आश्रय करना है ॥ ५८ ॥ कुम्भकर्णका वध ही मदका निग्रह है। मेघनादका वध मत्सरका निग्रह है ॥ ५९ ॥ आपने जो रावणका वध किया है वह ही अहंकारका नाश है, मायाकी एकता जो आपने कही, वह हम दोनोंका एकत्र हो जाना है ॥ ६० । लङ्काका त्यागना ही लिङ्गदेहका वियोग है। फिर अयोध्याके लिए प्रयाण करना ही हृदयाकाशका भजन है ६१ । आपका राज्यभोग करना ही एकमात्र आनन्दका अनुभव करना है फिर मायाका त्याग जो आपने बतलाया सो भविष्यमे वाल्मीकिके आश्रममे मेरा त्याग देना ही होगा। सात्त्विकी मायाका ग्रहण जो श्रीपने बतलाया सो मेरा पुनर्ग्रहण कर लेना होगा । ६२ ॥ ६३ । सात्त्विकी मायाके साथ उद्योग जो आपने कहा, सो मेरे साथ आपका