भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 281

सर्गः ३] विलासकाण्डम् २६५

अयोध्यानागरीमग्रे वैकुण्ठं प्रति नेष्यसि। प्रवेशत नगरे ऽस्मिन्सच्चिदानन्द्यंशके ॥६५॥
स्वरूपं परित्यज्य विष्णुरूपमभीप्सितम्। नृणां त्वया नैव मुक्तिर्व्यापुर्यामवनीदिना ॥६६॥
एवं यद्यत्त्वया राम कृतं कर्म शुभाशुभम्। तत्सर्वं ज्ञानबोधाय लोकानां च हिताय हि ॥६७॥
कर्तव्यमपरञ्चान्यत् कर्मातः परतः क्वचित्। निर्गुणस्याप्रमेयस्य सच्चिदानन्दरूपिणः ॥६८॥
इत्थं त्वयोपदिष्टा मे ह्यज्ञा मज्ञानभेदिका। अत्र लब्ध्वा विचारं तु जीवन्मुक्ता न संशयः ॥६९॥
देहे रामायणं सर्वं यत्त्वया मयि दर्शितम्। पञ्चदशाक्षराकारं कण्ठे तद्भास्करप्रदम् ॥७०॥
श्लोकरत्नमयं यो वै कण्ठे हारं बिभर्ति हि। जीवन्मुक्तः क्षणदेव भविष्यति नरोत्तमः ॥७१॥
देहरामायणं नाम राम यत्कथितं त्वया। नेदृशं कथितं केन न कोऽप्यग्रे वदिष्यति ॥७२॥
मम प्रीत्योपदिष्टं हि त्वयैतद्रघुनन्दन। इत्थं कोऽपि न जानाति ब्रह्मद्यानामगोचरम् ॥७३॥
गूढं रम्यं सुदुर्बोधं ज्ञानदं ज्ञानभास्करम्। देहरामायणं चैतच्छृण्वन्पातकनाशदम् ॥७४॥
इति सीताकृतः स्तुत्वा प्रहस्य रघुनन्दनः। विदेहतनये साध्वि धन्याऽसि गजगामिनी ॥७५॥
सम्यग्ज्ञानाग्निका बुद्ध्या मया यत्नेनरोधिता। विचिन्त्यूननयत्या नैव स्वरूपंयां यथास्थितम् ॥७६॥
बुद्ध्या ज्ञानं मयि ज्ञानं मोहनाशविदूताह। कथनीयमिदं देहरामायणं न कस्यचित् ॥७७॥
मदनुग्रहतमं प्रोक्तं त्वं प्रीत्या विद्धिते। दाम्भिकाय न दातव्यं नास्तिकाय शठाय च ॥७८॥
असत्काय द्विजद्वेषे परघाताय च। मलिनायातिक्रूराय निन्दकाय जडाय च ॥७९॥
कलौ नैतत्तु वै गुह्यं भविष्यति न संशयः। सहस्त्रेषु नरः कश्चित्प्राप्स्यतेऽत्र संशयः। ॥८०॥
सर्ववेदान्तसारं हि मया ते समुदीरितम्। देहरामायणं चैतद्भुक्तिमुक्तिप्रदं परम् ॥८१॥


बिहार करना है। उसके बाद आपने हृदयाकाशको महाकाशमें मिला देनेको जो कहा है, वह ही आपका देवलोक अपने धाम वैकुण्ठ में गमन न जाना होगा। इस स्वरूपका परित्याग करके फिर आपने विष्णुरूपस्वरूपको रूप धारण ही सच्चिदानन्दघन ब्रह्मस्वरूप नगरमें वास होगा ॥ ६५ ॥ आपके द्वारा छोड़कर विष्णुका दिखाया है आत्माका सम्पूर्णता मुक्ति है ॥ ६६ ॥ इस प्रकार हे रामचन्द्रजी आपने इस संसारमें जो जो कर्म किये हैं, वे सब जीवोंके हितके बानाय और उनका कल्याण करनेके लिये ही किये हैं ॥ ६७ ॥ इसके सिवाय आप जो कुछ भी कर्म करते वह ही ठीक है। प्रमेयत्व जो आपके लिए सम्भव ही है। क्योंकि आप सबसे अतीत हैं, निर्गुण हैं, व सच्चिदानन्दरूप हैं ॥ ६८ ॥ इस प्रकार आपके द्वारा उपदिष्ट यह ज्ञानकी पिटारी है। इसपर बार-बार विचार करनेसे मैं तो जीवन्मुक्त हो गयी, इसमें कोई भी संशय नहीं है ॥ ६९ ॥ इस शरीरमें आपने जो १५ अक्षरोंके रामायण दर्शन दिया, उस मैंने कण्ठ में प्रकाश करने गलेमें डाल दिया है ॥ ७० ॥ इस श्लोकरूपी रत्नोंकी मालाको जो प्राणी अपने गलेमें डालेगा, वह पुरुषश्रेष्ठ क्षणमात्रमें जीवन्मुक्त हो जायगा ॥ ७१ ॥ हे राम ! आपने यह जैसा देहरामायण कहा है, वैसा न अब तक किसीने कहा है और न भविष्यमें कोई कहेगा ॥ ७२ ॥ हे रघुनन्दन ! इसे आपने केवल मुझपर अनुग्रहम प्रकट किया है। इस देहुरामायणको कोई भी नहीं जानता। क्योंकि यह ब्रह्मादिक देवताओंका भी अलभ्य है ॥ ७३ ॥ यह गूढ़, रम्य और दुर्बोध ज्ञान था, उसे आपने ज्ञानामृत बतलाया है, इस देहरामायणके श्रवणसे सब पातक नष्ट हो जाते हैं ॥ ७४ ॥ इस तरह सीताकी बात सुनकर रामचन्द्रजी हंसकर बोले हे विदेहतनये तुम साध्वी हो, धन्य हो। तुमने मेरी ज्ञानकी पिटारीको देख लिया और इसका जो वास्तविक स्वरूप था, सो भी जान लिया। बुद्धिदृष्टिमं देखनेवालोंके लिये यह देहरामायण मोहका नाश करनेवाला है। यह रामायण जैसे तैसे मनुष्योमं कहनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ७५-७७ ॥ हे प्रिये सीते ! तुम्हारे अनुरागमं ही मैंने छात्र इसे तुम्हें बतलाया है। इसे पाखण्डी, नास्तिक तथा दुष्ट पुरुषास मत कहना ॥ ७८ । उस मनुष्य न बतलाना, जो ब्राह्मणों से द्वेष करते हैं, दूसरोंके बहार-घटियोंको छिपी दृष्टिसे देखते हैं जो मलिन प्रकृतिके क्रूर, निन्दक एवं जड़ स्वभावके हैं ॥ ७९ ॥ कलियुगमें यह गुप्त रहेगा। हजारों प्राणियोंमें एक-आध मनुष्य ही इसे जान सकेंगे। इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ ८० ॥ यह समस्त