श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
दिव्यान्नैः परिपूर्णानि चकार सुरभिस्त्विति । ततः शीघ्रं हेमपात्रैर्गृहीत्वान्नानि पृथग्विधान् ॥ परिवेषणार्थं सन्तुष्टा ययौ नूपुरगुञ्जिता ॥२७॥ एतस्मिन्नन्तरे रामश्चोपाहारार्थमादरात् । विप्रानिष्टान्मन्त्रिणश्च समाहूय सहस्रशः ॥२८॥ उपाविशद्भोजनस्य शालायां तैः समन्वितः । रुक्मपीठे सुवर्णे ने मणिरत्नैरूषमाः स्थिताः ॥२९॥ पीतक्षीरोल्लसत्समन्विता रुक्ममण्डनैः । पूजिता गन्धवेणापि गन्धसन्नन्तादिभिर्मुदा ॥३०॥ स्त्रीणां रुक्म-पदस्थु रुक्मपात्राणि च पृथक् रंगावलि विचित्राणि भूमौ न्यस्तानि तत्पुरः ॥३१॥ हेमोद्भवं नि पानीयपात्राण्यपि पृथक् पृथक् । सोपपत्राणि चित्राणि रत्नदीप्तियुतानि च ॥३२॥ स्थापयामासुः श्रीरामबन्धुवन्ध्वस्त्रगान्विताः । एतस्मिन्नन्तरे सर्वैः श्रुतो मञ्जुलनिस्वनः ॥३३॥ नूपुराणां किंकिणीनां कङ्कणानां मनोरमः । रत्नौघां कङ्कणानानां घर्षणादुत्थितो महान् ॥३४॥ स मञ्जुलस्वनं श्रुत्वा कथमेषं श्रूयते स्वनः । इति मतिश्चित्ताचन्ते व्यग्रनेत्रैरितस्ततः ॥३५॥ अपश्यन् ब्राह्मणाद्याश्च तावत्सीतां व्यलोकयन् । तडिद्गुणोपमां दिव्यां शतकोटिरविप्रभाम् ॥३६॥ यस्याङ्गुलिषु सर्वत्र पादयोर्विविधानि च । मत्स्यकच्छपनाकादिविहिताम्युज्ज्वलन्ति च ॥३७॥ ददृशु रत्नचित्राणि हेमाभ्याभरणानि ते । तत ऊर्ध्वं किंकिणीनां पादयोनूपुराणि च ॥३८॥ शृङ्खला विविधा रम्यास्तथा गुर्जरीयन्त्रताः । नानानुपुरभेदाय कङ्कणान्युज्ज्वलानि च ॥३९॥ रत्नकङ्कणसंघांश्च दिव्यवस्त्रकोत्रवानि च । मट्टशूम्ने हि सीताया म शिक्यचित्रितानि च ॥४०॥ तस्याः कट्यां ददृशुस्ते पीतकीशेयमुज्ज्वलम् । मुक्ताजालकघनतुपुष्परञ्जितिचितम् ।४१॥ नवीन गतिचांचल्यात्कृतमंजुलनिःस्वनम् । आदर्शादर्शसंयुक्तं सुगन्धा मोद मोदितम् ॥४२॥ वक्षोपरि ददृशुस्ते रशनां रुक्मतन्तुताम् । रत्नकङ्कणशोभाभिः किंकिणीभिर्विराजिताम् ॥४३॥
नमस्कार है कृपा करके आप साधु-ब्राह्मणोंके लिए अन्न-वस्त्र तथा दिव्य अन्नका प्रबन्ध कर दें जानकीजी इस प्रकार प्रार्थना करके कराहा मृदङ्गके पात्र कामधेनुके पास भिजवाकर रखवा देती थी और कामधेनु उन सबको विविध प्रकारके पकवानोंस भर दिया करती थी। उह्नो हेमपात्रेर्मंस सब पदार्थों ले लेकर युवतियां नूपुरके शब्दसे उस यज्ञमण्डपको शब्दायमान करती हुई अन्नदाताको परोसती थीं। २४-२७॥ इसके अनन्तर रामचन्द्रजी अपने साथ हजारों ब्राह्मणों तथा हित-मित्रोंको सादर बुलाकर पाकशालामें सुवर्णके पीढ़ापर बिठलाकर अनेक उपचारोंसे पूजन करते थे ॥२८-३०॥ वहाँ सुवर्णकी तिपाइयोपर घड़ोंमें जल भर भरकर रक्खा था। पास ही जल पीनेके लिए छोटे-छोटे बहुतसे सुवर्णके बर्तन रक्खे हुए थे। उनकी झटपट उठा उठाकर रामचन्द्रजीकी भ्रातृवधुओंस लाकर उनके सामने रख दिया। इतनेम सबको एक मनोहर ध्वनि सुनाई दी। जो नूपुर, किंकिणी और कंकणके संघर्षसे निकला हुआ शब्द मालूम पड़ता था ॥३१-३४॥ उस मञ्जुल शब्दको सुनकर यह कैसा शब्द सुनाई दे रहा है इस तरह सोचते हुए व्यग्र नेत्रांसे लोग इधर-उधर देखने लगे ॥ ३५ ॥ ३६ . कुछ देर बाद लावान सीताजीको आते देखा। जा अनेक विद्युत्तुल्य एवं सैकड़ो सूर्यकी भाँति प्रकाशमयी थी। जिनके पाँवोंको अंगुलियोंमें मछली-कछुए आदिके आकारवाले हेमामयमान आभूषण परे थे॥ ३७॥ रत्नोंके चमकसे विचित्रविचित्र सुवर्णके आभूषण सुशोभित हो रहे थे। किंकिणीके ऊपर दोनों पैरोंमें नूपुर थे। इसके ऊपर विविध प्रकारका सुन्दर मेखलाये पड़ी थीं। अनेक तरहके नूपुर और नाना प्रकारके उज्ज्वल कंकण हाथोंमें पड़े हुए थे। सीताजीकी कमरपर एक रेशमी वस्त्र था जिसमें मोतियाकी झालर लगी हुई थी और सुवर्णके तारों म फूल-पत्तीकी चित्रकारी बनी हुई थी ॥३८-४१॥ गतिको चंचलतावश उसमेंसे एक मधुर ध्वनि निकल रही थी। उनकी साड़ीमें जगह जगह मयूर, सिंह, धूप,