भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 349

सर्गः ८ ] जन्मकाण्डम् ३३३

जानकी तव कन्येयं श्वश्रूस्त्वं मेऽधुना प्रिये । कन्यादानं कुरु मुदा यत्त्वया पूर्वं कृतं न हि ॥६५। प्रसीद देवि नोचेन्मे त्वयि क्रोधो भविष्यति । श्रीरामदास उवाच इति संप्रार्थिता साऽथ शश्वत्तु महात्मना ॥६६। नारी काठिन्यभावाच्या नाश्रृणोद्रघवेश्चित् । शनैः शनैः समाविष्टा सा जगाम ह ॥६७। तां गच्छन्तीं पुनर्दृष्ट्वा भृशं रामो रुषान्वितः । बभूव क्रोधताम्राक्षस्तदा लक्ष्मणमब्रवीत् ॥६८। चापमानय सौमित्रे शिक्षयेऽहं भुवं त्विमाम् । मन्मुखोपेक्षरूपेण वसुधेयं विदेहजाम् ॥६९॥ मामकं दास्यति क्षिप्रमन्यथा घातं न संशयः । ततोऽसौ लक्ष्मणस्तूर्णं करे कोदण्डमुक्तवान् ॥७०॥ धृत्वा ज्यारोपणं कृत्वा शरसंधानमातनोत् । तदा ववौ महन्वायुरुद्भूमे लवणार्णवः ॥७१॥ तारा निपेतुर्धरणीं बभूवुः सरजा दिशः । चकम्पे धरणी भीता त्राह्यत्राह्यति वदती मुहुः ॥७२॥ कराभ्यां जानकीं धृत्वा रामस्याङ्के न्यवेशयत् । श्रीरामचरणयोः पृथ्वी शिरसा नमनं व्यधात् ॥७३॥ तदा खे देववाद्यानि नेदुः कुसुमवृष्टिभिः । ववृषुर्जाानकीं रामं देवसङ्घा मुदान्विताः ॥७४॥ ततो रामोऽपि तां दृष्ट्वा पदयोर्नमतीं भुवाम् । स्वक्रोधं शान्तमकरोत्त्यक्त्वा चापमथोऽसृजत् ॥७५॥ विस्मृत्योत्थापयामास स्वकराभ्यामपि प्रभुः । ततः सा राघवं नत्वा प्रसाद्य च पुनः पुनः ॥७६॥ दत्त्वा विदेहकन्यायै तन्सिंहासनमुत्तमम् । सीतां स्तुत्वाऽथ तां पृष्ट्वा तया संपूजिताऽपि च ॥७७॥ आमन्त्र्य राघवं पृथ्वी क्षणदन्तरहिताऽभवत् । तदा सीतां जनाः सर्वे पुनर्जातान्तु मेनिरे ॥७८॥ अयोध्यास्थाः प्रणमुस्तां चक्रुः पूजां पृथक् पृथक् । ददौ दानान्यनेकानि तदा रामो मुदान्वितः ॥७९॥ नवरत्नादिनिम्नाश्च सम्बभूवुः समन्ततः । ननृतुर्वारनार्यश्च तुष्टुवुर्बन्दिमागधाः ॥८०॥

संसारी मायाका प्रीतिपूर्वक प्रदान करता है। मुझ और अमुक जितना था कम है, उनमें आप सहायका हैं ॥ ६४ ॥ यह सीता आपका कन्या है। इस नाते आप मम सास हैं। आपने विवाहके समय कन्यादान नहीं किया था, सो अब कर दीजिए ॥ ६५ ॥ हे देवि ! आप मेरेपर प्रसन्न हो जावें । नहीं तो मैं आपपर क्रुद्ध हो जाऊँगा । श्रीरामदासवत कहा—रामके इस तरह प्रार्थना करनेपर भी पृथ्वीने उनकी एक न सुनी। क्योंकि स्वभावतः ही नायिकाका हृदय कठिन हुआ करता है। सीता धीरे-धीरे पृथ्वितलम समाती जा रही थी ॥ ६६।६७ ॥ विनय करनेपर भी जब रामने देखा कि पृथ्वी मेरी बातोंपर कुछ ध्यान नहीं दे रही है तो मारे क्रोधके उनका आँख लाल हो गयी और लक्ष्मणसे बाले—॥ ६८ ॥ लक्ष्मण ! मेरा धनुष तो उठा लाओ, मैं पृथ्वीका उसके दुराग्रहका दण्ड दे दूँ। मेरे छूटे सदृश तीक्ष्ण बाणसे डरकर यह सीताको लौटा देगी। इस मैं मारना नहीं चाहता, चाहता हूँ केवल साताको इसके हाथोंसे लोटना। तदनुसार तुरन्त लक्ष्मण धनुष उठा लाये। रामने उस लेकर राजा ठाक किया और बाण चढ़ाया। उस समय जोरास बांय चलन लगा, समुद्रमे प्रलयसदृशकी लहरें उठने लगीं, तारे टूट-टूटकर गिरने लगे और चारों दिशाएँ धूलसे आच्छादित हो गयी। ऐसी अवस्था में 'त्राहि त्राहि' करती हुई पृथ्वी काँपने लगी और उसने अपने हाथो साताका उठाकर रामकी गोदमें बिठा दिया। इसके बाद पृथ्वीने सिर भुकाकर रामके चरणोंकी वन्दना की ॥ ६९-७३ ॥ उस समय स्वर्गमें देवताओंने देवबाय बज ये और राम तथा सीतापर फूलोंकी वर्षा की ॥ ७४ । इसके बाद जब रामने देखा कि पृथ्वी मेरे चरणम मुकी हुई विनती कर रही है तो अपना कोप शान्त कर लिया तथा धनुष-बाणका परित्याग करके अपन दत्तो हाथोंसे पृथ्वीको उठाया । इसके अनन्तर पृथ्वीने किन्द भगवान्को बार-बार नमस्कार किया, प्रार्थना की और सीता तथा यह सुवर्णमय सिहासन रामको समपर्ण कर दिया। फिर सीताकी स्तुति की। सीताने भी पृथ्वीकी विधिवत् पूजा का। तत्पश्चात् रामकी आज्ञा लेकर क्षण भरके भीतर ही पृथ्वी अन्तर्धान हो गयीं। उस समय सभामें बैठे हुए लोगोंने सीताका पुनर्जन्म समना ॥ ७५-७८ ॥ सब लोगोंने सीताकी विधिवत् पूजा की और जय-जयकार करके प्रणाम किया। तब रामने अनेक प्रकारके दान दिये ॥ ७९ ॥ भाँति-भाँतिके नवीन बाजे बजे,