भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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३३२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

रामादन्यमहं चेद्धि मनसाऽपि न चिन्तये । तर्हि मे धरणी देवि विवरं दातुमर्हसि ॥४८॥ एवं शपन्त्याः सीतायाः प्रादुरासीन्महाद्भुतम् । भूतलाद्दिव्यरूपार्थं सिंहासनमनुत्तमम् ॥४९॥ धृतो दिव्यरसै रोषैः समानीतं मनोहरम् । नागेन्द्रैर्ध्रियमाणं तद्दिव्यदेहं रविप्रभम् ॥५०॥ मूर्द्ध्ना जानकीं दोर्भ्यां धृत्वा दुहितरं निजाम् । स्वागतामीति तामुक्त्वाऽऽसने मा मन्यवेशयत् ॥५१॥ वस्त्राऽलङ्कारसम्पन्नमुदधैः पूज्य मैथिलीम् । समालिङ्ग्याथ भूदेवी वीजयामास सादरम् ॥५२॥ तदा शनैः शनैर्भूम्यां सुतं सिंहासनं त्वभूत् । सिंहासनस्थ वैदेही प्रविशन्ती रसातलम् ॥५३॥ दृष्ट्वाऽऽकाशस्थिता देवाश्चैव सर्वांस्तु मन्त्रमन्त् । निरन्तरं भिर्र्वैदेही ववपुः पुष्पवृष्टिभिः ॥५४॥ साधुवादश्च सुमहान्बभूव सुरकीर्त्तितः । अन्तरिक्षे च भूमौ च सर्वं स्थावरजङ्गमम् ॥५५॥ तदा बभूव चकितं सीतापथदर्शनात् । ऊचुश्चे वसुधा वाचो वानराश्च नगादिकाः ॥५६॥ केचिच्चिन्तापराः केचिदासन्ध्यानपरायणाः । केचिद्रामं निरीक्षन्तः केचित्सीतामचेतसः ॥५७॥ मुहूर्त्तमात्रं तत्सर्वं तूष्णींभूतमचेतनम् । प्रविशन्तीं भुवं सीतां दृष्ट्वा संमोहितं जगत् ॥५८॥ एतस्मिन्नन्तरे रामः प्रविशन्तीं दृ भूतले । विदेहजां तदा दृष्ट्वा वामहस्तेन संभ्रमात् ॥५९॥ यां दधार करेणादौ धन्वा हस्तेन वै भुवम् । ततम्भो प्रार्थयामास भुवं स रघुनन्दनः ॥६०॥

श्रीरामचन्द्र उवाच

देवि त्वं सर्वलोकानां निवासस्थानमुत्तमम् । अपि लोकमाता त्वं महानीरोपरिवृतः सदा ॥६१॥ वर्तसे पुण्यरूपान्वं सम्पुदा सकलान् जनान् । स्वजठरोर्ध्वौषधीभ्यश्च करोषि विभृतन्विद्राः ॥६२॥ त्वं दुर्गा त्वं स्वरा लक्ष्मीरभमं विष्णोः प्रिया शुभा त्वमेवाद्यात्र मे शुक्तिर्निमिताऽसि मयैव हि ॥६३॥ निजोधराद्ददासि त्वं धातून्बीज्या जनान्मदा अभायुक्ता त्वमेवासि सूक्ताष्टाकादिकर्मसु ॥६४॥


की ओर नीचे निगाह तथा ऊपर मुँह करके बोली—॥४७॥ हे पृथ्वि माता ! यदि रामके सिवाय अन्य किसीको मैंने अपने हृदयमें भी न ठाना हो, तो आप मुझे ऐसी जगह दीजिए कि जिससे मैं आपमें समा जाऊँ ॥ ४८ ॥ इस प्रकार सीताके प्रार्थना करनेपर तुरन्त एक दिव्य सिंहासन पृथ्वीके भीतरसे निकला । उसको बड़े-बड़े नाग अपने शिरपर उठाये हुए थे सूर्यके समान देदीप्यमान उन नागोंका प्रकाश था ॥ ४९ ॥ ५० ॥ इतनेमें साक्षात् पृथ्वी देवीने अपनी दोनों भुजाओंमें सीताका स्वागत किया। फिर छातीसे लगा तथा गोदमें लेकर उन्हें उस सिंहासनपर बिठाल दिया । इसके अनन्तर वस्त्र अलङ्कार माला-फल आदिसे सीताकी पूजा की और छातासे लगाकर पङ्खा झलने लगी । ५१ । ५२ ॥ इसके बाद धीरे-धीरे वह सिंहासन पृथ्वीके भीतर घूमने लगा । सिंहासनपर बैठी हुई सीताको पातालमें जाती देखकर आकाशमें स्थित सारी देवांगनाएँ उनपर पुष्पोंकी वर्षा करने लगीं ॥ ५३ । ५४ ॥ आकाश और पृथ्वीमें देवताओं और मनुष्योंने साधुवाद किया । सीताकी उस शपथको देखकर समस्त स्थावर-जंगम प्राणी चकित हो गये और अपनी बुद्धि-बुद्धि भूलकर परस्पर बात करने लगे ॥ ५५ । ५६ ॥ उनमें कुछ लोग चिन्तित थे और कुछ ध्यानमग्न । कुछ लोग रामको देख रहे थे । कुछ लोग अपनी सुधि-बुद्धि भूलकर सीताकी ओर निहार रह थे ॥ ५७ ॥ मुहूर्तभरके लिए वही सारा समाज सन्न हो गया । सीताको पृथ्वीके भीतर समाती देखकर समस्त संसार मुग्ध हो गया ॥ ५८ ॥ राम सीताको पृथ्वीमें धंसती देखकर अपने सिंहासनसे कूद पड़े और पृथ्वीके पास जा पहुंचे। वे उनका हाथ अपने हाथसे पकड़कर इस प्रकार पृथ्वीसे प्रार्थना करने लगे । ५९ । ६० । श्रीरामचन्द्र बोले— हे देवि ! आप सारे संसारकी निवासभूमि हैं समस्त जगत्की माता होकर महानीरके ऊपर आप स्थित हैं ॥६१॥ आप पुण्यरूप हैं । समस्त जनोंको हर प्रकारकी सम्पत्तियां देनेको सामर्थ्य रखती हैं । आप अपने उदरसे अनेक प्रकारकी औषधियाँ उत्पन्न करके सबका रक्षा करती हैं । आप दुर्गा, रुद्रा और विष्णुकी प्रिया लक्ष्मी हैं । आप आदिशक्ति हैं और मैंने ही आपको बनाया है ॥ ६२ ॥ ६३ ॥ आप अपने उदरसे भाँति-भांतिके धातु निकालकर