भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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॥ सर्गः ८ ॥ जन्मकाण्डम् १३१

मुक्ताविमौ तु दुर्धर्षौ मध्यमेन्द्रावपि ते । प्रचेतासोऽहं दशमः पुत्रो रघुकुलोद्वह ॥३०॥ अनृतं न स्मराम्युक्तं यथेमौ तव पुत्रकौ । बहुवर्षसहस्राणां सम्यक् तपश्चर्या मया कृता ॥३१॥ नोपभोक्ता फलं तस्या भवेयं यदि मे ऽनिला । इत्युक्त्वा राघवस्यांके दक्षिणे स्थाप्य वै कुशम् ॥३२॥ लवं विन्यस्य वामांके तस्यान्वेवापरासने मूर्त्तः । गतोऽपि तौ समालिंग्य मूर्ध्न्यावघ्राय सादरम् ॥३३॥ लक्ष्म्य हस्तेके हस्तं संस्थाप्य आशीश्वरः । प्रतिष्ठास्ततं बालं पूर्ववन्मोऽकरोत् च तम् ॥३४॥ ततो रामोऽपि तां सीतां दृष्ट्वा बुद्धयन्विताम् । अथात इव सम्प्राह लक्ष्मणं पुरतः स्थितम् ॥३५॥ त्वया सूनः ममानीतः सीतायाश्च प्रदर्शितुम् । पुरा तमानयस्वाद्य खेदस्ति शशिनस्त्वया ॥३६॥ तथेत्युक्त्वा लक्ष्मणोऽपि पेटिकान्निहितं भुजम् । सीतायाः पुरतो राम दर्शयामास सादरम् ॥३७॥ सीताभुजोपमं दृष्ट्वा भुजं मारुतिनिर्मितम् । वस्त्ररुपांतरे काले सामन् सर्वऽतिविस्मिताः ॥३८॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र पश्यत्सु सकलेष्वपि । भुजः स गुप्ततां प्राप्तो विश्वकर्मोद्भवः क्षणात् ॥३९॥ तद्दृष्ट्वा कौतुकं लोका अभूवन्नतिविस्मिताः । रामोऽपि विस्मितः प्राह वाल्मीकिं प्रणिपत्य च ॥४०॥ एवमेव महाप्राज्ञ यदुक्तं मा मया ऽनृतम् । प्रत्ययो जनितो मह्यं तव वाक्यैरकिल्बिषैः ॥४१॥ लङ्कायामपि दृष्टा मे चैरेवाऽप्रतप्तः शपतः । इन्द्राद्यैः सुरतस्तेन मन्दिरं सम्प्रवेशिता ॥४२॥ सेयं लोकापवादेन मयाऽपि मतिमाऽधुना । मया त्यक्ता परित्यक्ता तद्गतान् क्षन्तुमर्हसि ॥४३॥ ममार्जुनोऽर्कश्चारूपं कुशीऽय वलवान्मया। सर्वशौर्या कृतो वेद्मि सीतायामप्यनसूये ॥४४॥ तथापि लोकसङ्गह्यान्कुरुतां शपयं त्वयि । जगत्सु शपयं नापि ममाद्यो तव सन्निधौ ॥४५॥ शुद्धायां जगतामध्ये सीतामंगीकरोम्यहम् । तदा तच्छपथं द्रष्टुमामन्लोकाः समुत्सुकाः ॥४६॥ समग्रा जानकी चाथ तदा कौशेयवासिनी । उदङ्मुखी ह्यधोदृष्टिः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥४७॥

असाधारण बल हैं। कोई भी योद्धा इनके सामने नहीं टिक सकता। विधाताका मैं दसवाँ पुत्र हूँ। आज तक मैं कभी झूठ नहीं बोला। अनेक वर्षोंतक मैने घोर तपस्या की है। यदि सीता किसी तरह भी पापाचारिणी हुई तो मैं उस तपस्याके फलका उपभोग न ग्रहण करूंगा। इतना कहकर वाल्मीकिने कुशको रामके दाहिना बगल तथा लवको बायीं ओर बिठाया और स्वयं उनके सामने एक ऊँचे आसनपर बैठे। रामने इन भाइयों उस बालकोंका आलिंगन किया, माथा सूंघा और उनके मस्तकपर अपना दाहिना हाथ रखकर कुशके समान उस अवसरपर उनका नाम बता दिया ॥ २७ से ३४ ॥ इसके अनन्तर रामने सीताकी ओर देखा तो सीताका शरीर देखकर बहुत शोक देखा। उन्होंने मज सभासद लक्ष्मणको आज्ञा दी कि उस समय जो सुवर्ण भुज काटकर हनुमान तुम दिखाये लाये थे, यदि वह सुरक्षित रीतिसे रक्खी हो तो यहाँ ले आओ ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ लक्ष्मण 'बहुत अच्छा' कहकर पटाम रक्खी भुजा लाकर रामके सामने रख दी ॥ ३७ ॥ दृश्न दिन दसोरपर भी ठंक सीताकी भुजाओंके समान लटकते चामके चीथड़े तथा रुधिरसंयुक्त भूषाप्रथा देखकर सभासद जितने लोग बैठे थे वे बड़े विस्मित हुए ॥ ३८ ॥ इसी बीच लोगोंके देखते ही देखते वह विश्वकर्माकी बनायी भुजा गायब हो गयी। यह कौतुक देखकर लोगोंको और भी आश्चर्य हुआ। तब रामने विस्मित होकर वाल्मीकिसे कहा—हे महाराज ! मुझे तो आपकी बातोंसे ही विश्वास हो गया था कि सीता परम पवित्र है ॥ ३९-४१ । लङ्कामें भी मैंने सीताका शपथ देखी थी। उस समय देवताओंके समक्ष शपथ लेनेपर ही मैंने उसे अपने घर किया था ॥ ४२ । तथापि लोकापवादके भयसे पवित्र समझकर भी मैंने सीताका परित्योग किया। आप मेरे इस अपराधको क्षमा करें ॥ ४३ ॥ यह भी मैं जानता हूँ कि कुश मेरा पुत्र है और लवको आपने सीताके गर्भसे उत्पन्न किया था ॥ ४४ । यह सब होते हुए भी इन संसारवालोंको विश्वास दिलानेके लिये सीता इस सभा में शपथ ले ॥ ४५ । यदि इस जनसमाजमें और इस संसारमे सीता शुद्ध सिद्ध हो गयी तो मैं इसको फिर अङ्गीकार कर लूँगा। उस समय सीताकी शपथको देखनेके लिए वहाँ बैठे हुए सब लोग उत्सुक हो रहे थे ॥ ४६ ॥ तदनन्तर सभामें रेशमी कपड़े पहने सीता खड़ी हो गयी और हाथ