भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 346

२३० आनन्दरामायणे [ सर्ग ८


इति तद्वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणाद्या महीं गताः । ऊचुर्यथोक्तं रामेण वाल्मीकिं लक्ष्मणादिकाः ॥ १२॥ रामस्य हृद्गतं सर्वं ज्ञात्वा वाल्मीकिरब्रवीत् । सर्वानितान् सुमंत्राद्यान् लक्ष्मणाय समर्प्य च । १३। युष्माभिः कथनीयं यद्वाक्यं श्रीराघवं प्रति । श्वः करिष्यति वै सीता शपथं जनसंसदि । १४। योषितां परमो देवः पतिरेको न चापरः । पतिं विना गतिः काऽन्या भार्याश्चास्ति जगत्त्रये ॥१५। लक्ष्मणाद्यास्ततः सर्वे राममागम्य ते पुनः । सुमंत्रादींश्चतुर्वीरांश्चाघवाय समर्प्य च ॥१६। वाल्मीकेर्वचनं हर्षात्पुनर्मं रघुनायकम् । वाल्मीकेर्वचनं श्रुत्वा तुतोष राघवोऽपि च ॥१७। सुमन्त्रं भरतं वायुपुत्रं वानरनायकः । समालिङ्ग्य चतुर्व्यान् स पुनर्जन्ममन्यत । १८। सीतया पालिताः सर्वे वयं लवजितास्त्विति । कथयामासुः श्रीरामं सुमन्त्रादिद्विरद० ॥१९। द्वितीये दिवसे कृत्वा सभां श्रेष्ठां मनोरमाम् । सर्वानृष्यान् समाहूय रामो वाक्यमथाब्रवीत् ॥२०॥ मुनयः पार्थिवाः सर्वे शृणुत स्वयमागताः । सीतायाः शपथं लोद्य विज्ञास्येऽनुभयं ततः॥२१ इत्युक्त्वा राघवेणाथ लोकाः सीतादिदृक्षवः । ब्राह्मणा क्षत्रिया वैश्या शूद्राश्चैव सहस्रशः २२। सत्रावगः समाजग्मुस्तद्दिव्यं द्रष्टुमुद्यताः । ततो मुनिसंयुक्ता सीता समाययौ पुरः ॥२३। अध्रनर्त्त मुनिं कृत्वा यांती किंचिदवाङ्मुखी । तावल्लोका जनाश्चैव चक्रुर्जयजयं ततः ॥ २४। दृष्टा लक्ष्मीमिरायांतीं श्रीविष्णोरनुयायिनीम् । वाल्मीकेः पुरत स्तेषां जयघोषं प्रचक्रिरे २५। तदा मध्ये जनौघस्य प्रविश्य मुनिपुङ्गवः । माहामात्यैः वाल्मीकिर्मदा मघामब्रवीत् । २६। इयं दाशरथे सीता सुवृत्ता धर्मचारिणी । त्वया पापान्मुदा त्यक्ता ममाश्रमसमीपत २७। लोकापवादभीतेन यमुनादक्षिणे तटे । प्रत्यक्षं दास्यते मह्यं तदनुज्ञातुमर्हसि ॥२८॥ इमौ तु सीतातनयौ कुशश्चवत्तो लवे मया । लवैर्वनिर्मितः सीताप्रत्ययञ्चाग्रवेचनमा ॥२९।


जो कुछ कहा था, सो कह सुनाया ॥ ६-११॥ रामके मनकी बात जानकर वाल्मीकिने कहा - आज तुम लोग जाओ और रामसे कह दो कि कल सभामे जाकर सीता सब लोगोके सामने शपथ खायगी ॥ १२-१४॥ स्त्रियोंके लिए पतिके सिवाय और कोई देवता नही होता ! इसी अवस्थामें सीता और कर ही क्या सकती है। पतिके बिना स्त्रीके लिए लोकमें और कोई गति भी नहीं है ॥ १५। तब लक्ष्मण आदि वहाँसे लौट आये। रामने उनके मुखसे वाल्मीकिका सन्देश सुना तो परम प्रसन्न हुए। वे लोग वहांसे लौटते समय सुमन्त्र आदि चारों वीरोंको, जिनको कि लवने बन्दी बना रक्खा था, साथ में लाये थे। राम उन सबको अपनी छातीसे लगाकर मिले और यह समझा कि इन चारोंका पुनर्जन्म हुआ है ॥ १६-१८ उन सबोंने अपना हाल बतलाते हुए कहा कि यद्यपि लवने हम सबको कैद कर दिया था किन्तु सीताने पूर्णरूपसे हमारी रक्षा की ॥ १९॥ दूसरे दिन एक विशाल सभा आयोजित की गयी। उसमें सब लोगोंको सम्बोधित करके रामने कहा- हे देशविदेशसे आये हुए ऋषियों ! आज इस सभामे आप लोगोंके समक्ष सीता शपथ खायगी। इससे आप लोगोंको उसके शुद्धता तथा दुष्टताका पता लग जायगा। इस प्रकार राम-के वचन सुनते ही सब लोग माताको देखनेके लिए उतावले हो उठे। नगरमें भी यह समाचार पहुँच गया। अतएव इस दिव्य शपथको देखनेकी लालसासे कितने ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वहाँ आ पहुँचे ॥ २०-२२॥ थोड़ी देर बाद सीताके साथ वाल्मीकि जी सभा में पधारे। आगे आगे वाल्मीकि थे और उनके पीछे नीचा सिर किये सीता मन्दगतिसे सभा में आयीं। उस समय सीता और वाल्मीकिको देखकर ऐसा लगता था कि मानों विधातुके पीछे पीछे लक्ष्मी चली आ रही हैं। सीताको देखते ही लोगोंने जयजयकार किया और वाल्मीकिजी सभाके बीचमे पहुँचकर रामसे कहने लगे - । २३-२६॥ हे राम ! कुछ दिन हुए जब आपने लोकापवादके भयसे सीताको मेरे आश्रमके समीप छोड़वा दिया था । आज वह ही सीता आपके सामने शपथ खायगी, आप इसके लिए आज्ञा दें । सीताके इन दोनों पुत्रोंमें कुश आपका सगा रूप (कुशकी दूर्वोंसे) बनाया हुआ मेरा वेटा है। उसे मैंने सहसा सीताके डरस बनाया था। ये दोनों बेटे