भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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११६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

एवमष्टौ कुमारास्ते रामादीनां मनोरमाः । ववृधुश्चन्द्रवदना मातृभिर्लालिताः सुखम् ॥१७॥ शृङ्खलावद्धरत्नौघनिर्मितेषु वरेषु च । प्रखेषु हि कुमारास्ते विरेजू रत्नभूषिताः ॥१८॥ भाले स्वर्णमयाश्वत्थपर्णाभ्यतिमहान्ति च । मुक्ताफलाग्रलम्बीनि शोभयन्ति स्म बालकान् ॥१९॥ कण्ठे रत्नमणीवानमध्यगौपन्नखाञ्चिताः । कर्णयोः स्वर्णसंपन्नरत्नाज्जुनसुतालकाः ॥२०॥ सिंजानमणिमंजीरकट्सूत्रार्गदैर्युताः । स्निग्धवक्त्र लपदशना इंद्रनीलमणिप्रभाः ॥२१॥ मंगणे रिंगमाणाश्च मस्कारैः मण्डनाः शुभाः । ते पितॄन् रञ्जयामासुर्भाताश्चापि विशेषतः ॥२२॥ नाना शिशु क्रीडनैश्चैव प्रमंग्मुखचुम्बनैः । बालकविभ्रमैर्मुग्धैर्गमनैर्मधुरैरितैः ॥२३॥ ततस्ते बालकाः सर्व्वे वस्त्रालङ्कारभूषिताः । सभायां राघवं नत्वा तस्थुः सिंहासनेोपरि । २४। एकदा राघवः प्राह वसिष्ठं सदसि स्थितम् । अवलोक्य बालानां त्वं चिह्नानि यथाक्रमम् । २५। तच्छ्रुत्वा रामवचनं वसिष्ठो भूसुरैः सह । आदौ कुशं समाहूय दृष्ट्वा रामं वचोऽब्रवीत् ॥२६॥

वसिष्ठ उवाच

पंचसूक्ष्मः पंचदीर्घः सप्तरक्तः षडुन्नतः त्रिषुयुक्तंषुगंभीरो द्वात्रिंशल्लक्षणव्ययम् ॥२७॥ पंच दीर्घाणि शस्तानि यथा दीर्घायुरोऽत्र च । भुजौ नेत्रं हनुर्जान् नासा च तनयस्य ते ॥२८॥ ग्रीवा जंघा मेढ़नैश्च त्रिभिर्ह्रस्वोऽयर्मडितः । स्वरेण सत्त्वनाभिभ्यां त्रिगंभीरः शिशुः शुभः । २९॥ त्वक्केशंगुलिदशनाः पत्रांण्यङ्गुलिजान्यपि । तथाऽम्य पंच सूक्ष्माणि सूचयन्ति परां श्रियम् ॥३०॥ पाण्र्यङ्घ्रितलनेत्रांते तालुजिह्वाधरोष्ठकम् सप्तरूष्ण च सनममस्मिन् राज्यसुखप्रदम् ॥३१॥ वक्षः कुक्ष्वालिकस्कन्धकरवक्त्रं षडुन्नतम् । तथाऽत्र दृश्यते बाले महदैश्वर्य्यभोगभाक् ॥३२॥


किया करते थे इस तरह रामादि चारों भ्राताओंके आठो कुमार—जिनका चन्द्रमाके समान मुखमण्डल था—माताओसे लालित होकर बढ़न आत थे। सोनेके जंजीरोंसे बधे हुए एवं तरह-तरहके रत्नोंसे सुसज्जित पालनोंपर ये आनन्दकी किलकारियां भरा करत थे । १६ , उन बच्चोंका कितने ही प्रकारके स्वर्णमय आभूषण पहनाये जाते और माथेपर पीपलके पत्तेकी नई सुवर्णका पत्ता बनाकर लगाया जाता था। जिसमें छोटे छोटे मोतियोंके गुच्छ लटकते हुए बड़े भले लगते थे । १७ ।। १८ । गलेमें रत्नों और मणियोंके समूहके बीचमें व्याघ्रका नख शोभायमान हो रहा था। कानामे सुवर्णक कुण्डल झूलते रहते थे और उनमें लगा हुआ हीरा प्रकाशित हो रहा था । १९ ।। २० ।। रुनझुन करती हुई मणियोंकी करधनी पड़ी थी । हाथोंमें कङ्कण तथा विजायत अपना असाधारण निखार दिखा रहा था। जिस समय वे बच्चे तनिक मुस्करा देते तो इन्द्रनीलमणिके समान उनके छोटे छोटे दांत दीखने लगत थे । हाथ और पैरके सहारे आँगनमें रंगते हुए वे बालक नाना प्रकारके बालविनोद तरह तरहके बाल, मुखचुम्बन, बालकीय कृत्रिम युद्ध ओर मोडामोंड़ा बोलोंसे अपने-अपने माता-पिताको आनन्दित करते रहते थे। कुछ दिनों बाद वे अच्छे अच्छे वस्त्रालभूषण पहिनकर राजसभाम जाते और वहाँ नियमत रामचन्द्रको प्रणाम करके अपने आसनपर बैठ जाते थे ॥ २१-२४॥

एक दिन राजसभाम बैठे हुए वसिष्ठजीसे रामन कहा—आप कृपया इन बालकोंका शुभाशुभ लक्षण देखकर हमें बतलाइए । यह बात सुनकर वसिष्ठने सबसे पहले कुशको अपने सामने बुलाया और रामसे कहने लगे—॥ २५ ॥ २६ ॥ पाँच प्रकारके लक्षण सूक्ष्म, पाँच ही तरहके दीर्घ, सात रक्त, छः उन्नत, तीन विस्तृत, तीन ही सांग लघु तथा तीन गंभीर सब मिलाकर ३२ प्रकारके लक्षण होते हैं ॥ २७॥ जैसे कि इस चिरंजीवी कुशके हाथ, नेत्र, बाहु घुटने, नाक ये पाँच दीर्घ हैं। अतएव ये बहुत अच्छे हैं। ग्रीवा, जंघा और लिंग इन तीनोंके छोटे होनेसे इसके तीन ह्रस्व हैं। ये भी अच्छे हैं। शब्द, बल तथा नाभि ये तीन गंभीर हैं। इसकी त्वचा, केश उँगलियां, दाँत, शरीरकी संधियां तथा नख ये पाँच सूक्ष्म इसकी श्रीकी सूचना दे रहे हैं। हाथ, पैर, तलवे, नेत्रके आस-पासवाले भाग तथा तालु, जिह्वा, अधरोष्ठ और नख ये रक्तवर्णके होनेसे राज्यसुख देनेवाले हैं ॥ २८-३१॥ छाती, पेट, कन्धा,