भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 353

सर्गः ९] जन्मकाण्डम् ३३७


ललाटकटिवक्षोभिस्त्रिभिर्विस्तीर्णैः यथा ह्यसौ। सर्वतेजो महैश्वर्यं तथा प्राप्स्यति नान्यथा ॥३३॥
अविच्छिन्नां तर्जनीं प्राप्य तथा रेखाऽस्य दृश्यते। कनिष्ठामूलनिर्याता दीर्घायुष्यं यया भवेत् ॥३४॥
कमठपृष्ठकठिनावूर्ध्वकण्ठौ करौ। राज्यहेतू शिरोऽस्य पादौ चाप्यति कोमलौ ॥३५॥
पादौ समामलौ रक्तौ समौ सूक्ष्मौ सुशोभनौ। समगूढ...म्वशब्देन स्निग्धार्थदर्शनैस्तथा ॥३६॥
स्कन्धाभिः कररेखाभिश्चारुकाभिः सदा सुखी। लिंग... कूहस्वनेन राज्ञां राजा भविष्यति ॥३७॥
उन्नतशमनगुल्फस्निग्धनाभिस्तथापि च। जंघा राजन वर्तुलस्या महदैश्वर्यसूचकम् ॥३८॥
धारैका मूत्रके यस्य दक्षिणावर्तनी यदि। मद्यश्च मानमधुनोर्यदि वीर्यं तदा नृपः ॥३९॥
विस्तीर्णा पीवरी स्निग्धी भुजावस्य सुखोचितौ। वामावर्ती सप्रसक्तौ भुजौ भूरथगोचितौ ॥४०॥
श्रीवत्सवज्रचक्राब्जमत्स्यकोदण्डदण्डभृत् । तथाऽस्य कण्ठगा रेखा यथा स्यात्त्रिदिवम्पतिः ॥४१॥
द्वात्रिंशल्लक्षणधायं वरंबुद्धिगोचरः। कोचदुदुमिहंसास्वरः सर्वैश्चाधिकः ॥४२॥
मधुपिंगलनेत्रोऽसौ नैनं श्रीन्त्यजति क्वचित्। पंचरेखाललाटस्थु तथा सिंहोदरः शुभः ॥४३॥
ऊर्ध्वरेखांकितपदो निःश्वसनपद्मगन्धवान्। आंक्षाद्रघ्राणिः सुसमो महालक्षणवानयम् ॥४४॥
एवं कुशं निरीक्ष्याथ सर्वान् दृष्ट्वा क्रमेण सः। लवादीनां मचिह्नानि पूर्ववत्प्राह राघवम् ॥४५॥
ततः प्रीतमना रामः पूजयामास तं गुरुम्। वस्त्रैराभरणैश्चैव ययौ हर्षात्ततो गृहम् ॥४६॥
एतस्मिन्नंतरे सीता भूमिदत्त्यवरामने। संस्थिता चामरैर्दर्पदर्शनीभिः परिवीजिता ॥४७॥
सखीभिः सेविता रम्या श्वेताभांसोपवस्त्रगा। मुहुर् म्वं निरक्षन्ती मुखं चन्द्रनिभं वरम् ॥४८॥


हाथ, पसलियां और मुंड यः छः उन्नत दृश्यते हैं, नासिका, नख और कर्ण ये रक्त दाता हैं ॥३२॥ मस्तक, कमर और छाती ये तीन विस्तीर्ण हैं, जो सब ऐश्वर्य देने वाले हैं इसमें कोई सन्देह नहीं है। ३३॥ हाथकी एक रेखा ठीक तर्जनी पर्यन्त चला गया है कनिष्ठाङ्गुलीपर्यन्त । ३४ । कछुएकी पीठके समान कड़े-कड़े इसके हाथ राज्यप्राप्तिकी सूचना दे रहे हैं, इसके कपोल, वृत्ताकार, लाल, पतले, सुन्दर और बराबर एंडीवाले पैर भी इसके राज्यप्राप्तिकी सूचना दे रहे हैं ॥ ३५ ॥ इसके कंधे और सरल सुन्दर रेखाएं यह बतलाती हैं कि यह सदा सुखी रहेगा। इसका लिंग पतला और गोल है। इससे यह जाना जाता है कि यह बच्चा भविष्यमें राजाओंका भी राजा होगा। इसका नितम्ब तथा गुल्फ मजबूत है और नाभि गहरी तथा दक्षिणावर्त होकर लाल रङ्गुली है ये सब भी महान् ऐश्वर्यकी सूचना देते हैं। लक्षणशास्त्रमें कहा गया है कि मूत्रत्यागके समय जिसके लिंगसे मूत्रकी केवल एक धार दक्षिणावर्त हो और उसके वीर्यसे मछली तथा शहदके समान गन्ध निकले तो वह मनुष्य राजा होता है ॥ ३६-३९ ॥ इसके बड़े मोटे और चिकनी भुजाएं सुख भोगने लायक हैं। लम्बी और वामावर्त बाहुदण्ड पृथिवीका राज्य भुगताने वाले हैं ॥ ४० ॥ इसके हाथमें वज्र, चक्र, कमल, मत्स्य, धनुष तथा दण्ड आदिके आकारकी ऐसी रेखाएं दृष्टिगोचर होती हैं जिससे ज्ञात होता है कि यह देवताओंका भी राजा होगा ॥ ४१ ॥ इसके मुखमें बत्तीस लक्षण हैं। शंखके समान सुन्दर इसकी ग्रीवा है। ग्रीव पक्षी, क्रौञ्च, हंस तथा मेघके समान गम्भीर इसका स्वर है। इससे जान पड़ता है कि यह संसारके समस्त राजाओंसे बढ़कर होगा ॥ ४२ ॥ मधु (शहद) के समान पिंगल वर्ण इसकी आंखें हैं, इसके ललाटमें पांच रेखाएं हैं, सिंहके समान उदर है, इसके पैरोंकी रेखाएं ऊपरको गयी हैं, इसके श्वाससे कमलकी गन्ध आती है और सुन्दर-सी नासिका है इन सब लक्षणोंसे ज्ञात होता है कि यह असाधारण लक्षणसम्पन्न बालक है ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ इस प्रकार कुशके लक्षणोंको बतलाकर वशिष्ठने बाकी लव आदि बालकोंके भी लक्षण बतलाये। तदनन्तर रामने अनेक प्रकारके वस्त्रों और आभूषणोंसे वसिष्ठकी पूजा की और उनकी आज्ञा लेकर रामचन्द्रजी अपने महलमें चले गये ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ वहां सीताजी पृथ्वीके दिये हुए सुन्दर सिंहासनपर बैठी थी। कितनी ही सखियां चंवर पंखे आदि झल रही थीं। बहुत सी सखियें तरह-तरहका सेवामें लगी थीं। उस समय सीताजी पीछे तकिया लगाकर बैठी हुई दर्पणमें अपना मुख देख रही थीं। सब उन्होंने सुना कि