श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 354, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११८ | आनन्दरामायणे | [सर्गः ९ |
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रामस्यागमनं श्रुत्वा सचचालासनाज्जवात् । ततो ददर्श श्रीरामं बालकैः परिवेष्टितम् ॥४९॥
स्वकक्ष्यां यूपकेतुं च दधानमपरं शिशुम् । तथैव दक्षिणे हस्ते दधानं चाङ्गदं शुभम् ॥५०॥
कुशं लवं पुरस्कृत्य सभायां तं शनैः शनैः । तत्पृष्ठे सा ददर्शाथ लक्ष्मणं बालकान्वितम् ॥५१॥
तक्षं कक्ष्यां पुष्करं च दधानं दक्षिणे करे । तत्पृष्ठे भरतं सीता ददर्श हरितानना ॥५२॥
चित्रकेतुं शिशुं कक्ष्यां दधानं रुक्ममण्डितम् । तथैव दक्षिणे हस्ते सुबाहुं पङ्कजेक्षणम् ॥५३॥
तत्पृष्ठे सा ददर्शाथ शत्रुघ्नं जनकात्मजा । रामशस्त्राणि विभ्रतं सभायांतं शनैः शनैः ॥५४॥
एवं सा राघवं दृष्ट्वा सीता प्रत्युज्जगाम तम् । शिञ्जन्मणीन्द्रकञ्चना पीतकौशेयधारिणी ॥५५॥
कराभ्यां पुरतो यांतं लवं धृत्वा चुचुंब सा । निधाय तं लवं कक्ष्यां धृत्वा हस्तेन हं कुशम् ॥५६॥
ययौ शनैः सा रामेण वदती स्वस्थलं पुरः । सखीभिर्वेष्टिता मंद्रा रञ्जयन्तीव राघवम् ॥५७॥
अथ रामोऽपि सीतायाः स्थित्वा सिंहासनोपरि । अङ्कयोः पुरतश्चापि बालकान्सन्निधाय सः ॥५८॥
सीतायै दर्शयन् प्रीत्या लालयामास सादरम् । सीतायै राघवः प्राह सभायां गुरुणा पुरा ॥५९॥
यान्युक्तानि सुलक्षणानि शिशूनां तानि विस्तरात् । श्रुत्वा राममुखात्तानि माता तोषं परं ययौ । ६०॥
राघवः प्राह वैदेहीमूर्भिलापार्श्वराजिताम् । सीतेऽङ्गदं चित्रकेतुं लक्ष्मणांके निवेशय । ६१॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा सीता शीघ्रं शिशून् ययौ । तावदुत्थाय सौमित्रिर्लज्जया गंतुमुद्यतः ॥६२॥
तं गन्तुकामरामोऽपि दृष्ट्वा तौ मांडवीं तथा । श्रुतकीर्तिं कञ्जनयनाऽबोधयत्तदा । ६३॥
ताभ्यां धृतोऽथ सौमित्रिः स्मितास्याभ्यामुपाविशत्। तावत्तदङ्कयोः सीता तत्पुत्रौ सन्न्यवेशयत् ॥६४॥
तद्वच्च भरतस्यांके निवेश्य तद्वत्पुत्रकौ । शत्रुघ्नस्यांके सुबाहुं च यूपकेतुं न्यवेशयत् ॥६५॥
ततः सीतां पुनः प्राह स्मितास्यः स रघूद्वहः । राजयन्त्वूर्मिलाद्याश्च स्व स्व स्वामिनमादरात् । ६६॥
राम आ रहे हैं तो आसनसे उठ खड़ी हुई। उधरसे राम भी बालकोंके साथ सीताके समक्ष आगये । ४७-४९। उस समय वे अपनी बायीं गोदमे यूपकेतु तथा दाहिनी गोदमे अंगदको लिये हुए थे और सब कुश आगे-आगे चल रहे थे। उनके पीछे बालकोंको लिए लक्ष्मणको भी आते हुए सीताने देखा ॥ ५० ॥ ५१ ॥ लक्ष्मण तक्षकको गोदमें लिय थे और पुष्करका अपने दहिने हाथकी उँगली पकडाये चल आ रहे थे। उनके बाद सीताने भरतको आते देखा ॥ ५२ ॥ वे भी चित्रकेतु नामक बच्चेको बायीं गोदमें लिये और दाहिना बांहमें कमलकी नाईं आँखोंवाले सुबाहु नामक बेटेको लिये हुए थे । ५३ ॥ उनके पीछे सीताने शत्रुघ्नको देखा। वे रामजीके शस्त्रोंको लिये धीरे धीरे मण्डपोंकी ओर आ रहे थे ॥ ५४ ॥ इस प्रकार उन्हें आते देखकर सीता रामकी ओर बढ़ीं। कमरकी करधनी अहैर क्षुद्रघंटिका अपनी झनझुनाकी ध्वनि कर रही थी और शरीरपर रेशमी पीताम्बर सुशोभित हो रहा था ॥ ५५ ॥ उन्होंने रामके पास पहुंचते ही लवका मुख चूमा । फिर गोदमे उठा लिया और कुशकी दाहिने हाथकी उंगली पकड़ाकर रामस बात करती हुई चलीं। उस समय भी चारों ओरसे कितनी ही सखियाँ घेरकर सीता सण रामको प्रसन्न करतो हुई चल रही थीं ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ इसके अनन्तर रामचन्द्रजी सीताके सिंहासनपर बैठ गये और बच्चोंको गोदमें लेकर खेलाने लगे। कुछ देर बाद रामचन्द्रजीने सीताकी बहिनके सुने हुए बालकोंके शुभ लक्षण कह सुनाये। जिन्हें सुनकर सीता बहुत प्रसन्न हुईं । ५८-६० । उर्मिला सीताके ऊपर पंखा झल रही थीं। इसी समय रामने सीतासे कहा कि अङ्गद और चित्रकेतुको ले जाकर लक्ष्मणकी गोदमें बिठा दो ॥ ६१ ॥ रामकी यह बात सुनकर सीता झटपट बच्चोंके पास पहुंची और उन्हें लक्ष्मणकी गोदमें बिठाना ही चाहती थीं कि लक्ष्मण लज्जाके मारे चलनेको तैयार हो गये ॥ ६२ ॥ लक्ष्मणकी बात देखकर रामने आँखसे संकेत कर दिया, जिससे श्रुतकीर्त्ति और माण्डवीने लक्ष्मणको पकड़ लिया। तभी सीताने उन दोनों बच्चोंको लक्ष्मणकी गोदमे बिठा दिया । ६३ ॥ ६४ ॥ उसी प्रकार भरतकी गोदमें तक्ष और पुष्कर तथा शत्रुघ्नकी गोदमें सुबाहु ओर यूपकेतुको बिठलवाया ॥ ६५ ॥ इसके बाद मुस्कराते हुए रामचन्द्रने