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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ
११८आनन्दरामायणे[सर्गः ९

रामस्यागमनं श्रुत्वा सचचालासनाज्जवात् । ततो ददर्श श्रीरामं बालकैः परिवेष्टितम् ॥४९॥
स्वकक्ष्यां यूपकेतुं च दधानमपरं शिशुम् । तथैव दक्षिणे हस्ते दधानं चाङ्गदं शुभम् ॥५०॥
कुशं लवं पुरस्कृत्य सभायां तं शनैः शनैः । तत्पृष्ठे सा ददर्शाथ लक्ष्मणं बालकान्वितम् ॥५१॥
तक्षं कक्ष्यां पुष्करं च दधानं दक्षिणे करे । तत्पृष्ठे भरतं सीता ददर्श हरितानना ॥५२॥
चित्रकेतुं शिशुं कक्ष्यां दधानं रुक्ममण्डितम् । तथैव दक्षिणे हस्ते सुबाहुं पङ्कजेक्षणम् ॥५३॥
तत्पृष्ठे सा ददर्शाथ शत्रुघ्नं जनकात्मजा । रामशस्त्राणि विभ्रतं सभायांतं शनैः शनैः ॥५४॥
एवं सा राघवं दृष्ट्वा सीता प्रत्युज्जगाम तम् । शिञ्जन्मणीन्द्रकञ्चना पीतकौशेयधारिणी ॥५५॥
कराभ्यां पुरतो यांतं लवं धृत्वा चुचुंब सा । निधाय तं लवं कक्ष्यां धृत्वा हस्तेन हं कुशम् ॥५६॥
ययौ शनैः सा रामेण वदती स्वस्थलं पुरः । सखीभिर्वेष्टिता मंद्रा रञ्जयन्तीव राघवम् ॥५७॥
अथ रामोऽपि सीतायाः स्थित्वा सिंहासनोपरि । अङ्कयोः पुरतश्चापि बालकान्सन्निधाय सः ॥५८॥
सीतायै दर्शयन् प्रीत्या लालयामास सादरम् । सीतायै राघवः प्राह सभायां गुरुणा पुरा ॥५९॥
यान्युक्तानि सुलक्षणानि शिशूनां तानि विस्तरात् । श्रुत्वा राममुखात्तानि माता तोषं परं ययौ । ६०॥
राघवः प्राह वैदेहीमूर्भिलापार्श्वराजिताम् । सीतेऽङ्गदं चित्रकेतुं लक्ष्मणांके निवेशय । ६१॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा सीता शीघ्रं शिशून् ययौ । तावदुत्थाय सौमित्रिर्लज्जया गंतुमुद्यतः ॥६२॥
तं गन्तुकामरामोऽपि दृष्ट्वा तौ मांडवीं तथा । श्रुतकीर्तिं कञ्जनयनाऽबोधयत्तदा । ६३॥
ताभ्यां धृतोऽथ सौमित्रिः स्मितास्याभ्यामुपाविशत्। तावत्तदङ्कयोः सीता तत्पुत्रौ सन्न्यवेशयत् ॥६४॥
तद्वच्च भरतस्यांके निवेश्य तद्वत्पुत्रकौ । शत्रुघ्नस्यांके सुबाहुं च यूपकेतुं न्यवेशयत् ॥६५॥
ततः सीतां पुनः प्राह स्मितास्यः स रघूद्वहः । राजयन्त्वूर्मिलाद्याश्च स्व स्व स्वामिनमादरात् । ६६॥


राम आ रहे हैं तो आसनसे उठ खड़ी हुई। उधरसे राम भी बालकोंके साथ सीताके समक्ष आगये । ४७-४९। उस समय वे अपनी बायीं गोदमे यूपकेतु तथा दाहिनी गोदमे अंगदको लिये हुए थे और सब कुश आगे-आगे चल रहे थे। उनके पीछे बालकोंको लिए लक्ष्मणको भी आते हुए सीताने देखा ॥ ५० ॥ ५१ ॥ लक्ष्मण तक्षकको गोदमें लिय थे और पुष्करका अपने दहिने हाथकी उँगली पकडाये चल आ रहे थे। उनके बाद सीताने भरतको आते देखा ॥ ५२ ॥ वे भी चित्रकेतु नामक बच्चेको बायीं गोदमें लिये और दाहिना बांहमें कमलकी नाईं आँखोंवाले सुबाहु नामक बेटेको लिये हुए थे । ५३ ॥ उनके पीछे सीताने शत्रुघ्नको देखा। वे रामजीके शस्त्रोंको लिये धीरे धीरे मण्डपोंकी ओर आ रहे थे ॥ ५४ ॥ इस प्रकार उन्हें आते देखकर सीता रामकी ओर बढ़ीं। कमरकी करधनी अहैर क्षुद्रघंटिका अपनी झनझुनाकी ध्वनि कर रही थी और शरीरपर रेशमी पीताम्बर सुशोभित हो रहा था ॥ ५५ ॥ उन्होंने रामके पास पहुंचते ही लवका मुख चूमा । फिर गोदमे उठा लिया और कुशकी दाहिने हाथकी उंगली पकड़ाकर रामस बात करती हुई चलीं। उस समय भी चारों ओरसे कितनी ही सखियाँ घेरकर सीता सण रामको प्रसन्न करतो हुई चल रही थीं ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ इसके अनन्तर रामचन्द्रजी सीताके सिंहासनपर बैठ गये और बच्चोंको गोदमें लेकर खेलाने लगे। कुछ देर बाद रामचन्द्रजीने सीताकी बहिनके सुने हुए बालकोंके शुभ लक्षण कह सुनाये। जिन्हें सुनकर सीता बहुत प्रसन्न हुईं । ५८-६० । उर्मिला सीताके ऊपर पंखा झल रही थीं। इसी समय रामने सीतासे कहा कि अङ्गद और चित्रकेतुको ले जाकर लक्ष्मणकी गोदमें बिठा दो ॥ ६१ ॥ रामकी यह बात सुनकर सीता झटपट बच्चोंके पास पहुंची और उन्हें लक्ष्मणकी गोदमें बिठाना ही चाहती थीं कि लक्ष्मण लज्जाके मारे चलनेको तैयार हो गये ॥ ६२ ॥ लक्ष्मणकी बात देखकर रामने आँखसे संकेत कर दिया, जिससे श्रुतकीर्त्ति और माण्डवीने लक्ष्मणको पकड़ लिया। तभी सीताने उन दोनों बच्चोंको लक्ष्मणकी गोदमे बिठा दिया । ६३ ॥ ६४ ॥ उसी प्रकार भरतकी गोदमें तक्ष और पुष्कर तथा शत्रुघ्नकी गोदमें सुबाहु ओर यूपकेतुको बिठलवाया ॥ ६५ ॥ इसके बाद मुस्कराते हुए रामचन्द्रने

सर्गः १ ] जन्मकाण्डम् ३३९

सर्गः १ ] जन्मकाण्डम् ३३९

ततस्ता दुद्रुवुः सर्वाः सर्वैर्भिलाषिता नृपाः । व्यजनेनैर्विजयामासुः स्वं स्वं कांतं सुलज्जिताः ॥६७॥ एवं नानाकोतुकारि भोजनायनकर्मसु । कारयामास वैदेह्या बंध्वादीनां रघूत्तमः ॥६८॥ अथ रामो वसिष्ठं च एकदा वाक्यमब्रवीत् । कुशस्याथ लवस्यापि व्रतबन्धो विधीयताम् ॥६९॥ तथेति गुरुणा प्रोक्तस्ततो रामः शुभे दिने । गणकान् स समाहूय मंत्रयामास सादरम् ॥७०॥ कुशाय पंचमं वर्षं किञ्चिन्न्यूनं लवाय च । ज्ञात्वा ते गणकाः सर्वे गुरुशुक्रादिकं बलम् ॥७१॥ दृष्ट्वा पंचांगपट्टेषु राघवं वाक्यमब्रुवन् । ब्राह्मणस्याष्टमे प्रोक्तो द्वादशे क्षत्रियस्य च ॥७२॥ वैश्यस्य षोडशे वर्षे व्रतबंधो मुनीश्वरैः । जन्मात् षष्ठे तथा गर्भात्सप्तमेऽब्दे नृपस्य च ॥७३॥ व्रतबंधो विधातव्यो यन्मनश्च यथाविधिः । ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यों विप्रस्य पंचमे ॥७४॥ राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्यार्थार्थिनोऽष्टमे । विद्वद्भिचोपनयनमेव शास्त्रेषु निर्णयः ॥७५॥ अतो गर्भाच्च षष्ठेऽब्दे पुत्रयोर्धर्म रन्दन । मुखं कुरुपनयनं मुहूर्त्तं शृणु सादरम् ॥७६॥ अद्यप्रभृत्य पंचदशदिने दर्श कुशाय ह । पश्चात्परेण च श्रुत्वा मुहूर्त रघुनंदनः ॥७७॥ गणकान् धनवस्त्राद्यैः पूज्य लक्ष्मणमब्रवीत् । आकारणीया राजानः सुहृदश्च मुनीश्वराः ॥७८॥ सांतःपुराः सर्वराज्ञः स्वस्वजानपदैः सह । शृङ्गारणीयोऽयोध्याथ वसिष्ठैः सह सादरम् ॥७९॥ शोधनीयास्तथा मार्गाश्चमूहैषु सुधाः शुभाः । दृश्या चित्राणि लेख्यानि प्रासादेषु समंततः । ८०॥ देवालयेषु सर्वेषु सुधा देया मनोरमा । लेखनीयानि चित्राणि स्थाप्यतां दल्पयः पृथक् ॥८१॥ बन्धनीयाः पताकाश्च रोषणीया ध्वजा अपि । मयतश्चस्तोरणानि बंधनीयानि लक्ष्मण । ८२॥


सीताने कहा-अब उर्मिला, श्रुतकीर्ति तथा माण्डवी अपने-अपने पतियोंको पंखा झलें ॥ ६६ । इस बातको सुनकर वे स्त्रियाँ लज्जाके मारे वहाँसे भागने लगीं । किन्तु सखियां रोककर उन्हें पकड़ लायीं और अन्तमें उन्हें रामके आज्ञानुसार अपने-अपने पति ऊपर पंखे झलने पड़े ॥ ६७ ॥ इस तरह भोजन, आचमन तथा शयनके समय रामचन्द्रजी सीता तथा भ्राताओंके साथ विविध प्रकारके कौतुक किया करते थे । ६८ ॥ कुछ दिन बीतनेपर एक दिन वसिष्ठसे रामने कहा-अब कुश और लवका व्रतबन्ध (यज्ञोपवीत-संस्कार) कर डालना चाहिए ॥ ६९ ॥ वसिष्ठने कहा-अच्छी बात है । एक पवित्र दिवसको रामने बहुतसे ज्योतिर्विदोंको बुलाकर सलाह की ॥ ७० ॥ जब ज्योतिर्विदोंको यह बात मालूम हुई कि कुशका पाँचवां वर्ष चल रहा है और लवका कुछ कम है । तब उन्होंने गुरु शुक्रादिका बलाबल देखा ॥ ७१ ॥ पंचांगमें सब देख-सुनकर उन्होंने रामसे कहा-ब्राह्मणका उपनयन आठवें वर्षमें, क्षत्रियका बारहवें वर्षमें और वैश्यका सोलहवें वर्षमें यज्ञोपवीत-संस्कार होना चाहिए । यह बड़े-बड़े ऋषियोंने कहा है । अपना वर्चस्व बढ़ानेकी इच्छा रखनेवाले विप्र-को गर्भसे पाँचवें वर्षमें, बलवृद्धिकी कामनावाले राजाको छठे वर्षमें एवं धनवृद्धिकी इच्छा रखनेवाले वैश्यको आठवें वर्षमें ही उपनयन-संस्कार करना उचित है । यह शास्त्रोंका निर्णय है ॥ ७२-७५ ॥ अतएव हे रघुनन्दन ! आपके बच्चोंका गर्भसे लेकर यह छठां वर्ष चल रहा है । इसलिए इस समय इनका व्रतबन्ध करना अतिशय श्रेयस्कर है । अब बच्चोंके व्रतबन्धके लिए सुन्दर मुहूर्त बतलाता हूँ, सो सुनिए ॥ ७६ ॥ आजसे पन्द्रहवें दिन कुशके यज्ञोपवीतका पवित्र मुहूर्त मिलता है । इस प्रकार एक पक्षके बाद यज्ञोपवीतका मुहूर्त सुनकर राम-चन्द्रजीने अनेक प्रकारके धन-वस्त्रसे उन गणकोंकी पूजा की और लक्ष्मणसे कहा कि समस्त राजाओं, मित्रों तथा मुनियोंके पास निमन्त्रण भेजकर कहला दो कि सब लोग अपनी स्त्रियों, पुरवासियों तथा देशवासियोंके साथ इस उपनयनसंस्कार के उत्सवमें मेरे यहाँ पधारें । इस अयोध्या नगरीको अच्छी तरह सजवाओ । इसके आस-पासकी गलियोंको साफ करवा दो ॥ ७७-७९ ॥ महलोंको चूनेसे पुतवा दो । कटहरियों और दीवारोंपर नाना प्रकारके चित्र बनवाओ । अयोध्याके समस्त देवालयोंको चूनेसे पुतवाकर उनमें नाना प्रकारकी चित्रकारियां करवाओ और तरह-तरहके पूजनका प्रबन्ध कर दो ॥ ८० ॥ ८१ ॥ चारों ओर पताका

३४० आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

वेद्याः कार्या ह्यसमग्रग्यो वस्त्रैर्नानाथ मंतपाः भूषणीया ह्ययोध्यायाश्चत्वराः सदसस्तथा ॥८३॥ अन्यच्चापि यथायोग्यं यद्यज्जानासि लक्ष्मणः । तत्कुरुष्व त्वया नैव मया तत्र रघूत्तम ॥८४॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा च लक्ष्मणः । तथा चकार तत्सर्वं यथा रामेण शिक्षितः ॥८५॥ ततो मुहूर्ते श्रीरामः स्नानमभ्यङ्गपूर्वकम् । कृत्वा कुमारैर्देव्या च पुत्रैश्चैव वधूभिः ॥८६॥ नानालंकारवस्त्राणि परिधायाथ तैः सह । पुण्याहवचनं चक्रे गुरुं पूज्य ऋषींस्तरान् ॥८७॥ नांदीश्राद्धादिकं कृत्वा प्रतिष्ठां देवतास्य च । चकार मङ्गलैस्तूर्यैर्नादैः सीतासमन्वितः ॥८८॥ ततो ययुः कोटिशस्ते पार्थिवाश्च मुनीश्वराः । यमद्रोपांतस्त्स्याश्च यच्छोभाः सराङ्गनाः ॥८९॥ तैः साऽयोध्या तदा व्योम्ना विरेजे नितरां यदा । ततो महूतेदिवसे वसिष्ठो ब्राह्मणैर्युतः ॥९०॥ रामस्याथ कुशस्याथ मध्ये धृत्वा वरं पटम् । उवाच मन्त्रान्तेऽथ सुस्वरैर्मधुरक्षरैः ॥९१॥ ध्यान्ता श्रीगणनायकं विधिसुतां शंभुं विधिं माधव लक्ष्मीं शैलसुतां विधेस्तु दयितामिन्द्रं सुरैस्नान् ग्रहान् । पुण्यान्स्थावरनिम्नगाश्च मुमुनीन्भूमीपां कुलस्यांबिकां तात मातग्मादरेण वटवे भूयात्सदा मङ्गलम् ॥९२॥ तदेव लग्नं सुदिनं तदेव नागबलं चन्द्रबलं तदेव । विद्याबलं दैवबलं तदेव सीताफ्तेर्यत्स्मरणं विधेयम् ॥९३॥ इति नानामंगलवाद्यैस्तूर्यघोषैर्मनोहरैः । ॐकारघोषैः स गुरुर्मुमोचांतःपटं तदा ॥९४॥ ततस्तं राघवस्याङ्के निवेश्य हवनादिकम् । विधिं कृत्वाय कौपीनं दण्डं चाथ कमण्डलुम् । ९५॥ बबन्धौदी रुक्मजां मौञ्जीं बबन्धेणाजिनं तदा । ततः कुशाय स गुरुर्गायत्रीमुपदिश्यरात् ॥९६॥ ब्रह्मचर्यव्रतादीनि स कुशायापदिश्यवान् । कुव्वोक्तावोघेता श्वीच कुर्यादाचमनं तथा ॥९७॥

लगवाओ और जगह-जगहपर ध्वजा आरोपित करो। सुवर्णकी वेदियाँ बनवायी जावें ॥ ८२ । ८३ ॥ इनके सिवाय भी जो-जो बात तुम्ह मालूम हो और मैंने न बतलायी हो, उन्हें भी ठीक कर देना ॥ ८४ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर 'जो आज्ञा' ऐसा कहकर लक्ष्मण चल गये और रामने जैसा बतलाया था, वह सब प्रबन्ध कर दिया ॥ ८५ ॥ जिस दिन मुहूर्त था, उस रोज उबटन लगाकर उन कुमारों तथा सीता और भाइयोंके साथ रामने स्नान किया। नाना प्रकारके वस्त्र-अलंकारोको पहन । ब्राह्मण तथा निमन्त्रणमें आय हुए ऋषियोंका पूजन करके पुण्याहवाचन नान्दीश्राद्ध, देवताओंकी स्थापना आदि कार्य गृहकी और नगाडेके मङ्गलमय निनादके साथ राम तथा सीताने सम्पादित किय ॥ ८६-८८ ॥ इसके बाद सातों द्वीपोंके करोड़ों राजे तथा ऋषि अपने-अपने परिवार एवं वाहनाके साथ वहाँ आ पहुंच। उन लोगोसे सारी अयोध्या भरकर बड़ी सुन्दर मालूम पड़ने लगी। पञ्चोपवीत मुहूर्तके अवसरपर बहुतसे ब्राह्मणोके साथ बसिष्ठजी राम ओर कुशके मध्यमे एक सुन्दर कपड़ेका पर्दा बाँधकर मांड़े तथा स्पष्ट स्वरमें मङ्गलपाठ करने लगे ॥ ८६-६१ ॥ उन मङ्गलमय श्लोकोंका अर्थ इस प्रकार है-गणेश, सरस्वती, शिव, ब्रह्मा, विष्णु, लक्ष्मी, पार्वती, ब्रह्माणी, इन्द्र, समस्त देवता, सम्पूर्ण ग्रह, पवित्र पर्वत तथा नदियाँ, अच्छे-अच्छे ऋषि, अपनी कुलदेवी तथा माता पिता इन सबको प्रणाम करके आपलोग प्रार्थना करें कि जिस बच्चेका यज्ञोपवीत संस्कार होनेवाला है, उसका कल्याण हो ॥ ९२ ॥ वही लग्न लग्न है, वही दिन दिन है, वही विद्याबल तथा दैवबल है, जिसमें सीतापति रामचन्द्रका स्मरण किया जाय। ९३ । इस तरह विविध प्रकारके मङ्गलमय मन्त्रोंका पाठ करके गुरु वसिष्ठने ॐकार शब्दके साथ पर्दा डाल दिया। तदनन्तर वसिष्ठने लव-कुशको रामकी गोदमें बिठाकर हवनादि विधियोंको सम्पन्न किया । इसके अनंतर कुशका मुञ्जक तागस बनी करधनी पहनायी, मृगचर्म बाँधा और कौपीन पहनायी । फिर उस ब्रह्मयज्ञ कराके वसिष्ठजीने कुशको गायत्री मन्त्रका उपदेश दिया । ६४-९६ ।। फिर ब्रह्मचर्यव्रतके नियम आदि बतलाते हुए कहने लगे कि शास्त्रोम जो नियम बतलाये

सर्गः ९ ] उत्तरकाण्डम् २४१


दन्तान् जिह्वां विशोध्याथ कृत्वामलविशोधनम् । स्नात्वाऽऽप्यैर्वर्तयेन्मन्त्रैः प्राणानायम्य यत्नतः ॥९८॥
उपस्थानं रवेः कृत्वा संध्ययोरुभयोरपि । अग्निकार्यं ततः कृत्वा ब्राह्मणानभिवादयेत् ॥९९॥
अमुकशर्मन्गोत्रोऽहमभिवादय इत्यपि । धारयेन्मेखलां दण्डापवीताजिनमेव च ॥१००॥
अनिन्द्यं चरेद्भैक्ष्यं ब्राह्मणेभ्याऽमत्सये । वाग्यतो गुर्वनुज्ञातो भुञ्जीतान्नमकुत्सयन् ॥१०१॥
एकान्नं च समश्नीयाच्छ्राद्धेऽश्नीयान्नचाऽऽपदि । द्विवारं नैव भुञ्जीत दिवा कापि द्विजोत्तमः ॥१०२॥
सायंप्रातर्द्विजोऽश्नीयादग्निहोत्रविधानवित् । मधु मांसं प्राणिहिंसां नास्तङ्गलोकनं जले ॥१०३॥
स्त्रियं स्पृष्टिनोच्छिष्टं परिवादं विवर्जयेत् । यथेष्टचेष्टो न भवेद्गुरोर्नयनगोचरे ॥१०४॥
न नाम परिगृह्णीयात्परोक्षेऽप्यविशेषणम् । गुरुनिन्दा भवेद्यत्र परिवादस्तु यत्र च ॥१०५॥
श्रुती विधाय स्थातव्यं गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः ।
न मात्रा न पितुः स्वस्रा न स्वस्रैकान्तवांस्तथा ॥१०६॥
बलवंतीन्द्रियाण्यत्र मोहयन्त्यपि कोविदान् । एवमादीन्यनेकानि ब्रह्मचारिव्रतानि हि ॥१०७॥
तस्मै गुरुरुपदिश्य ददौ दानान्यनेकशः । भोजयामास तं मात्रा सह मानोत्सवैस्तदा ॥१०८॥
कारयित्वाऽथ पालाशपूजनं विधिवत्पूर्वकम् । तेनापि कुशहोत्रेण देवकस्य विसर्जनम् ॥१०९॥
चकार राघवश्चैव सीतया स गुरुस्तदा । ततो रामो नृपतिभिर्जनकेनापि पूजितः ॥११०॥
चकार धनवस्त्राद्यैस्तुष्टान् विप्रान्नृपादिकांन् । आचांडालांन्सदा रामस्तोषयामास सादरम् ॥१११॥
एवं नानामहोत्सवैर्यन्मासमेकं विनाय सः । रामो विसर्जयामास तत्रत्यान्नृपार्थिकादिकान् ॥११२॥
एवं कालांतराद्रामो व्रतबंधं लवस्य च । चकार पूर्ववत्सर्वान्समाहूय नृपादिकान् ॥११३॥


गये हैं, उनके अनुसार शौचसे निवृत्त होकर दाँत तथा जीभ साफ कर लेनेके बाद वरुण दैवत्य से सम्बन्ध रखनेवाले मन्त्रोंका पाठ करता हुआ स्नान करे । फिर आचमन-प्राणायामादि करके दोनो समयको सूर्यका उपस्थान करना चाहिये । इसके पश्चात् हवन करके ब्राह्मणोंका प्रणाम करे ॥ ९७-९९ ॥ प्रणाम करते समय यह भी कहना जाय कि अमुक नामका अमुक व्यक्ति मैं आपको प्रणाम करता हूँ । उच्च जातिके लोगों अथवा जहाँतक हो सके, सुपात्र ब्राह्मणोंके यहाँसे भिक्षा माँगकर अपनी जीविका चलाय । किसीकी निन्दा न करे तथा मौनव्रतका पालन करे और जब गुरुकी अनुमति मिल जाय, तभी भोजन करे ॥ १०० ॥ १०१ ॥ सदा केवल एक समयका भोजन करे । श्राद्धोंमें तथा किसी आपत्समय कायक आ आनेपर भी दिनमें दो बार भोजन न करे । ब्राह्मणको चाहिये कि केवल सुबहशाम भोजन करे । मधु तथा मांसका आहार, प्राणिहिंसा, जलमें सूर्यके प्रतिबिम्बका दर्शन, स्त्रीप्रसंग, बासी और जूठा भोजन तथा दूसरेकी निन्दा इन कामोंको छोड़ दे । गुरुके सामने अपने इच्छानुसार जो चाहै, सो न कर डाल ॥ १०२-१०४ ॥ परोक्षमें भी बिना विशेषण लगाये गुरुका नाम न ले । जहाँपर गुरुकी निन्दा हो रही हों अथवा उनकी ठठोली की जाती हो, वहाँ कान ढांककर बैठे या वहाँसे उठ जाय । अपनी माता, बुआ अथवा बहिनके साथ भी एकान्तमें न बैठे ॥ १०५ ॥ १०६ ॥ क्योंकि इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल होती हैं। वे बड़े बड़े पण्डितोंको भी बातकी बातमें विचलित कर देता है। इस प्रकार गुरुने बहुतसे ब्रह्मचर्य व्रतसम्बन्धी नियम बतलाये ॥ १०७ ॥ इसके अनन्तर अनेक तरहके दान दिये गये । कुशको माताके साथ भोजन कराया गया ॥ १०८ ॥ तब विधिवूर्वक पलाशका पूजन कराया । फिर कुश, होता तथा रामके द्वारा आहूत देवताओंका पूजन कराया ॥ १०९ ॥ इसके बाद बहुतसे राजाओं तथा जनकजीने रामका पूजन किया । रामने बहुतसे धन-वस्त्रों द्वारा आये हुए राजाओं तथा ब्राह्मणोंको प्रसन्न करके अयोध्यानिवासी चाण्डालसे लेकर ऊँचसे ऊँचे कुल तकके लोगोंको आदर प्रसन्न किया ॥ ११० ॥ १११ ॥ इस तरह नाना प्रकारके उत्सवोंके साथ एक महीनेका समय बिताकर मेहमानीमें आये हुए राजाओं और ऋषियोंको विदा किया ॥ ११२ ॥ कुछ समय बीतनेके बाद उसी तरह कुशकेही

२४२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

ततस्तौ बालकौ रम्यौ वेदाध्ययनमुत्तमम् । चक्रतुर्गुरुसन्निधौ विधिवद् द्विसत्तमौ ॥११४॥ एवं तेषां तु बालानां सर्वेषां रघुनन्दनः । व्रतबन्धविधानानि यथाकाले महोत्सवैः ॥११५॥ चकार गुरुणा विप्रैः समाहूय नृपादिकान् । विशेषं निजपुत्राभ्यां चकार स महोत्सवैः ॥११६॥ अकरोदधिकं किञ्चिन्न न्यूनमकरोद्विभुः । ततस्ते बालकाः सर्वे ब्रह्मचर्यव्रते स्थिताः ॥११७॥ चक्रिरे गुरुसान्निध्ये वेदाध्ययनमुत्तमम् । अथ रामोऽपि तैर्दृष्ट्वा बालकैः परिवारितः ॥११८॥ विरेजे स्कन्दगणपादिभिर्देव्यै यथा शिवः । अथ ते बालकाः सर्वे कृत्वाऽध्ययनमुत्तमम् ॥११९॥ वेदादीनां गुरुस्यानुज्ञया ज्ञानं गुरोस्ततः । जग्मुस्तीर्थानि वै कर्तुं सेनया गुरुवह्निभिः ॥१२०॥ पृथिव्यां भरते खण्डे यानि तीर्थानि यानि ते । कृत्वा समाप्त्यैः पञ्च मासैः स्वां नगरीं शनैः ॥१२१॥ बालान्समागताञ् श्रुत्वा शोभयित्वा निजां पुरीम् । प्रत्युज्जगाम सौमित्रिः पुरस्कृत्याथ वारणम् ॥१२२॥ ते दृष्ट्वा लक्ष्मणं नेमुस्तेनालिङ्गिता अपि । नानोत्सवैर्ययुर्हत्वा अयोध्यायां गृहं प्रति ॥१२३॥ मार्गे मार्गे पुरस्त्रीभिः सौधस्थाभिस्तु वर्षिताः । वृष्टिभिः कुसुमादीनां दीपैर्नीराजिता अपि ॥१२४॥ ततस्ते बालकाः सर्वे सभायां रघुनन्दनम् । नेमुस्तेनालिङ्गिताश्च ययुः सीतागृहं ततः ॥१२५॥ एतस्मिन्नन्तरे सीतोर्मिला माण्डवी तथा । श्रुतकीर्तिश्च वेगेन चक्रुर्नीराजनं पृथक् ॥१२६॥ दध्योदनैर्यवार्दिद्यैः पक्वान्नैस्तैलपाचितैः । सर्षपैर्लवणैर्माषैस्तोयकुम्भैश्च सादरम् ॥१२७॥ ततस्ते बालकाः सर्वे नेमुः सीतां पृथक् पृथक् । ततो नेमुः स्वमातॄंश्च पश्चा नत्वा पितामहीः ॥१२८॥ ततस्ते बालकाः सर्वे ददुर्दानान्यनेकशः ब्राह्मणान् भोजयामासुः कोटिशस्ते पृथक् पृथक् ॥१२९॥


साथ सब लोगोंको बुलाकर लवका यज्ञोपवीतसंस्कार किया ॥११३॥ फिर वे दोनों बालक गुरु वसिष्ठके पास विधिपूर्वक वेदाध्ययन करने लगे । इसी रीतिसे रामचन्द्रने समय-समयपर लक्ष्मण भरत आदिके बच्चों-का भी व्रतबन्ध-संस्कार कराया और अपने लड़कोंसे बढ़कर उत्सव-दानादि किये । उसमें किसी प्रकारकी न्यूनता नहीं होन दी वे बच्चे भी संस्कृत होकर विधिपूर्वक ब्रह्मचर्यके नियमोंका पालन करते हुए गुरुके पास वेदाध्ययन करने लगे। यह सब ही ज्ञानके साथ-साथ सदा पुत्रोंके साथ बैठे हुए रामचन्द्रजी पार्वती, गणेश तथा स्वामिकार्तिकेयके साथ बैठे शिवजीके सदृश सुन्दर लगते थे । इसके बाद सब उन बालकोंने अच्छी तरह विद्याध्ययन कर लिया तो एक विशाल सेना, गुरु तथा कितने ही मन्त्रियोंको साथ लेकर तीर्थयात्रा करनेको निकले ॥११४-१२०॥ पृथ्वीके भरतखण्डमें जितने तीर्थ हैं, उन करके पांच महीनेमें वे सब बालक अयोध्या वापस आ गये ॥१२१॥ लक्ष्मणने जब सुना कि लड़के तीर्थयात्रासे अयोध्या लौट आये हैं तो बहुतसे बाजे-गाजे तथा हाथीयोंको साथ लेकर अगवानी करने गये ॥१२२॥ जब उन्होंने लक्ष्मणको देखा तो मस्तक झुका-झुकाकर प्रणाम किया और लक्ष्मणने उनको अपनी छातीसे लगा-लगाकर आलिंगन किया । फिर अनेक प्रकारके उत्सवोंके साथ उनका महलोंमें ले चले । रास्तेमें अयोध्याकी नारियां अट्टारियोंपर चढ़-चढ़कर उनपर फूलोंकी वर्षा करतीं और आरती उतारती थीं । इसके बाद बालकोंने राजदरबारमें जाकर रामको प्रणाम किया और वहाँसे सीताके महलोंको गये । वहाँ पहुंचनेपर सीता, उर्मिला, माण्डवी तथा श्रुतकीर्तिने अलग-अलग उन बालकोंकी आरती उतारी पक्वान्न, दही, भात तैलके बने पक्वान्न, सरसों, नमक, उड़द तथा पानी भरे कलश आदि हरकाफर बलि दी गयीं। इसके बाद उन सबोंने कौशल्या आदि तथा पिता और भाइयोंको प्रणाम करके सीता आदि माताओंको प्रणाम किया ॥१२३-१२८॥ इसके बाद उन बालकोंने भाँति-भांतिके दान दिये और अलग-अलग करोड़ों ब्राह्मणोंको भोजन कराया।

सर्गः ९ ] जन्मकाण्डम् १४३

सर्गः ९ ] जन्मकाण्डम् १४३

एवं नानोत्सवास्तत्र बभूवु रामवेश्मनि । अथ ते बालकाः सर्वे स्यन्दनादिषु संस्थिताः ॥१३०॥ दिव्यवस्त्राणि चित्राणि परिधाय समंततः । अयोध्याराजमार्गेषु हट्टेषु च चतुष्पथे ॥१३१॥ आरामोपवनारण्यवाटिकासु नदीतटे गमनागमने चक्रुः सेनया मंत्रिबालकैः ॥१३२। एवं साकेतनगरे बालकैः सीतया सुखम् । रेमे स बंधुभिर्युक्तश्चिरं राजा रघूद्वहः ॥१३३। एवं शिष्य मया प्रोक्तं जन्मकांडमिदं तव । कुशादीनां च जन्मानि वर्णितान्यत्र विस्तरात् ॥१३४॥ रम्यं पवित्रमानंददायकं च मनोहरम् । पुत्रपौत्रप्रदं जन्मकांडमेतत्सुखावहम् ॥१३५॥ जन्मकांडमिदं पुण्यं ये शृण्वंति नरोत्तमाः । तेषां पुत्रैश्च पौत्रैश्च वियोगो न भविष्यति ॥१३६॥ जन्मकांडमिदं ये भक्त्या शृण्वंति मानवाः । तेषां स्त्रीणां वियोगो हि न कदाप्यत्र जायते ॥१३७॥ जन्मकांडमिदं पुण्यं याः शृण्वंत्यत्र वै स्त्रियः । स्वभर्तृभिर्वियोगं ता न गच्छंति यथा रमा ॥१३८। ग्रामं देशान्तरं तीर्थं ये गताश्चिरं नराः । तेषामागमनार्थे हि जन्मकांडं पठेदिदम् ॥१३९। येषां भावीनि कार्याणि लब्धुं त्वरयते मनः । तैनरैः पठनीयं वै जन्मकांडं दिने दिने ।१४०॥ पूर्वे दिने चैकवारं द्विवारं चापरे दिने । एवं नवदिनं वृद्धिन्नयैकं क्षयोऽपि हि ।१४१। कार्यो नरैः स्वस्थचित्तैस्तेषां कार्यं भविष्यति । वर्षमेकं पठेद्भक्त्या ह्यपुत्रोऽपि लभे सुतम् ॥१४२॥ पुत्रार्थी प्राप्नुयात्पुत्रं धनार्थी धनमाप्नुयात् । इष्टान् कामांश्च कल्याणं जन्मकाण्डश्रवणालभेत् ॥१४३॥


इस तरह रामचन्द्रजीके भवनमे अनेक प्रकारके उत्सव हुए । वे सब रथ, हाथी, घोड़े आदि सवारियोंपर सवार हो-होकर बगीचे, उपवन, वन तथा नदीतट आदिपर अयोध्याके चौराहों तथा बाजारमें अनेक प्रकारके वस्त्र-आभूषण पहनकर मन्त्रियोंके लड़कोंके साथ आने जाने लगे ॥ १२६-१३२ ॥ इस तरह उस साकेतपुरमें उन बालकों तथा सीताके साथ आनन्दपूर्वक रामचन्द्रजी रहने लगे । हे शिष्य ! यह जन्मकाण्ड मैंने तुम्हें सुनाया । जिसमें कुश आदि बालकोंकी विस्तृत जीवनी वर्णित है । १३३ ॥ १३४ ॥ यह जन्मकाण्ड परम रम्य आनन्ददायक, मनोहर, सुखसौभाग्यका देनेवाला और पुत्र पौत्रादिका दाता है । जो लोग जन्मकाण्डको सुनते हैं, उनका कभी अपने पुत्रपौत्रादिके वियोगका दुःख नहीं उठाना पड़ता । जो लोग भक्तिपूर्वक इस जन्मकाण्डका श्रवण करते हैं, उनका अपनी स्त्री का भी वियोग कभी नहीं होता । यदि स्त्रियां इसे सुनती हैं तो उन्हें अपने स्वामीसे कभी वियुक्त नहीं होना पड़ता बल्कि लक्ष्मीके समान वे जन्मभर आनन्दसे अपना जीवन बिताती हैं ॥ १३५ ॥ १३६ ॥ यदि किसीके परिवारका कोई मनुष्य किसी तीर्थ या परदेशको चला गया हो तो उस लोगनके लिए इस जन्मकाण्डका पाठ करना चाहिए । जिसको अपना कोई भावी कार्य सिद्ध करना हो उसको चाहिए कि पहले दिन एक बार, दूसरे दिन दो बार, तीसरे दिन तीन बार, इस क्रमसे बढ़ाते-बढ़ाते नवें दिन नौ बार जन्मकाण्डका पाठ करे । नवें दिनसे एक-एक पाठ घटाता हुआ फिर नवें दिन केवल एक पाठ करे । इस तरह यदि स्वस्थचित्तसे इसका पाठ किया जाय तो प्रत्येक कार्यकी सिद्धि हो सकती है। यदि इस विधिसे एक वर्ष पर्यन्त जन्मकाण्डका पाठ किया जाय तो पुत्रहीन व्यक्ति भी पुत्र प्राप्त कर सकता है । १३७-१४२ ॥ कहनेका

३४४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

आनन्दरामायणमध्यसंस्थं श्रीजन्मकाण्डं तनयप्रदं च ।
पारायणं संश्रवणं तथा वा करोति यो ना स लभेत्सुपुत्रम् ॥१४४॥

इति श्रीमच्छतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये जन्मकाण्डे
कुशलवादीनां जन्मकथनयतवंशविस्तारो नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ॥


जन्मकाण्डे सर्गा आनन्दरामायणे नवैव ज्ञातव्याः । चतुरुत्तराष्टशतश्लोका विष्णुदासरूपरामदासामुखोपदिष्टाः ॥१॥
उपवनदर्शनम् ॥ १ ॥ उपवनक्रीडा ॥ २ ॥ सीतातत्यागः ॥ ३ ॥ कुशलवोत्पत्तिः ॥ ४ ॥ रामरक्षा ॥ ५ ॥
कमलहरणम् ॥ ६ ॥ पुत्रभ्यां संग्रामः ॥ ७ ॥ सीताग्रहणम् ॥ ८ ॥ बालकानामुपनयनम् ॥ ९ ॥


मतलब यह कि जन्मकाण्डका पाठ करनेसे पुत्रार्थी पुत्र, धनार्थी धन तथा किसी भी प्रकारकी कामनावालेकी कामनापूर्ण हो सकती है इस आनन्दरामायणके मध्यमें स्थित जन्मकाण्ड सन्तानदायक है। जो मनुष्य इसका पारायण करता या सुनता है, उसे सुपुत्रकी प्राप्ति होती है ॥ १४३ ॥ १४४ ॥ इति श्रीमत्शतकोटिरामचरि-तान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचितज्योत्स्ना भाषाटीकासहिते जन्मकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥

इस जन्मकाण्डमें कुल नौ सर्ग तथा आठ सौ चार श्लोकों द्वारा श्रीरामदासने विष्णुदासको उपदेश दिया है। ॥ १ ॥ उन नवों सर्गोंमें ये कथाएँ वर्णित हैं (१) उपवनदर्शन, (२) उपवनक्रीडा, (३) सीतातत्याग, (४) कुशलवकी उत्पत्ति, (५) रामरक्षा, (६) लव द्वारा कमलहरण, (७) पुत्रोंके साथ रामका संग्राम, (८) सीताका पुनर्ग्रहण और (९) बालकोंका उपनयनसंस्कार ।

इति श्रीमदानन्दरामायणे जन्मकाण्ड समाप्तम् ।

श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु

श्रीसीतापतये नमः

श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गत–

आनन्दरामायणम्

'ज्योत्स्ना'ऽभिधया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्


विवाहकाण्डम्

प्रथमः सर्गः

(स्वयंवरके प्रसंगमें रामका तथा भूरिकीर्तिकी पुरीको प्रस्थान)

श्रीरामदास उवाच

अथ रामः सभामध्ये मन्त्रिभिः परिवेष्टितः । तस्थौ सिंहासने रम्ये वरच्छत्रोपशोभितः ॥ १ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र कश्चिद्दूतः समाययौ । नत्वा सभायां श्रीरामं स्वामिवृत्तं न्यवेदयत् ॥ २ ॥
पूर्वदेशाधिपतिना राज्ञा श्रीभूरिकीर्तिना । प्रेषितोऽस्मि महाराज द्रष्टुं त्वत्पादपङ्कजे ॥ ३ ॥
पत्रं पाठयित्वा श्रीराम कार्या मत्स्वामिने कृपा । इत्युक्त्वा रामदूतस्य करे पत्रं समर्पयत् ॥ ४ ॥
रामदूतोऽपि सौमित्रेः पुरस्तात्पत्रमादधात् । नत्वाऽऽयामास वेगेन गत्वा तस्थौ निजस्थलीम् ॥ ५ ॥
ततः स लक्ष्मणः पत्रं वस्त्रबन्धनवेष्टितम् । समुद्घाट्य राघवाग्रे पपाठ मञ्जुलस्वरः ॥ ६ ॥
हेमकृत्रिमपुष्पाद्यैरङ्कितं कुङ्कुमान्वितम् । दर्शनादेव माङ्गल्यसूचकं तोषकारकम् ॥ ७ ॥
उवाच पत्रलिखितैरक्षरैर्लक्ष्मणः शनैः । स्थितः श्रीरामपुरतो वरासिंहासनांतिके ॥ ८ ॥

श्रीमान् श्रीराघवेन्द्रो जयतु दशशिरश्छेदनाथं जगत्त्यां
कौसल्यायां नृपेंद्राद्दशरथतनयोऽसि नाम्नाऽवतीर्णः ।
तस्याहं भूरिकीर्तिः पदजलहरुहयोगन्धमात्रातुकामः
कृत्वा नैजं शिरस्तु भ्रमरवदनिशं प्रार्थनां प्रार्थयामि ॥ ९ ॥


श्रीरामदास बोले—एक दिन रामचन्द्र सभामें अपने राजसिंहासनपर बैठे थे। उनके ऊपर सुन्दर छत्र लगा हुआ था और उनके चारों ओर कितने ही मंत्री बैठे हुए थे। इसी समय एक दूत आया और वह अपने प्रभुका सन्देश सुनाने लगा। उसने कहा— पूर्व देशके अधिपति महाराज भूरिकीर्तिने आपके चरणोंका दर्शन करनेके लिए मुझे भेजा है। आप मेरे स्वामीपर कृपा करके यह पत्र पढ़ लीजिए। इतना कहकर उसने वह पत्र रामके दूतको दे दिया। उस दूतने लक्ष्मणके हाथमें दिया और प्रणाम करके पूर्ववत् बैठ गया ॥ १-५ ॥
लक्ष्मणने सुन्दर कपड़ेमें बँधे हुए उस पत्रको खोला और मधुर स्वरसे बाँचकर रामको सुनाने लगे। पत्रपर सुवर्णके फूल बने हुए थे और कुमकुमके छींटे पड़े थे। जिसे देखनमात्रसे वह मांगल्‍यसूचक तथा आनन्ददायक प्रतीत होता था ॥ ६॥ ७ । पत्रमें जो लिखा था, उसे रामके पास जाकर धीरे-धीरे लक्ष्मण सुनाने लगे—। ८॥ रघुकुलमें उत्पन्न श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, जो राम रावणको मारनेके लिए दशरथके पुत्र

२४६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १ ]

मम पौत्र्यावुभे राम चंपिका सुमतिरिति च । तयोः स्वयंवरार्थं ह्यायाताश्च बहवो नृपाः ॥ १०॥ बंधुपुत्रैर्बंधुभिस्त्वं स्वसुताभ्यां च मंत्रिभिः । सुहृज्जनैस्तथा पौरैः सावरोधः स्वसेनया ॥ ११॥ आगच्छस्व मम पुरं मयि कृत्वा महन्कृपाम् । द्विषतां प्रार्थनां मे त्वं मा कुरुष्व विफ्लां प्रभो । १२॥ इति पत्रार्थमाकर्ण्य स्वस्थचित्तो रघूत्तमः । स्वयंवरं ततो गन्तुं गुरुणा निश्चय व्यधात् ॥ १३॥ ततोऽब्रवीन्म सौमित्रिमद्य सेनां प्रषोदय । श्वोऽहं गच्छामि युष्माभ्यां स्वया मंत्रिजनैः सह ॥ १४॥ भरतेनापि युष्माकं पुत्रैः शत्रुघ्नसंयुतः । स्वयंवरं सावरोधः पौरैर्जानपदैः सह ॥ १५॥ विजयो नगरीं गन्तुं पालितुं स्थापितो मया । अद्य वै वस्त्रगेहानि बहिर्नेयानि लक्ष्मण ॥ १६॥ पंथानं शोधयंत्वद्य नानादातृनरान्विताः । गच्छन्तु सकला नार्यः पुष्पकेण विहायसा ॥ १७॥ तथेति लक्ष्मणश्चोक्त्वा सत्कार स गशोधितम् । राघवेण समाभव्ये प्रबद्धकरसंपुटः ॥ १८॥ ततो द्वितीयदिवसे प्रभाते रघुनन्दनः । स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा निनाग्नीन्वै स पुष्पके । १९॥ स्थापयामास कुण्डेषु भुक्त्वा सह सुहृज्जनैः । ततः सीतां समाहूय त्वरयामास राघवः ॥ २०॥ ततः स्त्रियस्तदा सर्वाः सीताद्या रत्नभूषिताः । यानमञ्जुरुहुः शीघ्रं दिव्यवस्त्रादिमण्डिताः ॥ २१॥ ततो रामो गजारूढो वरच्छत्रोपशोभितः । ययौचाग्रे चामरैर्वीजितश्च मुहुर्मुहुः ॥ २२॥ रामाग्रे वारणारूढो ययौ शीघ्रं गुरुस्तदा । राघवस्य पृष्ठभागे करिस्थो लक्ष्मणो ययौ ॥ २३॥ ततः कुशाद्यास्ते हृष्टा बाला जग्मुर्गजस्थिताः । ततो भरतशत्रुघ्नौ नामतुर्गजसंस्थितौ । २४॥ ततः सर्वे मंत्रियश्च पौर जानपदादयः । नानावहनसंस्थास्ते ययुः सर्वे त्वरान्विताः ॥ २५॥ चतुर्दन्ते शुक्लवर्णं वारणंश्वतरोद्भवे । संस्थितो राघवो रेजे मुक्ताजालविराजिते ॥ २६॥ एवं रामः सुनेमार्गे वंदिमंगलशब्दनुतः । मृदंगद वाद्यनिनादैश्च ययौ पूर्वदिशं शनैः ॥ २७॥

होकर कौशल्याभी काममे अस्मे है। मैं मूर्खकीकी आपकी नाई जनक चरणकमलोंके संघनकी कामनासे रात-दिन प्रार्थना करता रहता हूँ ॥ ६ ॥ हे राम ! मेरो चम्पिका तथा सुमति नामकी दो पोतियां हैं। उनके स्वयंवरमें बहुतसे राजे आये हुए हैं। अतएव आपस भी प्रार्थना है कि अपने भ्राताओं पुत्रों, भ्राताओंके पुत्रों, मंत्रियों, मित्रों, घरकी नारियों, पुरवासियो तथा सेनाके साथ मेरे यहाँ पधारे हे प्रभो ! मेरी इस प्रार्थनाको विफल मत कीजिये ॥ १०-१२ ॥ इस प्रकार उस पत्रके अर्थको स्वस्थचित्त होकर रामचन्द्रजीने सुना और स्वयंवरमें जानेके लिए गुरु सहित निश्चय किया । इसके बाद रामने लक्ष्मणसे कहा कि आज सेना भेज दो । कल हम, तुम, सब, दूता, मंत्रियों, भरत तथा तुम लोगोंके पुत्रों, स्त्रियों तथा पुरवासियोंको साथ लेकर स्वयंवरमे चलेंगे। विजयको अयोध्या नगरी तथा दशकी रक्षाके लिए नियुक्त कर दिया जाय । हे लक्ष्मण ! तुम आज अभी तम्बूकनात आदि भेज दो १. १३-१६ ॥ झम्पट कुछ दूतोंको रास्ता साफ करनेके लिए आगे भेज दो। घरकी सारी स्त्रियं को पुष्पक विमान द्वारा पहले ही भेज दो । १७ ॥ लक्ष्मणने रामकी सब बातें मान लीं और जैसा उन्होंने कहा था, सो सब ठीक कर दिया । १८ । दूसरे दिन रामने सवेरे उठकर स्नान और नित्यकर्म करनेके अनन्तर सब बालकोंके साथ बैठकर भोजन किया । अग्निहोत्रकी अग्नि मँगवाकर पुष्पक विमानपर रखी ॥ १९ ॥ इसके बाद सीताको बुलाया और जल्दी तैयार होनेके लिये कहा ॥ २० ॥ सीता आदि नारियोंने सुनहले वस्त्र एवं आभूषण पहने और पुष्पक विमान पर जा बैठीं ॥ २१ ॥ इसके बाद राम एक सुन्दर हाथीपर बैठकर चले । उस समय उनके ऊपर श्वेत छत्र लगा हुआ था और सेवक उनपर चंवर डुला रहे थ ॥ २२ ॥ सबसे आगे गुरु वसिष्ठका हाथी था, उनके पीछे राम और रामके पीछे लक्ष्मणका हाथी था ॥ २३ ॥ उनके पीछे कुश आदि शांडों इष्टों और भरत-शत्रुघ्नका हाथी चल रहा था ॥ २४ ॥ इन सबके पीछे मन्त्री तथा पुरवासी अनेक प्रकारकी सवारियोंपर सवार होकर शीघ्रतासे चले जा रहे थे ॥ २५ । रामचन्द्रजी ऐरावतके कुलमे उत्पन्न चार दांतवाले तथा मोतियोंके झुमकेसे सुशोभित हाथीपर बैठे हुए बड़े सुन्दर लग रहे थे ॥ २६ ॥ इस तरह बन्दीजन-मगाध आदिकोंके हाथ

सर्गः ३] विवाहकाण्डम् ३६७


लवादिनेत्रगां बत्वा सुनन्दा वाक्यमब्रवीत् । पश्यैनं बालिके बालं लवं श्रीराघवात्मजम् ॥३२॥ स्वीकर्त्तुं स्वल्पवयसं सीतालालितमुत्तमम् । वाल्मीकिकृपया लब्धविद्यं रूपं कृशानुजम् ३३॥ गुणोपेतेन मुखेनैव कण्ठेऽस्य मालिकां कुरु । कुशार्क चपिकंर ते मग्ना पद्धस्तिथाऽद्य हि ॥३४॥ तथा त्वमपि भो मुग्धे लवांके संस्थिता भव । इति तस्या वचः श्रुत्वा सुनन्दायाः स्मितानना ।३५॥ लवस्य कण्ठे हर्षेण लज्जाऽवनतमानना । समर्पिनिजबाहुभ्यामर्पयामास मालिकाम् ॥३६॥ तदा निनेदुर्वादित्राणि जगुस्ते गायकास्तदा । ननृतुर्वारनार्यश्च तुष्टुवुर्बन्दिमागधाः । ३७॥ भूरिकीर्त्तिर्नृपस्तुष्टो लवांके सुमतिं तदा । शीघ्रं निवेशयामास परिपूर्णमनोरथः । ३८॥ तोषमाप रघुश्रेष्ठः सीता प्रासादसंस्थिता । जानक्यैः सञ्चनाश्च लवं दृष्ट्वा तुतोष सा । ३९॥ ततः सर्वांन्नृपान् पूज्य भूरिकीर्त्तिर्नृपोत्तमः । प्रार्थयामास विनयवचनेनभृगुत्तमः स्थितः ॥४०॥ विवाहकौतुकं दृष्ट्वा भवद्भिर्गम्यतामिति । तथेति ते नृपाः प्रोचुर्ययुर्मार्गस्थलांनि हि ॥४१॥ रामार्थे समरं कर्त्तुमसमर्था गतश्रियः । म्लानानना गतोत्साहाः कामबाणप्रपीडिताः ॥४२॥ रामोऽपि बन्धुभिश्चालेयैयीं वामस्थल मुदः । अथपरे दिने गत्वा भूरिकीर्त्तिः समाययौ ॥४३॥ पुरोधसोपविष्टः सन्मन्त्वा रामं रथोऽब्रवीत् । द्रष्टव्या लग्नदिवासाः सुमुहूर्त्तः सुखावहः ॥४४॥ मामङ्गीकृत्य रामाय त्वत्पादाश्रयकामुकम् । उभयोश्च मण्डपयाः कार्याण्याज्ञापय प्रभो । ४५॥ तथेति राघवोक्त्वा वसिष्ठ चादचत्तदा । सोऽपि गमाज्ञया ज्योतिःशास्त्रज्ञः परिवेष्टितः ॥४६। मुहूर्त्तं कथयामास पञ्चमेऽहनि राघवम् । ततस्तुष्टो भूरिकीर्त्तिर्गणेशां लग्नपत्रिकाम् ॥४७॥

सुनन्दाका आगे चलनेका सङ्केत किया ॥ ३० ॥ इसी प्रकार स्वादु, पुष्कर, तैल, चित्रकेतु तथा अंगदको छाडता हुई वह लवके पास पहुंचा । ३१॥ जब सुमति लवकी ओर देखने लगा तब सुनन्दा बाला -ने बोले। इस बालकको देख, यह रामका पुत्र है । यह अपना विवाह करना चाहता है। इनकी थोड़ी उमर है । सीताके द्वारा इसका पालन-पोषण हुआ है। वाल्मीकिजी कृपासे इस लब्ध विद्या प्राप्त हुई है और यह कुशका छोटा भाई है ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ तू मानन्द इस अपना दान बनाकर इसके गलेमें वरमाला डाल दे जिस तरह तुम्हारी बहिन चन्द्रिका कुशकी गोदमे बैठी हे उस तरह मा तुम तू भी उसकी गोदमें बैठ जा इस प्रकार सुनन्दाकी बात सुनकर वह मुसकुराता ओर लज्जावश मस्तक झुकाकर उसने अपने हाथोंसे लवके गलेमें वरमाला डाल दी ॥ ३४-३६ ॥ उस समय अनेक प्रकारके बज बज, गायकोंने गाने गाये, वेश्यायें नाचने लगी और बन्दीजन स्तुति करने लगे । ३७॥ महाराज भूरिकीर्त्तिने प्रसन्न होकर सुमतिको लवकी गोदमे बिठा दिया । ३८ । यह देखकर रामचन्द्रजी तथा मंदारोपर बैठी सीता दोनों प्रसन्न हुए। जब जानकीने सीताने सबवा मानन्द सुमतिकी देखा तब ता उनकी प्रसन्नताका ठिकाना नहीं रहा ॥ ३९ ॥ इसके अनन्तर राजा भूरिकीर्त्तिने वहाँ आये हुए सब राजाओंका पूजा करके विनयपूर्वक प्रार्थना की-॥ ४० ॥ अब आप लोग विवाहका भी उत्सव देखकर जाइयेगा। राजाओंने भी उनकी बात स्वीकार कर ली और अपने-अपन डेरेपर चल गये ॥ ४१ ॥ वे सब राज रामसे युद्ध करनेम असमर्थ थे । अतएव उनकी श्री नष्ट हो गयी थी, मुख कुम्हला गया था, उत्साह भंग हो गया था और बेजार कामके बाणोंसे पाडित हो रहे थे ॥ ४२ ॥ राम भी अपने भाइयों और बच्चोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक डेरेपर गये । इसके बाद दूसरे दिन राजा भूरिकीर्त्ति रामके पास पहुंचे ॥ ४३ ॥ पुरोहित उनके साथ था, वे रामके समक्ष बैठे और कहा कि कोई अच्छा लग्न- दिवस तथा सुखदायक मुहूर्त्त विचारिए । फिर कहा हे राम ! मदने वरणके भक्त मुझ दासकी प्रार्थनाको अंगीकार करके दोनों मण्डपं के लिए जो कार्य करने हों, उनके लिए आज्ञा दीजिए ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ "अच्छा" कहकर रामने वसिष्ठकी ओर सङ्केत किया । वसिष्ठने रामकी आज्ञा से ज्योतिषशास्त्रको जाननेवाले कितने ही पंडितोंके साथ विचार करके उनके पांचवें दिन विवाहका शुभ मुहूर्त्त बतलाया । इसके अनन्तर प्रसन्न मनसे भूरिकीर्त्तिने गणेशजी, लग्नपत्रिका, गणकों, पण्डितों, वैदिक बादियों तथा रामके साथवाले बंधुजनों को

३४८ आनन्दरामायणे [ सर्गः १

काचित्पक्त्वा भोजनं तु काचित्पाकस्य मञ्चिकाम् । काचिन्मज्जयतीदन्ता मुक्तकेशा ययौ जवात् ॥४६॥ स्तनालिंगिता काचित्क्षिप्त्वोपस्थने कन्दू । ययौ वेगेन ललना वस्त्राणामवलम्बकम् ॥४७॥ क्षालयन्ती पतेः पादमेकं प्रक्षाल्य भामिनी । पादमन्यङ्गलङ्गां तु नावच्छुन्द्रा मवागमत् ॥४८। मीनना गमनेन्द्रं हि शीघ्रं दृष्टार मा तदा । काचिद्दर्शो नुग्रथनान् दूरं कृत्वा पतेर्मुखम् ॥४९॥ ददर्श गच्छं दृष्टुं प्रासादे घस्तयहृष्टा । काचिद्विनिद्रिताऽऽरात्री व्यक्त्वा निद्रां तरान्विता ५०॥ विस्मृतार्धवसना मन्दान्ध्रा निद्राशणान्विता । नेकभ्यां कुचितन् केशान् यपयन्ती तदाशयौ ॥५१॥ त्यक्त्वाऽऽख्यां द्विकाञ्चित्पा कुर्वन्तं कर्माणिधिप । ययौ वेगेन प्रासादं श्रुत्वा राघवमागतम् ॥५२॥ काचिदङ्गेऽनुलेपी मा कुर्वती चापरे भुजे । कर्तुकामा ययौ शीघ्रं तथैव प्रमदोत्तमा ॥५३। काचिदेके पदे कृत्वा नूपुरंऽदानि भामिनी । अपरे कर्तुकामा सा तथैवाट्टाहमारुह्यौ ॥५४। कथयन्ती शुभां वार्ता सपत्न्युः पुरतः स्थिता । श्रुत्वा रामे ममायान्तं दृष्ट्वान गजगामिनी ॥५५॥ क तभिजपति पात्रे कुर्वन्ती पक्वरूपकम् ।भूमौ त्यक्त्वाऽऽद्रवात्र मा ययौ रामं निरीक्षितुम्॥५६॥ काचिन्स्नात्वा द्विज्यवस्था कुर्वन्ती म प्रदक्षिणा । तुलसीं च महादेवं श्रुत्वा रामं ययौ जवात् ॥५७॥ काचिद्रज्जुयन्त्र कूपे कच्वा तोयाद्यमुद्यता । त्यक्त्वा रज्जुघटं कूपे दृष्टावेदुनिभानना ॥५८॥ काचिन्मज्जयन्ती स्तन्यं गृह. पालयन्ती वधः कुचरोवालकं श्रुत्वा तथैव सा ययौ जवात् ॥५९॥ काचिन्मा परिधायाथ वस्त्रं कच्छं करोम सा । कुरुक्रमा ययौ वेगातन्देवाढुलवस्त्रकम् ॥६०॥ एवं कर्माप्यनेकानि कुर्वन्त्यस्ताः पुरस्त्रियः । विक्षिप्य गलि नत्वानि ययौ गमं निरीक्षितुम् ॥६१॥ दृष्ट्वा रामं गजस्थं ता ववृषुः पुष्पवृष्टिभिः । ऊचुः परस्परं नार्यः शश्वोऽट्टालमस्थिताः ॥६२॥ धन्या सा रामजननी कौमल्या या रघूत्तमम् । सुपुवे गजराजानं पश्चिणेणनीरुथा । ६३॥

भोजन करती थीं और कोई भोजन बना रही थी या उसकी अज्ञा तक छोड़के भागी। कोई बालको संभार रही थी, वह बेशक हाथम याते ही दौड़ पड़ा। किमोका पति आलिंगन कर रहा था। इतनेमें रघूका आगमन सुना तो स्वाभाविक हाव लिङ्गनकर दौड़ आयें। कोई अपने पतिके पैर धो रही थी, उसने एक पैर धोकर डमग पगता हुआ था कि उसे खबर लगी कि संगके सहित राम आ रहे हैं, वह तुरन्त उठकर प्रासादपर चढ़ गयी। कोई पतिके साथ शय्यापर सोती थी ॥४४-५०॥ इससे उसको आंखोका काजल मुँहपरमे पुछ गया यह भी यह समाचार पाने ही झरोखे सम्मुखवाले भागको इटाती हुई दौड़ी ॥५१॥ कोई उबटन लगा रही थी, वह एक हाथसे साडी सम्हालता हुई दौड़ पड़ी किणका पति कामोन्मत्त होकर आलिंगन करता बजता था। वह भी एक हाथमें सांडी सम्हालते हुई चली आयी। ॥५१॥ ५३। कोई कामिनं नूपुर पहिन रही थी। वह कनल एक ही पैरम उसे पहनकर भरना संभालकर दौड़ पडी ॥५४॥ कोई पतिस वात कर रही थी, वह जहाँतक बात कर चुकी थी वहीं हा छोड़कर दौड़ आयी ॥ ५५। कोई पतिके लिए भोजन बना रही थी, वह भी पाथको व्योका त्यों छोड़कर रामको देखने लिए दौड़ पडी ॥ ५६ । कोई स्नान करके तुलसी तथा महादेवकी प्रदक्षिणा कर रही था वह भी रामका आगमन सुनकर उसे अधूरा ही छोड़कर भाग चली। ५७। कोई चण्डयूरा रस्सी बांधकर पानी भरने गयी थी, वह रस्सा और घड़ा कूपमे ही फेककर चल पडी ॥५८॥ कोई बालकत स्तन्यपान करा रही थी, वह बालकका प्रिये हुए ही दौड़ आयी ॥ ५९ कोई भोजन अधिक कामीम निवृत्तकर अट्ट पर जाना चाहती थी, वह माधे काछ पहने हुए ही चली आयी ॥६०॥ इस प्रकार अनेक तरहके काम को करतो हुई स्त्रियां अपना अपना काम छोड़कर रामके दर्शनके लिए छज्जे और हटापर आ खड़ी हुई ॥ ६१॥ हाथीपर बैठे हुए रामको देखकर स्त्रियां उनपर फूलोंकी वर्षा करती हुई आपसमे इस प्रकार बाते करती थी-॥६२। रामकी माता कौशल्या धन्य

सर्गः २ ] विवाहकाण्डम् १४९


काश्चिदूचुश्च सा धन्या सीता जनकनन्दिनी । यस्या बिम्बाधरामृतमुररीकुरुतेऽत्र सः ॥ ६४ ॥
काश्चिदूचुस्तया तप्तं जानक्या दुष्करं तपः । पूर्वजन्मनि यत्पुण्याद्रामाऽप्रियाऽभवत् ॥ ६५ ॥
काश्चिदूचुर्वयं मन्दभाग्यास्तु जगतीतले । न तादृश्यो न जाताः स्य रामस्यैत्र स्तनन्धयाः ॥ ६६ ॥
इति नानाविधा वाचस्तासां शृण्वन् रघूत्तमः । ययौ स गजमगंग तूत्तन्प्यौपमन्दिरम् ॥ ६७ ॥
तत्रावरुह्य नागेन्द्राद्विवेश वरमन्दिरम् । तस्थौ सुखेन जनक्या बंधुभिश्चालिकैः प्रभुः ॥ ६८ ॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे विवाहकाण्डे स्वयंवरार्थं भूरिकीर्तेः पुरं प्रति श्रीरामगमनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीयः सर्गः

( राजा भूरिकीर्तिकी पुत्री चन्द्रकलाका स्वयंवर )

श्रीरामदास उवाच
अथापरदिने रामं भूरिकीर्तिः समागमत् । नत्वा प्राह रघुश्रेष्ठ सभाममागन्तुमर्हसि ॥ १ ॥
तथेति राघवश्चोक्त्वा चालंकारैः स्वमभूषयत् । कनकन्तन्तूद्भवैश्चित्रैः कञ्चुकैरुष्णीषमण्डितः ॥ २ ॥
कटिं बध्वाय त्रिगुणं कटिसूत्रेण चोद्यतः । भूरिवर्गगणैः सार्धं शिविकास्थः समाययौ ॥ ३ ॥
सभार्थं ये नृपाः पूर्वमासनेषु च संस्थिताः । श्रुत्वा रामं समायान्तं सभायास्तत्पुरो ययुः ॥ ४ ॥
चक्रुः सर्वे राघवाय प्रणामान्विधिरोन्मुखाः । तेषां नामानि रामाय दर्शयन्तः पृथक् पृथक् ॥ ५ ॥
चित्रार्णाशा रामदूताः प्रोचुर्वै वेत्रपाणयः । वस्त्रालंकारभूषाभिर्भूषिता मुदिताननाः ॥ ६ ॥
गजराज नृपश्चायं कर्णाटाधिप ईरितः । विजयस्ते प्रणामंश्च करोत्यत्र विलोकय ॥ ७ ॥
राघवेन्द्र नृपश्चायं श्रीमान् द्रविड़देशजः । कम्बुकण्ठो प्रणामान्ते करोत्यत्र विलोकय ॥ ८ ॥
दीननाथ नृपश्चायं विदर्भविषये स्थितः । अग्रनाथः प्रणामंश्च करोत्यत्र विलोकय ॥ ९ ॥


१ जिन्होंने २ ३ विराज राम जैसे पुत्रको जन्म दिया ॥ ६३ ॥ कोई कहने लगी कि जनकनन्दिनी सीता धन्य है कि रामचन्द्रजी जिनके अधरामृत पान करते हैं ॥ ६४ ॥ कोई बामा-जन कहती हैं कि सीताने पूर्वजन्ममें दुष्कर तपस्या की थी, जिसके प्रभावसे वे आज राजराज रामचन्द्रकी प्रिया वधू बनी हैं ॥ ६५ ॥ कुछ स्त्रियाँ कहने लगीं कि हम लोग बड़े अभागिनी हैं, जो सीताका दासी होकर भी रामकी सेवा नहीं कर सकीं ॥ ६६ ॥ इस तरह नाना प्रकारका वृत्त सुनते हुए रामचन्द्रजी गजमल्लसे चलकर छावनीसे उतरे और राजा भूरिकीर्ति द्वारा सजाये हुए भवनमें गये और सीता, भ्राताजी तथा बालकोंके साथ टिके ॥ ६७ । ६८ ॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे विवाहकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥

श्रीरामदास बोले इसके बाद दूसरे दिन राजा भूरिकीर्ति स्वयं रामके पास पहुंचे और प्रणाम करके हाथ जोड़ - हे रघुश्रेष्ठ ! अब सभामें चलिए । 'अच्छा' कहकर रामने भी सुवर्णके अनेक आभूषण पहने, सोने के सूत्रसे बने अच्छे-अच्छे वस्त्र धारण किये, पगड़ीसे सज्जित कमरबन्द कसा और शिविकापर बैठकर नगर बालकोंके साथ सभाभवनकी ओर चले, १-३ । जो राजे पहले ही से सभामें आकर बैठे हुए थे, वे रामका आगमन सुनकर सकुचकर उठे और रामके सामने जा पहुंचे ॥ ४ ॥ उन्होंने भगवान्को प्रणाम किया । रङ्ग-बिरंगी पगड़ी बाँधे और हाथमें बेंत लिए हुए रामके दूत जोर-जोरसे बोलकर इस प्रकार उनका परिचय बतलाने लगे- हे राजाओंके भी राजा राम ! देखिए कर्नाटक देशका रहनेवाला यह विजय नामका राजा आपको प्रणाम कर रहा है ॥ ५-७॥ इधर देखिए हे राघवेन्द्र यह द्रविड़ देशका निवासी कम्बुकण्ठ नामका राजा आपको प्रणाम कर रहा है ! हे दीनानाथ ! यह विदर्भ देशका अधिपति अग्रनाथ नामका राजा आपको

३९०आनन्दरामायणे[ सर्गः २

महाराज नृपश्वाय मगध विषये स्थितः। परंतपः प्रणामांस्ते करोति त्वं विलोकय ॥१०॥
सीताकांत नृपश्वायमवन्तिस्थः प्रतापनान। उग्रबाहुः प्रणामांस्ते करोति त्वं विलोकय ॥११॥
रघुवीर नृपश्वायं स्थितो ह्वैहयपत्तने प्रतापने प्रणामांश्व करोति त्वं विलोकय ॥१२॥
हे राम नृपतिश्वाय शूरसेने स्थितो महान् गुणेश्ने प्रणामाश्व करोति त्वं विलोकय ॥१३॥
कामलद्र नृपश्वाय हस्तद्वागस्थिता महान् नापानव्ये यशस्कीर्त्तः करोति नमनं तत्र ॥१४॥
अयोध्याश नृपश्वायं कलिङ्गविषये स्थितः हेमाङ्गदश्तेऽन्वेद्यश्च करोति नमनं तव ॥१५॥
रामभारे नृपश्वायं नागरत्नसमन्वितः पाण्ड्योऽयं मतिमान् शूरः करोति नमनं तव ॥१६॥
एवं तेषां प्रणामांश्व मानयन् स्वकृतांजलिभिः। विवेश बंधुभिर्बालैः मण्डपं मन्त्रिभिः प्रभुः ॥१७॥
तत्र सिंहासने दिव्ये पश्चिमायां ततो हरिः। उपाविशन्म पूर्वास्यश्छत्रचामरमण्डितः ॥१८॥
रामस्य सव्ये सौमित्रिर्ककेयीतनयस्त्वयाः स्थितः सम्भूस्तथा रामवामे कुशाद्या मंत्रिबालकाः ॥१९॥
शत्रुघ्नसव्ये सतस्थुः सुमन्त्राद्याः सुमन्त्रिण । नभश्चामुत्तरे याम्ये पंक्ती मध्ये नृपादिकाः ॥२०॥
नीभरेखोपमास्तस्थुः स्वसमूहपुरंज्जनान्विः पश्चिमाभिमुख्याः सर्वा ननृतुश्चाग्रतोऽभितः ॥२१॥
अट्टाट्टालसंस्था विप्राद्या ददृशुः कौतुक महन् । नतो नटन्चु वाद्येषु धूपेषु प्रज्वलत्सु च ॥२२॥
नदन्त्सु वारनारीषु गायन्त्सु मागर्घादिषु स्तुवन्त्सु बंदिवृन्वेषु सभायां नृपपोत्रिके ॥२३॥
शिबिकास्ये दिव्यवस्त्रदिव्यालंकारमण्डिते। नवरत्नमहामालाधृत्वाऽन्यकरोपले ॥२४॥
ते सभाङ्गमनू रम्ये समागभ्य विरेजतुः । तयोर्नेत्रकटाक्षेण भिन्नमर्मस्थला नृपाः ॥२५॥
बभूवुर्विकलाः सर्व कामबाणविचेतनः। न तदा लेभिरे शर्म शुष्ककण्ठोष्ठतालुकाः ॥२६॥
समार्ता चंद्रिकान्नाम्री वह्निंशीणा दवेश ह। ईशद्योणाच सुमतिः मर्भा तां सविवेश ह ॥२७॥

प्रणाम करता है, इसे देखिए ॥ १० ॥ हे सीतापते ! मगध देशका रहनेवाला यह परन्तप नामक राजा आपको प्रणाम करता है ॥ १० ॥ हे सीताकान्त ! अवन्तिदेशका निवासी और महाप्रताणशाली यह उग्रबाहु नामक राजा आपको प्रणाम कर रहा है ॥ ११ ॥ हे रघुवीर ! यह हैहयनगरका रहनेवाला प्रदीप नामक राजा आपको प्रणाम करता है ॥ १२ ॥ हे राम ! शूरसेन नगरका रहनेवाला यह गुणेश नामक राजा आपको प्रणाम करता है हे कामलद्र ! कुद्दलग नगरका रहनेवाला नौपञ्जय यशस्वी नामक राजा आपको प्रणाम कर रहा है ॥ १३-१४॥ हे अयोध्यापते ! कुरुदेशका रहनेवाला यह हेमांगद नामका राजा आपको प्रणाम करता है। हे रामप्यारे ! नागरत्ननगरके रहनेवाले बुद्धिमान् तथा अति पराक्रमी पाण्ड्य नामक राजा आपको प्रणाम कर रहा है ॥ १५ ॥ १६ ॥ रामचन्द्रजी सबकी ओर निहार तथा संगत साहिसे लोगो के प्रणाम स्वीकार करके अपने भ्राताओं और बालकोंके साथ सभामभवनमे पधारे। वहाँ पश्चिमाभिमुख रखे हुए एक दिव्य सिंहासनपर पूर्वका ओर मुख करके बैठे । उस समय भी उनक ऊपर छत्र लगा था और चमर चल रहे थे ॥ १७ ॥ १८ ॥ रामकी दाहिनी सव्यमे लक्ष्मण भरत आदि भ्राता बैठे। बायें ओर कुश आदि सब लड़के तथा मंत्रिपुत्र बैठे। शत्रुघ्नकी दाहिनी बगलमे सुमन्त्रादि मन्त्री बैठे। सभाकी उत्तर और दक्षिण पंक्ति गोलाकार बनाकर सब राजागणपुत्र तथा मंत्रिपत्रके साथ बैठे थे और पश्चिमाकी ओर मुख करके बैठायें नाच रही थीं ॥ १९-२१ ॥ अट्टालिकापर चढ़े हुए ब्राह्मण आदि नगरनिवासी वहाँका कौतुक देख रहे थे। इसके अनन्तर जब वाद्यू बजने लगे, धूपकी सुगन्धि उड़ने लगी, वेश्याएँ नाचने लगीं मागध-नट आदि विविध प्रकारके गाजन करने लगे और बन्दीजन तरह-तरहकी स्तुति करने लगे। उसी समय शिविकामर चढ़कर दिव्य वस्त्र तथा अलंकार पहिने नवरत्नोंकी बनी एक बड़ी-सी माला हाथोंमें लिये वे दोनों सुन्दरी कन्यायें सभामें आ पहुंची । उनके नेत्रकटाक्षम घायल तथा कामके बाणसे विदीर्णहृदय होकर कितने ही राजे विकल हो गये। उनके होठ और तालु सूख गये । उस समय कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। इस समय अग्निकोणसे चन्द्रिका तथा ईशानकोणसे सुमति नामवाली कन्या प्रविष्ट हुई

सर्गः २ ] विवाहकाण्डम् ३५१

अथोपमाता वृद्धा सा धृतहस्ताग्रयष्टिका मथाया चपकान्ताभ्यै दक्षिणस्थान्पृथक् पृथक् ॥२८॥ क्रमेण वर्णयामास तदा नृपतिसत्तमान् । तथाऽन्या च सभाप्राध धृतहस्ताग्रयष्टिका ॥२९॥ सुनन्दाख्याऽतिजग्धा सुमध्यै नृपतीन्क्रमात् । रणयाम्यौसरस्थनृपमना पृथक् पृथक् ॥३०॥ अथ सा चण्डिकां प्राह नीत्वा तां नृपतेः पुरः । विशवकार्थ्या च.पमाना नन्दा सामग्रीजिता ॥३१॥ राजकन्ये चषिकेत्र शृणुष्व वचनं मम । एन नृप वर्णयाम पश्य स्व मदनोपमम् ॥३२॥ पांड्याख्यं मतिमाणाग्ना नामपत्तनमास्थितः । शूर श्रेष्ठा नृपश्रेष्ठः प्रजापालनतत्परः ॥३३.। यदि ते रोचते चित्ते वरयैनमनुत्तमम् अद्य त्वं महिपी भुक्त्वा नागपत्तनमस्थिता । ३४.। क्रीडस्व मुदिताऽनेन वाप्रामन्द्रातिषु । नन्दीक्त चषिका श्रुत्वा द्वयर्थ वाक्यमनुत्तमम् ॥३५॥ न बबन्ध मनस्तस्मिन्नृपती मतिमत्तरा । चोदयामास नन्दां तामग्रे गन्तुं नृपोत्तमम् ॥३६ । तदाऽन्यं नृपति नन्दा नीन्वा तां शिबिरात्स्थिता । चण्डिकां प्राह चे क्ष पश्येनं बालिके नृपम् ॥३७' कलिङ्गविषयस्योऽयं नाम्ना हेमाङ्गदो महान् । को दृशो वाणदाणा यस्य गण्डस्थलादिषु ॥३८॥ मुक्ताजालानिगुच्छाश्च राजन्ते कमलानने । ** *** ******* ******* * ******* च ॥३९॥ एषापत्नी कौतुक बाले करोषि क्रोडनादिषु । यस्य सांक्रम रे हे मा मुख्योऽय कन्यके ॥४०॥ इत्युक्ताऽपि तथा तन्वी नन्दया चंडिका नृपे । न स्मन नगे न बबन्ध न्य गन्तु नामचोदयत् ।४१॥ सपत्नीभयमालक्ष्य सपत्नीकरण्याजष्यति । अमहानिति शब्देन नन्दया सूचिताऽपि मा ॥४०॥ ततोऽन्यं नृपतिं गन्त्वा नन्दा प्रोवाच चण्डिकाम् । पश्यैनं नपतिं मुग्धे हरिद्वारनिवासिनम् ।४३॥ नीपान्वयममुद्भूत ह्यब्धाविव निशाकरम् । यशानां नृत्नगन्ध कार्य्या जयन्त मण्डले ।४४। यज्ञकीर्तिरिरिति ख्यातः पृथ्वीशः प्रमदाप्रियः । वयैनं नृप भुवि रुक्मभूषणभूषितम् ॥४५.॥


॥ २८-२७ ॥ चण्डिकाके साथ एक उपमाता (धाई) मथायो थी, जो हाथमें एक लाठी लिये खड़ी दिये थी। वह दक्षिणकी तरफ बैठे राजाओंक वर्णन करने लगी । २८-३० ॥ सुनन्दा, चण्डिकाको एक राजाके सामने लायी । उस समय भी चण्डिका कामकीपर बैठी थी और चमर चमर चल रहे थे ॥ ३१ ॥ सुनन्दा चण्डिकाका सम्बोधन करके कहने लगी - हे राजकन्य चण्डिके ! म.. बात सुना इसा, यह कामदेवके समान सुंदर अति बुद्धिमान् पाण्डय नामक गजा नागपत्तनका रहनेवाला बड़ा पराक्रमी, रथी, सब राजाओंमें श्रेष्ठ और प्रजापालने तत्पर है । ३२ ॥ ३३ ॥ यदि इस प्रसन्न लगे तो इस को पसन्द कर लो । तुम इसकी महारानी बनकर नागपत्तनमे आनन्दक साथ अनूप-रूपके मथलोभ क्रीड़ा करोगी । सुनन्दाकी ये बातें उसे दुष्टार्थक तथा व्यर्थ-सी जान पड़ी । उस राजापर उसका तव मन नहीं सटा और दूसरे राजाके पास चलनेका संकेत किया । ३४-३६ ॥ फिर सुनन्दा शिविकापर बैठी चण्डिकाको दूसरे राजाके सामने ले जाकर कहने लगी । ३७ ॥ हे बालिके ! इसे देखो यह महान् कलिंग देशका रहनेवाला, हेमाङ्गद नामका राजा है । इसके गण्डस्थलपर हाथियोंके गजमुक्ताओंसे बने गुच्छू लटकते रहते हैं । इसकी रानी बनकर तुम गङ्गाजीकी खिड़कियोंम समुद्रकी लहरोंक कौतुक देखती हुई विहार करोगी । बस, अब इसे वरण्य करके तुम इसकी समस्त स्त्रियोंकी प्रधान बन जाओ ॥ ३८-४० ॥ इतना कहने-सुननेपर भी उसका मन उस राजापर नहीं जमा और आगे बढ़नेका संकेत किया । ४१ । क्योंकि सम्भावित यह ख्याल हुआ कि इसके यहाँ सपत्नी मौत का डर है। दूसरे 'अमहान्' शब्दका प्रयोग करके नन्दामे भी य०ठा०सा संकेत कर दिया था ॥ ४२ ॥ इसके अनन्तर दूसरे राजाके पास पहुंचकर नन्दा कहने लगी- हे मुग्धे ! इस गजाको देखो, यह हरिद्वारका नवासी है ॥ ४३ ॥ जैसे समुद्रसे चन्द्रमाको उत्पत्ति हुई है उसी प्रकार यह पवित्र नीप राजक वंशम उत्पन्न हुआ है। अनेक यज्ञोंको करनेसे जयन्त् घरमे इसकी कीर्ति फैल चुकी है ॥ ४४ ॥ इसलिए लोग इसे यज्ञकीर्ति कहते हैं । सुवर्णके आभूषणोंसे मण्डित इस राजाको तुम वर लो। यह विस्तृत भूभागका मालिक है और

३६२ आनन्दरामायणे [सर्गः २

अस्याद्य महिषी भूत्वा शृङ्गारैरुपसम्पदा । नौकास्था पश्यसि त्वं ह वर्ण्यनं नृपोत्तमम् ॥४६॥ अस्य पत्नी वसिष्ठा त्वं मय माऽग्रे प्रतापने । इत्युक्ताऽपि तया तस्मिन्न बबन्ध निजं मनः ४७। त्वं वसिष्ठा मा भवेति नन्दायाऽग्रे प्रचोदिता चाढ्य नाम मा नन्दाऽग्रे गन्तुं नृपोत्तमम् ॥४८॥ नन्दाऽन्यं नृपं नीत्वा चम्पिकां प्राह वेगतः। पश्यैनं नृपतिं मुग्धे सुषेणाख्ये वरे ॥४९॥ देशे करोति वै राज्यं सुषेणोऽयमनुत्तमः। तुरगा वायुवेगाश्च यस्य पन्नगो मृगीदृशः। ५०। यस्यांगणे वारनारीनृत्यद्यत्पत्यह्हानिशम् वर्णैन चांपिकेऽद्य य आनन्दवराननम् ॥५१॥ अस्य त्वं महिषी भूत्वा जन्मसाफल्यां कुरु। याश्च विष्ट शृण्वन्त्या वाक्यमनुत्तमम् । ५२। न बबन्ध मनस्तस्मिन्नृपती सा मनोदयम् मथ सा वादिनो कन्या नयाऽन्यं नृपतिं क्षणात् ॥५३॥ निनाय शिविकाध्यो तां चम्पिकामपि भामिनीम् । पश्यैनं नृपतिं बाले स्थितं हैहयपत्तने ॥५४॥ महस्रार्जुनवंशस्य भूषणं कल्पनेपमम् प्रताप इव मन्वानः ख्यातः शूर महारथी ॥५५॥ वर्ण्यनं नृप माऽन्य गच्छ हैमवत्यर्णिवि । अस्य त्वं महिषी भूत्वा रेवायाः पतिना सह ॥५६॥ करिष्यसि जलक्रीडां चम्पिके शृणु मद्रचः । इत्युक्तेऽपि तया तस्यां न बबन्ध मनो नृपे ॥५७। वर्ण्यनं नृपं मेने नन्दास्यादमहारथी । नृपाणां संख्येष्वर्थे वा ह्यथ बद्धुत्तमा । ५८। एवं नाना नृपाणां सा वर्णनं विविधं पृथक् । स्तुतीश्च नृपतीनां शुश्रावा नृपमध्यगा ॥५९॥ जगाम शिविकामंस्था सुनन्दा भरतानुजम् । सुमन्त्रादीन् विहाय श्रुत्वा श्रीरामेमान्तथा ॥६०। ततः प्रोवाच सा नन्दा पश्यैनं भरतानुजम् । कौसलेन्द्रस्य रामस्य लक्ष्मणसोदरोपमम् ॥६१॥ अयोध्यावासिनं रामराज्याज्ञामनुवर्तिनम् वर्ण्यनं चम्पिकेऽद्य श्रुतकीर्त्याः स्वसा भव ॥६२॥ इत्युक्तापि तया तन्वी शत्रुघ्ने निजमानसम् । न बबन्ध भृशं संतामग्रं गतु चकार ताम् ॥६३।

स्त्रियोसे बड़ा प्रेम करता ने। अत यदि तुम इसके साथ ब्याह कर लोगी तो नौकापर बैठकर गङ्गाजीकी अनूप लहरियोंको देखोगी। मेरी बात मान लो और इस राजाकी पति स्वीकार करो। अब आगे मत बढ़ा ऐसा कहनेपर भी उसका मन उस राजापर नहीं रमा और उसने नेका मस्त किया । ४५-४८ ॥ सुनन्दा भी दूसरे राजाके सम्मुख पहुँचकर कहने लगी कुमारी ! इस नरपत्ती ओर देखा। यह अङ्ग नामक दशामे रहता हुआ राज करता है। इसका सुषेण नाम है। कनकगण देवतुल्य बहुमूल्य घोड़े इसके पास हैं कितनी ही मृगीकी तरह नेत्रावाली स्त्रियां भी इसके विलासमे अंगणमें रात वक्वाये नाचती रहती हैं। हे चम्पिके तू इसे पसन्द कर ले। इस तेरे प्रिय मुखके समान इसका भी मुंह है। राजमहिषी बनकर तू अपना जीवन सुफल कर ले। उस राजाकी बड़ाई सुनकर नन्दाने प्रतिज्ञापालन कर राजापर भालती रमा और कन्धाको आगे बढ़नेके लिये संकेत किया। उसके संकेतपर वाहिकाने क्षण भरमें एक दूसरे राजाके पास पहुंचकर बोली हे बाले ! इस राजाको देखा यह हैहयपत्तनका रहनेवाला, कल्पवृक्ष सदृश कामद तथा सहस्रार्जुनका वंशज है। यह बड़ा योद्धा एवं महारथी है और प्रताप इस नामसे विख्यात है। ॥ ४९-५५, इसको वरकर तू अपने भाग्य सम्बन्ध पदपर पहुँचेगी। इसकी महिषी बनकर तू पतिके साथ नर्मदा नदीमे सानन्द विहार करेगी ॥ ५६ ॥ इतना कहनेपर भी उस चम्पिकाको अच्छा नहीं लगा। क्योंकि नन्दान भी कहा था- 'हे नृपोत्तम !' मानो इसे यह पसन्द करे दूसरे 'अमहारथी' शब्दसे भी तिरस्कार ही किया था। इसलिए वह भी अच्छा नहीं लगा। नन्दायें दुष्टकके समान कहा था खुद समझती थी ॥ ५७ ॥ ५८ । इस प्रकार जनक राजाक्त पृथक् पृथक् वचन तथा स्तुतिके अन्तर्गत लयवद्यायाका सुनती हुई पाल्कीपर बैठी हुई चंडिका रामके मन्त्रा सुमन्त्रादिकोंको लांघकर शत्रुघ्नके पास पहुंची ॥ ५९ ॥ ६० ॥ नन्द ने कहा- ये भरतके छोटे भाई हैं किन्तु रामके सगे भाई जैसे मालूम पड़ते हैं ॥ ६१ ॥ ये अयोध्यामे रहते हैं और राजा रामकी आज्ञाका पालन करते हैं । चम्पिके ! तू इन्हीक साथ विवाह करके श्रुतकीर्तिकी बहिन बन जा ॥ ६२ ॥ इतना कहनपर भी शत्रुघ्नमे उसका मन नहीं

सर्गः २ ] विवाहकाण्डम् ३६३


ततः सा भरतं नीत्वा नन्दा तामाह मञ्जुलम् । शत्रुघ्नस्याग्रगं चैनं कैकेय्या जठरोद्भवम् ॥६४॥
रामसेवारतं शान्तं युवानं दयितप्रियम् । वरयैनं बालिकेऽद्य माण्डव्या सरयूजले ॥६५॥
करिष्यसि जलक्रीडां नौकाभ्या मन्मतेन हि । ततस्तत्संज्ञया मन्दा लक्ष्मणं चपिकां जवात् ॥६६॥
नीत्वा सौमित्रिक्रीति तां वर्णयामास मादगम् । पश्यैनं लक्ष्मणं बाले सुमित्राजठरोद्भवम् ॥६७॥
वयोध्यक्षामिनं रामसेवाशक्तं मनोहरम् । वरयैनं चपिकेऽद्य मेघनादप्रमर्दनम् ॥
शेषांशसंभवं चोर्मिलाया वीरस्वसा भव ॥६८॥
सर्वांन् श्रुत्वा रामसेवामक्तान् पत्नीपुत्रानपि । छत्रचामरादींश्च रोषयामास ताञ्च सा ॥६९॥
ततस्तत्संज्ञया नन्दा श्रीरामाग्रे स्वयंवरम् । नीत्वा तामाह मधुरं स्तोतुं तं रघुनन्दनम् ॥७०॥
महत्ते चपिके दैव येन पश्यसि राघवम् । धन्योऽहमपि या रामं दृष्ट्वा स्तोतुं पुरः स्थिता ॥७१॥
क्काहं मंदमतिर्नारी क्व रामो गुणसागरः । नाहं तत्स्तवनने शक्ता बाल्मीकिर्यत्र कुण्ठितः ॥७२॥
शतकोटिभिर्नः श्लोकैश्चरित्रं राघवस्य च । मुनिना वर्णितं तच्च शतकोट्यक्षरान्वितम् ॥७३॥
तस्याहं वर्णनं किञ्चित्करोमि यच्छृणुष्व तत् । सूर्यवंशभूषणं श्रीदशरथनृपात्मजम् ॥७४॥
कौसल्यानन्दनं रामं साक्षान्नारायणं विभुम् । ताटकान्तकरं वीरं गाधिजायज्ञपालकम् ॥७५॥
अहल्योद्धारिणं श्रेष्ठं शिवचापंकारखण्डनम् । जानकीवल्लभं रम्यं जामदग्न्यादवानलम् ॥
नृपवृंदकंजेतारं भरतप्राणदायिनम् ॥७६॥
ताताज्ञापालकं भ्रात्रा सीतयाऽरण्यवासिनम् । विराधमर्दनं श्यामं खरदूषणमर्दनम् ॥७७॥
त्रिशिराश्चमृगमारीचकबन्धवालिमर्दनम् । समुद्रबंधनं लङ्कागर्भसान्तकरं प्रभुम् ॥७८॥
रावणांतप्रकर्तारं सीतया राज्यकारिणम् । तीर्थपुंजप्रकर्तारं लीलाकीडनतत्परम् ॥७९॥


डारा और आगे चलकर कर कट किया ॥ ६३ ॥ इसके बाद नन्दा चम्पिकाको लिए हुए भरतके सामने पहुंचकर कहने लगी - ये शत्रुघ्नके बड़े भाई भरत कैकेयीके गर्भसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ६४ ॥ ये भी रामकी सेवा करते हैं। इन शान्त युवा एवं दयितप्रिय भरतको वर लेती तुम इसी तथा भरतके साथ सरयूल जलमें विहार करोगी। हे धीठीके नहीं तब तो चम्पिकाका संकेत पाकर नन्दा लक्ष्मणके सामने पहुंची ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ वह चम्पिकासे कहने लगी-ये सुमित्रा के गर्भसे उत्पन्न लक्ष्मण हैं। ये अपाडतोपे युक्त हुए रामकी सेवा करते हैं। तू इन सुन्दर, मेघनादका नाश करनेवाले और शेष भगवान्के अंशसे उत्पन्न लक्ष्मणके साथ व्याह करके उर्मिलाकी बहिन बन जा ॥ ६७ ॥ ६८ ॥ उस बहिनको रामक सेवक, छत्रचमरादिहीन तथा व्याहे सुनकर उसने तीनों भाइयोंमेंसे किसी को भी नहीं पसन्द किया ॥ ६९ ॥ इसके बाद चम्पैके संकेत करनेपर वह आगे बढती हुई रामचन्द्रजीके सामने जा पहुंची। तब दासी रामकी स्तुति करती हुई इस तरह बोली- ॥ ७० ॥ हे चम्पिके ! तुम्हारा अहोभाग्य है, जो तुम रामचन्द्रजीको देख रही हो और मैं भी धन्य हूँ जो रामकी स्तुति करनेके लिए इनके सामने उपस्थित हुई हूँ ॥ ७१ ॥ कहाँ मैं एक मन्दमति नारी और कहाँ गुणोंके सागर रामचन्द्र । मैं इनकी स्तुति कानम कैसे समझ हा सकती हूँ जब कि वाल्मीकि जैसे महान् कवि भी पूरी तौरसे वर्णन नहीं कर सके ॥ ७२ ॥ उन्होंने सौ करोड़ श्लोकान्नों से वर्णन किया है जो केवल उनके सौ करोड़ अक्षरोंकी स्तुति हुई है ॥ ७३ ॥ मैं अपनी बुद्धिके अनुसार थोड़ी-सी स्तुति कर रही हूँ, सो सुन । ये सूर्यवंशके भूषण, महाराज दशरथके पुत्र, कौशल्याके तनय और साक्षाद्व्यापक महान् नारायण हैं । इन्होंने दुष्ट ताड़काका वध करके विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा की है ॥ ७४ । ७५ । इन्होंने अहल्याका शापसे मुक्त किया और शिवधनुष तोड़ा है । ये सीताके वल्लभ, परशुरामके कोपरूपी वनके दवानल, राजाओंके समूहको जीतनेवाले तथा भरतके जीवनदाता हैं ॥ ७६ । ये पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले, भाई तथा सीता के साथ वनोंमें रहनेवाले, विराधके नाशक, श्यामरूपधारी और खर-दूषणके नाशक हैं ॥ ७७ ॥ त्रिशिरा तथा मृगरूप धारण करनेवाले मारीचके वधकर्त्ता, कबन्ध तथा बालिको मारनेवाले, समुद्रमें सेतु बाँधनेवाले और लङ्कानिवासी राक्षसोंके विना-

३५४ आनंदरामायणे [ सर्गः २

जानकीत्यागकर्त्तारं सीतार्ग्रहणतत्परम् । कुशलवसङ्ग्रावां च वाजपर्थे युद्धकारिणम् ॥८०॥ एकपत्नीव्रतं शांतं सत्यभाषणतत्परम् । एकवाणमसंख्यातनामानं मरुनिध्वजम् ॥८१॥ कोविदारध्वजं वानरध्वजं वज्रध्वजं शुभम् । तार्थ्यध्वजं पुष्पकस्थं तार्थ्यवाय्वजवाहनम् ॥८२॥ नानाराजावतंसस्थमणीदीप्त्यांत्रिशोभितम् । वासिंहासनतासीनं छत्रचामरमण्डितम् ॥८३॥ वरयेनं चंपिकेत्वं सीतया सह राघवम् । सप्तद्वीपशियं सप्तद्वीपविभोर्पीडि च ॥८४॥ बाणः पत्नीचरो यस्य मान्यो यः खेदृदन्तथा । नवरत्नमल्लिकायस्य प्रीत्याथो कुरु मा वृज ॥८५॥ इत्युक्ता नदया बाला स्वरूपपुण्या विशेषतः । न वरञ्च मृगे रामे सीतां संस्मृत्य चंपिका ॥८६॥ एकपत्नीव्रतं शमं सीतया वयनेति च । खेदं मा चर तत्कण्ठे मालां मा कुरु वादिनि ॥८७ तत्सखसंज्ञया नंदा तां निनाय कुशं प्रति । प्रोवाच मधुरं वाक्यं कुशवर्णनहर्षिता ॥८८॥ एनं पश्याल्पवयसं श्रीरामतनयं कुशम् अनर्काण्वगृहं शंतनु भार्य्याथिनं शुभम् ॥८९॥ लवाग्रजं धनुर्वेदिनिपुणं विनयान्वितम् । पित्रा सङ्ग्रामकर्त्तारं वाल्मीकिमुनिशिक्षितम् । ९०॥ एनं वृणीष्व बाले त्वं सुरमानवसन्तनुतम् । नवरत्नमयीं मालायस्य कण्ठे स्वयं कुरु ॥९१॥ इति नन्दावचः श्रुत्वा सस्मिता सा स्मितानना । मुमोच मालिकां कण्ठे स्वकराभ्यां कुशस्य हि ९२॥ तदा निनेदुर्वाद्यानि तुष्टुवुर्वन्दिमागधाः । लज्जयाधोमुखो रेजे सभायां कुशवालकः ॥९३॥ तदा तुष्टो भूरिकीर्तिः कुशांके चम्पिकां शुभाम् । स्थापयामास वेगेन पश्यत्सु नृपतीषु च ॥९४॥


शक महाप्रभू है । ७८ ।। रावणको मारनेवाले सीताके साथ राज्य करनेवाले, तीर्थयात्राकर्त्ता एव सीताके साथ विहारकारी है । ७९ । इन्होंने सीताका त्याग किया और फिर वापस बुला लिया । इन्होंने अपना यज्ञ पूर्ण करनेके लिए अपने बेटो लव कुशके साथ भी युद्ध किया था ॥ ८० ॥ ये एकपत्नीव्रती, शान्त, सत्यवादी, एक बाण तथा असंख्यनामधारी है। ये कोविदारध्वज, वानरध्वज, वज्रध्वज तथा गरुडध्वज हैं। पुष्पक, गरुड़ तथा हनुमान्जी इनके वाहन है। ८१ ।। ८२ ।। ये बहुतस राजाओके मुकुटमणि है ओर मोतियोंके प्रकाशसे इनका चरण सुशोभित रहता है। ये एक अच्छे सिंहासनपर बैठे है और उनपर सुन्दर छत्र चमर शोभित रहता है ।।८३।। हे चम्पिके ! तू इन्हें वर ले ओर सीताके साथ रहती हुई इनकी सेवा कर । ये सबो खण्डा एवं सातूं द्वीपोंके अधिपति हैं ॥ ८४ ॥ ये किसी अन्य स्त्रीविषयक बातोको बाणकी नाईं समझते हैं। अब तू किसी प्रकारका सोच-विचार न करके यह नवरत्नोंकी माला इनके गलेमें डाल दे ।८५ । इस प्रकार नन्दाके समझाने-पर भी भाग्यवश तथा सीताका स्मरण करके राम था उसे पसन्द नहीं आया । ८६ । दूसरे नन्दाने भी अपने वर्णनमें कहा था कि एकपत्नीव्रता है, इसलिए सीतया अर्थात् सीताके साथ रहना पसन्द न कर ।॥८७॥ तत्पश्चात् चम्पिकाके सङ्केतसे नन्दा उसे कुशके सामने ले गयो और इस तरह कुशका भी वर्णन करती हुई कहने लगी-॥ ८८ ॥ इनको देखो, इनका अभी थोड़ी उमर है। ये रामके तनय तथा सीताके पुत्र हैं। इनका नाम कुश है। ये लवके बड़े भाई हैं। अभी इनका विवाह नहीं हुआ है। इसलिए ये भार्यार्थी हैं, ये धनुर्वेदमे निपुण, विनीत स्वभाव पिताके साथ सङ्ग्राम करनेवाले और महामुनि वाल्मीकिके शिष्य हैं ।। ८९ ।। ९० ।। अतएव मनुष्यों और देवताओंस सन्न इन कुशको पसन्द करके तू इनके कंठमे यह नवरत्नमयी माला डाल दे । ९१ । इस प्रकार नन्दाकी बात सुनकर दी हँसकर उसने अपने हाथोंसे कुशके गलेम वरमाला डाल दी ॥ ९२ । उस समय विविध प्रकारके बाज बज उठे और बन्दीजन तथा भाट ने स्तुति की । उस सभामे लज्जासे नीचा मुख किये बैठा हुआ बालककुश ही सुन्दर लग रहा था ॥ ९३ ॥ उस समय प्रसन्न होकर राजा भूरिकीर्तिने सब राजाओके सामने ही चम्पिकाको कुशकी गोदमें बिठा

सर्गः ३] विवाहकाण्डम् [३५५]


वरार्थं जालश्रेन् प्रसार्यैषा विदेहजा मुमोद नितरां स्त्रीभिर्मुमोद राघवोऽपि सः । ९५। इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे चम्पिकास्वयंवरो नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥


तृतीयः सर्गः

(द्वितीय राजकन्या सुमतिके स्वयंवरका वर्णन)

श्रीरामदास उवाच

अथार्या सा समादाय सुमतिं भोजगामिनीम् । नृपर्नीत्या नदिग्भागात्सुनन्दा धृतयष्टिका ॥ १ ॥
क्रमेण वर्णयामास द्विपकक्षास्थां सुलोचनाम् । बाले शृणुष्व मे वाक्यं दर्शयन्ती नृपोत्तमम् ॥ २ ॥
अवन्तिस्थं चोद्बाहुनामानं च मनोरमम् । नानेन सदृशः कश्चित्पृथिव्यां वर्तते नृपः ॥ ३ ॥
वरयैनं नृपं माऽग्रे गच्छ त्वं गजगामिनि । अस्य त्वं महिषी भूत्वा क्षिप्रातीरेऽथ संकटे ॥ ४ ॥
दत्तमेधमभिधानेन मृगं क्रीडय भामिनि । अनुत्तमं चेति वाक्यं दृष्ट्वा सा सुमतिः पुरा ॥ ५ ॥
श्रुत्वा मैनं वरयेति सुनदाया वचः पुनः । श्रुत्वा नां संदधौमाम् मा वा नोत्वा नृपान्तरम् ॥ ६ ॥
सुनन्दा सुमतिं प्राह पश्यैनं त्वं नृपं परम् । अंगनावल्लभं श्रेष्ठं विदर्भनिलयान्वितम् ॥ ७ ॥
दूरूढवयसं मा बाले दुर्बलं त्वं नृपोत्तमम् । ह्यद्यापि स्वल्पवयसं भुजकेशरिमण्डितम् ॥ ८ ॥
अस्य त्वं महिषी भूत्वा पयोष्णीजलराशिषु । सुखं कुरु जनक्रीडां नृपेणानेन भामिनि ॥ ९ ॥
एन दुर्गुन्ध मा चेति शृण्वन्त्या सुलोचना । अग्रे गन्तुं सुनन्दां सा नोदयामास सञ्ज्ञया ॥१०॥
ततोऽग्रे नृपतिं नीत्वा सुनन्दा वाक्यमब्रवीत् । पश्यैनं नृपतिं बाले देशे मागधसंज्ञके ॥११॥
राज्यं करोत्ययं श्रीमानात्मना ख्यात परः । वरयैनं नृपं माऽग्रे गच्छ त्वं पार्थिवोत्तमम् ॥१२॥
अस्य त्वं महिषी भूत्वा गङ्गासङ्गमवारिदे । कनकौघं सदा क्रीडां हेमन्ते भज भामिनि ॥१३॥


दिया ॥ ९४ ॥ अगरारु राजाने मन में यह सङ्कल्प कर लिया था, बहुत प्रसन्न हुए और रामचन्द्रजी भी अत्यन्त प्रसन्न हुए । ९५ ॥ इति श्रीमच्छतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे पं० रामतेज-पाण्डेयविरचित 'सरल' भाषानुवादसहितो द्वितीयः सर्गः समाप्तः ॥ २ ॥

श्रीरामदास बोले—तदनन्तर सुनन्दा हाथमें छड़ी लिये हुए सुमतिका हाथ पकड़े राजाओंके सामने ले जाकर ईशान कोणसे क्रमशः एक-एक राजाको दिखाकर इस प्रकार वर्णन करती हुई बोली—हे बाले ! मेरी बात सुनो, राजाओमें श्रेष्ठ इस राजाको देखो ॥ १ ॥ २ ॥ यह अवन्ति देशका रहनेवाला है। उद्बाहु इसका नाम है । पृथ्वीमण्डलपर इसके समान कोई राजा नहीं है । हे गजगामिनि ! तू आगे मत बढ़ इनको वर ले। इसकी रानी बनकर तू क्षिप्रा नदीके तटपर बने हुए बागमें आनन्दपूर्वक विहार करोगी । सुनन्दाने "अनुत्तमम्" तथा "एनं मा वरय" इन दो वाक्योंका दो अर्थमें प्रयोग किया था । उसका एकसे प्रशंसा और दूसरेसे निन्दा होती थी। इस कारण सुमतिको वह राजा पसन्द नहीं आया और उसने आगे बढ़नेका संकेत किया ॥ ४-६ ॥ सुनन्दा उसे दूसरे राजाके सम्मुख लाकर कहने लगी—यह विदर्भ देशका निवासी अनुत्थ नामक राजा है ॥ ७ ॥ तू इसे मत छोड़ । इसीको अपना पति बना ले, यह इसक इनका रचता है। इसकी थोड़ी उमर है और बाहुओंमें विपुल बल हुआ है ॥ ८ ॥ पयोष्णी नदीके तटपर इसके साथ सानन्द जलविहार कर ॥ ९ ॥ यहाँ भी बात्रीके 'एनं मा दुर्गुन्ध (इस मत कर )' यह वाक्य सुनकर उसने आगे बढनेका संकेत दिया ॥ १० ॥ तदनन्तर सुनन्दा उसे दूसरे राजाके सामने ले जाकर बोली हे बाले इस राजाको देख, यह कुरुपति मगध देशमें राज्य करता है। यह बड़ा श्रीमान् है। इसे लोग परन्तप कहते हैं। बस, तू इसी श्रेष्ठ राजाको अपना पति बना ले—और किसीके पास मत जा ॥ ११ ॥ १२ ॥ इसको अपना पति बनाकर गङ्गाके दिनोंमें तू सदा अट्टालिकाओंके सामने उसके क्रीड़ा किया करेगी।

२५६आनन्दरामायणे[सर्गः ३

मौनं नृपं वरयति शिक्षिता सा सुनन्दया । सोऽग्रमायेति वृद्धां मां वाग्मिन्निन्द्ये नृपांतरम् ॥ १४ ॥ सुनंदा बालिकामह शृणुष्व मृगलोचने । पश्यैनं नृपतिं रम्यं द्राविडे विषये स्थितम् ॥ १५ ॥ कम्बुकंठाख्य मेनं शान्तिपूर्णां निवासिनम् । एनं नृपं गुणाढ्याद्य मा व्रजान्य दर्शनम् ॥ १६ ॥ कान्तिपूर्णोपवनं त्वं सर्वतीर्थमनोमे । क्रीडां मजस्व विस्तीर्णे हेमकङ्कणशिञ्जिते ॥ १७ ॥ विष्णुं वरदराजाख्यं त्रियत्रेकाम्बराख्यकम् । पूजयस्व मदाज्ञेव कम्बुग्रीवन्मृदेश्वरम् ॥ १८ ॥ कुर्गाच्चैनं नृपं माद्य माहात्म्यनृपसत्तमजः । इति वृद्धावचः श्रुत्वाऽग्रे तां गन्तुं प्रबोदयत् ॥ १९ ॥ सुनंदाऽन्यं नृपं नीत्वा सुमतिं वाक्यमब्रवीत् । पश्यैनं नृपतिं मुख्ये मत्तमातङ्गगामिनि । २० ॥ कर्णाटविषयस्थं म्व विजये पार्थिवात्मजम् । कमलस्य सङ्ग्रहस्तं कमलोद्भिगमूज्ज्वलम् ॥ २१ ॥ स्मितास्यं कञ्जनयनं विजयाख्यपुरस्थितम् । शृणुष्व वचनं मेऽद्य पूर्णायैनं सुरीजनम् ॥ २२ ॥ अस्य त्वं महिषी भूत्वा वने कृष्णादीजले । मुग्य नृपेण क्रीडस्व मद्वाक्यं शृणु मा व्रज । २३ ॥ मद्वाक्यं शृणु मेत्युक्ता श्रुत्वा वाक्यमनुत्तमम् । अग्रेति सूचिता बाला चोदयामास तां पुनः ॥ २४ ॥ एवं नानारूपाणां च वर्णनानि पृथक् पृथक् । स्तुतिरूपनिषेधौनि श्रुत्वा द्व्यर्थानि बालिका ॥ २५ ॥ न वरम् मनः कस्मिश्चिन्नृपौ तेषु सा तदा । ततस्तां शिविकामस्थां सुनंदा च शनैः क्रमात् ॥ २६ ॥ अतिक्रम्य राममंत्रिबालकानपि पूर्ववत् । यूपकेतुं शिशुं नीत्वा बालिको वाक्यमब्रवीत् ॥ २७ ॥ शत्रुघ्नतनयं बालं यूपकेतुं मनोहरम् । पितृव्यं राममनुसद्व्याख्यानुवर्तिनम् । २८ ॥ एनं पश्य बालिके त्वं सावधानमना भव । वरयैनं यूपकेतुं माऽग्रे गच्छ नृपात्मजे ॥ २९ ॥ मैनं वरय गच्छाग्रे वृद्धया हेति चोदिता । सुनन्दा वाद्यमानाग्रे गन्तु सुमतिः पुनः ॥ ३० ॥ सुबाहुं पुष्करं तद्वन्मेवं सा सुमतिः शनैः । चित्रकेतुप्रभृतं च त्यक्त्वा सा तु लवे ययौ ॥ ३१ ॥

॥ १३ ॥ यहाँ तो सुनन्दान "एते नृपा मा वरय (इस राजा को मत वर,' यह द्व्यर्थक वाक्य कहा था जिससे सुमतिने आगे चलनेका संकेत दिया। तब वह उसे दूसरे राजाके सम्मुख ले गयी ॥ १४ ॥ और कहने लगी—हे मृगलोचनी ! इस सुन्दर राजा को देख, यह द्रविड देशका निवासी है ॥ १५ ॥ इसका कम्बुकंठ नाम है। वह शान्तिपुरका रहने वाला है। तू इस सब गुणवान् राजाको वरनेकी इच्छा मत कर ॥ १६ ॥ कान्तिपुरीमें तू अतिशय विशाल सुवर्णकमलोंसे युक्त मनोहर सर्वतीर्थम इसके साथ आनन्द विहार करेगी और इसके साथ वरदराज नामक विष्णु भगवान् तथा त्रियंत्रेकाम्बर नामक शिवका पूजन करेगी। साधारण राजाओंकी तरह इसे भी न छोड़, इसको वर ले। इस प्रकार वृद्धा सुनन्दाकी बात सुनकर सुमतिने उसे आगे चलनेका संकेत किया ॥ १७-१९ ॥ तब सुनन्दा उस दूसरे राजाके पास ले जाकर कहने लगी—हे मुख्ये ! हे मत्तमातङ्गगामिनि ! तू इस राजा को देख ॥ २० ॥ यह कर्णाटक देशका रहनेवाला विजय नामक राजा है। कमलके समान इसका मुख है और कमलके ही समान इसके हाथ-पैर भी हैं ॥ २१ ॥ इसका मुख सदा मुस्कुराता रहता है। कमलोकी कलियोसी नन्हीं इसकी आँखें हैं। यह विजयपुरका निवासी है। तू मेरा बात मानकर इसे अपना पति बना ले ॥ २२ ॥ इसकी राजमहिषी बनकर तू बना तथा कृष्णा नदीके जलमे सानन्द विहार करेगी। मेरी बात मानकर तू और आगे मत बढ़ ॥ २३ ॥ "मद्वाक्यं मा शृणु (मेरी बात सुन)' यह बात सुनकर उसने सुनन्दाको आगे चलनेका सङ्केत किया ॥ २४ ॥ इस प्रकार अनेक राजाओंके वर्णन जो वास्तवमें निषेधमय थे, किन्तु ऊपरसे स्तुतिवाक्य मालूम पडते थे। ऐसे द्व्यर्थक वाक्योंको सुन-सुनकर बालिकान उन राजाओमें किसको भी नहीं पसन्द किया। तब सुनन्दा शिविकामें बैठी हुई सुमतिको लेकर धीरे-धीरे रामके मन्त्रिगणोको छोडकर यूपकेतुके सामने गयी ओर कहने लगी—। २५-२७ ॥ ये शत्रुघ्नके सुन्दर पुत्र यूपकेतु हैं। ये पितृव्य (ताऊ) रामके बताये हुए कुल वृत्तके अनुगामी हैं ॥ २८ ॥ हे बालिके ! तू अब अपना मन सावधान करके इन्हें देख । हे नृपात्मजे ! अब भाग न जाकर तू इन्हींको अपना पति बना ले ॥ २९ ॥ 'मा एनं वरय अग्रे गच्छ (इसे न वर, आगे चल)' यह सङ्केत पाकर सुमतिने

सर्गः ३ ] विवाहकाण्डम् ३५७

सर्गः ३ ] विवाहकाण्डम् ३५७

लवार्पणैषणां बालां सुनन्दा वाक्यमब्रवीत् । पश्यैनं बालिके बालं लवं श्रीराघवात्मजम् ॥३२॥ स्त्रीकामं स्वल्पवयसं सीतालालितमुत्तमम् । वाल्मीकिकृपया लब्धविद्यं रम्यं कुशानुजम् ॥३३॥ वृणोन्मेनं सुखेनैनं कण्ठेऽस्य मालिकां कुरु । कुशाङ्के चन्द्रिकेयं ते स्वसा यद्वत्स्थिताऽथ हि ॥३४॥ तथा त्वमपि भो मुग्धे लवाङ्के संस्थिता भव । इति तस्या वचः श्रुत्वा सुनन्दायाः स्मयानना ॥३५॥ लवस्य कण्ठे हर्षेण लज्जयाऽवनतानना । सुमतिर्निजहस्ताभ्यामर्पयामास मालिकाम् ॥३६॥ तदा निनेदुर्वाद्यानि जगुस्ते गायकास्तदा । ननृतुश्चाङ्गनाश्चैव तुष्टुवुर्बन्दिसङ्घाः ॥३७॥ भूरिकीर्तिर्नृपस्तुष्टो लवाङ्के सुमतिं तदा । शीघ्रं निवेशयामास परिपूर्णमनोरथः ॥३८॥ तोषमाप स्नुषादृष्ट्वा सीता प्रासादसंस्थिता । जानक्यैः सपत्नीकं लवं दृष्ट्वा तुतोष सा ॥३९॥ ततः सर्वान्नृपान् पूज्य भूरिकीर्तिर्नृपोत्तमः । प्रार्थयामास विनयवचनैस्तत्पुरस्तः स्थितः ॥४०॥ विवाहकौतुकं दृष्ट्वा भवद्भिर्गम्यतामिति । तथेति ते नृपा प्रोचुर्ययुश्चावसथानि हि ॥४१॥ रामेण सङ्गरं कर्तुमसमर्था गतश्रियः । म्लानानना मनोन्मोहाः कामबाणप्रपीडिताः ॥४२॥ रामोऽपि बन्धुमित्रैर्ययौ वासस्थलं मुदा । अथापरे दिने रामं भूरिकीर्तिः समाययौ ॥४३॥ पुरोधसोपविष्टः सन्नत्वा रामं वचोऽब्रवीत् । द्रष्टव्यो लग्नदानाय सुमुहूर्तः सुखावहः ॥४४॥ प्रार्थनां कुरु रामाद्य भक्तदास्यैककामुकम् । उभयोश्च मण्डपयोः कार्याण्याज्ञापय प्रभो ॥४५॥ तथेति राघवश्चोक्त्वा वसिष्ठं चोदयत्तदा । सोऽपि गणयित्वा ज्योतिषशास्त्रज्ञैः परिवेष्टितः ॥४६॥ मुहूर्तं कथयामास पञ्चमेऽहनि राघवम् । ततस्तुष्टो भूरिकीर्तिर्गणेशं लग्नपत्रिकाम् ॥४७॥

सुनन्दाको आगे चलनेका सङ्केत किया ॥ ३० ॥ इसी प्रकार सुबाहु, पुष्कर, तदा, चित्रकेतु तथा अंगदको छांड़ती हुई वह लवके पास पहुंची ॥ ३१ ॥ जब सुमति लवकी ओर देखने लगी तब सुनन्दा बोली- हे बाले ! इस बालकको देख यह रामका पुत्र है, यह अपना विवाह करना चाहता है इसकी थोड़ी उमर है । सीताके द्वारा इसका पालन-पोषण हुआ है, वाल्मीकि कृपासे इसे उत्तम विद्या प्राप्त हुई है और यह कुशका छोटा भाई है ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ तू सानन्द इसे अपना पति बनाकर इसके गलेमें वरमाला डाल दे, जिस तरह तुम्हारी बहिन चन्द्रिका कुशकी गोदमें बैठी है उस तरह या मुग्धे ! तू भी लवकी गोदमे बैठ जा । इस प्रकार सुनन्दाकी बात सुनकर वह मुस्कायी और लज्जावश मस्तक झुकाकर उसने अपने हाथोंसे लवके गलेमे वरमाला डाल दी । ३४-३६ ॥ उस समय अनेक प्रकारके बाजे बजे, गायकोंने गाने गाये, वेश्यायें नाचने लगीं और बंदीजन स्तुति करने लगे ॥ ३७ ॥ महाराज भूरिकीर्तिने प्रसन्न होकर सुमतिको लवकी गोदमें बिठा दिया ॥ ३८ ॥ यह देखकर रामचन्द्रजी तथा अटारीपर बैठी सीता दोनों प्रसन्न हुए । जब झरोखोंसे सीताने लवकी गोदमें सुमतिका बैठा देखा, तब उनकी प्रसन्नताका ठिकाना नहीं रहा ॥ ३९ ॥ इसके अनन्तर राजा भूरिकीर्तिने वहाँ आये हुए सब राजाओंका पूजा करके विनयपूर्वक प्रार्थना की-॥ ४० ॥ अब आप लोग विवाहका भी उत्सव देखकर जाइगा। राजाओंने भी उनकी बात स्वीकार कर ली और अपने-अपने डेरेपर चले गये ॥ ४१ । वे सब राज रामसे युद्ध करनेमे असमर्थ थे । अतएव उनकी श्री नष्ट हो गयी थी, दुख दुस्सह होगया था उत्साह भंग हो गया था और कन्दर्प कामके बाणोंसे पीड़ित हो रहे थे ॥ ४२ ॥ राम भी अपने भाइयों और बान्धवोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक डेरेपर गये । इसके बाद दूसरे दिन राजा भूरिकीर्ति रामके पास पहुंचे ॥ ४३ ॥ पुरोहित उनके साथ था। वे रामके समक्ष बैठे और कहा कि कोई अच्छा लग्न- दिवस तथा सुखदायक मुहूर्त विचारिए । फिर कहा- हे राम ! अपने चरणके भक्त मुझ दासकी प्रार्थनाको अङ्गीकार करके दोनों मण्डपोंके लिए जो कार्य करने हैं, उनके लिए आज्ञा दीजिए ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ 'अच्छा' कहकर रामने वसिष्ठकी ओर संकेत किया । वसिष्ठ रामका आज्ञासे ज्योतिषशास्त्रको जाननेवाले कितने ही पण्डितोंके साथ विचार करके उनके पांचवें दिन विवाहका शुभ मुहूर्त बतलाया । इसके अनन्तर प्रसन्न मनसे भूरिकीर्तिने गणेशजी, लग्नपत्रिका, गणकों, पण्डितों, वैदिक आदिको तथा रामके साथवाले बंधुजनों और