भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः १ ] जन्मकाण्डम् ३३९

ततस्ता दुद्रुवुः सर्वाः सर्वैर्भिलाषिता नृपाः । व्यजनेनैर्विजयामासुः स्वं स्वं कांतं सुलज्जिताः ॥६७॥ एवं नानाकोतुकारि भोजनायनकर्मसु । कारयामास वैदेह्या बंध्वादीनां रघूत्तमः ॥६८॥ अथ रामो वसिष्ठं च एकदा वाक्यमब्रवीत् । कुशस्याथ लवस्यापि व्रतबन्धो विधीयताम् ॥६९॥ तथेति गुरुणा प्रोक्तस्ततो रामः शुभे दिने । गणकान् स समाहूय मंत्रयामास सादरम् ॥७०॥ कुशाय पंचमं वर्षं किञ्चिन्न्यूनं लवाय च । ज्ञात्वा ते गणकाः सर्वे गुरुशुक्रादिकं बलम् ॥७१॥ दृष्ट्वा पंचांगपट्टेषु राघवं वाक्यमब्रुवन् । ब्राह्मणस्याष्टमे प्रोक्तो द्वादशे क्षत्रियस्य च ॥७२॥ वैश्यस्य षोडशे वर्षे व्रतबंधो मुनीश्वरैः । जन्मात् षष्ठे तथा गर्भात्सप्तमेऽब्दे नृपस्य च ॥७३॥ व्रतबंधो विधातव्यो यन्मनश्च यथाविधिः । ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यों विप्रस्य पंचमे ॥७४॥ राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्यार्थार्थिनोऽष्टमे । विद्वद्भिचोपनयनमेव शास्त्रेषु निर्णयः ॥७५॥ अतो गर्भाच्च षष्ठेऽब्दे पुत्रयोर्धर्म रन्दन । मुखं कुरुपनयनं मुहूर्त्तं शृणु सादरम् ॥७६॥ अद्यप्रभृत्य पंचदशदिने दर्श कुशाय ह । पश्चात्परेण च श्रुत्वा मुहूर्त रघुनंदनः ॥७७॥ गणकान् धनवस्त्राद्यैः पूज्य लक्ष्मणमब्रवीत् । आकारणीया राजानः सुहृदश्च मुनीश्वराः ॥७८॥ सांतःपुराः सर्वराज्ञः स्वस्वजानपदैः सह । शृङ्गारणीयोऽयोध्याथ वसिष्ठैः सह सादरम् ॥७९॥ शोधनीयास्तथा मार्गाश्चमूहैषु सुधाः शुभाः । दृश्या चित्राणि लेख्यानि प्रासादेषु समंततः । ८०॥ देवालयेषु सर्वेषु सुधा देया मनोरमा । लेखनीयानि चित्राणि स्थाप्यतां दल्पयः पृथक् ॥८१॥ बन्धनीयाः पताकाश्च रोषणीया ध्वजा अपि । मयतश्चस्तोरणानि बंधनीयानि लक्ष्मण । ८२॥


सीताने कहा-अब उर्मिला, श्रुतकीर्ति तथा माण्डवी अपने-अपने पतियोंको पंखा झलें ॥ ६६ । इस बातको सुनकर वे स्त्रियाँ लज्जाके मारे वहाँसे भागने लगीं । किन्तु सखियां रोककर उन्हें पकड़ लायीं और अन्तमें उन्हें रामके आज्ञानुसार अपने-अपने पति ऊपर पंखे झलने पड़े ॥ ६७ ॥ इस तरह भोजन, आचमन तथा शयनके समय रामचन्द्रजी सीता तथा भ्राताओंके साथ विविध प्रकारके कौतुक किया करते थे । ६८ ॥ कुछ दिन बीतनेपर एक दिन वसिष्ठसे रामने कहा-अब कुश और लवका व्रतबन्ध (यज्ञोपवीत-संस्कार) कर डालना चाहिए ॥ ६९ ॥ वसिष्ठने कहा-अच्छी बात है । एक पवित्र दिवसको रामने बहुतसे ज्योतिर्विदोंको बुलाकर सलाह की ॥ ७० ॥ जब ज्योतिर्विदोंको यह बात मालूम हुई कि कुशका पाँचवां वर्ष चल रहा है और लवका कुछ कम है । तब उन्होंने गुरु शुक्रादिका बलाबल देखा ॥ ७१ ॥ पंचांगमें सब देख-सुनकर उन्होंने रामसे कहा-ब्राह्मणका उपनयन आठवें वर्षमें, क्षत्रियका बारहवें वर्षमें और वैश्यका सोलहवें वर्षमें यज्ञोपवीत-संस्कार होना चाहिए । यह बड़े-बड़े ऋषियोंने कहा है । अपना वर्चस्व बढ़ानेकी इच्छा रखनेवाले विप्र-को गर्भसे पाँचवें वर्षमें, बलवृद्धिकी कामनावाले राजाको छठे वर्षमें एवं धनवृद्धिकी इच्छा रखनेवाले वैश्यको आठवें वर्षमें ही उपनयन-संस्कार करना उचित है । यह शास्त्रोंका निर्णय है ॥ ७२-७५ ॥ अतएव हे रघुनन्दन ! आपके बच्चोंका गर्भसे लेकर यह छठां वर्ष चल रहा है । इसलिए इस समय इनका व्रतबन्ध करना अतिशय श्रेयस्कर है । अब बच्चोंके व्रतबन्धके लिए सुन्दर मुहूर्त बतलाता हूँ, सो सुनिए ॥ ७६ ॥ आजसे पन्द्रहवें दिन कुशके यज्ञोपवीतका पवित्र मुहूर्त मिलता है । इस प्रकार एक पक्षके बाद यज्ञोपवीतका मुहूर्त सुनकर राम-चन्द्रजीने अनेक प्रकारके धन-वस्त्रसे उन गणकोंकी पूजा की और लक्ष्मणसे कहा कि समस्त राजाओं, मित्रों तथा मुनियोंके पास निमन्त्रण भेजकर कहला दो कि सब लोग अपनी स्त्रियों, पुरवासियों तथा देशवासियोंके साथ इस उपनयनसंस्कार के उत्सवमें मेरे यहाँ पधारें । इस अयोध्या नगरीको अच्छी तरह सजवाओ । इसके आस-पासकी गलियोंको साफ करवा दो ॥ ७७-७९ ॥ महलोंको चूनेसे पुतवा दो । कटहरियों और दीवारोंपर नाना प्रकारके चित्र बनवाओ । अयोध्याके समस्त देवालयोंको चूनेसे पुतवाकर उनमें नाना प्रकारकी चित्रकारियां करवाओ और तरह-तरहके पूजनका प्रबन्ध कर दो ॥ ८० ॥ ८१ ॥ चारों ओर पताका