श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 409, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः २ ] गद्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९३
संदेहोऽनेन मे जातः स्तन्वङ्गः कथं भुवि । अयोध्यायां रामगेहे स्वर्गलोकान्समागतः ॥ २ ॥
प्रभो मे संशयं छिन्धि कृपां कृत्वा ममोपरि ।
सम्यक् पृष्टं विष्णुदास सावधानमनाः शृणु ॥ ३ ॥
एकदा राघवं द्रष्टुं दुर्वासा मुनिरभ्यगात् । शिष्यैः परिवृतस्तैश्च वेष्टितोऽचिन्तयत्पथि ॥ ४ ॥
विष्णुर्मनुजरूपेण रामो जातोऽत्र संशयम् । तथापि लोकान् रामस्य दर्शयिष्यामि पौरुषम् ॥ ५ ॥
एवं निश्चित्य साकेते मुनिः शिष्यैर्विबेश ह । विसृज्य सोऽष्टकक्षांस्तैः सीतागेहं ययौ मुनिः ॥ ६ ॥
सीतागेहे महत्द्वारप्रसंस्थितं मुनिपुङ्गवम् । दुर्वाससं शिष्ययुक्तं दृष्ट्वा वै वेत्रपाणयः ॥ ७ ॥
शीघ्रं निवेदयामासुर्दुर्व्यासां रामं रहः स्थितम् । रामोऽपि श्रुत्वा संप्राप्तं मुनिं प्रत्युज्जगाम सः ॥ ८ ॥
नत्वा चानाययामास सय ह्यासनमर्पयत् । एतस्मिन्नन्तरे रामं तिष्ठन्तं मुनिसत्तमः ॥ ९ ॥
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं शिष्यैः सर्वत्र वेष्टितः । अद्य वर्षसहस्राणामुपवाससमापनम् ॥ १०॥
अतो भोजनमिच्छामि हविष्यान्नलहैर्विना सिद्धमन्नं मुहूर्तेन सशिष्याय समर्पय ॥११॥
मम मनोरभिलषितं नानापक्वान्नसंयुतम् । तथा शंकूरुजनार्थे हि शम्भोः पुष्पाणि मे नरैः ॥१२॥
अदृष्टान्यन्यवस्त्राद्य गाहंश्चयं चेत्प्रयच्छसि । नोचेन्नाहं समर्थोऽस्मीत्युक्त्वा मां त्वं विसर्जये ॥१३॥
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा विहस्य रघुनन्दनः । सर्वमङ्गीकृतं चेति विनयेनाब्रवीन्मुनिम् ॥१४॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा तुष्टोऽभून् मुनिपुङ्गवात् । स्नात्वा सरय्वां शीघ्रन्याम गच्छामि त्वरं कुरु ॥१५॥
मदुक्तं सफलं कर्तुं सिद्धं कार्यश्च जानकी । तथेत्युक्त्वा भुवि रामः स्नानाथं तं व्यसर्जयत् ॥१६॥
तदा ते लक्ष्मणाद्याश्च बंधवो जानकी तथा । कुश या बालकाः सर्वे तेऽभूवन् भयविह्वलाः ॥१७॥
स्पर्शनामित धोयोपर बैठे हुए अनशनका व्यान करें ॥ १ ॥ सो सुनकर मुझे यह संदेह हो रहा है कि कल्प-वृक्ष स्वर्गलोकसे रामचन्द्रजीके भवनमें कैसे आया। मुझपर कृपा करके आप इस संशयका निवारण कीजिये। श्रीशेषदासजीने कहा—हे विष्णुदास तुमने बहुत अच्छी बात पूछा है। सावधान होकर सुनो ॥ २॥ ३॥ एक बार रामचन्द्रजीका दर्शन करनेके लिये सहस्र हजार शिष्योंस परिवेष्टित दुर्वासा मुनि अयोध्याको जा रहे थे। रास्तेमं जात-जात दुर्वासान सब कि स्वयं विष्णुभगवान् मनुष्यका रूप धारण करके यतारण आये हैं यह मैं जानता हूँ। फिर भी आज मगरके साधारण मनुष्योंको मैं उनका पौरुष दिख-लाऊंगा ॥ ४ ॥ ५ ॥ ऐसा निश्चय करके व अपन शिष्याँके साथ अयोध्या नगरीमं प्रविष्ट हुए और सबकी सथ लिये हुए आठ चौक लांघकर सीताके भवनमे जा पहुंचे ॥ ६ ॥ सीताक विशाल द्वारपर शिष्यों समेत आये हुए दुर्वासा को देखकर दण्डायोंने तुरन्त रामचन्द्रजीको खबर दी। यह समाचार सुनते ही भगवान् दुर्वासा मुनिक पास आ पहुंचे। उन्हें प्रणाम किया और सबको बड़े आदर समेत भवनके भीतर ले गये। वहाँ बैठनेके लिये उन्हें सुन्दर आसन दिया। उससमय बैठे हुए दुर्वासानि बड़े मधुर वाणीमं रामचन्द्रजीसे कहा महाराज ! आज एक हजार वर्षका मेरा उपवासव्रत पूरा हुआ है। इस कारण मेरे शिष्योंके साथ मुझे भोजन चाहिए। इसके लिये आपको केवल एक मुहूर्तका समय मिलेगा और वह भोजन मणि, कामधेनु तथा अग्निकी सहा-यतासे न तैयार किया जाय। बस, एक मुहूर्तमें इस मग इच्छाके अनुकूल भोजन मिले, जिसमं विविध प्रकार-के पक्वान्न सम्मिलित हों। यदि इस बपना दुर्भास्कर बने रहना चाहते होगे तो शिवजीकी पूजाके निमित्त मुझे ऐसे फूल मँगवा दो, जिन्हें अबतक किसीने न देखा हो। यदि ऐसा न कर सकत हो तो साफ साफ कह दो कि मैं ऐसा काममें असमर्थ हूँ। यह कहकर मुझे विदा कर दो। ७-१३॥ मुनिकी बातोंको सुनकर मुसकाते हुए राम नम्रता पूर्वक बोले-"मुझे सब कुछ अंगीकार है" ॥ १४॥ रामकी बातस प्रसन्न होकर दुर्वासान कहा कि मैं शीघ्र सरयूम स्नान करके आता हूं ॥१५। हमारे कथनानुसार सब चीजोंकी तैयारीके लिए अपने भ्राताओं तथा सीताको भी शीघ्रताके लिए कह दया। 'अच्छा' कहकर रामचन्द्रजाने दुर्वासाको स्नान करनेके लिये