भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः २ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९५


अस्माकं कल्पितं किंचिदसमस्तमथवा न वा ।
चिंतायुक्तोऽस्ति वा तूष्णीं संस्थितोऽन्यच्च किं कृतम् ॥३६॥
बहिः संपादितं सर्वं मया यद्यन्न याचितम् । रहः स्थितः सुवैर्दृष्ट्वा शीघ्रं त्वं याहि मां पुनः ॥३७॥
इत्येवमुक्त्वा मुनिं शिष्यः स ययौ रामसद्गृहम्। तत्र दृष्ट्वा कल्पवृक्षपारिजातौ सनिर्जरौ । ३८।
सनिर्जरेशं रामं च मुदितं सीतयाऽन्वितम् । ततस्तूर्णं ययौ शिष्यः परावृत्य मुनिं प्रति ॥३९॥
कथयामास सकलं यदाश्चर्यं निरीक्षितम् । तच्छ्रुत्वा शिष्यवचनं दुर्वासा विस्मयान्वितः । ४०॥
ययौ शिष्यैः परिवृतो विवेश नृपतेर्गृहम् । तं मुनिं राघवो दृष्ट्वा प्रत्युद्गम्य पुनः सुरैः ॥४१॥
नमस्कृत्य मुहुर्वेगाद्ददावासनमुत्तमम् । ततो मुनेः पूजनं स सशिष्यस्य रघूत्तमः ॥४२॥
चकार सीतया सार्द्धं लक्ष्मणारिभिरन्वितः । पारिजातप्रसूनानि नेक्षितान्यत्र मानवैः ॥४३॥
ददौ शंभोः पूजनार्थं रामो दुर्वाससे तदा । तानि दृष्ट्वा मुनिस्तूर्णं वैष्णवेश्वरार्चनम् ॥४४॥
ततः सर्वान्मुरानाहूय परिवेषणकर्मणि । चोदयामास श्रीरामो जानकीं लक्ष्मणेन सः ॥४५॥
तत सा जानकी वेगाद्दिव्यालंकारमण्डिता । कल्पवृक्षपारिजातौ सम्पूज्य नूपुरस्वना ॥४६॥
पात्राणि कल्पवृक्षाधः स्थापयामास कोटिशः । सीता तं प्रार्थयामास कल्पवृक्षं नगोत्तमम् ॥४७॥
क्षीरसागर्सम्भूत देवानां विहितप्रद । दुर्वाससे कल्पवृक्ष सशिष्याय च तोषय ॥४८॥
तन्मतान्यन्नं भूत्वा हेमपात्राणि कोटिशः । विविधैः पूरयामास क्षणात्कल्पतरुस्तदा ॥४९॥
तैरन्नैर्हेमपात्रेषु जानकी परिवेषणम् । शुश्रूषूञ्चकार मुहुः सुर्मिलाचंपिकादिभिः ॥५०॥
ततस्तुष्टो मुनिश्रेष्ठः शिष्यैरशनमादरात् । चकार रघुप्रीरेण प्रार्थितः स मुहुर्मुहुः ॥५१॥
ततः कृत्वा भोजनं हि कराशुद्धिं विधाय सः । तांबूलं दक्षिणां चापि ज्याह रघुनायकात् । ५२।


आसनपर जा बैठे ॥ ३४ ॥ उधर उत्सुक चित्त से दुर्वासाने अपना एक शिष्य भेजा और उससे कहा- "तुम जाकर देखो कि, राम इस समय क्या कर रहे हैं ॥ ३५ ॥ मैंने जो जो बतलाया था, उसमें कुछ अन्न तैयार है या नहीं । अथवा अभी तक चिंतामग्न हुए यूं ही चुपचाप बैठे हैं, ३६ ॥ यदि मेरे आज्ञानुसार काम कर रहे हैं तो अबतक क्या-क्या किया है। मैंने जैसा कहा था, वे सब चीजें इन्होंने इकट्ठी कर लीं या नहीं। कहीं छिपकर चुपचाप वह सब देखो और शीघ्र मेरे पास लौट आओ" । ३७ । "अच्छा" कहकर शिष्य रामचन्द्रजीके भवनमें जा पहुंचा। वहां कल्पवृक्ष, परिजात, इन्द्र, देवताओंकी मण्डली एवं प्रसन्न राम तथा सीताको देखकर फिर दुर्वासा मुनिके पास लौट गया और जैसा देखा था, सब समाचार कह सुनाया। शिष्यकी बात सुनकर दुर्वासाको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ३८-४० ॥ इसके बाद शिष्योंको साथ लेकर वे रामचन्द्रजीके सुन्दर भवनमें पहुंचे । मुनि दुर्वासाको देख देवताओंके साथ उठकर रामचन्द्रजीने बड़े आदरके साथ समस्त शिष्यों समेत मुनिको प्रणाम किया और बैठनेके लिये उत्तम आसन देकर सीता तथा लक्ष्मणादिके साथ उनकी पूजा की। मत्र्यगण पारिजातके फूल नहीं देख पे ॥ ४१-४३ ॥ सो उन फूलोंको शिवपूजनके निमित्त मुनिके सामने रखा । दुर्वासाने उन्हें एक बार विस्मित नेत्रोंसे देखा और तुरताव शिव तथा सब देवताओंका पूजन किया ॥ ४४ ॥ इसके अनन्तर सम्यक्प्रकार से लक्ष्मण और जानकीको भोजन परोसनेकी आज्ञा दी ॥ ४५ ॥ तब दिव्यालंकारोंको धारण किये सीताने कल्पवृक्ष और पारिजातका पूजन करके करोड़ों बर्तन लाकर उनके नीचे रख दिया और इस प्रकार प्रार्थना करने लगी-॥ ४६ ४७ ॥ "हे क्षीरसागरसे जायमान तथा देवताओंकी अभिलाषा पूर्ण करनेवाले कल्पवृक्ष ! आज शिष्यो समेत दुर्वास को आप सन्तुष्ट कर दीजिए" । ४८ । सीताकी प्रार्थना सुनकर क्षणभरमें कल्पवृक्षने करोड़ों पात्रोंको विविध प्रकारका बाञ्छतान्नपियोंसे भर दिया । उन अन्नोंको उर्मिलादिके साथ सीताने सुवर्णके पात्रोंमें परोसा और महर्षि दुर्वासा ने प्रसन्न होकर अपने समस्त शिष्योंके साथ रामचन्द्रजीके द्वारा प्रार्थित होनेपर भोजन करना आरम्भ किया ॥ ४९-५१ ॥ भोजन करनेके बाद उन्होंने