भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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३९६आनन्दरामायणे[ सर्गः २

ततः सुराणां पुरतो वेदवाक्यैः सविस्तरम् । दुर्वासा राघवं स्तुत्वा तमाहाऽऽनन्दनिर्भरः ॥५३॥
राम राजीवपत्राक्ष त्वं साक्षाज्जगदीश्वरः । अत्र रावणनाशार्थमवतीर्णोऽसि भूतले ॥५४॥
जनांस्त्वत्पौरुषं ज्ञातुं मयैतद्याचितं तव । विना गोवृद्धिमणिभिर्द्विजान्ने रघुनन्दन ॥५५॥
प्रभूतान्यन्नपात्राणि सान्नैर्व्यजनैस्तले । किं राम दुर्घटं तत्र यस्य भूभङ्गमात्रतः ॥५६॥
लयो ब्रह्मादिदेवानां जायते सम्भवोऽपि च । मन्दरं मज्जमानं तु दृष्ट्वा त्वं क्षीरसागरे । ५७ ।
कूर्म्मरूपेण जातोऽसि धर्तुं तु मन्दराचलम् । निष्कासितानि रत्नानि तदा देवैश्चतुर्दश ॥५८॥
तत्र साहाय्यमात्रेण सर्वं जानन्त्यहं प्रभो । लक्ष्मीः सोमः कामधेनुः कौस्तुभश्च सुधा विषम् । ५९ ॥
ऐरावतश्चाप्सरसः कल्पवृक्षो भिषग्वरः । उच्चैःश्रवाः पारिजातो सुरा ज्येष्ठेति राघवः । ६० ॥
चतुर्दश सुरत्नानि विभक्तानि पुरा त्वया । देवेभ्यो यानि तान्येते भोक्ष्यन्ति कृपया तव ॥६१॥
त्वदाज्ञापालिनः सर्वे शङ्कराद्याश्च निर्जराः । सर्वेषां जीवनोपायस्त्वयैव सर्वं पृथक् पृथक् ॥६२॥
कल्पिता येन रामेण तत्र किं दुर्घटं तव । ममाभिलषितं भोज्यं दातुं त्वत्कौतुकं मया ॥६३॥
अद्यावलोकितं राम जनानाग्रे प्रदर्शितम् । त्वं पाता सर्वलोकानां जनकोऽपि पालकः ॥६४॥
अस्माकं मतिदानाञ्च ये क्षमस्वाऽपराधिनम् । एवं नानाविधं स्तुत्वा तं प्रणम्य पुनः पुनः ॥६५॥
राममामन्त्र्य दुर्वासा ययौ शिष्यैः स्वाश्रमम् । अथ तान्निर्जरान् प्राह रामः कनकलोचनः ॥६६॥
कल्पवृक्षपारिजातौ गृहीत्वा सम्पदं दिवम् । तद्रामवचनं श्रुत्वा बृहस्पतिः प्राह राघवम् ॥६७॥
यावत्कालं निवासाऽत्र भूम्यां तावन्नयात्मनः । अयोध्यायां विमुक्तस्तौ कल्पवृक्षसुहृत्तमौ ॥६८॥
त्वाय वैकुण्ठमायाने दिवं तौ यास्यतो ध्रुवम् । तथेति तमुद्गुरुं प्रोतिनद वचः प्रभुः ॥६९॥


हाथ पाया और राक्षस ताम्बूल दीजियेगा ॥ ५३ ॥ फिर उन देवताओंके सामने ही वेदवाक्यों द्वारा विस्तारपूर्वक रामचन्द्रजीकी स्तुति की और अत्यन्त प्रसन्न होकर कहने लगे ॥ ५४ ॥ हे राम हे कमलदल सदृश नेत्रवाले भगवन् ! मैं जानता हूँ कि तुम साक्षात् जगदीश्वर हो और रावणका विनाश करनेके लिए इस धरातलपर आये हो ॥ ५५ ॥ केवल प्रजाको तुम्हारा पौरुष दिखलानेके लिए ही मैंने गौ-वृद्धि और मणिसे न सिद्ध हुआ अन्न तथा मनुष्योन् न्हीं अनेक प्रकारके विभिन्न भाँति भाँति हे राम ! तुम्हारे लिए यह कुछ दुर्घट कार्य नहीं है तुम्हारे भूभंग मात्र से ही ब्रह्मादिक देवताओंका संहार विनाश एवं उद्भव होता है। जिस समय मंदराचलका क्षीरसागरमें तुमने डूबते देखा ॥ ५५ । ५६ ॥ तब कूर्मरूप धरकर उसे अपनी पीठपर उठा लिया था । उस समय एकमात्र तुम्हारी सहायतासे ही देवताओंने क्षीरसागर से चौदह रत्न निकाले थे ॥ ५७ ॥ ५८ ॥ जिनके नाम हैं—लक्ष्मी, चन्द्रमा कामधेनु, कौस्तुभ, सुधा, विष, ऐरावत, अप्सराएँ, कल्पवृक्ष, धन्वन्तरि, उच्चैःश्रवा, पारिजात, सुरा और मद्य ॥ ५९ ॥ ६० ॥ उन चौदहो रत्नोंको तुमने चौदह देवताओंको बाँट दिया और तुम्हारी ही कृपासे वे सब आनन्दपूर्वक उनका उपभोग कर रहे हैं ॥ ६१ ॥ शंकरादिक समस्त देवता तुम्हारी ही आज्ञाका पालन करते हैं। इस जगत् में स्थित सब प्राणियोंका जीवनका उपाय तुम्हीं करते हो ॥ ६२ ॥ तब यदि तुमने हमारे इच्छानुसार भोजनकी सामग्रियें जुटा दीं तो इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। यह तो तुमने इन साधारण अज्ञानी मनुष्योंको तुम्हारा कौतुक दिखलाया था, सो दिखा दिया । ६३ ॥ हे राम ! तुम्हीं समस्त लोकोंके रक्षक, स्रष्टा तथा संहारक ज्ञापक हो ॥ ६४ ॥ तुम्हीं हमारे गतिदाता हो । मुझसे जो कुछ त्रुटि हुई हो सो क्षमा कर दो । इस तरह नाना प्रकारके वाक्यों द्वारा स्तुति करके दुर्वासाने बारम्बार प्रणाम किया और रामचन्द्रजीकी आज्ञा लेकर सब शिष्योंको साथ लिये हुए अपने आश्रमको चल दिये । इसके अनन्तर रामचन्द्रजीने उन देवताओंसे कहा—कल्पवृक्ष और पारिजातको लेकर अब आप लोग भी अपने लोकको चले जायें । इस प्रकार रामकी बात सुनकर देवगुरु बृहस्पति कहने लगे ॥ ६५-६७ ॥ "जबतक आप भूमण्डलमें रहेंगे, तबतक कल्पवृक्ष तथा पारिजात ये दोनों भी इस अयोध्यामें ही रहेंगे ॥ ६८ ॥ जब आप अपने वैकुण्ठ लोकको जाने लगेंगे, तब ये भी आपके साथ चले