भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ३ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९७


पुष्पके स्थापयामास कल्पवृक्षसुरद्रुमौ । ततस्ते राघवं नत्वा ययुरिन्द्रादिकाः सुराः ॥७०॥
स्वर्गलोकं सुसंतुष्टा राघवेणातिपूजिताः । एवं प्राप्तौ कल्पवृक्षपारिजातौ भुवं दिवः ॥७१॥
तयोरेतत्त्वकारणं ते प्रोक्तं पृष्टं यथा त्वया । तदारभ्य सुरतरू पुष्परथौ विरेजतुः ॥७२॥
साकेते सीतया रामस्ताभ्यां सुखमवाप सः । कल्पवृक्षतले दिव्यपर्यङ्के सीतया सह ॥७३॥
नानाभोगावाप्तचन्द्रः स बुभोज चिरं सुखम् । अतः पूर्वं मया रामध्यानं कल्पतरोः स्थले ॥७४॥
सहस्रनामसङ्केते प्रोक्तं शिष्य तवाग्रतः । तदारभ्य पारिजातवृक्षांशाः शतशो भुवि ॥७५॥
पारिजातनगा जाता वर्तन्तेऽद्यापि तेऽत्र हि । नानेन सदृशं पुष्प वर्तते रामतोषद्म् ॥७६॥
कल्पवृक्षांशरूपाश्च ज्ञातव्यास्तत्र मानवैः । अश्वत्थाः सेवनाद्यैश्च सर्ववाञ्छितदायकाः ॥७७॥
पुण्याधिक्येन सेवन्ते रोपेक्षन्ते शुभाश्रये । पापाधिक्येनापि सेवां नरा वाञ्छन्ति नो कलौ ॥७८॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे
चम्पिकास्वयंवरो नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥


तृतीयः सर्गः

( रामोपासक तथा कृष्णोपासक का परस्पर मधुर विवाद )

विष्णुदास उवाच

रामदास गुरो भूपां रामकृष्णौ परौ भुवि । मया दशावतारेषु ह्यवतारवुभौ पुरा ॥ १ ॥
तयोरपि च कः श्रेष्ठस्तन्मे वद ममाग्रतः । यं श्रुत्वा सर्वदा दस्य श्रोष्येऽहं चरितं शुभम् ॥ २ ॥

श्रीरामदास उवाच

सम्यक् पृष्टं विष्णुदास सावधानमनाः शृणु । रामावतारः श्रेष्ठोऽत्र विशेयः सर्वदा नरैः ॥ ३ ॥
अस्मिन्नर्थे पूर्ववृत्तां कथां शृणु मनोहराम् । द्विजाभ्यां वादरूपेण कीर्तितां पुण्यदायिकाम् ॥ ४ ॥


कार्यंत। रामने सुरगुरु बृहस्पतिकी बात स्वीकार कर ली ॥ ६९॥ देवताओने उन दोनोंको पुष्पक विमानमें रखकर भगवान्‌को प्रणाम किया और राम द्वारा पूजित होकर सब अपने अपने लोकको चल गये । ७० ॥ इस प्रकार कल्पवृक्ष और पारिजात स्वर्गसे मृत्युलोकमें आय , उनके आनेका जो कारण था, वह तुम्हारे प्रश्नानुसार मैंने कह सुनाया। तभीसे दोनों सुरतरु पुष्पकमे विराजमान रहे ॥ ७१ । ७२ ॥ अयोध्यामें सीताके साथ रामचन्द्रजी उन्हीं वृक्षोंके नीचे दिव्य पर्यङ्कपर कार विहार करत हुए विविध प्रकारके सुखोंको भोगते थे ॥ ७३ ॥ ७४ ॥ इसलिए मैंने रामसहस्रनामक कथन करत समय कल्पवृक्षके नीचे रामका ध्यान करनेको कहा था। तभीसे पारिजातके सैकड़ो अंश पृथ्वीतलमें उत्पन्न हुए और वे आज भी इस धरातलमे विद्यमान हैं। इसके समान रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेवाला कोई दूसरा फूल नहीं है ॥ ७५ ॥ ७६ ॥ कल्पवृक्षके अंशसे पीपल वृक्षकी भी उत्पत्ति हुई है उसकी आराधना करनेसे सब प्रकारका कामना पूर्ण होती है ॥ ७७ ॥ अन्य युगोंमें पुण्य अधिक था। इस कारण लोग पीपलके वृक्षकी आराधना करते थे। किन्तु कलियुगमे पापकी अधिकता होनेके कारण लोग उसका पूजन नहीं करना चाहत ७८ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचितायां 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासमन्विते राज्यकांडे पूर्वार्द्ध द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

विष्णुदासने कहा--हे गुरो ! भगवान्‌के दश अवतारोंम राम-कृष्ण दो अवतार श्रेष्ठ माने जाते हैं । यह मैंने बहुसे कई बार सुना है ॥ १ ॥ अब आप हमको यह बतलाइए कि इन दोनों अर्थात् राम और कृष्णमें कौन बड़ा है। जिसको आप श्रेष्ठ बतलायेंगे, मै सर्वदा उसीका चरित्र सुना करूँगा ॥ २ ॥ श्रीरामदासने कहा- हे विष्णुदास ! तुमने ठीक प्रश्न किया है सावधान मन होकर सुनो। इन दोनों अवतारोंमें मनुष्यको रामका अवतार ही श्रेष्ठ समझना चाहिए ॥ ३ ॥ इसके लिए एक मनोहर कथा आपसमें दो ब्राह्मणोंके