श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 414, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३९८ | आनन्दरामायण | [ सर्ग ३ |
|---|
अयोध्याविषये कश्चिद्विजो रामाह्वयस्त्वभूत् । द्वारकायां तथा विप्रः कृष्णाख्योऽभूत्परः सुधीः ॥ ५ ॥
भक्त्या संसक्तौ चोभौ सर्वदा रामकृष्णयोः । तावेकदा माधवमासे प्रयागे मिलितौ द्विजौ ॥ ६ ॥
उभौ स्नात्वा त्रिवेण्यां हि माधवं परिपूज्य च । कथां पौराणिकमुखाच्छ्रोतुं तत्पुरः स्थितौ ॥ ७ ॥
शुश्रुतुः कथास्तत्र प्रसङ्गाद्राघवस्य च । रामाख्यो रामभक्तःस श्रुत्वा राघवसत्कथाम् ॥ ८ ॥
तुष्टस्तं पूजयामास मुदा पौराणिकं तदा । कृष्णाख्यः क्रोधसंयुक्तस्तदा वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥
किं क्लेशिनोऽद्य रामस्य कथां श्रुत्वाऽतिहर्षितः ।
पूजितोऽपि वृथा व्यासस्त्वं मूढोऽसीति वेद्म्यहम् ॥ १० ॥
नान्यस्यैवं कस्यापि पावनं श्रुतिदोषहम् । यथा कृष्णस्य मे रम्यं नानाक्रोडापुरःसरम् ॥ ११ ॥
तत्कृष्णवचनं श्रुत्वा रामाख्यः प्राह सस्मितः ।
रामोपासक उवाच
रामः क्लेशी कथं प्रोक्तस्त्वया कृष्णः कथं सुखी ॥ १२ ॥
कथं कृष्णस्य ते रम्यं चरितं दुश्चिन्तापहम् । कथं रामस्य मे रम्यं चरितं नेरितं त्वया ॥ १३ ॥
वदाद्य विस्तरेणैव शृण्वन्त्वेते सभासदः ।
कृष्णोपासक उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया राम सावधानमनाः शृणु ॥ १४ ॥
वदामि राघवस्याथ कृष्णस्य चरितं महत् । क्लेशदं तोषदं नृणां शृण्वन्त्वेते सभासदः ॥ १५ ॥
तत्र रामस्य जन्मादौ जातः शापः पितुः पुरा । शापस्यादावपि पुरा तद्वेत्तो रावणेन हि ॥ १६ ॥
लंका वन्दितरौ नादौ प्रारम्भे दुःखमीदृशम् । मम कृष्णस्य जन्मादौ तद्विप्री-सौख्यदायकैः ॥ १७ ॥
विवाहमङ्गलैः कंसः पूजयामास सादरम् ।
विवादरूपां कही गयी थी। वह कथा परम पुण्यदायिता है, उस सुनो । १ एक समय अयोध्यामे राम नामका एक ब्राह्मण रहा करता था। उसी तरह द्वारकापुरीम कृष्ण नामका विद्वान् विप्र रहता था ॥ ५ ॥ वे दोनों सदा राम और कृष्णकी उपासना किया करते थे। एक समय माध म मेवे त्रिवेणी के तटपर उन दानोकी भेंट हुई ॥ ६ । उन्होंने त्रिवेणीम स्नान किया और वेणीमाधवकी पूजा करके दिशा करके एक पौराणिकके पास कथा सुननेकी इच्छासे जा बैठे ॥ ७ ॥ दानां कथा सुन रहे थे। उनम कही राघवका प्रसग आ गया। उसे सुनकर वह राम नामवाला ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ और हर्षपूर्वक पौराणिकका भली भांति पूजा की। इससे कृष्ण नामवाला ब्राह्मण मार क्रोधके लाल हो गया और कहने लगा उत्सुका कष्ट देनवाले रामकी कथा सुनने-से तुम्हें क्या लाभ हुआ, जो तुम इतने प्रसन्न हुए और तुमने व्यासकी ऐसी पूजा की ? मेरी समझम तो यही आता है कि तुम बडे मूर्ख हो ॥ ८-१० ॥ मुझे तो और किसोका चरित्र इतना सुन्दर नहीं लगता, जितना श्रीकृष्णका। क्योंकि उस चरित्रमें त्रिविध प्रकारकी लीलाएं भरी हुई हैं ॥ ११ । कृष्ण नामक ब्राह्मणकी यह बात सुनकर रामोपासक मुसकाता हुआ कहने लगा कि तुमने रामचन्द्रको कैसे दुःखी बतलाया और कृष्णको सुखी ॥ १२ ॥ तुमने कृष्णचरित्रको कैसे पापनाशक बतलाया और रामचन्द्रजीका नाम लेना भी पसन्द नहीं किया। तुम इसे विस्तारपूर्वक कहो । जिससे ये सभासद भी सुनें। कृष्णोपासकन कहा-हे राम ! तुमने बहुत ठीक प्रश्न किया है। अब सावधान होकर सुनो ॥ १३ ॥ १४ ॥ मै रामचन्द्र तथा कृष्णचन्द्र इन दानोका चरित्र सुनाता हूँ। उनम रामचरित्र कैसा क्लेशप्रद और कृष्णचरित्र कितना सुखकर है, सो सब सभासद सुनते जायें ॥ १५ ॥ तुम्हारे रामके जन्मके पहले ही उनके पिताको श्रवणके पिताका शाप मिल चुका था। उसके भी पहले उनके माता-पिताको रावण अपनी लंकामे उड़ा ले गया था। इस प्रकार रामके जन्मके पहले उनके माता-पिताको