भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ३] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ३०९


रामोपासक उवाच
रे रे शृणु त्वं दुर्बुद्धे न स शापो वरोऽर्पितः । १८॥
यत्प्रसादादपुत्रस्य नृपस्य तनयश्चतुः । तथा मद्रावमीत्या हौ नीतावपि विसर्जितौ ॥ १९॥
दशास्येन तत्पितरौ जन्मार्दो पौरुषं त्विदम् । तव कृष्णस्य जन्मादौ पित्रोः कारागृहस्थितिः ॥ २०॥
राजभोगनिषेधार्थं शापो यदुकुलाय च । जन्मापि बहिशालायां वियोगश्च तयोरपि ॥ २१॥
सहोदरवधश्चापि उद्वेगोर्मातुलेन हि । न बाहुजश्च वैश्यश्च यस्य तातावुभौ स्मृतौ ॥ २२॥
गोरक्षकस्य तनयः प्रवासः शैशवेऽपि च ।
परेण पोषितश्चापि कनीयान् बलभद्रतः । एव नानाविधं दुःखं तव कृष्णस्य नो सुखम् ॥ २३॥

कृष्णोपासक उवाच
आत्मार्थं तव रामेण त्राटिका स्त्री विदारिता । नार्थाद्विमोचितो बाणः पित्रोः खेदो वियोगतः ॥ २४॥

रामोपासक उवाच
द्विजघ्ना निहता दुष्टा मम रामेण ताटिका । मुनियज्ञरक्षणार्थं मुदा राज्ञाऽर्पितो शिशुः ॥ २५॥
तव कृष्णेन रक्षार्थमात्मनः पूतना हता । तथाऽऽत्मार्थं प्राणिहिंसा बहु तेन कृता ब्रजे ॥ २६॥
गोपैश्च सङ्गतिस्तस्य तथैव गोरक्षणम् । गोवधः सर्पघातश्च स्रगवाजिबधस्तथा ॥ २७॥
रासभवृषघातश्च चौर्यं द्यूतं वनेऽटनम् । कंबलाव्रणं शीतोपर्जन्योग्रप्रपीडनम् ॥ २८॥
क्षुत्तृड्भ्यां पीडनं नित्यं गोपालोच्छिष्टसेवनम् । आत्मार्थे याचितं चान्नं द्विजस्त्रीभ्यो वने मुहुः ॥ २९॥
इन्द्रध्वजपूजनं दिष्ट्वाचाप्रलोपनम् । परस्त्रीगमनं ज्येष्ठनारीभिः क्रीडनं चिरम् ॥ ३०॥


कितना क्लेश हुआ। इसके विपरीत हमारे कृष्णके जन्मके पहले कंसने उनके माता-पिताको वैवाहिक तथा मङ्गलमयी सामग्रियास पूजा की थी। रामोपासकने कहा— अरे दुर्बुद्धे ! वह रामचन्द्रके पिताको शाप नहीं, बल्कि वरदान मिला था। जिसके प्रभावस्वरूप निपुत्र महाराज दशरथके घरमें रामचन्द्रादि चार भाइयोका जन्म हुआ और हमारे मन्दराजके डरसे ही रावण उनके माता-पिताको ले जाकर भी अयोध्यामे लौटा गया था। १८-१९ ॥ जन्मके पहले ही मेरे रामचन्द्रजीमे इतना पौरुष था। तुम्हारे कृष्णके जन्मके प्रथम ही उनके माता-पिता कारागारमे बन्द थे। दूसरे यदुकुलको राजभोगनिषेधके निमित्त पहले ही शाप प्राप्त हो चुका था। उनका जन्म भी हुआ तो जेलखानेमे और वहा थोड़ी ही देरमे माता-पितासे वियोग हो गया। कृष्णके कितने ही सगे भाई मामाके द्वारा पहले ही मार डाले गये। उनको जो कृत्रिम माता-पिता मिले थे, वे न तो क्षत्रिय थे और न वैश्य ॥ २०-२२ ॥ तुम्हारे कृष्ण एक ग्वालेके लड़के बने। इस प्रकार वे शैशवावस्थामें ही प्रवासी हो गये। औरोन उनकी रक्षा की और तुम्हारे कृष्ण बलरामसे छोटे थे। इसीलिए कृष्णको अनेक प्रकार का दुःख मिला, सुख कुछ भी नहीं। २३ । कृष्णोपासक बोला—अपनी रक्षा करनेके लिए तुम्हारे रामने ताड़का नामवाली एक स्त्रीका वध किया और रामके वियोगसे उनके माता पिताको महान् क्लेश हुआ ॥ २४॥ रामोपासकने कहा— हमारे रामन ब्राह्मणांकी हत्या करनेवाली स्त्री ताड़काको मारा था और द्विज यज्ञरक्षाके लिए उन्हें पिता दशरथने प्रसन्नतापूर्वक मुनिके साथ भेजा था। २५। किन्तु तुम्हारे कृष्णने रक्षाके लिए पूतनाको मारा था। इसी प्रकार उन्होंने आत्मरक्षामे लिए ब्रजमे और भी बहुत सी प्राणिहिंसाएं की थीं ॥ २६॥ गोप-ग्वालोंका साथ था और वे गायोंकी ही रक्षा करते थे। उन्होंने गौ (धेनुकासुर) पक्षी (बकासुर) घोड़ा (केसी), रासभ तथा वृष आदिको मारा, चोरी की, जुआ खेले और वनोंमे इधर-उधर घूमत रहे। शीत वर्षा तथा आतपसे बचनेके लिए अपने ऊपर केवल एक कम्बल डाले रहते थे ॥ २७-२८ ॥ भूख-प्याससे दुखी होकर ग्वालोंका जूठन खाते थे अपने लिए उन्होंने वनमें ब्राह्मणोंकी स्त्रियोंसे बार-बार अन्न माँगा। २९ ॥ इन्द्रध्वज-पूजन आदि वृद्धोंकी कुलपरम्परासे चलनवाली प्रथाका उन्होंने लोप किया। वे परस्त्रियोंके साथ घूमते