श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 421, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ३ ] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) २७५
मृधेऽग्रेऽ कुरुक्षेत्रे शरेणापात्रताहितम् ॥८८॥
मे रामस्य वचश्चैकं सत्यमेव च नान्यथा । ते कृष्णस्य ह्यनेकानि वचनान्यमृषानि हि ॥८९॥
रामस्य ये शरास्त्वेकः शत्रुनिर्दलनक्षमः । विकलास्तव कृष्णस्य बहवोऽप्युशुरार्दभाः ९०॥
एका स्त्री मम रामस्य ते कृष्णस्य बह्वियः । वन्याऽप्यर्था विना नान्या दृष्टा रामस्य वै समम् ९१
स्त्रीणां वृन्दा विना रक्ष्याः स्त्रियः कृष्णस्य वै द्विज । रक्ताश्चितिमप्यद्यूतं प्राप्तेने मम्पुनटे ॥९२॥
अन्येतटे पश्चिमे वै स्थितिः कृष्णस्य वै तरे । भ्रातरो मे रामस्य कृष्णस्यैकं भ्रातृस्तथा ॥९३॥
गौर्मणिः पुष्पकं वृक्षौ कटके मुनिनाऽर्पिते । ऐरावतकुलोद्भूतः सुमुखेभो गजस्तथा ॥९४॥
एतानि मम रामस्य नव रत्नानि संति हि । मणित्वयं पारिजातस्त्वमेकं रत्नत्रयं तव ॥९५॥
कृष्णस्य मति भो विप्र त्वं मं स्तोषिकथं वृथा । सप्तद्वीपेश्वरो भव्यो मम पृथ्वीश्वराचिंतः ॥९६॥
ईशश्च जगदीशश्च सममेव द्वय म्मृतम् । त्वां न मम रामेण तुल्यं कृष्णं विचिन्तय ॥९७॥
यस्य चाप हि कोदण्डं यस्याभयप्रदः करः । विष्टरपूरणं यस्य व्रतं नित्यं द्विजोत्तम ॥९८॥
यस्य निरासनं छत्रं व्यजनं चामरद्वयम् । यस्य यानं पुष्पकं तत्सुतौ तौ पितुः समौ ॥९९॥
अद्यापि पान्यते यस्य दत्त दानं द्विजोत्तमान् । रामनाथपुरस्येह नाम सम्भव मे नृपैः ॥१००॥
तव कृष्णेन किं दत्तं वद महतेऽधुना । सदाह्यहर्निशं शम्भुरपि मे रामचिन्तनम् ॥१०१॥
तारकं मे रामनाम करण्यं संशृण्वन्त्सदा । मृत्योर्मुक्ताप्तिलाभार्थं द्विजोपविशति स्वयम् ॥१०२॥
अतएव जनाश्चापि सर्वत्र मरणोन्मुखात् । ध्यायन्मुहुः शिववृति ध्येयो रामोऽधुना त्विति ॥१०३॥
तथा प्राणिभिवोक्षार्थं सदा तण्डवनायकैः । रामेति रामेति नाम भूत्वामुदीर्यते ॥१०४॥
यन्नाममहिमा सोऽयं त स्तोम्यधुना प्रभुः । वाल्मीकिनाऽप्येत एवपूर्वन्तच्चरितं कृतम् ॥१०५॥
व्यासजीने कहा कि हमारे रामने भी तो कुरुक्षेत्रमे स्नान किया था ॥ ८८ । मेरे राम सदा सत्य वचन बोलते थे, किन्तु तुम्हारे कृष्णकी बहुत सी बातें झूठी हो गयीं थीं ॥ ८९ । मेरे रामका एक बाण शत्रुको मारनेके लिये पर्याप्त होता है, किन्तु तुम्हारे कृष्णके अनेक विकल बाण गधाके मुख हैं ॥ ९० ॥ हमारे रामका केवल एक स्त्री सीता है और तुम्हारे कृष्णकी बहुत सी स्त्रियाँ हैं, पत्नीका मर्यादातिरिक्त हमारे रामको कोई और इच्छा नहीं है, लेकिन तुम्हारे कृष्णका बहुतों स्त्रियाँ हैं, जो बिना रक्षक हैं। हमारे राम समुद्रके तटपर अयोध्यामे रहते हैं । ९१ ।। ९२ । इसके विपरीत तुम्हारे कृष्ण पश्चिमा समुद्रके किनारे रहते हैं। मेरे रामके तीन भाई हैं और तुम्हारे कृष्णके केवल एक भाई हैं ॥ ९३ ॥ हमारे रामके पास कामधेनु गौ, मणि, पुष्पक, कल्पवृक्ष, पारिजात मुनि अगस्त्य द्वारा दिये हुए बाण, तूणीर, ऐरावत वंशमें उत्पन्न सुमुख हाथी ये नौ रत्न सदा विद्यमान रहते हैं। हे विप्र ! तुम्हारे कृष्णके पास दो मणि तथा पारिजात वृक्ष ये ही तीन रत्न हैं ॥ ९४ ।। ९५ ।। तब कहिए तुम कृष्णका क्यों व्यर्थ स्तुति करते हो ? रामचन्द्रजी सात द्वीपोंके स्वामी एवं राजाओंके भी वन्दित हैं ॥ ९६ ॥ राम ईश श्रेष्ठ और जगत्पति थे, उनमे राजा विश्वनाथ है । तब मेरे रामके बराबर कृष्णको मत मानो, उनके पास धनुष है और अभय दायक है। वे भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करनेका सदा तत्पर रहते हैं ॥ ९७ ॥ ९८ ॥ जिनका नाम निरासन है, दो चमर एवं छत्र हैं, जिसके पुष्पक विमानकी सवारी है और पिताके सदृश गुणवान् दो बेटे हैं। जिनका दत्त दिया हुआ रामनाथपुर आज भी विद्यमान है। मुष्टी ऋषीको कि तुम्हारे कृष्णका क्या अंश दान दिया है जो आजतक विद्यमान है। साक्षात् शिवजी भी सदा मेरे रामका भजन करते हैं ॥ ९९-१०१ ॥ कल्याण करणाभ्युक्त प्राणियोंका शिवजी घूम-घूमकर रामतारक रूप सुनाया करते हैं। इसीलिए संसारके लोग मरत समय कहते हैं- रामका ध्यान करो भैया, रामका भजन करो" ॥१०२॥१०३॥ मृत जीवोंकी मुक्ति टिके निमित्त ही जटाको उठानेवाले शिव जी रामनामका उच्चारण करत फिरत हैं ॥ १०४ ॥ जिसके नामकी ऐसी महिमा है, मैं उस रामकी स्तुति करता हूँ