भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 427, कुल 811 में से

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पृष्ठ 427

सर्गः ४ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४११

निर्मिता विधिना पूर्वं निद्रानाम्नी त्वहं प्रभो । दत्तं तेन मम स्थानं कुम्भकर्णे चिरं सुखम् ॥६७॥
यावत्कालं स्थिता राम स त्वया निहतो रणे । ततो मद्भवनान्नाशं गता शीघ्रं विधिं प्रति ॥६८॥
तेन त्वां प्रेषिता राम ततः प्राप्ता त्विमां पुरीम् । सोमाचारमयादस्यां नगर्यां न गतिर्मम ॥६९॥
अत्रैव संस्थिता राम शोचंती सरयूतटे । मे स्थानं वद रामाद्य यत्र स्वाप्यामहं सुखम् ॥७०॥
तत्तस्या वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् । स्मृत्वा दूतकृतं पूर्वं तदा क्रोधेन बोदितः ॥७१॥
निद्रे शृणु वचो मेऽद्य ते स्थानं कीर्तयाम्यहम् । पापात्मानो नरा भूम्यां ये शृण्वंति हि कीर्तनम् ॥७२॥
पुराणश्रवणं वेदपठनं पूजनं जपम् । तपो ध्यानं च होमादि यद्यत् कुर्वन्ति पापिनः ॥७३॥
तेषु त्वं तिष्ठ मद्धाक्याद्धीनदेवनरेष्वपि । जडे बालेऽथ गुर्विण्यामुपवासाप्रभोजने ॥७४॥
तथा विद्यार्थिनि भ्रांते नर्ते जागरूकामुके । एतेषु ते स्थलं दत्तमेतान्मोहय मद्धरात् ॥७५॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा सा तुष्टा प्रणनाम तम् । ययौ रामः स्वनगरीं सुखं निद्रां चकार वै ॥७६॥
तदारभ्य पुरोक्तेषु दाने निद्राऽकरोन्मुखम् । पापात्मनामतो निद्रा बाधते पुण्यकर्मसु ॥७७॥
तदारभ्य सेवकेषु नरेष्वप्यवनीतले । निद्राप्रस्तेषु पुण्यात्मा सङ्ख्येऽपि कश्चन ॥७८॥
शुश्राव संकीर्तनादि चकार पूजनादिकम् ।

श्रीरामदास उवाच
अथान्यां सम्प्रवक्ष्यामि कथां सीतापयस्कराम् ॥७९॥
कुम्भकर्णस्य पुत्रस्य निकुम्भस्य च गर्भिणी । प्रसूत्यर्थं पितुर्गेहं गता द्वीपांतरं प्रिया । ८०॥
रावणादिक्षये जाते तस्यां जातस्तु पोलुकः । मायापुर्यां सनक्रिश्च प्रतयदन्तरः पुनः ॥८१॥


हे प्रभो यह बहुत समयकी बात है कि जब ब्रह्माने मुझे बनाया था । मेरा नाम निद्रा है और ब्रह्माने मुझपर दया करके कुम्भकर्णके देहम रहनेका स्थान दिया । तब मैं बड़े आनन्दसे उसमें रहन लगी ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ लेकिन आपने उसे भी मार डाला । मेर रहनेका एक अखाड़ा था, उसे भी आपने उजाड़ दिया । ऐसा व्यवस्थान रहतो-करावली हुई में ब्रह्माक पास गया और उन्ह अपनी गाथा सुनायी । उन्होंने मुझ आपके पास भेजा ओर मै इस जगह आ पहुंची। सगरक्षाकोंके भयस इस नगराम घुसनका माहस नहीं हुआ । इसलिए इसा सरयूके किनारे बैठी बैठी विलाप किया करती हू । हे राम ! अव आप कृपा करके मेर रहनक लिए कोई स्थान बतला दीजिए, जहाँ मै रह सकूं ॥ ६८-७० ॥ इस प्रकार उसकी बात सुनकर रामचन्द्रको पहले दूतकी बातें सोचकर कुछ गुस्सा आ गया और विद्वास बाल-॥ ७१ । हे निद्रे ! सुना, मै तुम्हें तुम्हारे रहनेके लिए स्थान बतलाता हूँ । जो पापी मनुष्य मेरा कीर्तन सुनने जायँ और वे पुराणश्रवण, वेदपाठ, पूजन, जप, ध्यान आदि जो कुछ भी करने लगें, उनमें तुम अपना रङ्ग जमाओ जो लोग हीन प्रकृतिक हों, न चाहे देता हों या मनुष्य, जड़, बालक, गर्भिणी स्त्री, अत्रोसर भोजन करनेवाल, विद्यार्थी और थके हुए मनुष्योंमें तुम रहो । जो लोग उसकी भगत हों, उन लोगोंमे मे तुम्हें रहनक लिए स्थान देता हूँ । मेर बरदानसे तुम इन्होंपर अपना मोहजाल फैलाओ ॥ ७२-७५ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर वह प्रसन्न हुई और उसने भगवान्-को प्रणाम किया । उधर रामचन्द्र भी अपनी नगरीमं लोट आये और रातभर खूब अच्छी तरह सोये ॥ ७६ ॥ तभीसे ऊपर कहे हुए लोगांम निद्रा निवास करने लगी । इसीलिए यदि पापी मनुष्य कोई पुण्यकर्म करने लगता है, तब उसे निद्रा सताती है ॥ ७७ ॥ तभीसे पृथ्वीमण्डलमें निद्राने सेवकोंपर अपना मोहजाल फैलाया । सहस्त्रों निद्रानु अनुरक्तोंमें कहीं एक मनुष्य ही मुश्किलसे ऐसा मिलेगा, जो श्रवण-कीर्तन आदि शुभ कर्म करनेवाला पुण्यात्मा हो ॥ ७८ ॥ श्रीरामदास कहने लगे—अब मै सीताके यशसे भरी एक दूसरी कथा सुना रहा हूँ ॥ ७९ ॥ कुम्भकर्णके बेटे निकुम्भकी गर्भिणी स्त्री बच्चा पैदा करनेके लिए किसी दूसरे द्विपमें रहनेवाले अपने पिताके घर गयी थी ॥ ८० ॥ जब रामके साथ युद्ध करके रावण वंश समेत नष्ट हो

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