भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 428
४१२आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

घ्राणानदीतटे चक्रेऽद्रावणः सौरमादरे । महाकायश्चतुर्हस्तश्चोद्वेजयन्निवा विभीषणम् ॥८२॥
शताननेन वै सार्धं लङ्काराज्यं चकार स । ततो विभीषणो रामं गत्वा सर्वं न्यवेदयत् ॥८३॥
सीताविभीषणाभ्यां वै रामो लङ्कां ययौ द्रुतम् । निहत्य रावणं सैन्या युद्धे रामे जितेऽथ तम् ॥८४॥
विभीषणाय तां लङ्कां दत्त्वा तं पौण्ड्रकं दृढौ । अथैकदा सभामध्यं स्वधाम विभीषणः ॥८५॥
ययौ विषण्णः सचिवैश्चतुर्भिः संयुतः क्षितौ । नत्वा रामं साश्रुनेत्रश्चाऽब्रूवं कपितत्परः ॥८६॥
उवाच सकलं वृत्तं लङ्कायाः प्रम्लवद्गिरः । राम राजीवपत्राक्ष त्राहि मां शरणागतम् ॥८७॥
मूलर्क्षे कुम्भकर्णस्य जातः पुत्रः पुरा वने । दैवोत्पन्नो वृक्षवृक्षे बालस्तत्र शयिनः ॥८८॥
मक्षिकाभिः स्ववमनजलस्य बिंदुभिर्मुदुः । पालितो रहसः श्रुत्वा न्यक्तेनैश्वर्यकुलक्षयम् ॥८९॥
तपसा तोष्य ब्रह्माणं नडरेणानिर्गजितः । पातालस्थै राक्षसैश्च लंकायां समुपागतः । ९० ।
मया सेन तु षण्मासं कृतं युद्धं महत्तमम् । मां जित्वा म पुरीं धास्ताददात् सचिवैः श्शिशौ ॥९१॥
मधुत्रौ गुप्तमार्गेण भ्रामर्जन पलायिनः । शनैर्विश्रमर्गेण लङ्काया योजनोपरि । ९२ ।
रात्रौ बहिर्निर्गत्य विडान्तरं समागतः । मूलर्क्षे यः समुत्पन्नस्तन्मूले विवर्द्धितः ९३॥
मूलकासुरनाम्नाऽतः पगं ख्यातिं गतोऽधुना । सगरं तेन मामुक्तमादौ त्वां तु विभीषणम् । ९४।
हत्वा लङ्कापुरीं पश्चात् ततो गच्छामि राघवम् । यन्विना निहतो येन विहतं सकलं कुलम् । ९५॥
त राम सगरं हत्वाऽऽनृण्यं गन्ताऽहह पितुः । आगमिष्यति सोऽत्रापि त्वां योद्धं रघुनन्दन । ९६।
इदानीं यद्धितं यत्र तस्कुरुष्व मृत्तम । ततस्य सकलं वृत्तं श्रुत्वा रामोऽतिविस्मितः ॥९७॥
लक्ष्मणं प्राह बेगेन वारिपन्तु जगतातले । स्वस्वरूपावस्थितन्वमन्वर्गकारवाधुना ॥९८॥

भया ना इस गर्भ पौण्ड्रक नामका पुत्र उत्पन्न हुआ, ८१॥ दण्डकारण्यके अन्दर मायापुरी नामकी नगरी-में एक सौ सिरवाला रावण रहता था उसके १०० सुतायें थीं। पौण्ड्रकने उस रावणकी सहायतासे विभीषण-को परास्त कर दिया और शतानन रावणके साथ लङ्काका राज्य स्वयं करने लगा। उस समय विभीषण रामके पास गये और उन्होंने अपना सब वृत्तान्त सुनाया ॥८२-८३॥ मिसकी इस दुःखभरी कहानीको सुनकर राम सीता और विभीषणके साथ लङ्काको चल दिये। वहाँ पहुंचकर उन्होंने उस सौ मूँहवाले रावण तथा पौण्ड्रकको मारा और फिर विभीषणको लङ्काके सिंहासनपर बिठाकर अयोध्या लौट आये। इसके बाद एक दिन राम अपनी सभामें बैठे थे। उस सभामें स्त्री, पुत्र तथा मन्त्रियक साथ विषण्ण भावसे बैठे हुए विभी-षणने कहा-हे राम, हे राजीवपत्राक्ष ! मैं आपकी शरणमें हूँ, मेरी रक्षा कीजिए । ८४-८७ ॥ बहुत दिनों-की बात है, जब मूल नक्षत्रम कुम्भकर्णक एक पुत्र हुआ था । कुम्भकर्णने दुष्टों द्वारा उस लड़केको जङ्गलमें छोड़वा दिया। वहीं मधुमक्खियोंने उसके मुंहमें मधुकी एक-एक बूंद टपकाकर उसकी रक्षा की। वह इस समय बड़ा हुआ है। जब उसने लोगोंके मुंहसे यह सुना कि रावण और पिता तथा कुटुम्बियोंका नाश किया है ॥ ८८ ॥ ८९ ॥ तब उग्र तपस्या द्वारा उसने ब्रह्माको सन्तुष्ट करके वर प्राप्त कर लिया। वरके प्रभावसे गर्वित होकर पातालनिवासी राक्षसोंकी सहायतासे उसने लङ्कापर चढ़ाई कर दी। मैंने छह महीने तक उसके साथ घमासान युद्ध किया। अन्तमें उसने मुझे परास्त करके लङ्कापर अधिकार कर लिया। ऐसी अवस्थामें मैं आधी रातको अपने पुत्र, स्त्री एवं मन्त्रियोंके साथ एक गुप्तमार्गसे गमभ्य भागा ॥ ९०-९२ । एक योजन दूर भाग आनपर ठहर गया जब रात्रि व्यतीत हो गयी। तब आगे बढ़ और आपके पास आ पहुँचा। वह मूल नक्षत्रमें पैदा हुआ तथा वृक्षोंके नीचे उसका पालन-पोषण हुआ है। इसीलिए लोग इसे मूलकासुर कहते हैं। युद्ध करते-करते एक बार उसने मुझसे कहा था कि इस रणभूमिमें पहले तुझको मारकर लङ्कापर अधिकार कर लेने-के बाद मैं उस रामके पास आऊँगा, जिसने मेरे पिता तथा मेरे कुलका संहार किया है ॥९३-९५॥ रणाभूमिमें तुझको मारकर मैं अपने पितृऋणसे उऋण हो जाऊँगा। हे रघुनन्दन मैं अनुमित जानता हूँ, शीघ्र ही वह आप-से भी युद्ध करनेके लिए आयेगा ॥ ९६ ॥ ऐसा अवस्यामे आप जो उचित समझे सो कर । विभीषणका हाल