भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 429

सर्ग ४ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४२१

तथेति रामवचनाद्गताश्चान्यनदाः। लक्ष्मणस्तेऽपि वेगेन गत्वा दूताः समायताः ॥९९॥
प्रोचुः समार्था श्रीरामनृपाणां वचनाजिते। केचिन्न्ृपाः पालयंति तवाज्ञां रघुनन्दन ॥१००॥
केचित्तु पालयन्त्याज्ञां तत्र तत्कारण श्रृणु। चम्पकायाः सुकन्यायाः स्वयंवरसमुद्भवम् ॥१०१॥
दुःखं हृदयमध्यस्थं यत्तदद्यापि वर्तते हि। शुकैरंशनशातस्तैर्विदार्यतेऽबला पुनः ॥१०२॥
स्मृत्वा मदनसुन्दर्या दुःखं काम्युद्भव नृपाः। आज्ञां न पालयन्त्यद्य तत्र राघव मन्मथो ॥१०३॥
पालिता यैस्तवाज्ञा ते सुग्रीवाद्या नृपोत्तमाः। मध्यकोटिबलैर्युक्ताः समायाताः महत्तरः ॥१०४॥
तद्दूतवचनं श्रुत्वा रामो गर्तत्रलोचनः। प्राह मात्सर्यतास्तेने स्पृहयंति नृराधमाः ॥१०५॥
मादौ हन्त्वा कौम्भकर्णि तान्गच्छामि ततश्चहम्। इत्युक्त्वा सुदिने रामः सेनया बहुभिर्जगात् ॥१०६॥
मूलबाणुरघाताथंषादी पूर्वा प्रदिदिशे। विचिन्त्यैतत्पुरे दुग्र्यां युपकेतुं न्यवेशयत् ॥१०७॥
कुशाद्याः सप्त बालान्ते रामेण सह निर्ययुः। विमाने मरुतां सेनां स्थापयामास राघवः ॥१०८।
तादृशे पार्थिवाः सर्वे नानावाहनमाश्रिताः। रेणेताः स्वस्वसैन्यैश्च नन्वा रामं पुरःस्थिताः ॥१०९॥
तान् रामः स्थापयामास विमाने सैन्यसंयुतान्। अष्टादशपरमिर्तैः कपिभिः कपिराड् ययो ॥११०॥
आरुरोह विमानग्रं कपिमी राघवस्ततः। ततः सीतां विना रामः स्वय स्थित्वा तु पुष्कके ॥१११॥
पश्यन्मानाविधान् देशान्ययौ लङ्कां विहायसा। यात्राकाले यथा वानरवताऽऽसीत्तथा पुनः ॥११२॥
ततो राम समायातं श्रुत्वा स मूलकासुरः। ययौ लङ्काबहिर्येद्धुं राघवेण बलीयसा ॥११३॥
दशकोटिमित्रां सेनां विभ्रन् स बलदर्पितः। तत्तन्ते राक्षसाः पट्टिशैर्निघ्न्युः प्लवगान मुहुः ॥११४॥
वानरा राक्षसांश्चापि निघ्न्युश्चन्द्रवलर्गैः। एवं बभूव तद्युद्धं तुमुलं दिनसप्तकम् ॥११५॥


सुनकर राम बड़े विस्मित हुए ।९९॥ तब लक्ष्मणने उनसे कहा कि संसारमें जितने राज हैं, उनके पास दूत भेजकर शीघ्र बल्वा लो । ९८ ॥ लक्ष्मणके वचनके आज्ञानुसार दूत भेजे। दूतोंने शीघ्र लौटकर रामसे कहा- हम लोग सब राजाओंके पास हो आय। उनमें कुछ राजे ही आपकी आज्ञाका पालन कर रहे हैं और कुछ नहीं ।९९॥ १००॥ इसका कारण यह है कि चम्पिकाके और सुप्रतीक स्वयंवरके समय उनके हृदयपर जो लोभ उपजा था, वह अब तक ज्योंका त्यों बना है। फिर पुत्र विरहके शोकसे उनका हृदय अलग विदीर्ण हो चुका है । १०१॥१०२॥ जब वे मदनसुन्दरीकी उस अनर्थी व्यथाको याद करते हैं तो उनका कलेजा टुकड़े-टुकड़े हो जाता है। इन्ही कारणोंस वे आपकी आज्ञाका पालन नहीं करना चाहते ॥ १०३॥ जिन सुग्रीव आदि नृपतियोंने आपकी आज्ञाका पालन किया है, वे अपने दल-बल समेत अयोध्या आ रहे हैं ॥ १०४ ॥ दूतकी बात सुनकर रामचन्द्रने कहा-वे नीच राजे व्यर्थपर हमारे साथ ईर्ष्याभाव रखते हैं? अस्तु, पहले कुम्भकर्णके बेटे मूलकासुरको मारकर उन लोगोंपर भी चढ़ाई करूँगा। इस प्रकार निश्चय करके रामने शुभ दिन और मुहूर्तमें अपनी विशाल सेना तथा लक्ष्मण भरत आदि भ्राताओंके साथ मध्यकासुरको मारनेके लिए अवधेशार प्रस्थान कर दिया ॥१०५, १०६॥ पुरीके बाहर आकर उन्होंने कुछ सेनाके साथ यूपकेतुको अयोध्याकी रक्षाके लिए छोड़ दिया और बाकी कुश आदि सात लड़कोंको अपने साथ ले गये। राघव यात्राके समय सारी सेनाको पुराक विमानपर बिठा लिया ॥ १०७॥ १०८ ॥ रास्तेमें रामके अनुगामी राजा भी अपनी-अपनी सेनाके साथ आकर रामसे मिल गये ॥ १०९॥ उन लोगोंको भी रामने विमानमें बिठा लिया। इस यात्रामें सुग्रीव अठारह पद्म बन्दरोंके साथ गये थे ॥ ११०॥ उनको भी रामने पुष्पकपर बिठाल लिया। इसके अनन्तर सीताको छोड़कर राम विमानपर बैठे। आकाशमार्गमें अनेक देशोंको देखते हुए वे लङ्काकी ओर बढ़े और अल्प समयमें ही निर्दिष्ट स्थानपर पहुँच गये उधर जब मूलकासुरने यह समाचार सुना ता रामचन्द्रके साथ युद्ध करनेके लिए दस करोड़ सेना लेकर लङ्काके शहरवाले मैदानमें आ डटा ॥ १११-११३ ॥ उस समय ब्रह्माके वरदानसे वह बड़े घमण्डमें था। फिर क्या होना था, राक्षसगण बानरोंको लाठीसे मारने लगे। वानरयूहने पहाड़के बड़े-बड़े टुकड़ों तथा वृक्षोंसे