श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 430, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४१४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ४ |
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तत्र ये ये मृता युद्धे बानरास्तन्स मारुतिः । द्रोणाचलं समानीय जीवयामास पूर्ववत् ॥११६॥
तेनः सा राक्षसा सूता चतुर्थांशावशेषिता । तान्सदृष्ट्वा राक्षसेन्द्रः स रुष्ट्वा क्रोधयुतस्तदा ॥११७॥
मन्त्रिणश्चोदयामास तथा सेनापतीन् बलैः । तानागतान् सम्भूव रामदाशाः सहस्रशः ॥११८॥
शताघ्नीभिर्हस्तयंत्रैर्भिन्दिपालशरुण्डिभिः । पट्टिशैः पट्टिशै शूलैः कृन्तैः खड्गैर्वमर्द्दयन् ॥११९॥
तेऽपि तालँस्तमालँश्च हिन्तालँश्च तृणन्समैः । शैलैः शिलाभिः श्रीरामर्वागान् संमर्दयन् रणे ॥१२०॥
पुनर्युद्धं महावासीन्तुमुलं रोमहर्षणम् । मत्सप्तान् मन्त्रिणः सर्वांस्तथा सेनापतीनपि ॥१२१॥
रामदासाः क्षणेनैव चक्रुः संयमनागतान् । तान् महांस्तेहतान् श्रुत्वा क्रोधेन मुरुकासुरः ॥१२२॥
स्वयं दिव्यरथे स्थित्वा किञ्चित्सैन्ययुतो बली समागतं नृपा दृष्ट्वा ययुर्युद्धे सहस्रशः ॥१२३॥
ववर्षुः शरजालैश्च चक्रुर्दुन्दुभिभिःस्वनार । तान्सर्वान् राक्षसेन्द्रः स च हाशु व्यमूर्च्छयत् ॥१२४॥
तान् मूच्छितान्नृपान्दृष्ट्वा याँहु तेन पुनर्ययुः । सुमन्त्राद्या मन्त्रिणश्च शरवृष्ट्याशण दलैः ॥१२५॥
तान्सर्वान्मुच्छितान् वाणेश्चकार मुरुकासुरः । मूच्छितान्मन्त्रिणो दृष्ट्वा कुशश्याद्यास्तथा ययुः ॥१२६॥
ततो बभूव तुमुलं युद्धं सर्वान्मददर्पणम् । ततः कुशः स्वबाणैर्विलंकायां मुरुकासुरम् ॥१२७॥
प्राक्षिपदुदमध्ये स पपात पुनरुत्थितः । ततोऽभिचारिकं होमं स्वशक्त्यर्थमुपक्रमम् ॥१२८॥
कर्तुं विवेश स गुहां रुद्ध्वा द्वाराण्यनेकणः । ततो विभीषणः प्राह होमधूमं निरीक्ष्य च ॥१२९॥
राघव कल्पवृक्षाधः संस्थितं बंधुवेष्टितम् । होमं करोत्ययं दुष्टः प्रेषयस्व कपीन्पुनः ॥१३०॥
होमे समाप्तोऽजेयः स भविष्यति महासुरः । एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा ययौ रामं सुरैर्वृतः ॥१३१॥
नत्वा तं राघवश्चापि पूजयामास सादरम् । तदाऽऽहूय शतं नत्वा राजन्त्वस्मै मयाऽर्पितः ॥१३२॥
प्रहार करना आरम्भ कर दिया । इस तरह सात दिन तक उन तीनो सेनाओमे घमासान युद्ध होता रहा ॥ ११४ ॥ ११५ ॥ उस संग्रामम जो जो बानर मरते थे वो द्रोणाचली द्रोणाचल पर्वतवाली ओषधि लाकर उन्हें जीवित कर दिया करते थे ॥ ११६ ॥ आखरी राव राक्षसोंका एक चोथाई सेना रह गयी, शेष सब मार डाले गये । मुरुकासुरने जब देखा कि अब थोड़ेश राक्षस बच गये हैं तो रुष्ट होकर अपने मन्त्रियों, सेनापतियों और सेनाको भेजकर उसने बड़ा घोरतर साथ षड्यंत्र रचाया गया । उधर जब रामदसक वीरोंने देखा कि राक्षसोंकी और भी सेना आ गयी है और वे अपनी सांगी, तलवारे, बन्दूकों आदिसे मेरी सेनाको मार कर गिरा दिये हैं तब वेभी ताल, तमाल, हिन्ताल आदि वृक्षों तथा पर्वतोंकी बड़ी बड़ी चट्टानोंको लेकर फिर तुमुल युद्ध करने लगे और थोड़ी ही देरमें सम्पूर्ण मन्त्री, सेनापति तथा सेनाको यमपुर पहुंचा दिया ॥ ११७-१२१ ॥ जब मुरुकासुरने सुना कि वह सेनाभी साफ हो गयी तो मारे क्रोधके तमतमा उठा और स्वयं एक दिव्य रथपर सवार हो तथा थोड़ी सी सेना साथ लेकर लड़नेको चल पड़ा । सम्मुख पार्श्ववर्त्ती राजाओने जब उसे आतेकी नेगर देखा तो वे हजारों राधे भी परिकर बाँध बाँधकर मैदानमे आ गये ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ उन लोगोंने दुन्दुभीकी घनघोर गर्जनाके साथ उस राक्षसपर बाणवर्षा प्रारम्भ कर दी, लेकिन मुरुकासुरने क्षणभरमे इन लोगोंको मूच्छित कर दिया । १२४ ॥ जब राजाओंको मूच्छित देखा तो राजन्द्का आज्ञासे सुमन्त्र आदि मन्त्री अपना-अपनी सेनाके साथ लड़नेके लिए जा डटे । मन्त्री भी बेहाल हो गये तो कुश आदि बालक जाकर लड़ने लगे ॥ १२५ ॥ १२६ ॥ कुश आदिके पहुंचतेपर बड़ा भीषण युद्ध हुआ । कुछ देर बाद कुशने अपने बाणोंसे मुरुकासुरको उठाकर फेंक दिया और वह लंकाके सागरमे जा गिरा। किन्तु तुरन्त उठ खड़ा हुआ और उत्तम शस्त्र तथा या प्रति करनकी इच्छासे एक कन्दरामें घुस गया, द्वार बन्द कर लिया और वहां आभिचारिका क्रियाके अनुसार हवन आदिकरने लगा ॥ १२७ ॥ १२८ ॥ जब विभीषणने हवनके धुएँको देखा तो भाईयोंको मण्डलमें कल्पवृक्षके नीचे बैठे हुए रामचन्द्रके पास जाकर इस प्रकार कहने लगे-हे राम वह दुष्ट कन्दरामं बैठा हवन कर रहा है, अतएव फिर बानरगणको भेजिए । यदि कहीं हवन समाप्त हो गया तो फिर वह किसीसे भी नहीं जीता जा सकेगा । इसी बीचमें बहुतसे देवताओंके साथ