श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 434, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११८ | आनन्दरामायणे | [ सर्ग ६ |
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रविवारे करिष्यामि रवेऽहं पूजनं तव। इत्थं दिने दिने सीता नियमनकरोत्तदा ॥३६॥
ब्राह्मणैरर्घ्यदानं च कारयामास जानकी। न सा सुष्वाप रात्रौ तु दिवा वा वरवर्णिनी ॥३७॥
एवं दिने दिने सीता श्रीरामविरहातुरा। न शमाप क्वापि देशे श्रीरामार्पितमानसा ॥३८॥
एवं ता ऊर्मिलाद्याश्च चण्डिकाद्यापि वै स्त्रियः। स्वस्वस्वामिवियोगाग्निज्वलिता व्याकुलाः क्षणम् ॥३९॥
न सुखं क्वापि वै प्रापुः स्वकान्तार्पितमानसाः। सर्वास्ता लुलुठुर्भूमौ मणिभूमौ सुधीरधः ॥४०॥
काचिन्तर्तयति क्रीडामयूरं न मुदा तदा। शुकं न पाठयन्त्यन्या पञ्जरस्थं कुतूहलात् ॥४१॥
लालयन्नकुलं नान्या नालापयति सारिकाम्। अपराजतीव मत्ता नैव खेलति सारसैः ॥४२॥
मेजिरे न विलासं ता रेमिरे नैव मंदिरे। सखीभिरुचिरे नार्तं वीणावाद्यं न शुश्रुतुः ॥४३॥
कल्पद्रुमप्रसूतं यद्भवत्सुधोपमम्। मद्यत्कुसुमामोदं न पपुर्मधुरं मधु ॥४४॥
योगिन्य इव ता शुद्धा नासाग्रन्यस्तलोचनाः। अलक्ष्यध्यानावधानाः स्वनाथार्पितमानसाः ॥४५॥
चन्द्रकांतमणिच्छन्ने स्रवद्वारिकणद्रवैः। क्षण शतायने स्थित्वा जलप्रवेक्षणं क्वचित् ॥४६॥
रचयति क्षणं शय्या दीर्घिका मोजिनीदलैः। वीज्यमानाः सखीभिस्ताः शीतलैः कदलीदलैः ॥४७॥
इत्थं युगसमां रात्रिं दिनं ता मेनिरे सदा। कथञ्चिद्धारणां कृत्वा विह्वलाः मन्मथाः स्थिताः॥४८॥
एतस्मिन्नन्तरे सीता नियमैश्च व्रतादिभिः। मपानीतावाञ्जनेयगरुडस्वीयतुः पुरीम् ४९।
प्रास्फुरच्च भुजो वामः सीताया नयनं तथा। सुचिह्नं मन्यमाना सा किञ्चित्तुष्टाऽभवत्तदा ॥५०॥
अथ तौ कंपनोद्भूतगरुडौ सद्मि स्थितम्। अयोध्यायां यूपकेतुं वृत्तं कथयतो जवात् ॥५१॥
तच्छ्रुत्वा यूपकेतुः स इष्टं मत्वा न्यवेदयत्। सा तु तुष्टमनाः सीता तस्मिन्नेव दिने शुभे ॥५२॥
शीघ्र मेरे प्रभुका दर्शन मिल जाय तो मै अपनी सहेलियाके साथ नवरात्रका व्रत करूँगी ॥ ३४॥ ३५॥ हे सूर्य भगवान् ! प्रत्येक रविवारको मै आपका विधिवत् पूजन करूँगी। इस प्रकार रामके वियागवान दिनोंम सीता प्रतिदिन अनेक प्रकारकी मनौती गन्डा करती थी ॥ ३६ ॥ वे ब्राह्मणोने अर्घ्यदान कराती रहती थी। रात-दिन कभी नहीं सोती थीं। इस तरह रामके वियोगसे दुखिनी सीता कहीं भी सुख नहीं पाती थी ॥ ३७॥ ३८॥ इसी तरह उर्मिला और चण्डिकादिक स्त्रियाँ भी अपन-अपने स्वामियाके वियोगरूपी अग्निसे दग्ध होकर व्याकुल रहतीं थीं । वे समस्त स्त्रियाँ अपने महलोकी मणियाकी भूमियोपर लोट-लोटकर दिन काटतीं थीं। उन्हे समाग्के किसी भी प्रदेशम आनन्द नही मिलना था ॥ ३६ ॥ ४० ॥ उनमेसे न कोई क्रीडामयूर नचाती, न पिंजरेमे बैठे हुए तूतको पढ़ाती, न पाले हुए नेवलको प्यार करती, न मैना पढ़ाती और न कोई स्त्री सारसोंके साथ खेलवाड ही करती थी ॥ ४१ । ४२ । उन्होंने किसी सुखका उपभोग नहीं किया। महलोंम उन्होने आनन्द नहीं लिया। वे न अपनी सहेलियोके साथ हंसी-दिल्लगी करती थी, न वीणा बजातीं और न सुनती थीं ॥ ४३ ॥ कल्पवृक्षके पुष्पस उत्पन्न कुसुमकी अमृतसरीखी सुगन्धिका भी उपयोग नहीं करतीं थीं । ४४॥ वे नारियां योगियीके समान अपनी दृष्टि नासाग्रभागम रोक्तर रात-दिन अपन अपन पतियोका ध्यान किया करतीं थी। उन्होंने अपना-अपना मन अपने-अपने पतियोंको अर्पण कर दिया था ॥ ४५ ॥ वे झरोखेमे लगे हुए चन्द्रकान्त मणिके समीप, जिसमें सदा रातके समय अलकी धारा बहा करती थी, वहाँ बैठकर कुछ देर वर्धाको निहारा करती थीं ॥ ४६॥ कभी कमलके दलकी शय्यापर सोंतीं और हथियास कनक पत्तोंका पखा झलवाती थी ॥ ४७॥ इस प्रकार एक-एक रात्रिको युगके समान मानकर बड़े सन्तापसे विह्वल होकर समय बिताती थीं। जब सीता इतनी कठिन यंत्रणा भाग रही थीं, उसी समय गरुड और हनुमान्जी वहाँ आ पहुंचे। सहसा सीताकी बायीं आंख तथा भुजा फडकने लगीं। इस शुभ शकुन मानकर वे अपन मनमे कुछ प्रसन्न हुई ॥ ४८-५० ॥ थोड़ी देर बाद गरुड और हनुमान्जी राजसभा मे बैठे हुए यूपकेतुके पास पहुंचे और उन्होंने रामका सन्देश सुनाया ॥ ५१ ॥ उसे सुनकर यूपकेतुने सीताको बतलाया और रामके आज्ञानुसार सीता उसी दिन कुछ ब्राह्मणो, पुरोहितों