श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 435, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ५ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४११
रामवाक्यादाहृत्य गरुडं वेगवत्तरम् अग्निहोत्रं पुरस्कृत्य ऋत्विग्भिश्च पुरोधसा ॥ ५२ ॥ पतिं विनाऽग्निदा नारी सीमामुल्लङ्घ्य न व्रजेत् । मदाज्ञारूढ न विज्ञेयः सीताप्यागो विहाय माम् ॥ ५३ ॥ मदे प्राप्ते प्रवामोऽपि स्त्रीणामुक्तोऽग्निभिः सह, पतिना रहितानां च न दोषः कथ्यतेऽत्र हि ॥ ५४ ॥ भूमिगेहाद्यपायंच न देशचरितं चरेत् । ततः स रथमाराप्य मारुतिस्त्वरितं व्रजेत् ॥ ५५ ॥ पश्यती विविधान् देशान् सीता लङ्कां ययौ मुदा । ददर्श कल्पवृक्षाधः पुष्पकस्थं रघूत्तमम् ॥ ५६ ॥ ननाम शिरसा पद्भ्यां प्राञ्जल्या समाधिवान् । तां दृष्ट्वा राघवः प्राह सीते तेऽद्य मुखं कथम् ॥ ५७ ॥ विवर्णमगयस्तिम्ने कृशाङ्ग्य पल्लिश्यते । तद्रामवचनं श्रुत्वा जानकी सस्मितानना ॥ ५८ ॥ विलज्जती विनोदेन राघवं प्राह सादरम् । स्वामिन्मद्विरहाद्देशात्सर्वं त्वं विद्धि राघव ॥ ५९ ॥ न निद्रामि न जागर्मि नाश्नामि न पिबाम्यहम् । ध्यायन्त्यहं केवलं त्वां योगिनीव वियोगिनी ॥ ६० ॥ निद्रादृग्दिनधना स्वप्नेऽपि न त्वदाननम् । आनंदि सर्वथा यन्मे मंदभाग्या विलोकये ॥ ६१ ॥ त्वदाननप्रतिनिधिं पुरैन्दुर्या मया । उदितोऽपि न चालोकि नायं वै त्यक्तुकामया ॥ ६२ ॥ त्वदालापममालाप कल्पयन् किल काकवाक् । कोकिलोऽपि मयाऽऽकर्णि नालङ्कारोपकर्णया ॥ ६३ ॥ त्वदङ्गसंगजं मन्दं न च शीतमहं क्वचित् । आलिङ्गितवती वातं तद्विद्वन्निन्द्यभाविना ॥ ६४ ॥ नाना यथाश्च नियमा अर्थार्थ तव राघव । कुर्वन्त्या मम नैवाभूत्सुखं त्वद्विरहाग्निना ॥ ६५ ॥ ततो विहस्य श्रीरामस्तामालिङ्ग्य पुनः पुनः । साध्वीं हस्तौनी स्पृष्ट्वा वपो विचारराग्रतः ॥ ६६ ॥ अथापरेदिने रामः स्नात्वा स्नातां विदेहजाम् । अशिक्षियां शस्त्रविद्यामस्वादानविसर्जने ॥ ६७ ॥
तथा अग्निका साथ लेकर गरुडपर जा बैठी ॥ ५२ । ५३ ॥ यह एक नियम है कि स्त्री बिना अग्निके अपने गांवकी सीमाको लाँघकर कहीं नहीं जातीं । अग्निका साथ न तनने वह दोष रह्यो रहता ॥ ५४ ॥ दूसरे एक जगह मान्य यह भी माना देता है कि यदि किस प्रकारके खतरेका अवसर आ जाय तो अग्निको साथ लेकर वह प्रवास भी कर सकती है। यदि उस समय वह पतिसे वियुक्त हो तो उसको ऐसा करनेपर कोई दोष नहीं लगता ॥ ५५ ॥ मद्यन्त्यादिवादियों मदा ब्राह्मणोंको चाहिए कि व देववालोंका अनुकरण न करें । अस्तु, सीता गरुड़पर सवार हुई । हनूमान् माताकी रक्षा करत सब ओर मारुत रास्तेके अनेक देशोंको देखती हुई लङ्काकी तरफ चली । इस प्रकार बहुत शीघ्र लङ्कामे पहुंचकर उन्होंने देखा कि रामचन्द्रजी वहीं कल्पवृक्षके नीचे बैठे हुए हैं ॥ ५६ । ५७ ॥ वहीं पहुंचकर उतरकर उन्होंने उनको प्रणाम किया । रामने कहा-सते ! मै देखता हूँ कि तुम्हारा मुँह कुम्हलाया हुआ है और शरीर दुर्बल हो गया है। रामकी बात सुनकर मुस्कराती हुई सीता लज्जाके साथ कहने लगीं- हे स्वामिन् ! यह सब आपके विरहका प्रभाव है ॥ ५८-६० ॥ मुझे न नींद आती है, न जाग ही पाती हूँ और न खाती पीती हूँ । आपसे वियुक्त होकर योगिनीके समान सदा आपका ध्यान किया करती हूँ ॥ ६१ ॥ निद्राकी वन्दि मेरी आँख स्वप्नमें आपके ही मुखको देखा करती है। उसीमें इनको आनन्द मिलता है ॥ ६२ ॥ आपके मुखका प्रतिनिधस्वरूप चन्द्रमा भी उदित होता है तो मुझे अच्छा नहीं लगता , सन्तापको दूर करनेका कामनासे भी उसकी ओर निहारनेको मन नहीं करता ॥ ६३ ॥ यद्यपि तुम्हारी ही बोलीके सदृश कोकिलकी बोल होती है, किन्तु वह भी सुननेको इच्छा नहीं होती । उसकी बोल कानोंको शल्यके समान लगती है ॥ ६४ ॥ यद्यपि तुम्हारे अङ्गोंके स्पर्शके समान ही मधुर वृक्षके स्पर्शसे मिली वायु भी है किन्तु उसका भी मैने कभी आलिङ्गन नहीं किया ॥ ६५ ॥ आपकी विजयके लिए मैं विविध प्रकारके व्रतों और उपवासोंको करती रही । आपकी विरहाग्निसे संतप्त होनेके कारण कभी मुझे सुख नहीं मिला । ६६ ॥ इसके अनन्तर हँसकर रामने बार-बार सीताको अपने छाती से लगाया, स्तनस्पर्श किया और होठोंको चूमा । ६७ ॥ इसके बाद दूसरे दिन रामने स्नान किया, सीताको भी स्नान करवाया और सब अस्त्रविद्या शस्त्राविद्या एवं उनके आवाहन तथा विसर्जनकी रीति सिखलायी । कहनेका तात्पर्य यह कि उन्होंने थोड़े ही समयमें सीताको समस्त धनुर्वेदकी शिक्षा दे दी । रामकी आज्ञासे लक्ष्मणने रथ तैयार