श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 436, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें४२० आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
शिक्षयामास सकलां धनुर्विद्यां सविस्तराम् । रामाज्ञया लक्ष्मणेोऽपि रथं सिद्धं चकार सः ॥ ६९ । दारुकः सारथिर्यस्मिन् शस्त्राण्यस्त्राण्यनेकशः । गदापद्मं तु यत्रास्ति यत्रास्ति गरुडो ध्वजे । ७०॥ यस्मिन् शैब्यश्च सुग्रीवस्तथा चैव बलाहकः । मेघपुष्पश्च चत्वारो वायुगास्तुरगोत्तमा ॥७१॥ यत्र छत्रं वरं दिव्यं हेमदंडं विराजते । यस्मिन् शुक्ले चामरे द्वे यस्मिन्कीलादिरुक्मजम् ७२। तं रथं राघवो दृष्ट्वा जानकीं वाक्यमब्रवीत् । सीते स्थित्वा स्यदनेऽस्मिन् जहि त्वं मूलकासुरम् ७३। तथेति रामवाक्याच्छायां सीतां प्रचोदयत् । तामसी साऽपि तं नत्वा परिक्रम्य पुनः पुनः ॥७४॥ आरुरोह रथं वेगाद्घोरा घर्घरनिःस्वना । एतस्मिन्नन्तरे रामप्रेरिता वानरोत्तमाः ॥७५॥ लंका गत्वा पूर्ववच्च हवनार्च प्रचालयन् । ततस्ते वानराः सर्वे ययुः श्रीरामवत्रं पुनः ॥७६॥ ययौ स्थित्वा रथे योद्धुं कोपेन मूलकासुरः । मार्गे श्रुति पथात्ताम्य मुकुटः स्खलितो भुवि ॥७७॥ अनिवर्त्यासुरो गर्वाद्वयौ रणभुवं जवात् । सीताछायाऽपि सैन्येन ययौ भालक्ष्मणादिभिः ।७८। इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे राज्यकांडे पूर्वार्ध सीताविग्रहो नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
षष्ठः सर्गः
( रामके द्वारा राज्यका विभाजन )
श्रीरामदास उवाच
अथ छाया टणत्कृत्य शाङ्गं दध्रुष महत्धनुः । ययौ रणभुवं वेगात्तां ददर्शासुरोऽपि सः ॥ १ ॥
करालदंष्ट्रानयनां विद्युत्प्रद्युतशिरोरुहाम् । तालजंघां शूर्पपादां दरिवक्त्रां घनप्रभाम् ॥ २ ॥
लोमशां प्रललज्जिह्वां विदीर्णास्यां महच्छिलाम् । तां दृष्ट्वा कौंभकर्णिः स भीतः प्राह स्खलद्गिरा ।। ३ ।
का त्वं समागताऽध्यक्ष किमर्थं रोद्धुमिच्छसि । मम सर्वं वदस्व त्वं सदग्रे मा स्थिरा भव ॥ ४ ।
लिया ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ उस रथका दारुक सारथी था, विविध प्रकारके अस्त्र शस्त्र एवं गदापद्म उसमें रक्खे थे और रथके ऊपर गरुड़से अंकित पताका फहरा रही थी ॥ ७० ॥ उसमें शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामवाले चार घोड़े जुते हुए थे ॥ ७१ ॥ उसपर बढ़िया छत्र लगा था और सुवर्णके दण्ड लगे दो सफेद चमर रक्खे थे । उस रथमें जगह-जगह सुवर्णकी कीलें लगी हुई थीं ॥ ७२ ॥ इस प्रकार उस सुसज्जित रथको देखकर रामने सीतासे कहा - सीते अब तुम इस रथपर बैठकर मूलकासुरको मारो ॥ ७३ । सीताने रामकी बात अङ्गीकार की और अपनी तामसी छायाको प्रेरित किया । उस तामसी छायारूपिणी सीताने बार-बार रामकी प्रदक्षिणा की और घर्घर शब्द करते हुए रथपर जा बैठी उसी समय रामके द्वारा प्रेरित वानर लङ्कामें पहुंचे और उन्होंने मूलकासुरको हवनकर्मसे विचलित कर दिया। फिर लौटकर वे वानर रामके पास पहुंचे और सब समाचार सुनाया। उधर मूलकासुर कुपित होकर रथपर जा बैठा और संग्रामके लिए चल पड़ा। जात-जात रास्तेमें एक जगह उसका मुकुट माथेसे खिसककर जमीनपर गिरा और वह स्वयं भी फिसलकर गिर पड़ा ॥ ७४-७७ ॥ फिर भी वह लौटा नहीं, उसी गवके साथ रणभूमिमें पहुंचा इधर सीता भी रथपर बैठी और अपने लक्ष्मणादि वीर सैनिकों के साथ रणभूमिकी ओर चल पड़ीं ॥ ७८ ॥ इति शतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपांडेयकृत 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासमन्विते राज्यकांडे पूर्वार्द्ध पंचमः सर्गः ॥ ५ ॥
श्रीरामदासने कहा-इसके अनन्तर उस छायामयी सीताने अपने धनुषका विकराल टंकोर किया और संग्रामभूमिमें जा डटीं। तब मूलकासुरने भी उन्हें देखा ॥ १ ॥ उस समय सीताके बड़े बड़े दांत, डरावनी आंखें, बिजलीके समान पोतवर्णके केशपाश, तालकी नाई लम्बी चौड़ी जांघे, सूपकी तरह चौड़े पैर, कन्दराके समान भयावना तथा मेघके समान काला मुंह, लपलपाती जीभ और बड़ा भारी माथा था। उन्हें देखकर कुंभकर्णके बेटेने घबराकर कहा-॥ २ ॥ ३ ॥ तुम कौन हो ? यहाँ युद्ध करनेके लिये क्यों आयी हो ? इन बातोंका