श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 437, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें[सर्गः ६] आनन्दरामायणे पूर्वार्द्धे । ४२१
यदि जीवितुमिच्छाऽस्ति न ममाऽग्रे स्थितो भव । श्रीरामेण समं तन्मां विमानस्थमुदीक्षताम् ॥ ५ ॥ इत्युवाच तदा छाया गिरं निर्भर्त्सनीं गिरम् । श्रुत्वा सुरगणाःसर्वे व्योमस्थाश्चाऽभवन्मुदा ॥ ६ ॥ यस्मिंस्त्वनुकूलं नष्टं मम लक्ष्यं प्रवर्तिता । मच्छापेनास्ति विद्धं पूर्वं त्वं तु दावानलो मयि ॥ ७ ॥ तस्यानुपदं गमिष्यामि त्वां हत्वाऽद्य रणाजिरे । इत्युक्त्वा चापमादाय संदधे तीक्ष्णबाण तम् । ८ । ततः सोऽपि धनुर्गृह्य छायायां बाणमुत्सृजत् । तं दृष्ट्वा पादचारेण जीविता ये हनूमता ॥ ९ । ददृशू रानराः सर्वे पुष्पकस्थानमास्थिताः । सीताया अनुगोभूत्वा कल्पवृक्षतले स्थितः । १० । रत्नमाणिक्यपर्यङ्के दामोभिः परिशोभिते । उपरहर्षपुष्टः स भुजयोरुपबर्हणः ॥ ११ ॥ युद्धं ददर्श तच्छायामूलकासुरयोर्महत् । मूलकासुरमुक्तांस्तद् बाणांश्छाया गवाक्षतान् ॥ १२ ॥ छित्त्वा स्वबाणजालैस्तान्मुनूर्बाणांन्मुमोच सा । चतुर्भिस्तुहयान् हत्वा मुकुटं कवचं धनुः ॥ १३ ॥ सा चिच्छेद त्रिभिर्बाणैस्ततः पद्भ्यां महासुरः । रथान्तरं समारुह्य छायां योद्धुं पुनर्ययौ । १४ । ततश्छायां मुमोचाऽसौ वह्न्यस्त्रं मूलकासुरः । छायया मुमोच मेद्यास्त्रं तद्वह्न्यस्त्रं न्यवर्तयत् ॥ १५ ॥ पर्वतास्त्रं कौम्भकर्णिस्ततश्छायां मुमोच सः । व्यदारयत्सच्छायां सा पवनास्त्रेण पर्वतम् ॥ १६ ॥ पुनर्मुमोच वेगेन सर्पास्त्रं मूलकासुरः । गारुडास्त्रेण तच्छाया चकार विफलं क्षणात् ॥ १७ ॥ एवं तन्मुलकं युद्धं बभूव दिनसप्तकम् । तदा छाया महारेष्ट्रा चण्डकाऽस्त्रेण तं रिपुम् ॥ १८ ॥ हन्तुकामा महास्त्रं तन्मुमोच मूलकासुरम् । तदा चचाल जगती मर्यादाऽत्यज्यतस्तदा ॥ १९ ॥ लंघयामासु रत्नाद्या स्वामाशामभयं दिशि । पण्डितोऽथ तु चिच्छेद मूलकासुरसच्छिरः ॥ २० ॥ पपात काये लङ्कायां शतकोटिर्मदन्तिके । हाहाकारो महानासील्लंकायां रक्षसां तदा ॥ २१ ॥
उत्तर दो और यदि तुम्हें अपने प्राण प्रिय हो तो मेरे आगेसे हट जाओ। विश्राम लेनेके लिए मुझे दुष्प्राप्य नहीं है। थोड़ी ही देर बाद सीता श्रीरामके साथ विमानपर बैठी हुई दिखायी पड़ोगी ॥ ५ ॥ यह बात अपनी फटकार वाणीसे धमकाती हुई सीता कहने लगी हे मूलकासुर! इस समय उस रूप धारण किये मैं चण्डिकारूपा हूं। जिसक कारण तुम्हारा सारा कुल नष्ट हो गया था और लंका ध्वस्त हो गयी थी, वही सीता मैं हूँ। उसके मर पश्चात् अब तुम्हारा नम्बर आ रहा है ॥ ६ ॥ ७ ॥ उसके बाद आज तुम्हे मारकर मैं उसीका अनुगमन करुँगी। इतना कहकर सीताने अपना धनुष उठाया और चंचल बाण बाणोंसे मूलकासुरपर प्रहार किया ॥ ८ ॥ इसके अनन्तर उस दुष्टने भी अपना धनुष सम्हालकर छायाके ऊपर कई बाण चलाये। उस दोनोंके उस तुमुल युद्धको देखनेके लिए वे बहुतसे राजर्षि तथा वानर पुष्पक विमानपर बैठे थे जिनको हनुमानजीने संजीवनी बूटीसे जीवित कर दिया था ॥ ९ ॥ इसके बाद वानरोंने देखा कि राम सीताके साथ व सुग्रीव छायाके स्वर्णजटित आसनपर बैठे हैं ॥ १० ॥ वे हिंडोलेमें झूल रही है और उनके आगे-पीछे सेविका लगी हुई हैं ॥ ११ ॥ रामचन्द्रजी बहुत प्रसन्न होकर छायामयी सीता तथा मूलकासुरका युद्ध देखन लगे। सीता मूलकासुरकी ओरसे आये बाणोंको क्षणमात्रके साथ काट-काटकर अपने बाणोंको उसके ऊपर छोड़ने लगी थी। चार बाणोंसे सीताने मूलकासुरके रथके सूत व घोडे और वाणसे उसका माथेका मुकुट, धनुष तथा कवच काट डाला ॥ १२ ॥ १३ ॥ ऐसी अवस्थामे वह पैदल दौडता हुआ गया और एक दूसरे रथपर सवार होकर फिर सीतासे युद्ध करनेके लिए आ डटा ॥ १४ ॥ वहाँ पहुंचते ही उसने सीतापर वह्न्यस्त्र छोड़ा। सीताने मेद्यास्त्रका प्रयोग करके उसके बह्व्यस्त्रका अन्त कर दिया ॥ १५ ॥ फिर उसने सीतापर पर्वतास्त्र छोड़ा। सीताने पवनास्त्र छोड़कर इसका निवारण किया। इसके अनन्तर बड़े वेगसे उसने सर्पास्त्र चलाया। सीताने गरुडास्त्र छोड़कर उसे व्यर्थ कर दिया ॥ १६ ॥ १७ ॥ इस प्रकार सीता और मूलकासुरमें सात दिन पर्यन्त महान् युद्ध होता रहा। तदनन्तर कुपित होकर सीताने मूलकासुरका नाश करनेके लिए अपना एक महान् अस्त्र चलाया। जिससे पृथ्वी डगमगाने लगी और समुद्र अपनी मर्यादाका उल्लङ्घन करके बड़ी-बड़ी लहरें उछालने लगा ॥ १८ ॥ १९ ॥ दसो दिशाएं धूरसे व्याप्त हो गयी और उस अमोघबाणने ही