श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 438, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४२२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ६ ] |
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निनेदुर्देववाद्यानि देवाश्चाकाशसंस्थिताः । ववर्षुः कुसुमौघांश्च रामं सीतां मुहुर्मुहुः ॥२२॥
रथो निवर्त्य सा छाया ययौ श्रीरामसन्निधौ पुनः । नत्वा रामं च सीतां च सतारुह्रदयं ययौ ॥२३॥
तदा निनेदुर्वाद्यानि ननृतुश्चाप्सरोगणाः । तुष्टुवुर्मुनयश्चाथ जगुर्गीतं नटादयः ॥२४॥
ततः सुभगैः सर्वैर्देवाः श्रीराघवं ययौ । नत्वा रामं च सीतां च तुष्टुव जानकीं मुदा ॥२५॥
ब्रह्मोवाच
कनककन्यके राघवप्रिये कनकभासुरे भक्तपालिके ।
दशशतास्यप्राणनाशके तव पदांबुजालिः शिरोऽस्तु मे ॥२६॥
मूलकासुरप्राणनाशके रामरक्षिते रथमर्द्दिने ।
राममोहिनि स्यदनास्थिते त्वत्पदाम्बुजालिः शिरोऽस्तु मे ॥२७॥
रामसङ्गकाश्रिष्ठिते रमे रामजीविते रामलालिते ।
रामसंगुते रामरञ्जिते त्वत्पदाम्बुजालिः शिरोऽस्तु मे ॥२८॥
लोकपावनि धीरजे वरे भूमिकन्यके लोकपालिके ।
पद्मलोचने धरामजे परे त्वत्पदाम्बुजालिः शिरोऽस्तु मे ॥२९॥
कंजलोचने नागगामिनि स्वीयसत्सुखे रम्यरूपिणि ।
रुक्मभूषिते मौक्तिकार्त्तिते त्वत्पदाम्बुजालिः शिरोऽस्तु मे ॥३०॥
जलरुहानने विश्वभामिनि त्वमवसि सर्वदा स्वीयसेवकान् ।
मुनिद्रिपून् सदा दुःखदायिके त्वत्पदाम्बुजालिः शिरोऽस्तु मे ॥३१॥
सीताके उस महान् अस्त्रने बातकी बातमें सहस्राननक मस्तकको काट पृथक् कर दिया ॥ २० ॥ उसका धड़ रावणके राजद्वारपर जा गिरा । इस घटनासे लंकाके दैत्योंमें हाहाकार मच गया ॥ २१ ॥ उधर देवताओंने प्रसन्न होकर अपने दुन्दुभी बाज भी बजाये तथा विमानोंमें बैठकर आकाशमें आये और राम तथा सीतापर उन्होंने पुष्पवृष्टि की ॥ २२ ॥ इसके बाद सहस्रका छाया रावण-धड़से लोटकर रामके समीप पहुंची। वहाँ वह राम तथा जानकी सीताको प्रणाम करके उन्होंने विलीनरूपमें हो गयी ॥ २३ ॥ उस समय फिर देवताओंने अपने मंगलवाद्य बजाये और अप्सराएँ नाचने लगीं । मुनि कवीजनादिकोंने सीता-की स्तुति की और नटाने उनका यशगान किया ॥ २४ ॥ थोडी देर बाद ब्रह्मा आदि समस्त देवताओंके साथ रामचन्द्रके पास पहुंचे और उनको नवां प्रणाम करके इस प्रकार स्तोत्र करने लगे। ब्रह्माजीने कहा- हे कनककन्यजे ! हे सुवर्णसदृश चमकनेवाली भक्तरक्षाकारिणी सब रङ्ग-रागप्रिये ! हे भक्तोंका पालन करनेवाली माँ ! हे रामचन्द्रकी प्रेयसी, हम ऐसा आशीर्वाद दो कि हमारा मस्तक सदा तुम्हारे चरणकमलका भौंरा बना रहे ॥ २५ ॥ २६ ॥ हे मूलकासुरघातिनि ! हे रामरक्षित हे रामहर्षित ! हे रामको मुग्ध करनेवाली ! हे रथपर आरूढ होकर दुष्टोंका दर्प दूर करनेवाली सति ! हम आशीर्वाद दो कि हमारा मस्तक सदैव तुम्हारे चरणकमलका भ्रमर बना रहे ॥ २७ ॥ हे रामके साथ दिव्य सिंहासनपर बैठनेवाली ! हे लक्ष्मी ! हे राम-जीविते ! हे रामलालिते ! हे रामसंग्रुत ! हे रामरञ्जित सति हम आशीर्वाद दो कि हमारा मस्तक सदा तुम्हारे चरणकमलका भ्रमर बना रहे ॥ २८ ॥ हे लोकपावनि ! हे धीरा ! हे अजे ! हे वरे ! हे भूमिकन्यके ! हे लोकपालिके ! हे पद्मलोचने ! हे धरातनजे सीते ! हम आशीर्वाद दो कि हमारा मस्तक सर्वदा तुम्हारे चरणकमलका मधुकल बना रहे ॥ २९ ॥ हे कंजलोचने ! हे गजगामिनि ! हे स्वीयसत्सुखे ! हे रम्यरूपिणि ! हे रुक्मभूषिते ! हे मौक्तिकार्चिते सीते ! हमें आशीर्वाद दो कि हमारा मस्तक सर्वदा तुम्हारे चरणोंका भौंरा बना रहे ॥ ३० ॥ हे कमल सदृश मुखवाली सीते ! हे विश्ववसने तुम सदा अपने भक्तोंकी रक्षा करती हो । ऋषियोंको दुःख देनेवाले राक्षसोंको दुःख देनेवाली हे सीते ! तुम ऐसा कुछ करो कि जिससे हमारा मस्तक सर्वदा तुम्हारे चरणकमलका भृङ्ग बना रहे ॥ ३१ ॥