भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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४२४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

तं जित्वा रावणेनैव प्रमाथीता निजां पुरीम्। यां सदा पूजयामास लङ्कायां रावणश्चिरम् ॥४४॥ विभीषणेन सा दत्ता राघवाय वृषन्मयी। तां मुदा स्थापयामास विमाने रघुनन्दनः ॥४५॥ ततः सीताऽथ रामेण देवेनालर्कगेण सा। अशोकनिनिकां गत्वा शिंशपावृक्षमन्वगात् ॥४६॥ दर्शयामास रामाय यत्र पूर्वं स्थिता स्वयम्। रामे वामकरेणैव रामस्य हि कनिष्ठिकाम् ॥४७॥ धृत्वा दक्षिणहस्तेन सीता बभ्राम तद्वने। स्वान्तमन्तर्ददह पूर्वं यत्र यत्र कृतं वने ॥४८॥ गमं नीत्वा तत्र तत्र दर्शयामास जानकी। ततोऽसां त्रिजटां नीत्वा वस्त्रैराभरणादिभिः ॥४९॥ कृत्वाऽतिसंतुष्टां रामग्रे साऽथ वाक्यमब्रवीत्। यत्तया रक्षिता पूर्वं राक्षसीगृहभीतिभिः ॥५०॥ मनुज्या सादरंनेयेयं सर्वदा सरमे त्वया। इत्युक्त्वा सरमाहस्ते त्रिजटाकरमर्पयत् ॥५१॥ ततो वासस्थलं नीता ययौ रामेण सा शनैः। अथ निकुम्भिलादीनि दृष्ट्वा नानास्थलानि हि ॥५२॥ पुष्पकस्थो ययौ रामो विभीषणसमन्वितः। विभीषणस्य याञ्चया लङ्कायां भूम्यवेक्षणम् ॥५३॥ रामः करे धनुर्धृत्वा लङ्कायाः परितस्तदा। दर्शयिष्येऽपरं देत्याद्लङ्कायामाम सादरम् ॥५४॥ ततो विभीषणं प्राह वचनं रघुनन्दनः। राक्षसेन्द्र मया बाण रक्षार्थं भ्रामितं तव ॥५५॥ हतो रामो विमानेन ययौ शीघ्रं विहायसा। विभीषणेन रक्षार्थं तस्यैवानुमतेन च ॥५६॥ मच्चापरेखाऽप्यन्येषां दुःखोत्तीर्णा भविष्यसि। अमुं बाणं समादाय स्वं गृहाण विभीषण ॥५७॥ मम नामाङ्कितं तीक्ष्णं तव प्राणान् रक्षिष्यति। मच्चाप्या बाणहस्तो देत्यांस्त्रां धर्षयिष्यति ॥५८॥ महाबाणहस्तं त्वां कश्चिन्न रिपुर्धर्षयिष्यति। इत्युक्त्वा स ददौ बाणं विभीषणकरे प्रभुः ॥५९॥ प्रणनाम मुदा बाणं बाणहस्तो विभीषणः। ततो रामो विमानेन पश्यन् देशान् मनोरमान् ॥६०॥

जब रावणने इन्द्रसे संग्राम करके उसे पराजित किया, तब वह भी उस मूर्तिको इन्द्रसे छीन लाया और बहुत समय तक उसका पूजन करता रहा॥४३।४४॥ आज उसे ही विभीषणने रामको अर्पण कर दिया। रामचन्द्रने प्रसन्न उसे अपने पुष्पक विमानपर रक्खा॥४५॥ इसके पश्चात् अपने पति राम और लक्ष्मणानि देवरो तथा इन्द्र आदि इन्द्रवेध गाम स वा सब शिंशपा वृक्षके नीचे पहुँची, जहाँ रावणके हर ले जानेपर बहुत दिन तक रह चुका था। उस स्थानपर सीताने बतलाया कि यह वही स्थान है जहाँ आपसे वियुक्त होकर मैं बहुत दिन तक रही। यह कहकर रामचन्द्रसहित उनकी उँगली पकड़कर सीता अशोकवाटिका में इधर-उधर घूमती हुई उन स्थानोंको दिखाने लगी, जहाँ अनादि कृत्य करती थी। घूमती-घूमती सीता त्रिजटाके स्थानपर पहुँची और विविध प्रकारके वस्त्राभरणोंसे त्रिजटाका सत्कार किया॥४६-४९॥ जब त्रिजटा प्रसन्न हो गयी तो विभीषणकी स्त्री सरमासे सीताने कहा—जिस समय राक्षसियाँ अपना भयानक मुंह दिखाकर मुझे डराती रहतीं थीं, तब यह त्रिजटा ही मेरी रक्षा करती थी, हे सरमे ! मैं तुमसे विनयपूर्वक कहती हूँ कि सर्वदा तुम मेरी तरह इसका सम्मान करना। इतना कहकर सीताने त्रिजटाका हाथ सरमा के हाथोंने पकड़ा दिया ॥५०।५१॥ इस तरह घूम-फिरकर राम सीताके हाथ डेरेपर पहुँचे और लंका में मन्त्रीको राज्यकी देखभाल करनेके लिए छोड़कर विभीषणको अपने साथ लिये हुए ही अयोध्याको प्रस्थान कर दिया। अपने भक्त विभीषणके प्रार्थना करनेपर रामने उसकी रक्षाके लिए अपना धनुष उठाकर बड़े बांके साथ लंकाके चारो ओर घुमाया और इस प्रकार कहने लगे हे राक्षसेन्द्र, मैंने तुम्हारी रक्षाके लिये यह धनुष घुमाया है। मेरे धनुष री यह रेखा शत्रुओंके लिए दुस्तर होगी। तुम्हें यह बाण भी दे रहा हूँ इसे ग्रहण करो॥५२-५७॥ इसपर मेरा नाम लिखा हुआ है। यह सदा तुम्हारे प्राणोंका रक्षक होगा। एक बात और भी है, वह यह कि तुम इस बाणको लिए हुए मेरे धनुषको इस रेखाको लांघोगे तो तुम्हें यह कोई कष्ट नहीं पहुँचायेगी ॥५८। मेरा बाण जब लिये रहोगे, उस समय कोई शत्रु भी तुम्हारे ऊपर आक्रमण नहीं करेगा। इतना कहकर रामने अपना बाण विभीषणको दे दिया ॥५९॥ बाणको हाथोंमें लेकर विभीषणने रामको प्रणाम किया। इसके अनन्तर राम पुष्पक विमानपर