श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 441, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ६ ] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४२५
पूजितो दानमानैश्च नृपैः स्वनगरीं ययौ । तदा निनेदुर्वाद्वानि ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥६१॥ प्रत्युज्जगाम श्रीरामं यूपकेतुः समागतः । प्रासादशिखराङ्गलग्नाः पौरनार्यः सहस्रशः ॥६२॥ सीतां रामं निरीक्ष्याथ ववृषुः पुष्पवृष्टिभिः । ततो विवेश श्रीरामः सभां तां पार्थिवैः सह ॥६३॥ विवेश स्वीयगेहं सा जानकी तुप्रसन्नधीः । गेहे कायलजन्दैर्मात् रामो न्यवेशयत् ॥६४॥ एकदा राघवस्तुष्टः शत्रुघ्नाय हि तां दृढौ मंत्राउविमु पुरा न्यकर्मोभ नियमादिकान् ॥६५॥ मङ्गळ्ययामास मंत्रौस्तांश्चकार यथाविधि । उद्यापनन्यनेकानि सर्वेषा माङ्गळैर्मुदा ॥६६॥ एकदा मुनयः सर्वे यमुनातीरवासिनः । आजग्मु राघवं द्रष्टुं भयाल्लवणाक्षसः ॥६७॥ कुम्भाडग्रे तु मुनिश्रेष्ठ मार्गेपं च्यवनं द्विजाः । अमन्वान्ताः सशिष्यास्ते राघवद्ययकांक्षिणः ॥६८॥ तान् पूजयित्वा परया भक्त्या रघुकुलोद्वहः । उवाच मधुरं वाक्यं हर्षयन् मुनिमण्डलम् ॥६९॥ करवाणि मुनिश्रेष्ठाः किमागमनकारणम् । धन्योऽस्म्यद्य यदिह्यूयं मां प्रीत्या द्रष्टुमिहागताः ॥७०॥ सुदुष्करं वा यत्कार्यं भवतां त-करोम्यहम् । प्रताडयन्त मां अन्य ब्राह्मण दर्शनं हि मे ॥७१॥ तच्छ्रुत्वा सहसा हृष्टश्च्यवनो वाक्यमब्रवीत् । मधुर्नामा महादैत्यः पुरा राम कृते युगे ॥७२॥ आसीदतीव धर्मात्मा देवब्राह्मणपूजकः । तस्मै तुष्टो महादेवो दत्तं शूलमनुत्तमम् ॥७३॥ तं शूलानेन यं हन्सि स तु भस्मीभविष्यति । सवणगण्पुत्र तस्य भार्या कुंभीनसी स्मृता ॥७४॥ तस्यां तु लवणो नाम राक्षसो भीमविक्रमः । आसीद्रुद्रेण या दर्षतो देत्य क्षणात्मकः ॥७५॥ मधुः स तत्र हस्तेन सूनः पूर्वं यतस्तदा । मधुसूदनामाभवत् ख्यातस्तदनम ॥७६॥ पीडिता लवणेनाथ वयं त्वां शरणं गताः । तच्छ्रुत्वा राघवोऽप्याह मा भैष्टेति मुनिपुङ्गवाः ॥७७॥
बैठे और अनेक देशोंको देखते हुए अयोध्याको चल पड़े ॥ ६० ॥ राम उस जनक महाराजके भटको स्वीकार करत हुए व अपनी नगरीमे पहुँचे । रामके वहाँ पहुँचनेपर नाना प्रकारके बाजे बजे और अप्सरागण नाची ॥ ६१ ॥ यूपकेतु बहुतसे लोगोंके साथ फिरते हुए रामकी अगवानी करने पहुंचे । अयोध्यानिवासिनी नारियोंने कोठेपर चढ़कर सीता और रामका दर्शन कर करके उनपर फूलोंकी वृष्टि की । सब बाद राम अनेक महिपालोंके साथ अपने सभाभवनमें गये । सीता अपने महलमें चली गयीं । बादम रामचन्द्रज ने वहां रखिलवाराङ्गमूर्तिकी स्थापना की ॥६२-६४॥ एक दिन रामचन्द्रजात प्रसन्न होकर बड़े भक्ति पूर्वकसम दर १ मंचागत रामक विशामकालम जिन व्रतों और नियमांका मनोक्षा माना सो, उनका वर्णविधि विधान समेत सम्पन्न करके उनका उद्यापन भो पत्नके साथ किया ॥६५॥६६॥ एक दिन यमुना तटपर रहनेवाले सब ऋषि लवणासुर नामक राक्षससे भयभीत होकर रामके पास आये ॥ ६७ ॥ सब ऋषिन भगवन् दर्शन बुद्धिभ अपना अगुआ बनाया और हजारोंक अधिक संख्या में एकत्रित होकर रामके पास जा पहुंचे ॥ ६८ ॥ रामन उन ऋषियोंका विधिवत् पूजन किया और उनका प्रसन्न करत हुए इस प्रकार कहन लगे - 'हे मुनिगण आप लोग किस वास्ते मेरे पास आये हैं ? आपकी जो आज्ञा हो, उस पूर्ण करने में तत्पर हूँ। मैं अत्यन्त धन्य समझता हूँ जो आप सब मुझे दर्शनके लिए मेरे यहाँ पधारे ॥ ६९ । ७० ॥ यदि कोई अत्यन्त दुष्कर काय होगा तो उसको भी करनेके लिए बराबर प्रस्तुत हूं । क्योंकि ब्राह्मण महान्का दर्शन सदृश है । आपलोग बिना संकोच उच्चारिये, मुझ सेवकको आज्ञा दीजिए ॥ ७१ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर उनमेंसे च्यवन नामक ऋषि गद्गद होकर कहने लगे - 'हे राम ! बहुत दिन हुए, मधु नामका एक महादैत्य था। वह ब्राह्मणोंका पूजक एवं बड़ा धर्मात्मा था उसकी इस सद्वृत्ततास प्रसन्न होकर शिवजीने एक त्रिशूल दिया और कहा- ॥ ७२ । ७३ । तुम इस त्रिशूलसे जिसे मारोगे, वह भस्म हो जायगा। रावणके छोटे भाई कुम्भीनसी कुम्भीनसी नामकी भार्या थी । उससे लवण नामके एक राक्षसकी उत्पत्ति हुई । वह दुष्ट भारी दुराचारी दुष्ट हृदय देवताओं और ब्राह्मणोंके लिए दुखदायी है ॥ ७४-७५ ॥ भगवान् शंकरने कुम्भीनसी राक्षसको मारा था । इसलिए आपका मधुसूदन नाम पड़ा था । मधुके समान ही आज लवणासुरसे अकुलाकर हम आपको शरणमें आये