भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 446, कुल 811 में से

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पृष्ठ 446

४२० आनन्दरामायणे [ सर्ग ७


तैनातिपूजितो रामः शनैश्शनैर्न दक्षिणाम् । ययावब्धितटेनैव द्राविडं देशमुत्तमम् ॥२५॥ कृष्णातीरेप्रदेशांश्चान्वपश्यन् रामः शनैः शनैः । कांची ययौ विमानेन कंचुकंठोऽपि राघवम् ॥२६॥ पूजयामास विधिवत्स्वाद्याद्यैः सुहृदं निजम् । आरवारं महादेवं तथा तच्चोलमण्डलम् ॥२७॥ उल्लङ्घ्य श्रीरामस्तत्रस्थैः पूजितो नृपैः । ययौ स केरलान् ईशान्यैश्च कर्णाटकं ययौ ॥२८॥ पूजितो विजयेनापि विजयापुरस्वामिना । क्रौञ्चाख्यान्नृपान् जित्वा महाराष्ट्रं ययौ प्रभुः ॥२९॥ दुर्गं देवगिरिं नाम चकार स्ववशं क्षणात् । वश्यान्यान्यपि दुर्गाणि स्वाधीनान्यकरोद्विभुः ॥३०॥ कृत्वा विराट्देशं च देशान् विन्ध्याचलाश्रितान् । पश्यन् ययौ स रेवायास्तीरेणोङ्कारमीश्वरम् ॥३१॥ मालवस्थान्नृपान् जित्वा ययौ रामः स उज्जयाम् । उग्रबाहुं रणे जित्वा ययौ हैहयपत्तनम् ॥३२॥ जित्वा प्रतीपं श्रीरामः स ययौ हस्तिनापुरम् । एतस्मिन्नन्तरे सोमवंशजास्ते त्रयो नृपाः ॥३३॥ पुरूरवास्तथाऽनुरुच्चान्यसैन्येन वै पुरात् । रामेण संगरं कर्तुं नानावाहनसंस्थितः ॥३४॥ ववृषुर्वपुः शस्त्राणि पुष्पकस्थं रघूत्तमम् । युद्धं बभूव तैः साकं त्रिदिनं रोमहर्षणम् ॥३५॥ तदार्यद्रक्तपूर्णा सा जाह्नवी पापहारिणी । चतुर्थे दिवसे रामस्तान् जित्वा तत्पुरं ययौ ॥३६॥ सुषेणं वानराणां च वैद्यं वानरसेनया । गजाह्वये पुरे स्थाप्य तांस्त्रीन् सोमान्वयोद्भवान् ७॥ कारगृहस्थितान् कृत्वा सुग्राह्याशु रघूत्तमः । ययौ स मथुरां द्रष्टुं सुबाहुपरिपालिताम् ॥३८॥ दृष्ट्वा सुबाहुं राज्यस्थं विदिशानगरं ययौ । यूपकेतुं तत्र दृष्ट्वा राज्यस्थं तेन वन्दितः ॥३९॥ कुरुक्षेत्रं पुष्करं च दृष्ट्वा रामो विहायसा । मरुं च समतिक्रम्य ययौ गुर्जरामुत्तमम् ॥४०॥ प्रभासं च ततो गत्वा महादेवं ययौ ततः । गजाह्वयनगरं दृष्ट्वाऽङ्गदं राज्यपदस्थितम् ॥४१॥ धनरत्नैश्चित्रकेतुं दृष्ट्वा राज्यपदास्थितम् । आनर्त्तं च ययौ रामस्तत्स्थैः परिपूजितः ॥४२॥


अपने स्थान से, व पुष्पक विमानपर सवार होकर गन्धके साथ साथ चले ॥ २३॥ मगध देशको लांघकर राम शस्तक अनेक देशोंको देखा हुआ भूरिकीर्ति नामक राजाकी राजधानीमें पहुंचे ॥ २४॥ उनसे पूजित होकर विमान द्वारा धीरे धीरे दक्षिण दिशाकी ओर समुद्रतटसे चलकर द्राविड़ देशमे जा पहुंचे ॥ २५॥ कृष्णा नदीके आस पासवाले देशोंको दखते हुए राम काशिकाश जा पहुंचे। वहां कञ्चुकण्ठ नामके राजाने उनका आदर-सत्कार किया और फिर वहाँसे आरवार महादेव और चोलदेशको लांघकर ॥ २६ ॥ २७॥ वहाँके राजाओंसे पूजित होते हुए केरल देशको गए वहां विजयपुरम रहनेवाले विजय नामके राजासे पूजित होकर क्रौञ्चाख्यदेशके रहनेवाले राजाओंको परास्त कर महाराष्ट्रमें पहुंचे ॥२८ ॥ २९॥ वहाँ देवगिरि नामके किलेको क्षणभरमें अपने अधीन करके और भी बहुतसे किलोंको अपने कब्जेमें कर लिया ॥ ३०॥ इसके अनन्तर विराट देश नामक विन्ध्याचलके आसपासवाले देशोंको देखते हुए रेवातटसे ओंकारेश्वर पहुंचे। यहाँ मालव देशके राजाओंको जीतकर उज्जैनको गए। वहींपर राजा उग्रबाहुके जीतकर हैहयनगरमें गये ॥ ३१ ॥ ३२॥ उसके समीपवर्ती राजाओंको ... कर श्री रामचन्द्र हस्तिनापुरमें पहुंचे, तिमें सोमवंशी तीन राजे तथा पुरूरवा नामके राजा घंटा... सेना लेकर रामचन्द्रसे युद्ध करनेके लिए आ पहुंचे ॥ ३३ ॥ ३४॥ वहाँ पहुंचते ही पुष्पक विमानपर बैठे हुए रामके ऊपर उन लोगोने शस्त्रोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी। तब उनके साथ रामने तीन दिन तक लोमहर्षण युद्ध किया। उस समय जाह्नवी रक्तसे पूर्ण हो गयी थी। चौथे दिन रामने उनको परास्त करके उनकी पुरीपर अधिकार कर लिया ॥ ३५ ॥ ३६॥ हस्तिनापुरीमें बानरोंके वैद्य सुषेणको गद्दीपर बिठाकर सोमवंशी राजाओंको जेलमें ठूंस दिया और वहाँसे सुबाहु परिपालित मथुरा पुरीको देखनेके लिए गये । ३७। ३८॥ सुबाहुको राजगद्दीपर आसीन देखकर विदिशा नगरको गये, वहां यूपकेतुने रामका विधिवत् आदर सत्कार किया वहाँसे कुरुक्षेत्र पुष्कर आदि तीर्थोंको देखकर आकाशमार्गसे रामचन्द्रजी मरुदेशका लंघन हुए गुजरात गये ॥ ३९ । ४० ॥ फिर प्रभासक्षेत्र आकर मरुदेश गये। वहाँ राजखपुरमें अङ्गदको राज्यासनपर रखकर घनरत्न नामक नगरके राज्यासनपर बैठे हुए चित्रकेतुको देखा।

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