श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 449, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ८ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ५३३
जनकजाजानिरुपययौ पश्चिमाभिमुखः ॥ १६ ॥ अथ मेरोः पश्चिमदिक्संस्थितं माल्यवन्तं पर्वतं द्विसहस्रयोजनविस्तीर्णं चतुस्त्रिंशत्सहस्रयोजनदीर्घमतिक्रमणीयं स जनकजाजनो नयनगोचरं चकार ॥ १७ ॥ ततश्चिमनः केतुमालं नाम षष्ठं वर्षं एकत्रिंशत्सहस्रयोजनविस्तीर्णं चतुस्त्रिंशत्स- हस्रयोजनदीर्घं कामदेवोपास्यलक्ष्म्युपासिकाममर्षाणस्तमनोहरं स रामचन्द्रोऽनुजगाम ॥ १८ । तद्वर्षनृपसमूहमुकुटावतंसपरागपूजितचरणारविन्दयुगलः स रघुकुलदीपकः सीतया पुष्पकमण्डि- तमुदमाप ॥ १९ ॥ अथ मेरोरुत्तरतः स नीलपर्वतं द्विसहस्रयोजनविस्तीर्णं नवतिसहस्रयोजनदीर्घं रघुकुलतिलको नयनविषयं चकार । २० ॥ अथ रम्यकं नाम सप्तमं वर्षं नवसहस्रयोजनपरिमितं मत्स्योपास्यमनूणामकशियानमधितिष्ठितः स रघुनन्दन उपजगाम ॥ २१ ॥ तत्रत्यैर्नृपतिभिः स्वको- शादिपूजितः स रघुनायकः सीतां सुखयन् पुरतोऽनुससार ॥ २२ ॥ तस्योत्तरतः श्वेतपर्वतं द्विसहस्र- योजनविस्तीर्णमष्टाशीतिसहस्रयोजनदीर्घमतिक्रमणीयं स स्वलोचनविषयं चकार । २३ । अथ हिरण्मयं नामाष्टमं वर्षं नवसहस्रयोजनपरिमितं कूर्मोपास्यार्यमोपासक्रमधितिष्ठितमतिक्रमणीयं स समुपययौ । २४ ॥ तद्वर्षगामिन्नृपदंयित्ताभिरांगभूपप्रमपिजेन्यो द्वापि जानकीचरणारविन्दयुगलवीक्षमाणः स रघुनन्दनो मुदमाप ॥ २५ ॥ तस्योत्तरतः शृङ्गवन्तं पर्वत द्विसहस्रयोजनविस्तीर्णं त्रिसप्ततिसहस्र- योजनदीर्घं स रघुनन्दनो ददर्श ॥ २६ ॥ अथोत्तरकुरुवर्षं नवमं नवसहस्रयोजनपरिमितं वाराहोपास्यभूम्युपासिकाममधितिष्ठितमनोहरं स रामचन्द्रस्तमनुययौ ॥ २७ ॥ तद्वर्षवासिकृत्स्न- पिताववन्नृपमदावनपमपिमुनकाविशिजपदनचरुहद्वंद्वः स रघुनायको मुदमाप । २८ ॥ अथ रामो लवं जम्बूद्वीपपतिं कृतियानीति निश्चित्य कियदद्दिनं तदधिकारे विजय नाम स्वमन्त्रिणं स्थापयामास ॥ २९ ॥ एतेषां जम्बूद्वीपांतर्गतवर्षाणां तथा मर्यादापर्वतनववर्षाणां यानि यानि नामानि
राजाओंके साथ साम संग्राम किया और बहुतोंका शरणम आ जानपर क्षमा प्रदान किया तदनन्तर शयन कर लेते हुए वहांसे लौटकर पश्चिम दिशाकी ओर बढ़े ॥ १६ । इसके बाद मह पर्वतके पश्चिम माल्यवान् पर्वतपर पहुंचे, जो दो हजार योजन विस्तृत तथा चौंतीस हजार योजना लम्बा था ॥ १७ ॥ इसके आगे केतुमाल नामक छठ देशमें पहुंचे, जो इकतीस हजार योजन विस्तृत एवं चौंतीस हजार याजन लम्बा था और वहीं कामदेवकी उपासिकाएँ रहती थीं ॥ १८ जब उस देशके राजाओंने अपना मुकुटाभिमंडित मस्तक रामचन्द्रजीके चरणोंपर रख दिया तो सीता तथा रामको बड़ा प्रसन्नता हुई ॥ १९ ॥ फिर मेरु पर्वतके उत्तर ओर विराजमान नील पर्वतको देखा, जो दो हजार योजन विस्तृत तथा नब्बे हजार योजन लम्बा था ॥ २० ॥ इसके अनन्तर रम्यक नामके सातवें देशमे पहुंचे, जो नौ हजार योजन विस्तृत था । वहीं मत्स्यभगवान्के बहुतस उपासक लोग रहा करते थे ॥ २१ ॥ वहाँके राजाओने अपना राज्यादि देकर रामकी पूजा की और रघुनाथजी सीताको प्रसन्न करते हुए आगे बढ़े ॥ २२ ॥ उनके उत्तर ओर रामने श्वेत पर्वतको देखा, जो दो हजार योजन विस्तृत तथा इक्यासी हजार याजन लम्बा था ॥ २३ । इसके बाद हिरण्मय नामके आठवें देशमे पहुंचे, जहाँ अधिकांश कूर्म भगवान् तथा सूर्य नारायणक उपासक लोग रहा करते थे ॥ २४ ॥ उस देशके राजाओंकी स्त्रियोन सब जानकीक चरणोम मस्तक रखकर प्रणाम किया तो रामचन्द्रजाको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ २५ ॥ उसक उत्तर दो हजार योजन विस्तृत तथा त्रिहत्तर हजार याजन लम्बा शृङ्गवान् नामक पर्वतको देखा ॥ २६ । इसके अनन्तर नवें देश उत्तर कुरुम पहुंचे, जो हजार योजन लम्बा-चौड़ा था । वहीं वाराह भगवान्के उपासक तथा भूमिकी उपासिका स्त्रियां रहा करती थीं ॥ २७ ॥ जब उस देशके राजे तथा प्रजाने भयसे कांपकर रामके चरणोंमें लोट गये, तब रामको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ २८ ॥ इसके बाद रामने जम्बूद्वीपके राजाको मार डाला और मनमे यह निश्चय किया कि यहाँसे लौटकर अयोध्या पहुंचनेपर लवको जम्बूद्वीपका अधिपति बनाऊंगा। तबतक कुछ दिनोंके लिए अपने विजय नामके मन्त्रीको वहाँकी देख भाल करनेके लिए छोड़ दिया ॥ २९ ॥ जम्बूद्वीपके अन्तर्गत जितने राज्य थे, वे सब प्रियव्रत नामक राजाके पौत्रोंके नामसे प्रसिद्ध