भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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४३४आनन्दरामायणे[ सर्गः ८

तानि प्रियव्रतनृपपौत्रनामसूचितानि सन्ति । तेषु ये ये नृपा जायन्ते ते तद्वर्णनामयुक्ता एव भवन्त्यतः सर्वेषां पृथक् नामानि मयाऽत्र नोच्यन्ते ॥ ३० ॥ एवं जम्बूद्वीपमायामविस्ताराभ्यां लक्षयोजनपरिमितमनिकपनीयं समवर्तुलं पुष्करपत्रोपमं नववर्षमण्डितं स रघुनायकः स्ववशं चकार ॥ ३१ ॥ मेरुपर्वताग्रेऽष्टपुर्योऽष्टदिक्पालानां संति । तन्पालकाः मुग्धाश्चाग्नियमनिर्रतिवरुणवायु- कुबेरेशास्ते सर्वे ममाज्ञां परिपालयन्विति निश्चित्य स रघुनायकस्मान प्रति जगाम ॥ ३२ ॥ ता अष्टपुर्यः पृथक् पृथक् सार्धद्विसहस्रयोजनपरिमाणेनायामविस्तारतो ज्ञातव्याः ॥ ३३ ॥ मेरुलक्षयोजनयुक्तो मूर्ध्नि द्वात्रिंशत्सहस्रयोजनविततो मूले षोडशसहस्रयोजनविततश्चाधः षोडश- सहस्रयोजनमितो भूम्यां प्रविष्टश्चतुरशीतिसहस्रयोजनमितो भूम्या बहिर्धतूरापुष्पवद्दृश्यते ॥ ३४ ॥ तत्र मेरुपर्वतग्रेऽष्टदिक्पुरीणां मध्ये ब्रह्मपुरी दशसहस्रयोजनायामविस्तारतो ज्ञातव्या ॥ ३५ ॥ सर्वे वर्षमर्यादीभूताष्टपर्वता दशसहस्रयोजनसमुन्नता ज्ञातव्याः । ३६ । वर्षदीर्घेना पर्वतासमाना ज्ञातव्या ॥ ३७ ॥ जम्बूद्वीपस्योपद्वीपानष्टौ हैक उपदिशंति ॥ ३८ । सगरस्तनयानन्वेषण क्षां महीं परितो निखनद्भिरूपकल्पितान् ॥ ३९ ॥ तद्यथा स्वर्णप्रस्थः चन्द्रशुक्ल आवर्तनो रमणकः मन्दरहरिणः पाञ्चजन्य सिंहलो लङ्का चेति ॥ ४० । तेषु लङ्कां विना मप्रसु यदा यद्यत्समीपं यदा तत्र तत्र गत्वा तत्तस्थानुपद्वीपपालकान् श्रीरामचन्द्रः स्ववशांश्चकार । ४१ । भारतेला- वृतवर्षाभ्यां विना सप्तसु वर्षेष्वसंख्याका नद्यो गिरयश्च संति । तेषां विस्तार को वक्तुं क्षमः ॥४२॥ अथैलावृतसंस्थिता मुख्यनद्य एवोच्यन्त । ४३ ।। अरुणोदाजंबुनदी पयोदसिधुमधुगुड़ान्नांबर- छाव्यासनाभरणसंज्ञा नदास्तदा पञ्च मधुधास्रान्वस्तथा सीताऽलकनंदाचक्षुर्भद्रेति मेरोरधश्चतुर्दिक्षु पतिता जाह्नवीभेदाश्चत्वार एवमिलावृतनद्यः ॥४४। तासु मीता पूर्वसमुद्रं चक्षुभद्रा पश्चिमसमुद्रं महोक्षगसमुद्रमलकनंदा दक्षिणस्यां दिशि शास्ते वर्ष जलनिधि प्रविशति ॥ ४५ ॥ भारतेऽस्मिन्


थे । जहाँका जो राजा था, उसीके नामसे वह राज्य विख्यात था। इसीलिये सबका अलग-अलग नाम मै नही बतला रहा हूँ ॥ ३० ॥ इस प्रकार एक लक्ष योजन लम्बा चौडा, अतिशय सुन्दर एवं वर्तुलाकार कमल- पत्रके समान विराजमान जम्बूद्वीपको उन्होंने जीत लिया ॥ ३१ ॥ मेरुपर्वतके आगे आठ दिक्पालोंकी आठ पुरियां है। वे सब भी मेरी आज्ञाका पालन करें। ऐसा विचारके रामचन्द्रजी आगे बढ़े ॥ ३२ ॥ वे आठों पुरियाँ अलग-अलग अढाई अढाई हजार योजन लम्बी चौड़ा है। मेरु पर्वत एक लाख योजन ऊँचा है और उसकी चोटीपर बत्तीस हजार योजन लम्बा चौड़ा मैदान है। नीचे सोलह हजार योजन विस्तृत है और सोलह ही हजार योजन वह पृथ्वीके भीतर समाया हुआ है चौरासी हजार योजनको लम्बाई चौड़ाईवाला यह पर्वत धतूरेके फूलकी तरह दीखता है ॥ ३३ ॥ ३४ मेरुपर्वतके आगे पूर्वोक्त आठ पुरियोंके ब्रह्मपुरीकी लंबाई- चौड़ाई विस्तारम ठीक दस हजार योजन है । ३५ ॥ जिन-जिन पर्वतोंपर वे आठों पुरियाँ हैं, वे प्रत्येक पर्वत दस-दस हजार योजन ऊँच हैं ॥ ३६ । प्रत्येक पुरीका विस्तार पर्वतके विस्तारकी तरह ही समझना चाहिए । ३७॥ जंबूद्वीपके भी आठ उपद्वीप हैं ॥३८॥ जिस समय महाराज सगरके साठ हजार पुत्र समुद्रको खोद रहे थे, तब उन्होंने ही इन द्वीपोंकी रचना की थी । ३९ । उन आठ द्वीपकि नाम इस प्रकार हैं स्वर्णप्रस्थ, चंद्रशुक्ल, आवर्त रमणक, मन्दरहरिण पाञ्चजन्य, सिंहल और लङ्का ॥ ४० ॥ इनमेंसे लङ्काको छोड़कर शेष सब द्वीपोंमें आकर वहांके राजाओंको रामने अपने वशम कर लिया । ४१ । भारत और इलावृतको छोड़कर सातो देशोंमें असंख्य पर्वत और नदियाँ है, जिनका विस्तार बतलाना कोई समर्थ नही है। ४२ । इलावृत द्वीपमें जो मुख्य मुख्य नदियाँ हैं, उन्हें ही हम बतलाते हैं। वे हैं-॥ ४३ ॥ अरुणीदा, जंबूनदी, दूध, घी, मधु गुड़, अन्न, वस्त्र, शय्या, आसन और आभरणसंज्ञक नदियां हैं, इनमें पाँच नदियाँ तो ऐसी हैं, जिनमें सदा मधुकी धारा बहती रहती है। मेरु पर्वतसे सीता, अलकनंदा, चक्षु, भद्रा तथा जाह्नवी ये पाँच नदियाँ निकली है