भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 452, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 452

४३६ आनन्दरामायणे • [सर्गः ९

मेरोः पूर्वदिशायां वै तत्र वर्षं शिवाङ्गकम् । आदौ ययौ रामचन्द्रः क्षणादेव विहायसा ॥ ४ ॥ नदी यत्राऽरुणा नाम्नी सर्वपापप्रणाशिनी । तस्यां स्नात्वा रघुश्रेष्ठः शीघ्रं तद्वर्षपं ययौ ॥ ५ ॥ तेन वर्षाधिपेनैव युद्धमासीत्सुदारुणम् । तं जित्वा पञ्चमासेंश्च तैश्च पार्थिवसत्तमैः ॥ ६ ॥ पूजितो रघुनाथस्तु वज्रकूटाचलं ययौ । वज्रकूटं महाश्रेष्ठं द्वयोः सागरयोः स्थितम् ॥ ७ ॥ परस्परं वर्षयोश्च सीमाभूतं ददर्श सः । तं गिरि पृष्ठतः कृत्वा वर्षं पयसमं ययौ ॥ ८ ॥ नुम्णानदीजले स्नात्वा ययौ यावयसेश्वरम् । तेन सम्पूजितो रामस्ततस्तद्वर्षपार्थिवैः ॥ ९ ॥ सहितः पुष्पकैनैवमुपेंद्रसेनपर्वतम् । दृष्ट्वा कृत्वा पृष्ठतस्तं सुभद्रं वर्षमाययौ ॥ १० ॥ अगौग्मींनदीतोये स्नात्वा स रघूनायकः । वर्षाधिपेन कोशैः संपूजितः पार्थिवैः सह ॥ ११ ॥ ज्योतिष्मन्तं गिरि गत्वा तं कृत्वा पृष्ठतः क्षणात् । शान्तिवर्षेश्च सावित्रानदीतोये विगाह्य च ॥ १२ ॥ तद्वर्षेशं नृपं जित्वा तथा तद्वर्षसंस्थितान् । नृपान् जित्वा क्षणादेव सुवर्णपर्वतं ययौ ॥ १३ ॥ ततो गत्वा क्षेमवर्षं सुप्रभातानदीजले । स्नात्वा रामः क्षेमपेन स्वकोशैः परिपूजितः ॥ १४ ॥ हिरण्यग्रीवनामानं गिरि रम्यं विलंघ्य च । वयऽमृते तन्नृपेण पार्थिवैः परिपूजितः ॥ १५ ॥ ऋतंभरानदीतोये चकार स्नानमादरात् मेघमालं गिरि त्यक्त्वा पृष्ठतः पुष्पकेण हि ॥ १६ ॥ वर्षेऽभये तन्नृपतिं क्षणाञ्जित्वा रणे प्रभुः । सत्यधरानदीतोये स्नात्वा स रघूत्तमः ॥ १७ ॥ सुचंद्राख्यं नृपं प्लक्षद्वीपेशं तीक्ष्णसङ्गरैः । कृत्वा तं स्वपदाक्रान्तं तेन तद्द्द्दीपपार्थिवैः ॥ १८ ॥ मणिष्टूटं गिरिवरं समातिक्रम्य वै क्षणात् । इक्षुरसोदनामानं द्विलक्षयोजनं वरम् ॥ १९ ॥ तीर्त्वा तं सागरं भीमं प्लक्षस्य परिखोपमम् । तथा च शाल्मलीद्वीप चतुर्लक्षमितं ययौ ॥ २० ॥ द्वीपस्तुरूपवान्कुत्र यत्रास्ति शाल्मली द्वीपपादपः । यत्रोपास्थ्यश्च सोमोऽस्ति तत्रस्थास्तदुपासकाः ॥ २१ ॥ विस्तारद्दीपमानानि दीर्घतायाः स्मृतानि च । तत्र क्रमेण वर्षाणि कथ्यते पूर्ववन्मया ॥ २२ ॥


लवण समुद्र घेरे हुए था। ३ ॥ मंदरपर्वतकी पूर्व ओर प्लक्षद्वीपमें शिवाङ्कक नामका एक देश था। रामचन्द्रजी क्षणमात्रमें आकाशमार्गसे वहाँ पहुंचे। ४ ॥ वहाँपर सब पापोंका नाश करनेवाली अरुणा नदी बहती थी। जिस-में उन्होंने स्नान किया और उस देशके राजाके पास गये। ५ ॥ उस राजाके साथ रामका भयंकर युद्ध छिड़ गया। पाँच महीनेतक घमासान युद्ध होनेके पश्चात् वहाँका राजा रामके वशमें आ गया और उसने उनकी पूजा की ॥ ६ ॥ फिर वहाँसे वज्रकूटाचलपर गये। वह पर्वत दो सागरोंके बीचमें स्थित होकर दोनों देशोंकी सीमा-का काम कर रहा था। उसको लाँघकर पयसम नामक देशको गये ॥ ७॥८॥ वहाँ उन्होंने नुम्णा नदीमें स्नान किया और थवयस देशवाले राजाके पास गये। उसने रामकी पूजा की। इसके बाद रामने वहाँके भी बहुतसे राजाओंको अपने पुष्पक विमानपर बिठा लिया और आगे उपेन्द्रसेन नामक पर्वतपर पहुंचे। उसे देखकर वे सुभद्र देशको गये। ९॥ १०॥ वहाँ आगस्तं नदीमें स्नान करनेके पश्चात् वहाँके राजासे मिले। उसने बहुतसे धनका व्यय करके रामचन्द्र तथा उनके साथवाले राजाओंका सत्कार किया। ११ ॥ फिर ज्योतिष्मान् नामक पर्वतको लाँघकर वे शान्तिदेशको गये। वहाँ सावित्री नदीमें स्नान करके उस देशके राजाको परास्त किया और उसके आगे सुवर्ण पर्वतपर गये। वहाँसे क्षेमदेशमें पहुंचे। वहाँ रामने सुप्रभाता नामकी नदीमें स्नान किया और क्षेमदेशके राजाने रामका विधिवत् पूजन किया ॥ १२-१५ ॥ इसके अनन्तर ऋतंभरा नदीमें स्नान करके मेघमाल नामके पर्वतको लाँघते हुए राम अभय देशमें पहुंचे। वहाँके राजाको क्षणमात्रमें जीतकर सत्यधरा नदीम स्नान किया। फिर सुचन्द्र नामक राजा जो प्लक्षद्वीपका शासक था उसे भयानक युद्धमें हराकर वहाँके बहुत-से राजाओंको अपने साथ लेकर इक्षुरसोद नामके भयंकर समुद्रको पार किया। वह प्लक्षद्वीपकी खाईके समान दो लाख योजन विस्तृत था। वहाँसे चलकर शाल्मली द्वीपमें पहुंचे, जो चार लाख योजन विस्तृत था। १६-२० ॥ वहाँ एक विशालका शाल्मली (सेमर) का