श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 453, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ९] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४३७
मेरोः पूर्वदिशामारभ्य सर्वत्र क्रम उच्यते सुलोचनं सौमनस्यं तथा रम्यकं शुभम् ॥२३॥
देववर्षं पारिभद्रमाप्यायनमनुत्तमम् । अविज्ञातं सप्तमं च सप्त वर्षाणि वै क्रमात् ॥ २४॥
अनुमती सिनीवाली तथैव च सरस्वती । कुहूश्च रजनी नन्दा च राका नद्यः प्रकीर्त्तिताः ॥२५॥
शतशृङ्गो वामदेवो कुन्दश्च कुमुदस्तथा । पुष्पवर्षः पदभ्रश्च सहस्रश्रुतिनभसः ।२६॥
स्वरसः पर्वता सप्त ज्ञेयाः सीमासु वै क्रमात् । एतेषु सप्तवर्षेषु वर्षपानान् विजित्य सः ॥२७॥
जित्वा द्वीपेश्वरं रामः सुबाहुं मुदमभ्ययात् । सुरोदं च चतुर्लक्षमितं तीर्त्वा पयोनिधिम् ॥२८॥
कुशद्वीपं महालक्षमितं रामो ययौ क्षणात् । तत्रोपास्यो जातवेदाः सर्वेषां द्वीपवासिनाम् ॥२९॥
द्वीपाख्याकृच्च यत्रास्ति कुशस्तम्बः सुरैः कृतः । तत्र क्रमेण वर्षाणि कीर्त्यन्ते सप्त वै मया ३०॥
बर्भू च वसुदानं च तथा दृढरुचिं शुभम् । नाभिगुप्तं तथा सत्यव्रतं विविक्तमत्तमम् ॥३१॥
वामदेवं सप्तमं च वर्षं ज्ञेयं क्रमेण हि । मस्कुल्या मधुकुल्या मित्रविंदा नदी शुभा ॥३२॥
श्रुतिविंदा देवगर्भा तथा चैव धूतच्युता । मंत्रमाला क्रमाद्य नद्यः सप्तसु वै क्रमात् ॥३३॥
वतुःशृङ्गः कपिलाश्चित्रकूटो मनोरमः । देहानीक ऊर्ध्वरोमा द्रविणश्चक्र ईरितः ॥३४॥
एते सीमासु वर्षाणां गिरयः सप्त वै क्रमात् । एतेषु सप्तवर्षेषु मन्त्रितान्वार्थिवोनभान् । ३५॥
राघवः समरे जित्वा लब्ध्वा चानुत्तमं यशः । कुशद्वीपपतिं जित्वा महासेनं तुतोष सः । ३६॥
अष्टलक्षमितं तीर्त्वा घृतोदं सागश्रोत्तमम् । क्रौञ्चद्वीपं ययौ रामः पुष्पकेणातिभास्वता । ३७।
कुशद्वीपाच्च स ज्ञेयो द्विगुणो द्वीप उत्तमः । द्वीपाख्याकृच्च यत्रास्ति क्रौञ्चनामा गिरिर्महान् । ३८॥
यत्रोपास्योऽस्मयो देवो हविष्मद्वीपवासिनाम् । तत्रापि सप्त वर्षाणि कथ्यंतेऽथ क्रमेण हि ॥३९॥
शामं मधुरूहं मेघपृष्ठं चैव मनोहरम् । सुभ्रमानं च भ्राजिष्ठ लोहिताणं वनस्पतिम् ॥४०॥
युक्त था। इसीलिए वह देश शल्मली द्वीपके नामसे विख्यात था वहाँ चन्द्रदेव सब के आराध्य देवता हैं और वहाँके निवासी चन्द्रमाकी ही उपासना करते हैं। पीछे जिन द्वीपोंका जो विस्तार कह आये हैं, उन्हींके अनुसार यह भी विस्तृत था, वहाँके जो देश हैं, अब उनको बतलाता हूँ ॥ २१ ॥ २२ ॥ मेरुके पूर्व ओरसे लेकर क्रमशः सब देशोंका नाम कहूँगा। जैसे—सुलोचन, सौमनस्य, रम्यक, देववर्ष, पारिभद्र, आप्यायन और अविज्ञात ये सात देश उस द्वीपमें हैं ॥ २३ ॥ २४ ॥ वहाँपर अनुमती, सिनीवाली, सरस्वती, कुहू, रजनी, नन्दा और राका ये नदियाँ हैं ॥ २५ ॥ शतशृङ्ग, वामदेव, कुन्द, कुमुद, पुष्पवर्ष, सहस्रश्रुति और स्वरस ये उस देशके सात पर्वत हैं जो उसकी सीमाका काम कर रहे हैं। इन सातों देशोंके राजाओंको रामने जीत लिया ॥ २६ ॥ २७ ॥ इसके अनन्तर उस द्वीपके अधीश्वरको जीतकर चार लाख योजनके लगभग लम्बे-चौड़े सुरोदसमुद्रको लाँघकर वे सुबाहुके पास पहुँचे ॥ २८ ॥ फिर क्षणमात्रमें राम आठ लाख योजन विस्तृत समुद्रको लांघकर कुशद्वीप गये । उस द्वीपके समस्त निवासी अग्निके उपासक हैं ॥ २९ । द्वीपके नामका स्पष्ट करनेके लिए वहाँपर एक कुशका जंगल देवताओं द्वारा लगाया हुआ है। अब वहाँके जो सात देश हैं, उनको बतलाते हैं— ३० । बभ्रु, वसुदान, दृढरुचि, नाभिगुप्त, सत्यव्रत, विविक्त और सातवाँ वामदेव नामक देश हैं। उन सातों देशोंमें मस्कुल्या, मधुकुल्या, मित्रविन्दा, श्रुतिविन्दा, देवगर्भा, धूतच्युता तथा मन्त्रमाला ये सात नदियां हैं, बभ्रु शृङ्ग, कपिल, चित्रकूट, देवानीक, ऊर्ध्वरोमा, द्रविण और चक्र ये सात पर्वत उस द्वीपमें हैं ॥ ३१-३४ ॥ इन सातों देशोंके राजाओंको रामने जीतकर कुशद्वीपके अधिपति महासेन नामक राजाको उन्होंने जीत लिया। इससे रामको प्रसन्नता हुई । ३५ ॥ ३६ ॥ फिर आठ लाख योजन विशाल घृतोद सागरको पार करके वे अपने देदीप्यमान पुष्पक विमान द्वारा क्रौञ्चद्वीप गये ॥ ३७ ॥ कुशद्वीपकी अपेक्षा यह द्वीप दूना लम्बा-चौड़ा है। वहाँ उस द्वीपका नाम सार्थक करनेके लिये एक विशाल क्रौञ्च पर्वत है ॥ ३८ ॥ वहाँके समस्त निवासी वरुणके उपासक हैं और विष्णुभगवान्