श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ९] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४३७
मेरोः पूर्वदिशामारभ्य सर्वत्र क्रम उच्यते सुलोचनं सौमनस्यं तथा रम्यकं शुभम् ॥२३॥
देववर्षं पारिभद्रमाप्यायनमनुत्तमम् । अविज्ञातं सप्तमं च सप्त वर्षाणि वै क्रमात् ॥ २४॥
अनुमती सिनीवाली तथैव च सरस्वती । कुहूश्च रजनी नन्दा च राका नद्यः प्रकीर्त्तिताः ॥२५॥
शतशृङ्गो वामदेवो कुन्दश्च कुमुदस्तथा । पुष्पवर्षः पदभ्रश्च सहस्रश्रुतिनभसः ।२६॥
स्वरसः पर्वता सप्त ज्ञेयाः सीमासु वै क्रमात् । एतेषु सप्तवर्षेषु वर्षपानान् विजित्य सः ॥२७॥
जित्वा द्वीपेश्वरं रामः सुबाहुं मुदमभ्ययात् । सुरोदं च चतुर्लक्षमितं तीर्त्वा पयोनिधिम् ॥२८॥
कुशद्वीपं महालक्षमितं रामो ययौ क्षणात् । तत्रोपास्यो जातवेदाः सर्वेषां द्वीपवासिनाम् ॥२९॥
द्वीपाख्याकृच्च यत्रास्ति कुशस्तम्बः सुरैः कृतः । तत्र क्रमेण वर्षाणि कीर्त्यन्ते सप्त वै मया ३०॥
बर्भू च वसुदानं च तथा दृढरुचिं शुभम् । नाभिगुप्तं तथा सत्यव्रतं विविक्तमत्तमम् ॥३१॥
वामदेवं सप्तमं च वर्षं ज्ञेयं क्रमेण हि । मस्कुल्या मधुकुल्या मित्रविंदा नदी शुभा ॥३२॥
श्रुतिविंदा देवगर्भा तथा चैव धूतच्युता । मंत्रमाला क्रमाद्य नद्यः सप्तसु वै क्रमात् ॥३३॥
वतुःशृङ्गः कपिलाश्चित्रकूटो मनोरमः । देहानीक ऊर्ध्वरोमा द्रविणश्चक्र ईरितः ॥३४॥
एते सीमासु वर्षाणां गिरयः सप्त वै क्रमात् । एतेषु सप्तवर्षेषु मन्त्रितान्वार्थिवोनभान् । ३५॥
राघवः समरे जित्वा लब्ध्वा चानुत्तमं यशः । कुशद्वीपपतिं जित्वा महासेनं तुतोष सः । ३६॥
अष्टलक्षमितं तीर्त्वा घृतोदं सागश्रोत्तमम् । क्रौञ्चद्वीपं ययौ रामः पुष्पकेणातिभास्वता । ३७।
कुशद्वीपाच्च स ज्ञेयो द्विगुणो द्वीप उत्तमः । द्वीपाख्याकृच्च यत्रास्ति क्रौञ्चनामा गिरिर्महान् । ३८॥
यत्रोपास्योऽस्मयो देवो हविष्मद्वीपवासिनाम् । तत्रापि सप्त वर्षाणि कथ्यंतेऽथ क्रमेण हि ॥३९॥
शामं मधुरूहं मेघपृष्ठं चैव मनोहरम् । सुभ्रमानं च भ्राजिष्ठ लोहिताणं वनस्पतिम् ॥४०॥
युक्त था। इसीलिए वह देश शल्मली द्वीपके नामसे विख्यात था वहाँ चन्द्रदेव सब के आराध्य देवता हैं और वहाँके निवासी चन्द्रमाकी ही उपासना करते हैं। पीछे जिन द्वीपोंका जो विस्तार कह आये हैं, उन्हींके अनुसार यह भी विस्तृत था, वहाँके जो देश हैं, अब उनको बतलाता हूँ ॥ २१ ॥ २२ ॥ मेरुके पूर्व ओरसे लेकर क्रमशः सब देशोंका नाम कहूँगा। जैसे—सुलोचन, सौमनस्य, रम्यक, देववर्ष, पारिभद्र, आप्यायन और अविज्ञात ये सात देश उस द्वीपमें हैं ॥ २३ ॥ २४ ॥ वहाँपर अनुमती, सिनीवाली, सरस्वती, कुहू, रजनी, नन्दा और राका ये नदियाँ हैं ॥ २५ ॥ शतशृङ्ग, वामदेव, कुन्द, कुमुद, पुष्पवर्ष, सहस्रश्रुति और स्वरस ये उस देशके सात पर्वत हैं जो उसकी सीमाका काम कर रहे हैं। इन सातों देशोंके राजाओंको रामने जीत लिया ॥ २६ ॥ २७ ॥ इसके अनन्तर उस द्वीपके अधीश्वरको जीतकर चार लाख योजनके लगभग लम्बे-चौड़े सुरोदसमुद्रको लाँघकर वे सुबाहुके पास पहुँचे ॥ २८ ॥ फिर क्षणमात्रमें राम आठ लाख योजन विस्तृत समुद्रको लांघकर कुशद्वीप गये । उस द्वीपके समस्त निवासी अग्निके उपासक हैं ॥ २९ । द्वीपके नामका स्पष्ट करनेके लिए वहाँपर एक कुशका जंगल देवताओं द्वारा लगाया हुआ है। अब वहाँके जो सात देश हैं, उनको बतलाते हैं— ३० । बभ्रु, वसुदान, दृढरुचि, नाभिगुप्त, सत्यव्रत, विविक्त और सातवाँ वामदेव नामक देश हैं। उन सातों देशोंमें मस्कुल्या, मधुकुल्या, मित्रविन्दा, श्रुतिविन्दा, देवगर्भा, धूतच्युता तथा मन्त्रमाला ये सात नदियां हैं, बभ्रु शृङ्ग, कपिल, चित्रकूट, देवानीक, ऊर्ध्वरोमा, द्रविण और चक्र ये सात पर्वत उस द्वीपमें हैं ॥ ३१-३४ ॥ इन सातों देशोंके राजाओंको रामने जीतकर कुशद्वीपके अधिपति महासेन नामक राजाको उन्होंने जीत लिया। इससे रामको प्रसन्नता हुई । ३५ ॥ ३६ ॥ फिर आठ लाख योजन विशाल घृतोद सागरको पार करके वे अपने देदीप्यमान पुष्पक विमान द्वारा क्रौञ्चद्वीप गये ॥ ३७ ॥ कुशद्वीपकी अपेक्षा यह द्वीप दूना लम्बा-चौड़ा है। वहाँ उस द्वीपका नाम सार्थक करनेके लिये एक विशाल क्रौञ्च पर्वत है ॥ ३८ ॥ वहाँके समस्त निवासी वरुणके उपासक हैं और विष्णुभगवान्
[४३८ आनन्दरामायणे [सर्गः ९
एतानि सप्त रूपाणि कृतवानुरुशक्तिभिः । वर्धमानो भोजनश्च तथोद्बर्हणो महान् ॥४१॥ नन्दश्च नन्दनश्चैव सर्वतोभद्र एव च । शुक्लाभ्रभाश्चलाः प्रोक्ता मण्डलायुः परन्तः शुभाः ॥४२॥ अमृता अमृतौघा च तथा वैरम्भिरामथा । ज्योतिष्मती रम्या वृष्टिरूपवती तथा ॥४३॥ पवित्रवन्ता सुपुण्या द्वे शुकोक्तं मत्र कीर्तिताः । सप्तद्वैपेषु नद्यश्च स्नानात्पातकनाशनाः ॥४४॥ एतेषु सप्तवर्षेषु पार्थिवेभ्यो निजं प्रभु । कन्यारत्नं मुदाऽऽच्छाद्य तैः सर्वैः परिपूजितः ॥४५॥ क्रौञ्चद्वीपपतिं युद्धे जित्वा तु शङ्खलोचनम् । हयकुञ्जररथतुरगं कोषाद्यैस्तेन पूजितः ॥४६॥ स्तुतो मागधवृन्दैश्च नितरां मुदमाप सः । ततस्तीर्त्वा तु क्षीरोदं क्रौञ्चद्वीपसमं मुदा ॥४७॥ शाकद्वीपं ययौ रामो द्वात्रिंशल्लक्षममितम् । द्वीपरूप्याक्रुञ्चयत्रास्ति शाकवृक्षोऽतिरङ्गनः॥४८॥ यत्रोपास्यो वायुरूपी हरिनिरुद्धापनाभिमान् । तत्रापि सप्त वर्षाणि कथ्यंते पूर्वजन्मना ॥४९॥ पुरोजवं नाम वर्षं तथा तच्च मनोजवम् । पवमानं महच्छुद्धं धूम्रानीकं मनो मयम् ॥५०॥ बहुरूपं चित्ररूपं विद्याधारं तथा स्मृतम् । एवं सप्तसु वर्षेषु नद्यश्चापि ब्रवीम्यहम् ॥५१॥ अनघा च तथाऽऽयुर्दा चोभयसृष्टिश्च वै तथाऽपराजिता पुण्या शुभा पञ्चपदी स्मृता ॥५२॥ सहस्रश्रुतिरन्या सा प्रोक्ता निजवृत्तित्तथा । एव सप्तसु वर्षेषु सप्त नद्यः शुभानहाः ॥५३॥ उरुशृङ्गो बलभद्रस्तथाऽन्यः शतकेसरः । सहस्रस्रोतोऽन्य प्रोक्तो देवपालो महानमः ॥५४॥ ईशानाः पर्वताः सप्त सीमाम्ध्येते प्रकीर्तिताः । एवं सप्तसु वर्षेषु तत्र तत्र नृपोत्तमैः ॥५५॥ पूजितो रघुनाथः स शाकद्वीपपतिं रणे । सुन्दरारव्यं नृपं युद्धे सप्ताहोभिर्महाबलम् ॥५६॥ जित्वा स्पृ जनस्तेन वादयाम स दुन्दुभीम् । तीर्त्वा तं दधिमण्डोदं द्वात्रिंशल्लक्षसस्मितम् ॥५७॥ चतुःषष्टिलक्षमितं पुष्करद्वीपमाययौ । मेखलावत्तस्य मध्ये पर्वत चक्रपोपमम् ॥५८॥ मानसोत्तराचलाख्यं तं ददर्श रघूद्वहः । द्वे वर्षे तत्र वै प्रोक्ते पूर्वं रमणकं शुभम् ॥५९॥
वह्निके देवता हैं । उस द्वीपमें भी बड़े-बड़े सात देश हैं । उन बनतांन है—॥३९॥ आम्र, मधुष्ट, मेघपृष्ठ, सुधामा, भ्राजिष्ठ, व्यतिहाय और वनस्पति । ४०॥ ये सा कौंचद्वीपके सात देश हैं वर्धमान, भोजन, उपवर्हण, नन्द नन्दन, सर्वतोभद्र और शुक्ल ये सात स्थिर रहने वाले शोभन इस द्वीपको घेरे हुए हैं । ४१ ॥ ४२ ॥ अमृता, अमृतौघा, आरंभा, सुवर्णा, वृष्टिरूपवती, पवित्रवती और पुण्या ये पवित्र नदियां उन सातो देशामें बहती हैं। जिनम स्नान करनस समस्त पातक नष्ट हो जाते हैं ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ इन सातों देशोंके राजाओंसे रामनं कन्या-रत्नोंको प्राप्त किया और उन राजाओंने रामकी पूजा की ॥ ४५ । तत्पश्चात् रामने क्रौञ्चद्वीपके अधीशमको संग्रामभूमिमें परास्त किया और उनपर प्रसन्न होकर, घोड़े, रथ, ऊंट आदिका उपहार पाकर पूजित हुए ॥ ४६ ॥ स्तुतिपाठकजनोंके द्वारा कीर्तिगायन सुनकर रामचन्द्रजी परम प्रसन्न हुए इसके बाद क्षीरोदनामक समुद्रको पार करके क्रौञ्चद्वीपके समान ही बत्तीस लाख योजनक लगभग विस्तृत शाकद्वीपमें गये। जहाँपर द्वीपके नामकी भाँति वटवृक्षके समान बहुत बड़ा ही सुन्दर शाकवृक्ष है । ४७-४८ ॥ वहाँपर वायुरूप धारण करनवाले विष्णुभगवान्के उपासक रहते हैं । उस द्वीपके जो सात देश हैं, उनको कह रहा हूँ ॥ ४९ ॥ पुरोजव, मनोजव, पवमान, धूम्रानीक, चित्ररूप, बहुरूप और विद्याधार ये ही सात देश हैं। अनघा, आयुर्दा, उभयसृष्टि, अपराजिता, पञ्चपदी, सहस्रश्रुति तथा निजवृत्ति ये नदियाँ उन सातो देशामें बहती हैं। उरुशृङ्ग, बलभद्र, शतकेसर, सहस्रस्रोत, देवपाल, महानस और ईशान ये सात पर्वत इन देशोंकी सीमापर स्थित हैं। उन सातों देशोंके राजाओंने रामका पूजाकी और सुन्दर नामक महाबली अर्द्धस्वरयसे उन्होंने सात दिन पर्यन्त युद्ध करके हरा दिया ॥ ५०-५६ ॥ इसके बाद उसन भी रामकी पूजा की । रामके इस मनुष्यसे प्रसन्न होकर देवताओंने दुन्दुभी बजायी । तत्पश्चात् बत्तीस लाख योजन विस्तृत दधिमण्डोद नामक समुद्रको पार करके चौसठ लाख योजन विस्तृत पुष्करद्वीपमें पहुंचे, जिसके मध्यमे मेखलाके समान मानसोत्तर
सर्गः ९ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) २३९
अपरं तद्गतञ्चैतत्स्वरूपान्नं ते कङ्कणोपमम् तद्वर्षपौ नृपौ जित्वा ततो द्वीपेश्वरं नृपम् ॥ ६०॥
उत्तराङ्गाह्वयं रामः परां मुदमवाप सः । ददर्श पुष्करं तत्र द्वीपसंज्ञाकारकं वरम् ॥६१॥
कमलासनम्य यज्ज्ञेयं ब्रह्मणः परमासनम् तत्र कूर्म्ममयं लिंगं ब्रह्मलिंगं जनोऽर्चयत् ॥६२।
वर्षयोर्बहुला नद्यः पापहन्त्रीरुनत्तमाः दशलक्षप्रमानेन प्रागुत्तंगः स पर्वतः ॥६३॥
तस्मिन् गिरी पूर्वभागे पुरी मद्यवतः शुभा । देवभाविति नाम्ना सा मनोज्ञा ज्वलनप्रभा ॥६४॥
गिरीतस्मिन् दक्षिणस्यां दिशि संयमनी पुरी। यमराज्ञस्य सा ज्ञेया मनोज्ञा ज्वलनप्रभा ॥६५॥
पश्चिमे वरुणस्याथ पुरी निम्लोचनी स्मृता । उत्तरस्यां तु कौबेरी पुरी ख्याता विभावरी ॥६६।
भिन्नाः पुर्य्यस्तिस्रो ज्ञेया मेरुश्याभ्यः शुभावहाः यथा नृपस्य स्थानानि ह्यनेकानि महीनिभाः ॥
सर्व्वे सीमापर्वतास्ते विस्तीर्णाश्च पृथक स्मृताः । द्विसहस्रैर्योजनैश्च प्राञ्चस्तां ते वदाम्यहम् ॥६८॥
सर्व्वेषां दशलक्षैश्चयोजनैः प्रोच्यते, नृप । उत्सर्गा वां तु शुद्धोदं पुष्करद्वीपममितम् ॥६९॥
सीतायाः कौतुकार्थं हि स जगाम ०धुजमः । उद्गगं व्याहलोकान्तस्त्यानां नृणामपि ॥७०॥
ततोऽग्रे भूमिं सार्द्धमसलक्षोत्तरमर्ककोटि ( १५७५०००० ) परिमितां कंचिन्न प्राप्तिसहितां रघुनन्दनो ददर्श । ७१। तैः सर्वभूमिभिनिवासिभिः सुपूजितो रघुनन्दनो मैथिलीरंजनार्थमग्रे जगाम ॥ ७२ ॥ मेरुमन्दारोन्त्यसमपञ्चशताधिकं सार्द्धकोटि ( १५७५००० ) योजनपरिमितं मेरुमान-मान्गवलयान्तरंगले भन्न ज्ञात्वेयम् ॥७३ । ततोऽग्रे आदर्ष तापनां काञ्चनीं भूमं देवैर्यधिष्ठितां चैकोनचत्वारिंशल्लक्षोत्तरकोट्यष्ट ( ८३९००००० परिमिमां दृष्ट्वा देवैः संपूजितः श्रीरामचन्द्रो मुदमवाप ॥ ७४ ॥ ततोऽग्रे लोकालोकपर्वतं सार्द्धद्वादशकाट ( १२५०००००० ) परिमितं विस्ती-र्णावत्तया भूमिप्राकारोपमं केनाप्यनलङ्घयं स रघुनन्दनो ददर्श ॥ ७५ ॥ यस्मिंश्चतसृदिषु द्विरदप-तयः ऋषभः पुंडरीकः पुष्पदन्तः कुमुदो वामनः पृषदन्तःउपराजितः सुप्रतीक इत्यष्टौ दिग्गजाः
पर्वत विद्यमान है, उसे रामने देखा । उस द्वीपका प्रथम देश — पहला मण्डल देश और दूसरा घातकी ये दोनों देश उस द्वीपके कङ्कणके समान । रामने उन देशोके राजाओ तथा पुष्करद्वीपके स्वामी उत्तराङ्गको जीत लिया, जिससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई । इसके अनन्तर उस द्वीपके नामको सार्थक करनेवाले पुष्कर सरोवरको देखा ॥ ५७-६१ ॥ कमलका एक मात्र आसन है। यहाँपर कूर्ममय ब्रह्माकी मूर्त्तिका लोग पूजते हैं ॥ ६२ ॥ उन दोनों देशों में बहुत-सी पाप हरनेसमर्थ बहुत-सी नदियाँ बहती हैं। यह पर्वत दस हजार योजनके लगभग ऊंचा है। इसके पूर्व भागपर इन्द्रकी देववतीपुरी है। पश्चिम ओर वरुणकी निम्लोचनी नामकी पुरी । ... ... उत्तरमें कुबेरकी कुबेरीपुरी है ॥ ६३-६६ ॥ मेरु पर्वतपर इन्द्रादिकोंका जो पुरी ... ... ... स्थान वह है। जैसे राजाके एक देशमें अनेक स्थान होते हैं, उसी तरह इनके विषयमें भी जानना चाहिये ॥ ६७-६८ ॥ सबवे सब आपसमें जितने सीमापर्वत हैं। वे सब अलग-अलग दो हजार योजन ऊंचे हैं। इस तरह सब मिलाकर दस हजार योजन उनकी उंचाई है। इसके बाद रामचन्द्रजी शुद्धोद समुद्रको पार करके सीताके कौतुक या यह कहिये कि उस द्वीपके निवासियांको अपने दर्शन देनेके लिये आगे बढे ॥ ६९-७० ॥ डेढ करोड अडतालीस लाख योजन विस्तृत भूभाग ऐसा है कि जिसको रघुनन्दन श्रीरामजीने देखा ॥ ७१ ॥ वहाँके निवासिगण सीतारामकी पूजा की और ये लोग आगे बढ गये ॥ ७२ ॥ मेरु और मानसलोचनाके बीचमें डेढ करोड साढे सात लाख एकचालीस हजार योजन परिमित अन्तरकाल है इसके अनन्तर दर्पणके शीशेके समान चमकती कांचनमयी भूमि देखी जहाँ कि देवता लोग रहते हैं। जिसका विस्तार आठ करोड़ उनतालीस लाख योजन है। वहाँके भी निवासियोने रामकी पूजा की और वे प्रसन्न हुए । इसके अनन्तर साढ़े बारह करोड़ योजन परिमित विस्तीर्ण तथा ऊंचे लोकालोक नामक पर्वतको देखा, जिसे कि आजतक कोई नहीं लांघ सका है ॥ ७३-७५ ॥ जहाँकी
४९० आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
सकलाकाशावस्थानहेतवः ॥ ७६ ॥ तस्मिन्नेव गिरिवरे भगवान् परममहापुरुषो महाविभूतिपतिः सकललोकहिताय आस्ते । ७७ । ततः परस्ताद्योगेश्वराणां विशुद्धामुदाहरन्ति ॥ ७८ ॥ एव पञ्चा- शत्कोटिगुणिता भूगोलोऽयं ज्ञेयः । ७९ ।। एवं पञ्चविंशतिकोटिमितां भूमिं लोकालोकमध्यवर्तिनीं स रघुनन्दनः स्ववशां कृत्वाऽऽकाशपथा परिक्रम्य सर्वान् द्वीपान् पूर्ववत्पश्यन् जंबुद्वीपं भारत- वर्षमध्यगतां स्वां राजधानीमोध्यां सप्तद्वीपेश्वरैः परिवेष्टितोऽनुययौ । ८० । ततो रामोऽयोध्या- निकटं गत्वा दूतैः स्वागमनं सुमंत्रं सूचयामास । ८१ । समायातं रामचंद्रं श्रुत्वा स मंत्रिसत्तमः । अयोध्यां भूषयामास पताकाध्वजतोरणैः । ८२ । वारणेन्द्रं पुरस्कृत्य पौरैर्जानपदैः सह । प्रत्युद्गम्य रामचन्द्रं नत्वाऽयोध्यां निनाय सः । ८३ । तदा निनेंदुर्वाद्यानि ननृतुश्चाप्सरोगणाः । तुष्टुवुर्मार्गधाद्याश्च नटा गानं प्रचक्रिरे । ८४॥ रामागमनमाकर्ण्य पौरनार्यः सुलंकृताः । प्रासादाजिरमारूढा ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः । ८५॥ राजद्वारं विमानेन शनैः स रघुनन्दनः । गृह्णन् पौरौपायनानि स्त्रीभिर्नीराजितः पथि ॥ ८६॥ ययौ यानादवरुह्य सभायां निज आयतः । तस्थौ समन्ततः सर्वैर्नृपैश्च परिवेष्टितः । ८७॥ दत्त्वा स्थलानि सर्वेषां वस्तुमाज्ञाप्य लक्ष्मणम् । दक्षिणाद्यादि सम्पाद्य कृतकार्यममन्यत ॥८८॥ आत्मानं सकलान्पृथ्वीस्थितान् जित्वा समुद्धतान् । ततस्तैः सप्तद्वीपस्थैः पार्थिवैः परिपूजितः ॥८९॥ रामः स्वभ्रातरं विप्रेर्मंत्रं भारताधिपम् । चकार पार्थिवैर्युक्तं लक्षणानुमतेन सः ॥ ९०॥ आदावेव वसिष्ठेन ह्युक्तं भरतनाम तत् । विचिंत्येदं भावि वृत्तं जातकर्मणि निश्चितम् । ९१॥ पूर्वमाज्ञापितं स्वाप्तसेवकं भरतस्य च । रक्षणे तं रामचन्द्रः कार्यान्तरमकल्पयत् । ९२॥
चारों दिशाओंमें ऋषभ, पुण्डरीक, पुष्करचूड, कुमुद, वामन, मुखदन्त, अपराजित और सुप्रतीक ये सभी लोकोंको अपने सिरपर धारण करनेवाले आठ दिग्गज विद्यमान हैं । ७६ । उसी पर्वतके ऊपर परममहा- पुरुष और महाविभूतिपति भगवान् समस्त संसारके हितकी कामनामे वास करते हैं ॥ ७७ । इसके आगे विशुद्ध योगेश्वरोकी ही गति है, ऐसा लोग कहते हैं ॥ ७८ ॥ इस प्रकार सब मिलाकर पचास करोडगुना विस्तृत भूगोल है उनमेंसे पचीसको अपने वशमे करके राम आकाशमार्गसे लौटकर सम्विक विविध द्वीपो- को देखते हुए जम्बूद्वीपके भारतवर्षमध्य अयोध्या नामकी अपनी राजधानीमे सातो द्वीपोके राजाओोके साथ वापस आये ।७९-८१। अयोध्याके समीप पहुँचकर रामने एक दूत द्वारा सुमन्त्रको अपने आगमनकी सूचना दी । सुमंत्रने रामका आगमन सुना तो पताका, ध्वजा तथा तोरणादिकसे अयोध्याको सज्जित करवाया । ८२ ॥ फिर एक बडे भारी हाथीको आगे करके पुरवासी लोगोंके साथ रामके समक्ष पहुंच और उन्हें प्रणाम करके अयोध्या लाये ॥ ८३ । उस समय अनेक प्रकारके बजे बाजे अप्सराएं नाचीं गायकोने गाने गाये और बन्दीजनोंने स्तुति की । ८४ । रामका आगमन सुनकर अयोध्याकी स्त्रियां भांति-भांतिके वस्त्राभरण पहनकर अपने कोठोंपर चढ गयीं और वहाँसे फूलोंका वर्षा करने लगीं । ८५ । रामचन्द्रजी धीरे-धीरे पुरवासियोंकी भेटें स्वीकार करते हुए पुष्पक विमान द्वारा अपने राजद्वारपर पहुंचे। रास्तेम स्त्रियोने रामकी आरती उतारी ॥ ८६ ॥ राजद्वारपर पहुंच ता पुष्पक विमानसे उतरकर सभाभवनमें गये और अपने सिंहासनपर बैठे । उनके साथ जो राजा आये थे, वे भी सिंहासनके चारो ओर बैठ गये ॥ ८७ ॥ इसके अनन्तर सब मेहमानोंको ठहरनेके लिए स्थान बतलानेके निमित्त लक्ष्मणसे कहकर राम दक्षिणाद्यादि कार्योंमें लग गये, इस प्रकार पृथ्वीपर रहनेवाले उद्दण्ड राजाओका परास्त करके रामने अपनेको कृतकृत्य समझा। इसके अनन्तर उन सातो द्वीपके राजाओने फिरसे रामकी पूजा की ॥ ८८ ॥ ८९ ॥ तदनन्तर लक्ष्मणसे सलाह लेकर रामने भरतको भारतवर्षका अधिपति बना दिया ॥ ९० ॥ इस भावी बातको सोचकर ही वसिष्ठने भरतका नाम भरत रक्खा था ॥ ९१॥ पहले जिस सेवकको रामचन्द्रजीने भरत देशकी रक्षाके
सर्गः १० ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४४१
सर्गः १० ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४४१
जम्बुद्वीपपतिं रामश्चकार स्वसुतं लवम् । लवोऽपि विजयं स्वीयसचिवं चाकरोन्मुदा ॥९३॥ नवस्वपि च वर्षेषु यातायातं पुनः पुनः। चकार विजयेनैव पुनः कार्यार्थमादरात् ॥९४॥ शत्रुघ्नो यौवराज्ये स्वे भरतेनाभिषेचितः । यौवराज्यपदे स्वेऽपि कृत्वा रामः कुशं सुतम् ॥९५। चकार लक्ष्मणं मुख्यं सचिवेषु सुमन्त्रणम्। सप्तद्वीपपतिः श्रीमान्स्वयमासीद्रघूत्तमः ॥९६॥ स्वस्वकार्येषु सर्वे ते रामन् तत्परमानसाः । ततः सर्वांन्नृपान्पूज्य ददावाज्ञां रघूद्वहः ॥९७॥ ततस्ते राघवं न्त्वा ययुः स्वं स्व स्थलं मुदा । ततो भारतवर्षस्य परामर्शं सदा मुदा ॥९८॥ चकार भरतः श्रीमान् भरताधिपतिः प्रभुः । जम्बुद्वीपपरामर्शं च पकार लवस्तथा ॥९९॥ सप्तद्वीपपरामर्शं रामचन्द्रः कुशेन च । लक्ष्मणेन सहैवासि स्वयमेवाकरोत्प्रभुः ॥१००॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे कुशादिषड्द्वीपविजयदर्शन नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ।
दशमः सर्गः
( रामका संन्यासी, शूद्र तथा गृध्रको दण्डदान )
श्रीरामदास उवाच
एकदा राघवः सारमेयदीर्घारवं मुहुः । राजद्वाराद्बहि श्रुत्वा सभास्थो दूतमब्रवीत् ॥१॥ कथं दीर्घस्वरेणैव श्वाऽद्य क्रोशति पश्यताम् । तथेति रामदूतोऽपि गत्वा राजसभाद्बहिः ॥२॥ न्यवारयत्सारमेयं राजद्वारात्स्वधर्षणैः । रामं नत्वाऽब्रवीद्वाक्यं तूष्णीं श्वा क्रोशति प्रभो ॥३॥ मया निवारितो दूरं गतः स राक्षसान्तक । ततो द्वितीयदिवसे तच्छब्दान् राघवोऽशृणोत् ॥४॥ दूतेन पूर्ववच्चापि सारमेयो निवारितः । ततस्तृतीये दिवसे तद्रावानशृणोत्प्रभुः ॥५॥ तदाविस्मितः प्राह लक्ष्मणं पुरतः स्थितम् । श्वाऽयं दिनत्रयं बन्धो कथं क्रोशति संततम् ॥६॥
लिए नियुक्त किया था, उसे दूसरे काममें लगा दिया ॥ ९२ । इसके अनन्तर अपने लव नामक वंटको जंबूद्वीपका अधिपति बनाया लवने विजय नामके उस सेवकको मंत्री बना दिया, जिसे कि रामचन्द्रजीने कुछ दिन तक भरतखण्डको देखभाल करनेके लिए नियुक्त किया था । ९३॥ उस विजयके साथ कार्यवश नवों द्वीपोंमें बराबर आवा-जाया करते थे । ९४ । भरतने अपनी जगह शत्रुघ्नका युवराजपदपर अभिषेक कर दिया । रामने कुशको युवराजके पदपर अभिषिक्त करके लक्ष्मणको अपना सर्वश्रेष्ठ मन्त्री बनाया । किन्तु सातो द्वीपोंके अधिपति राम स्वयं थे ॥ ९५ ॥ ९६ ॥ ये सब लोग अपने कार्योंको बड़ी तत्परताके साथ निभाते थे। इसके अनन्तर रामने साथ आये हुए राजाओंको अपने देश जानेका आज्ञा दी ओर वे रामचन्द्रजीको प्रणाम करके अपने-अपने देशको चल गये । ९७ ॥ भारतवर्षका शासन भरतजी प्रसन्नतापूर्वक करते थे। जंबूद्वीपका शासन लव करते थे और भरत, कुश तथा लक्ष्मणसे सलाह लेकर रामचन्द्रजी सातों द्वीपोंका शासन कर रहे थे ॥ ९८-१०० ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित-'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते राज्यकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ।
श्रीरामदास कहने लगे—एक समय रामचन्द्रजी सभामें बैठे थे । सहसा कई वार एक कुत्तेके रोनेकी आवाज सुनी तो दूतसे बोले- १ ॥ देखो तो इतने ऊंचे स्वरमें कुत्ता क्यों चिल्ला रहा है। रामके आज्ञानुसार दूत कुत्तेके पास गया । उसे धमकाकर वहाँसे हटा दिया और रामसे जाकर कहा—हे राक्षसान्तक ! उसे मैने दूर भगा दिया है, अब वह नहीं चिल्लायेगा । दूसरे दिन फिर रामने उसी प्रकार उस कुत्तेका रोदन सुना तो दूतसे भगवाया ॥२-५॥ तीसरे दिन फिर उसका रुदन सुनकर रामने लक्ष्मणसे कहा-आज तीन दिनसे
४४२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १०
किं दुःखं सारमेयस्य प्रष्टव्यं मत्पुरस्त्वया । तथेति लक्ष्मणो दूतानब्रवीत्सम्भ्रमान्वितः ॥७॥
समामाकारणीयः श्वा युष्माभिस्त्वथ सादरम् । तथेति रामदूतास्ते सारमेयं वचोऽब्रुवन् ॥८॥
आकारितोऽसि रामेण त्वमेहि राघवांतिकम् । त्वद्यैवं फलितं चाद्य पूर्वपुण्योदयेन हि ॥९॥
रामदूतवचः श्रुत्वा तुष्टः श्वा तान्यचोऽब्रवीत् । देवगृहे यज्ञवाटहोमशालासु वै तथा ॥१०॥
वृन्दावने सभायां च मठे पार्थिवसद्गृहे । गोष्ठे पुण्यस्थले पुण्ये तीर्थे देवालयोऽपि च ॥११॥
पाकस्थाने रतिस्थाने स्नानसंध्यास्थलादिषु । गन्तु नार्हा वयं पापयोनित्वाद् बाह्यनां प्रभुः ॥१२॥
तत्रस्ते विस्मयाविष्टास्तद्वाक्यं राममब्रवन् । राघवस्तद्वचः श्रुत्वा विहस्य सम्भ्रमेण च । १३॥
आनीयतां पादुके मे त्विति दूतान वचोऽब्रवीत् । ततस्तैरर्पिते दिव्ये पादुके कृत्य पादयोः ॥१४॥
रत्नदण्डं करे धृत्वा शनैः सर्वैः समन्वितः । मुद्रिकाग्लन्द्धारेव मणिनूपुरशिञ्जितः । १५॥
मुकुटेनावतंसेन केयूराभ्यां समन्वितः । नूपुराभ्यां कंकणाभ्यां कुण्डलाभ्यां सुशोभितः । १६॥
पदकैः शृखलाभिश्च वरवस्त्रैर्विराजितः । गजद्वाराद्वहिर्देशे श्वाभ्येवांतिकं ययौ ॥१७॥
कृत्वा दंडं त्वरुक्षेऽथ किंचिद्वक्रः स्थितः प्रभुः । कृत्वा वामं जान्वधो स्वां जंघां रामः स दक्षिणाम् ॥१८॥
अब्रवीत्सारमेयं तं किंचित्कृत्वा स्मिताननम् । मदग्रे वद किं दुःखं सारमेय तवास्ति यत् ॥१९॥
भद्रान्ये सहसा माऽस्तु दुःखं केषां कदापि च । इति रामगिरं श्रुत्वा सारमेयः पुनः पुनः ॥२०॥
नमस्कृत्या राघवेंद्रं छिन्नपादोऽब्रवीन्मुदा । मदर्थं श्रमितोऽत्र त्वं चिरं जीव दयानिधे ॥२१॥
निरपराधो यतिना प्राप्याऽत्राहं प्रताडितः । छिन्नपादोऽस्मि राजेंद्र त्वामद्य शरणं गतः । २२।
तद्वाक्यं राघवः श्रुत्वाऽऽकारयामास दण्डिनम् । राजाज्ञया यतिश्चापि विह्वलो राघव ययौ ॥२३॥
दृष्ट्वा यतिं तं श्रीरामस्तदा वचनमब्रवीत् । स्वामिन् किमर्थं युष्माभिश्छिन्नः पादोऽस्य वै शुनः॥२४॥
यह कुत्ता क्यों राजदरबारके समक्ष आकर रोता है। मेरे सामने बुलाकर पूछो कि उसे किस बातका कष्ट है। लक्ष्मणने भी घबड़ाकर दूतोंको आज्ञा दी कि जाओ और आदरपूर्वक उस कुत्तेको सामने ले आओ। "बहुत अच्छा" कहकर दूत कुत्तेके पास पहुंचे और उससे कहने लगे- ॥६-८॥ आज पूर्वसंचित पुण्योंसे तुम्हारा भाग्योदय हुआ है। चलो, श्रीरामचन्द्रजी तुम्हें बुला रहे हैं। ९॥ दूतोंकी बात सुनी तो प्रसन्न होकर कुत्ता कहने लगा- देवालय, यज्ञशाला, हवनगृह, तुलसीका बगीचा, सभा, मठ, राज-भवन, गोशाला, पवित्र तीर्थ, रसोईघर, रतिस्थान तथा स्नान-सन्ध्यादि करनेके स्थानोंपर मै जानेके अयोग्य हूँ। क्योंकि मेरा जन्म पापयोनिमें हुआ है। तुम जाकर रामसे कह दो ॥१०॥ ११॥ इतनी सुनकर वे दूत बड़े विस्मित हुए और जैसा उसने कहा था, जाकर रामको सुना दिया। राम उसकी बात सुनकर हँस पड़े और दूतोंसे कहा कि हमारी खड़ाऊँ ले आओ! दूतोंने आज्ञाका पालन किया। रामने खड़ाऊँ पहिना, एक रत्नजटित छड़ी हाथमें ली और सब लोगोंके साथ उस कुत्तेकी ओर चले। उस समय रामचन्द्रके हाथोंमे अंगुलियाँ थीं, रत्नजटित हार गलेमें था, मस्तकपर मुकुट तथा कानोमे कुण्डल झूल रहे थे, भुजाओमे बिजयठ और कङ्कण था। गलेमें हार तथा सिकडियाँ शोभित हो रही थी। इनके सिवाय और भी कई प्रकारके आभूषण और सुन्दर वस्त्र सुशोभित हो रहे थे। इस तरह सज-धजकर राम कुत्तेके पास जा पहुँचे ॥१२-१७॥ वहाँ पहुँच तो छड़ी बगलमे दबा ली और बायें घुटनेको तनिक मोड़कर कुछ तिरछे खड़े हो गये ॥१८॥ पुचकारकर राम कुत्तेसे बोले- हे सारमेय! तुम्हें जो कुछ कष्ट हो वह मुझे बताओ ॥१९॥ क्योंकि मैं चाहता हूँ कि मेरे राज्यमें किसीको किसी प्रकारका कष्ट न हो। इस तरह प्रभुकी बात सुनकर कुत्तेने रामको अनेकशः प्रणाम किया और हर्षित होकर कहने लगा- हे दयानिधे ! आपने मेरे लिए बड़ा कष्ट किया, जो यहाँ पधारे। हे महाराज ! मैने कोई अपराध नहीं किया था। फिर भी एक संन्यासीने पत्थरसे मुझे ऐसा मारा कि जिससे मेरा पैर टूट गया। इसीसे दुःखी होकर मै आप की शरणमे आया हूँ। २०॥ २१॥ २२॥ उसकी बात सुनकर रामने उस संन्यासीको बुलवाया।
सर्गः १० ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४४१
तद्रामवचनं श्रुत्वा यतिः प्राह रघूत्तमम् । भिक्षार्थं भ्रमतो मार्गे भिक्षात्रं स्पृशितं मम ॥२५॥
शुनाऽनेन राघवेंद्र मध्याह्ने क्षुधितस्य च । मयाऽतः क्रोधचित्तेन शुनेऽस्मै अपराधिने ॥२६॥
अर्पितं लोष्टकं क्षिप्तेन भिन्नं पदं शुनः । तद्यतेर्वचनं श्रुत्वा पुनस्तं प्राह राघवः ॥२७॥
ज्ञानहीनः पशुश्चायं भक्ष्यं दृष्ट्वायं निर्दोष च । स्वाभाविकी तस्य दोषो नैवार्य वेद्मयहं यते ॥२८॥
स्वमेवास्यैवापराधी तद्दण्डं प्राप्तुमर्हसि । इत्युक्त्वा मारगेयं तु राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥२९॥
यदिश्रायं तैऽपराधी तत्र हस्तेऽर्पितो मया । यं त्वमिच्छसि वै कर्तुं तस्मै दण्डं सुखं कुरु ॥३०॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा सारमेयोऽब्रवीत् प्रभुम् । शिवालयस्याधिपत्ये च स्थापनीयो यति प्रभो ॥३१॥
तथेति रामचन्द्रोऽपि शिविकायां निवेश्य तम् । स्रग्वस्त्रचन्दनाद्यैश्च सम्पूज्याथ यतिं मुदा ॥३२॥
वाद्यघोषैर्नर्तनाद्यैर्ब्राह्मणैश्च शिवालयाम् । नीत्वा शिवालयस्याधिपत्ये संस्थापयत्प्रभुः ॥३३॥
तदाऽज्ञानाद्यतिर्देवं फलितं वेत्यमन्यत । ततो रामो जनैर्युक्तः स्वां सभां संविवेश ह ॥३४॥
तत्सर्वे कौतुकं दृष्ट्वा पौराः प्रोचु रघूत्तमम् । कथं शुनाऽद्य यतये शिक्षेत्प्रसाधिता प्रभो ॥३५॥
अन्नार्थं भ्रमतस्तस्य यनेदेशं पदं सदन् । नैतादृशारूपं सञ्जातं यतये शिक्षितं न तत् ॥३६॥
तत्पौराणां वचः श्रुत्वा राघवस्तान् वचोऽब्रवीत् । प्रष्टव्यः श्वा तु युष्माभिः सन्देहं हरिष्यति ॥३७॥
तथेति मारगेयं तं पप्रच्छुर्नागराश्च तत् । तन्त्रोवाच सारमेयः शृणुध्वं यन्मयोच्यते ॥३८॥
कुपिप्रज्ञानभार्यापत्यबलसम्मानकारिणः । शिवालयमठारामतटाकग्रामाधिकारिणः ॥३९॥
अनाथस्त्रीबालवित्तहारिणः क्रूरमानसाः । गौविप्रशिववित्तेम्ब हारिणोऽन्यासकारिणः ॥४०॥
रामके आज्ञानुसार वह संन्यासी भी सिर झुकाये रामके पास आया ॥ २३ ॥ रामने उनको प्रणाम किया और कहने लगे-कहो स्वामिंवा ! आपने किस अपराधमें इस कुत्तेका पैर तोड़ डाला ? ॥ २४ ॥ उसने उत्तर दिया कि मैं भिक्षा लिये रास्तेसे जा रहा था। तभी इसने मेरा भिक्षान्न छू दिया। वह मध्याह्नका समय था। मैं भूखा था । इसके उस अपराधपर मुझे क्रोध आ गया और इसको चमकानेकी इच्छासे मैंने एक पत्थर फेंककर मारा। वह इसके पैरमें लगा, जिससे इसका पैर टूट गया ।। यतिकी बात सुनकर राम उससे कहने लगे—॥ २५, २७ ॥ यह एक ज्ञानविहीन पशु है। यदि इसने अपना भक्ष्य पदार्थ देखकर आपको छू दिया तो मैं इसमें इसका कोई दोष नहीं समझता। यह तो इसकी स्वाभाविक प्रकृति है। इसलिए आप ही इसके अपराधी हैं। यतिके प्रति इतना कहकर कुत्तेसे कहने लगे-यह संन्यासी तुम्हारा अपराधी है। मैं इसे तुम्हे सौंपता हूँ। तुम जो दण्ड चाहो, इसे दे सकते हो ॥ २८-३० । रामकी बात सुनकर कुत्तेने कहा-इसे किसी शिवालय का महन्त बना दिया जाय। ३१॥ रामने उसकी बात स्वीकार कर ली और सुन्दर वस्त्र, चन्दन तथा माला आदिसे यतिको सुशोभित करके एक पालकीमें बिठाया और विविध प्रकारके बाजे यगान हुए उत्सवके साथ एक शिवालयमें ले गये और उसे वहाँका महन्त बना दिया ॥ ३२ ।। ३३ । उस समय अज्ञानतावश यतिने अपना भाग्योदय समझा । कुछ देर बाद रामचन्द्रजी अपने सचिवों समेत राजसभामें लौट आये ॥ ३४ ॥ इस प्रकारका कौतुक देखकर कितने ही उत्सुक नागरिकोंने रामसे कहा-हे प्रभो ! इस कुत्तेने यति- को इस प्रकारका दण्ड क्यों दिया ? यतिका तो कर्तव्य उसकी टांग तोड़ दी और जब आपने कुत्तेको उसके कियेका दण्ड देनेके लिए कहा तो उसने इतरुक स्थानपर दनिकी महन्थ बनवा दिया । ३५ ॥ ३६ ॥ इस प्रकार नागरिकोंकी बात सुनकर रामने कहा कि आप लोग इस कुत्तेसे ही पूछ लें कि उसने ऐसा क्यों किया। यह आप लोगोंकी शङ्काका भली भाँति समाधान कर देगा । ३७॥ रामके आज्ञानुसार उन लोगोंने कुत्तेसे पूछा तो उसने कहा-मै जो कुछ कहता हूँ, उसे सावधान होकर आप लोग सुनें ॥ ३८॥ मनमें उत्पन्न अन्न रखनेवाले, शिवालय, मठ, बगीचा तालाब राजग्राम इन स्थानोंके अधिपति, अनाथ स्त्री तथा बालकोंके धनका अपहरण करनेवाले, गाली-गलौज करनेवाले, गौ-विप्र तथा शिवके लिए अर्पित धनका अपहरण करनेवाले, अन्याय करनेवाले, राजाके घरपर पहुँचे हुए याचकका अपमानवान् दूसरेका धन हड़पनेवाले, प्राणभित्रके
४१४ आनन्दरामायणे [ सर्ग० १०
नृपगेहे प्रविष्टानां याचकानां निवारिणः । परद्रव्यपहर्तारः प्रत्यशिनाञ्चिकारिणः ॥४१॥ विप्रभोजनद्रव्यस्य होमद्रव्यस्य हारिणः । बहुद्रव्यापहर्त्तारश्चैते सर्व्वेऽप्यन्यन्मनि ॥४२॥ गच्छन्ति वै शुनो योनिं मत्समेतद्वचा मम । मया मठाधिपत्याञ्च लब्धा योनिः शुनः स्वयम् ॥४३॥ अतो मयाऽद्य यतये दित्सितं पदमीरितम् । इति तद्वाक्यमाकर्ण्य नागरादिच्छिन्नसंशयाः ॥४४॥ ते ययुः स्वीयगेहानि यथौवाऽपि निजस्थलम् । ईदाने स यतिजीतः शुनो योनौ स्वकिल्विषत् ॥४५॥ आप्तमश्चाशुभां मुक्ति भुक्त्वाऽसौ स्वीयकिल्विषम् । न तस्योऽयं यतिः शिष्य मार्केनेऽत्र मृतस्त्विति॥४६ स्थलान्तरे मृतश्चायं शतैः कार्यार्थमान्नरः । अयोध्यायां मृतानां च पुनर्जन्म न विद्यते ॥४७॥ क्व यतिः सारमेयत्वं क्व स श्वा मुक्तिमाप्तवान् । गहना कर्मणश्चात्र गतिस्तया महात्मनः ॥४८॥ क्व यतिः सारमेयः क्व न्यायश्चेत्थं समापने । आभीक्ष्म्यतः सर्व्वचात्र नान्यायस्तन्मुखेक्षणात् ॥४९॥ अथैकदा तु साकेतवासिनो भूसुरस्य च । पञ्चत्वं पञ्चवर्षीयः पुत्रः प्राप्तः शिशुः प्रियः ॥५०॥ तदा विप्रः सपत्नीकस्तन्प्रेतमरुणोदये । राजद्वार मपानीथ रुरोदोच्चैः सुविद्रुतः ॥५१॥ अब्रवीत् पुत्रशोकेन व्यथितः क्रोधसंयुतः । सीतामालिङ्गय गजेन्द्र कथं न्वं निद्रितोऽसि हि ॥५२॥ त्वद्राज्येऽधर्मतः कस्य मृतो मे बालकः प्रियः । त्वत्तोऽप्यधमॊऽथवान्याच्च अतोऽधर्मी न संशयम्५३॥ नृपे पापििन म्रियन्ते नरा ह्यल्पायुषः भुक्तम् । यस्य राज्ये जनैः सर्व्वैरापाधर्मः क्रियते भुवि ॥५४॥ सोऽपि ज्ञेयो नृपस्यैव यत्तन्नेषां न शिक्षितम् । अस्मन्नेऽधारिणो राज्ञो राज्ये मेऽय शिशुर्मृतः ॥५५॥ उपायं चिंतयस्वाम्य जीवनेऽद्य यवान्वभूः । नोचेदावां विनिं वारोहावस्तनपेन हि ॥५६॥ स्मर वृत्तं श्रवणस्य हेतोर्यत्तनकञ्च ने जानं शापादिकं पूर्व्वं तद्वदत्रापि ते भवेत् ॥५७॥
विप्र निज धनको ग्रहण करनेवाले व ज्ञानभाजनके लिये जुटाई सामग्रीसे चोरी करनेवाले और बेईमानी करके अधिक धन इकट्ठा करनेवाले लोग मरकर दूसरे जन्ममें कुत्तेकी योनिम जन्म पाते हैं ॥३६-४२॥ इस प्रसङ्गमें मैंने जो बात कही है, व सब सत्य है। मैंने स्वयं मठाधिपत्यके कारण ही कुत्तेकी योनि पायी है ॥४३॥ इस संन्यास को उसकी करनीका फल देने के लिए मैंने उसे यह पद दिलाया है। इस प्रकार उसकी बात सुनकर सारे पुरवासिजनका स देह निवृत्त हो गया और सब लोग अपने-अपने घरको चले गये। कुत्ता भी अपने स्थानको चला गया। उस संन्यासी ने मठाधिपत्यके मदमें आकर जा पाप किये, उत्तम जन्मान्तरम उसे कुत्तेकी योनि मिली ॥४४ ।४५। वह कुत्ता जिसको रामचन्द्रजीके यहाँ दावा किया था उसे कुछ दिनो बाद शुभ गति मिली, किन्तु वह पनि जो अपने पापोसे कुत्ता हुआ था अयोध्यामे न मरकर किसी दूसरे स्थानपर मरा। इम लिए उसे मुक्ति नहीं मिला। जो लोग अयोध्यामे शरीर त्याग करत है ये जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। कर्मनी गति बड़ी विचित्र होती है। कहाँ वह कुत्ता होकर भी मुक्त हो गया और वह यति होकर भी कुत्ता हो गया ॥४६॥४७॥४८॥ कहाँ तुत्ता और कहाँ मंन्यासी । रामने उस श्वानका कितना अच्छा न्याय किया । सच तो यह है कि रामक राज्यम किसोका मुँह देखकर न्याय नहीं किया जाता था। बल्कि जा न्याय्य बात होती, वही होती थी ॥४९। एक समय अयोध्यामे एक ब्राह्मणके पंचवर्षीय बालककी मृत्यु हो गयी ॥५०॥ सबेरा होते ही वे ब्राह्मणदम्पती बच्चेके शवको लेकर राजद्वारपर आये और बड़े जोर-जारसे रोने लगे ॥५१॥ पुत्रशोकसे कुपित होकर उस ब्राह्मणने कहा हे राम! सीताको गोदमे लेकर तुम भय भाः आनन्दके साथ पड़े सो रहे हो ? ॥५२॥ तुम्हारे राज्यमे किसीके अपराधस मेरे बच्चेको मृत्यु हुई है। इसमे तुम्हारा कोई अधर्म है अथवा किसी दूसरेका। यह मै नहीं जानता ॥५३॥ मैने ऐसा सुना है कि राजक अधर्मी होनेस ही उसके राज्यम अकाल मृत्यु होती है जिस राजाक राज्यम अधर्म होता है, उसका भी कारण राजा ही होता है क्योंकि वह अपनी प्रजाका अच्छी तरह शिक्षा नहीं देता। इससे यह निश्चित है कि तुम अधर्मी हो। इसी लिए मेरे बालककी मृत्यु हुई है ॥५४॥ ५५॥ अतएव हे राजन् ! इसके लिए शीप्र ही कोई उपाय करो, नही तो हम दोनों (स्त्री-पुरुष)
सर्गः १०] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४४५
वसो विप्रप्रिया प्राह साता प्रोत्कण्ठयेव हि । कथञ्चेन्निधिनिद्रां गते मुत्रे शुभे ॥५८॥
त्वमप्यसि पुत्रवती मे दुःखं शाम्यन् कुरु । उपायं कारयाद्याद्य भर्त्राऽद्य जीवने शिशोः ॥५९॥
इति तद्दर्शनीवाक्यं श्रुत्वा सर्वे पुरीजनः । आपन्नद्रव्यनिक्षिप्तो प्रमत्तार्य मस्थिताः ॥६०॥
सीतारामावपि तयोर्वाक्यं श्रुत्वाऽतिविह्वलौ । विनिर्गतौ मणिशालाद्बहिस्तद्रुद्धहृद्दुःखितौ ॥६१॥
निवार्य वन्दिगीनानि गजद्दारं तयोः पुरः । वेगेन जग्मतुः सद्धिः सीतागमी गतभियौ ॥६२॥
दृष्ट्वा सीतां च रामं च तौ शोकं चक्रतुर्मुहुः नाद्याद्याम्य रामचन्द्रभ्बदाऽऽह गद्गदाक्षरः ॥६३॥
मा शोकं कुरुतोभोभी मद्भिरं शृणुताम्विति । कृत्योपायं हि युत्रयोः पुत्रं संजीव्यपाम्यहम् ॥६४॥
न जीवितंश्चेद्युवयोर पुत्रस्तर्पये कुशम् गिर् सत्याऽभिर्यो नोभो पश्यतस्स्विह मेऽय हि ॥६५॥
ततः सीता विप्रपत्नीम आख्याह गिरं शुभाभ् । रामेण ते प्रतिज्ञातं कुशदानेन मामिनि ॥६६॥
अहमप्यद्य ते दन्मि तव दुःखस्य शांतये । न जीविश्चेद्रामेण भयाऽय व्यधिदुः प्रियः ॥६७॥
तर्हि त्वमुद्भवोऽन्यं धर्मपेयेट् लवं प्रियम् नाभ्यां कुशलदाग्यां त्वं पुत्रदुःखं त्यजिष्यसि ॥६८॥
भजिष्यसि च धर्मौघयत्नतः शोकं कुरुष्व मा । ततः प्राह द्विजं रामस्त्वं पत्न्याऽत्र स्थितो भव ॥६९॥
मा कुरुष्व मुहुः खेदं त्वत्पुत्रं शिल्याभ्यहम् । इत्युक्त्वा लक्ष्मणैनैन तैलद्रोण्यां शव शिशोः ॥७०॥
निधाय कृमिदंग्येद्गन्धद्रुतप्रशांतये । स्वयं स्नात्वा निर्य्यादधि चाक्रानिस्त्रकशानमः ॥७१॥
ततः सभासन्धितः सन् वसिष्ठ प्राह राघवः । राज्यं शुमति धर्मेण नन्नायं वै शिशुः कथम् ॥७२॥
अपने प्रिय पुत्रके साथ चिताम जमकर भस्म हो जावेंगे ॥ ५६ । अनन्तर पूर्वोक्तका स्मरण कर जिस प्रकार तुम्हारे पिता द्वारा अपने पुत्रवधका दुःख हुआ होकर उमके मोर पण दशरथका शव देकर अपने प्राण त्याग दिये थे, वही दशा हमारा भा हागा ॥ ५७ ॥ इसके अनन्तर ब्राह्मण आराम साथ साताकी सम्भाषित करके कहा—हे शुभे ! तुम बतो पतिका आगमन करके आनन्दक साथ सा रहो हा ? तुम ता पुत्रवती हो । इस कारण मेर दुःखका भार श्यान दकर मर बच्चाका जिलानेके लिय अपन पति द्वारा काई उपाय करवाआ ॥ ५८ । ५९ ॥ इस प्रकार उस विप्रदम्पतीका गम्द सुनकर वहाँक सब पुरवासी व्याकुल हो उठे और उस शवका चारो बारस धरकर गड़ हा गय ॥ ६० ॥ इधर गम तथा साता दानों ब्राह्मणका बातांस विह्वल हांकर रतिशब्दाग बाहर निकल आये । नाच गाकर राजन वन्दानन का स्तुति तथा गान-बजानावालोंक गान-बाज गक दिय और वह सब दाड़त हुए उन दानांक पास पहुँचे । उस समय उस दुःखम सीता तथा रामका मुख धुन्धला गया था ॥ ६१ ॥ ६२ ॥ महाराज राम तथा साताका दख्कर व दानो ओर भी जोर-जारसे चिल्ला चिल्लाकर रोन लग ॥ उनमा आश्वासन दत हुए गद्गद कण्ठस रामन कहा कि आप लाग इतना व्याकुल न हा, में जो कुछ कह रहा हूँ उस सुना। म काई उपाय करक तुम्हारे पुत्रको जीवित करूँगा । ६३,। ६४।। याद तुम्हार बच्चा जीवित न कर सकूँगा ता मैं अपना पुत्र कुश आपको दे दूंगा । भग वाक्यो बात समझकर आप विश्वाम कर ॥ ६५ ॥ इसके अनन्तर साताने विप्रपल्न क पास जाकर कहा—ह भामना । तुम सुन रहा हा कि रामने क्या प्रतिज्ञा की है ? तुम्हार मतोषक लिए मैं भा प्रतिज्ञा करता हूँ कि यदि रामचन्द्रजा आपक बच्चे का जीवित न कर सक ता मैं अपन छाट पुत्र लवका दे दूंगा । उन दोना पुत्रांक पासस तुम्हारा पुत्रशाक दूर हो जायगा । ६६-६८ ॥ अब शोक मत करा । तुम्हारे पुत्र न जिला ता अधा जा मूल में भाग रहीं हूँ, वह तुमको प्राप्त होगा । इसके अनन्तर र मने ब्राह्मणस कहा कि आप अपना पत्नाक साथ यहाँ बैठ ओर किसी प्रकारका खेद न करें मैं आपके बटक जीवित करूँगा । इतन कहकर रामन लक्ष्मास कहकर एक तैलसे भरी हुई नौका मँगवायी । जिससे शव सड़े-गले नहीं, उसमह दुर्गन्ध न निकल या कीड़े न पड़ें । इस विचारसे उस शवको उसम रखवा दिया और स्वयं खिन्न होकर सम्पूनादि निष्कण्टक करनका चल गये । इसके अनन्तर समामें बैठकर रामन अपन कुलगुरु वसिष्ठसे कहा कि जब मैं धर्मपूर्वक राज्यशासन कर रहा हूँ तब
| ४४६ | आनन्दरामायणे | [सर्गः १० |
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बाल्येऽन्ते अस्यतो प्राप्तस्त्वोपायं विचिन्त्यताम् । | इति यावद्द्रुतं रामः प्रोवाच तावदम्बरात् ॥७३॥ नारदः प्रययौ वीणां रणयन् तत्सभां जयन् । | प्रत्युद्गम्याथ तं रामः परिपूज्य यथाविधि ॥७४॥ सम्भार्य्य सकलं वृत्तं पुनः पप्रच्छ तं मुनिम् । | त्वयोपायोऽत्र वक्तव्यः शिशोश्चास्य प्रजीवने ॥७५॥ पुत्राभ्यां हि प्रतिज्ञातं द्विजाय सीतया मया । | किमर्थं मम राज्येऽसौ मृतस्त्रीदृङ् न वेद्यहम् ॥७६॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा राघव प्राह नारदः । | राम स्वद्विषयेऽधर्मं न कोऽप्याचरते जनः ॥७७॥ भूम्यां सर्वत्र द्रष्टव्यं गत्वा गत्वाऽथ मद्गिरा । | यद्यप्यहं विजानामि भूम्यां वृत्तं च जानतः ॥७८॥ तथापि जनशिक्षार्थं त्वामेव प्रेषयाम्यहम् । | त्वं दृष्ट्वाऽधर्मनिरतं जनं शिक्षय सादरम् ॥७९॥ अधर्मोच्छेदनेनायं जीविष्यति वै द्विजः । | तथेति राघवश्चोक्त्वा विसर्ज्य नारदं मुनिम् ॥८०॥ सीतया नागरैः सर्वैर्भ्रातृभिर्गुरुणा सह । | पुत्राभ्यां मन्त्रिभिर्युक्तः पुष्पकं चारुरोह सः ॥८१॥ एतस्मिन्नन्तरेऽग्रेऽभून्महान्कोलाहलस्तदा । | तं श्रुत्वा चकितो रामः स ददर्श समन्ततः ॥८२॥ तावद्ददर्श पुरतः पौरैः संवेष्ठितां स्त्रियम् । | पृष्ठतोऽपरं शवमुद्वहन्तं समागतम् ॥८३॥ रामं दृष्ट्वा पुष्पकस्थं रुदती ब्राह्मणी पुरः । | दीनस्वरेण प्रोवाच हस्ताभ्यां हृदि ताड्य सा ॥८४॥ राम राम महाबाहो ते राज्ये गतमर्तृका । | अहं जाताऽस्मि त्वद्दोषान्मां दृष्ट्वा त्वं न लज्जसे ॥८५॥ मद्भर्तारं जीवयेनं नोचेच्छापं ददामि ते । | इति तस्या वचः श्रुत्वा राघवः विस्मयान्वितः ॥८६॥ स मयान्मधुरं वाक्यं ब्राह्मणीं तोषयन्मुहुः । | कोऽयं श्रमस्त्वया रम्भोरु ते भर्तारं प्रजीवये ॥८७॥ अस्यैव हेतोर्गच्छामि त्वं मद्गेहे सुखं वस । | इत्युक्त्वाऽऽश्वास्य तां रामस्तच्छवञ्चापिपूर्ववत् ॥८८॥ तैलद्रोण्यां स्थापयित्वा सुमन्त्रं वाक्यमब्रवीत् । | आगमिष्याम्यहं यावत्तावद्रक्ष्यसि मे शवम् ॥८९॥
इस ब्राह्मणके बालककी अकाल मृत्यु क्यों हुई ॥६०-२॥ इसके लिये कोई उपाय सोचना चाहिये। इस प्रकार रामने गुरु वसिष्ठसे प्रश्न किया ही था कि इतनेमें आकाशमार्गसे वीणा बजाते हुए नारदजी उस सभामण्डपमें आ पहुंचे। रामचन्द्रजीने उठकर नारदकी पूजा की और सारा वृत्तान्त कह सुनाया। इसके पश्चात् वे बोले- हे मुनिराज आप ही इस विप्रपुत्रके जीवनका कोई उपाय बतलाइये। हमने तथा सीताने यह प्रतिज्ञा की है कि यदि हम बालकको मैं जीवित न कर सका तो अपने दोनों पुत्र कुश तथा लव इस विप्रको अपर्ण कर दूंगा। मेरे राज्यम इस प्रकार अकाल मृत्यु कैसे हुई, यह मुझ मालूम नहीं हो रहा है॥७२-७६॥ इस प्रकार रामके वचन सुनकर नारदने कहा—हे राम! तुम्हारे राज्यम कोई भी मनुष्य किसी प्रकारका अधर्म नहीं करता। फिर भी मेरे कथनानुसार आपको यह उचित है कि आप गन्धर्वथरमे घूमकर देख यदि कहीं कोई किसी तरहका अधर्माचरण करता हुआ दीखे तो उसे आप दण्ड दें इस प्रकार अधर्मका मूलोच्छेद करनेपर यह ब्राह्मणबालक जीवित हो जायगा राजन आपकी सन्तुष्ट मान हैं। नारद मुनिको सादर विदा करके राम सीता, कुछ नगरवासी जना, अपने ३ ताभ्रा, गुरु वसिष्ठ दोनों पुत्रों तथा मन्त्रियोंको साथ लेकर पुष्पक विमानपर आरूढ़ हुए ॥७९-८१॥ उसी समय आगेके आगम जोरोंका कोलाहल सुनाई पड़ा। उसे सुनकर राम और भी विस्मित हुए और चहु ओर निहारन लगे। तबतक उन्होने देखा कि एक स्त्रीको चारो ओरसे बहुतसे पुरवासी घेरे हुए हैं। उनके आगे पृष्टतम्पुत्रकी सडकमे एक और शव लदा हुआ आ रहा है। स्त्रीने जब रामको पुष्पक विमानपर बैठे देखा तो अपने हथोस छाती पीटकर कहने लगी-हे राम ! हे राम !! तुम्हारे राजकाल्म दिववा होकर मैं यहाँ आरी हूँ मुझ इस दशाम देखकर तुम्हे लाजे नही आती? मेरे पतिका मृत्यु तुम्हारे ही अधर्मत हुई है। इस कारण जैसे बने, वैसे मेरे पतिको जिलाओ ! नही तो मै शाप दे दूँगी। इस प्रकार उस स्त्रीकी बात सुनकर रामने विस्मितहोकर मीठी वाणीसे आश्वासन देते हुए उत्तर दिया-हे रंभोरु तुम कायका क्षन्त्यिग करके शान्त हओ। मै तुम्हारे पतिकी जिला दूँगा। मैं भी इसी कामके लिए जा रहा हूँ। तुम आनन्दके साथ मेरे भवनम चलकर रहो। इस तरह उसे समझा-बुझाकर रामने उस शवको भी पहलेके समान तैलके नौकाम रखवाया और सुमन्त्रको वचन कर दिया कि
सर्गः १०] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) १४७
तया वह्नौ ज्वालनीयं शृण्वीयं प्रयत्नतः। मर्त्तानपि नृपा भूम्यां श्राव्य दुंदुभिनिःस्वनैः॥९०॥
न कस्यापिशवं दग्धं क्वापि कार्यं जनैरिति। तथेति राघवं चोक्त्वा दूतैः संश्राव्य उद्भवः ॥९१॥
सुमंत्रः सकलान् भूस्थान् साकेते न्यवसन्सुखम्। रामोऽपि पुष्पकेनैव पश्चिमां चोत्तरां दिशम् ॥९२॥
पूर्वामपि शनैः पश्यन् दक्षिणाभिमुखो ययौ। एतस्मिन्नन्तरेऽयोध्यापुर्यां पञ्च शवानि हि ॥९३॥
समानीतानि तैलस्य द्रोण्यां तान्यपि पूर्ववत्। सुमंत्रः स्थापयामास श्रीरामस्याज्ञयाऽऽदरात् ॥९४॥
तेषु पञ्चसु चैकैकं चैकं मधुपुरि स्थितम्। क्षत्रियस्य च तज्ज्ञेयं समानीतं सुहृज्जनैः ॥९५॥
प्रयागस्य द्वितीयं च शवं वैश्यस्य तत्स्मृतम्। पूर्वं वयसि पञ्चत्वान्ममर्त्ताने हि तज्जनैः ॥९६॥
हस्तिनापुरगस्थं तत्तृतीयं शवमीरितम्। तैलकारस्य तज्ज्ञेयं समानीतं हि तज्जनैः ॥९७॥
शवं चतुर्थं तज्ज्ञेयं हरिद्राग्रस्थितं द्विज। लोहकारस्तुपायाथ समानीतं हि तज्जनैः ॥९८॥
उज्जयिन्याश्च पञ्चमं च शवं ज्ञेयं महामते। चर्मकारदुहितायाः समानीतं हि तज्जनैः ॥९९॥
एवं पञ्च शवान्यानन् पूर्वे द्वे ब्राह्मणस्य च। सप्तायोध्यापुरीमध्ये शवान्येवं स्थितानि हि ॥१००॥
रामोऽपि दण्डकं पश्यन् स बभ्राम समंततः। अथो विन्ध्याचल धीमान् रेवायाश्चापिप्लुतः। १०१।
तत्र वृक्षे लंबमानं धूमं पातुमधोमुखम्। शूद्रं निरीक्ष्य स्वर्गोच्छे न इनुं समुपस्थितः। १०२।
तदा तं राघवः प्राह भो शूद्र शृणु मद्वचः। ब्राह्मणादितिभिर्विप्रैस्तपः कार्यं न चेतरैः ॥१०३।
शूद्रेण द्विशुश्रूषा सदा कार्याऽतिभक्तितः। द्विजकृत्यं त्वया चात्र कृत पापमना अह ॥१०४॥
इदानीं त्वां हनिष्यामि जीवायिष्यामि तान्मृतान्। तुष्टोऽहं त्वां न्वनपमा वरं वरय वाञ्छितम् ॥१०५।
इति रामवचः श्रुत्वाऽधोमुखो रामपादजः। उवाच भयभीतः सन्नन्या गर्प सुदुर्मदः ॥१०६॥
राम रावणदर्पघ्न यदि तुष्टोऽसि मां प्रभो। तर्हि ते वध्यामद्य येन शुद्धगतिर्भवेत् ॥१०७॥
जबलक मैं लौट न आऊं तबतक तुम किसी भी शवका अग्निसंस्कार न करने देना ॥८२-८९। साथ ही मेरे राज्यमें यह दुंभी पिटवा दो कि जबतक मैं लौट न आऊं तबतक कोई भी शव न जलाया जाय। सुमन्त्रने रामकी आज्ञा स्वीकार करके दूतों द्वारा डिंडिम पिटवाकर रामकी यह आज्ञा सब लोगोंको सुनवा दी और आनन्दपूर्वक राज-काज देखते हुए रहने लगे। उधर रामचन्द्रजी पुष्पक विमानपर बैठकर पश्चिम तथा उत्तरकी दिशाओंको धीरे-धीरे अच्छी तरह देखते हुए दक्षिण दिशाकी ओर बढे। इसी बीच अयोध्यामें पाँच शव और आकर एकत्र हो गये। उन्हें भी सुमन्त्रने पूर्ववत् तेलकी नौकाके रखवा दिया ॥९०-९४॥ उन पांचोंमेंसे एक शव मधुपर गन्धर्व रहनेवाले एक क्षत्रियका था। जिसे उसके सुहृज्जन रामके दरबारमें ले आये थे। दूसरा शव प्रयागनिवासी एक वैश्यका था थोड़ी ही अवस्था में उसकी मृत्यु हो गयी थी। इसी लिए उसके घरवाले रामके पास ले आये। तीसरा शव हस्तिनापुरनिवासी एक तेलीका था। उसे भी उसके घरवाले रामके पास ले आये थे। चौथा शव श्रृंगवेरपुरनिवासी एक लोहारका पुत्र/मृतक था। पाँचवां शव उज्जयिनीनिवासी एक चमारकी लड़कीका था और इसके घरवाले उसे अयोध्या ले आये थे। इस प्रकार ये पांच शव तथा पूर्वके दो ब्राह्मणके शव मिलाकर अब कुल सात शव एकत्र हो गये ॥९५-१००॥ राम-चन्द्रजी भी दण्डकारण्यमें अच्छी तरह घूमकर रेवानदीमें पवित्रयुक्त विन्ध्यपर्वतकी ओर बढ़े वहाँ उन्होंने देखा कि एक शूद्र उलटा टंगा है और नीचे आगकी धूनी धधक रही है। वह शूद्र धुआँ पीता हुआ मुँह बाये लटका हुआ है। इस प्रकारकी उग्र तपस्या करके स्वर्ग चाहनेवाले उस शूद्रको राम मारनेके लिए तैयार ही गये और उसके पास आकर कहने लगे-हे शूद्र ! ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य इन तीनों वर्णोंके लिए ही तपस्या करनेका विधान है, शूद्रके लिए नहीं। तुम्हें तो सर्वदा इन तीनों वर्णोंकी सेवा करनी चाहिए। अरे नह! तुझ पापीने अपने धर्मका उल्लङ्घन करके द्विजोंके समान कर्म किया है ॥१०१-१०४॥ इस समय मैं तुझे मारकर उन लोगोंको जीवित करूँगा जो तेरे धर्मविरुद्ध आचरणसे अकालमृत्युके ग्रास बने हैं। मैं तेरी इस तपस्यासे प्रसन्न हूँ। बोल, तेरी क्या कामना है ? इस प्रकार रामकी वाणी सुनकर भयभीत हो
४५८ आनन्दरामायणे [ सर्ग १०
ममापि येन कीर्तिः स्यात्तं वरं दातुमर्हसि । इति शूद्रवचः श्रुत्वा रामस्तुष्टोऽब्रवीद्वचः ॥१०८॥ मम रामेति यन्नाम तच्छूद्रैः सर्वदैव हि जपनीयं कीर्तनीयं चिंतनीयं मुहुर्मुहुः ॥१०९॥ भविष्यति मतिस्तेषामनेन मम्परे भव तवानेनोपकारेण कीर्तिः शूद्रेषु वै भवेत् ॥११०॥ इति रामवरं श्रुत्वा पुनः शूद्रोऽब्रवीद्वचः । शूद्राः कलौ मंदधियो भविष्यन्ति रघूत्तम ॥१११॥ व्यग्रचित्ता भविष्यन्ति कृषिकर्मादिभिः प्रभो । तदा तेषां कुतो बुद्धिर्जपादिषु भविष्यति ॥११२॥ अतस्तदनुरूपोऽद्य वरो देयो विचार्य च । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा रामस्तुष्टोऽब्रवीत् पुनः ॥११३॥ परवन्दनकालेषु रामरामेति सर्वदा । शूद्रा वदंतु सर्वत्र तेन तेषां गतिर्भवेत् ॥११४॥ तवापीय कथाकीर्तिः स्मारयिष्यति मद्द्विजाः । त्वं मया निहतस्त्वद्य वैकुंठं प्रति यास्यसि ॥११५॥ पुनर्ययाचे श्रीराम वरमन्यं स्वकांक्षया । अस्मिन् क्षेत्रे सदा तिष्ठ सीतालक्ष्मणसंयुतः ॥११६॥ अंशतन्ते पूर्वमेव दर्शनं मम ये नराः । करिष्यन्ति ततः पश्चाद्ये नरास्तव दर्शनम् ॥११७॥ कुर्वन्ति सहितं भक्त्या मोक्षमेव व्रजंति ते । मदंशनं विना मन्याँस्त्वा पश्यन्त्यविचारतः ॥११८॥ तेषामुद्धरणं राम कुरु मद्द्वचनात् प्रभो । तथोवाच तदा रामो भक्ति तस्मै ददौ हरिः ॥११९॥ इति कृत्वा सुसंतुष्टं हत्वा शूद्रं रघूत्तमः । जीवयामास विप्रादीन्मम साकेतमर्थिनान् ॥१२०॥ तदारभ्यात्र शूद्रेस्तु विष्णुदासावनीतले । परवन्दनकालेषु रामरामेति कीर्त्यते ॥१२१॥ तं हत्वा रघुवीरः स परिनृत्य मुदान्वितः । सीतां नानाकौतुकानि दर्शयन्स्वपुरीं ययौ ॥१२२॥ एतस्मिन्नंतरे मार्गे गृध्रोलूकौ विरोधिनी । विवदमानौ समेत्य रामपादं द्रष्टुमागतौ ॥१२३॥ तानुवाच रघुश्रेष्ठः किमर्थे हि युवामुभौ । विवदमानौ संप्राप्तौ मां ब्रून्तन्त्वद्य विस्तरात् ॥१२४॥
और नीचा मस्तक किये हुए बार-बार प्रणाम करके उस शूद्रने कहा—हे रावणके अभिमानको दूर करनेवाले राम ! यदि वास्तवमें आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो मुझे वह वरदान दीजिये कि जिससे शूद्रजातिकी भी सद्गति प्राप्त हो, साथ ही मेरा भी उद्धार हो जाय। इस तरह शूद्रकी दीनतापूर्ण बात सुनकर रामचन्द्रजी बहुत प्रसन्न हुए और कहने लगे—। १०५-१०८ ।। 'राम' इस पवित्र नामको वे शूद्र सदा जप, कीर्तन तथा चिन्तन करते रहेंगे, उन लोगोंको सद्गति प्राप्त होगी और तुम भी इस तपस्याको छोड़कर मेरा चिन्तन करो। तुम्हारे इस उपकारसे शूद्रोंमें तुम्हारी कीर्ति होगी। इस प्रकार रामचन्द्रजीके द्वारा वर पाकर शूद्रने कहा—हे रघूत्तम ! आगे महाभ्रष्ट कलिकाल आनेवाला है। उसमें शूद्रजातिके लोग बड़े मूर्ख होंगे। वे सर्वदा अपनी खेतीबारीके काममें ही व्यस्त रहेंगे। ऐसी अवस्थामें उन्हें जप तथा कीर्तन करनेका अवसर ही कहाँ मिलेगा इन शुभ कर्मोंपर और उनकी बुद्धि कैसे जायगी। अतएव उनके अनुरूप कोई वरदान दीजिए। शूद्रकी यह बात सुनकर तो प्रसन्न होकर रामने कहा कि वे लोग एक-दूसरेको प्रणाम-वार्ता करनेके समय 'राम-राम' ऐसा कहेंगे इससे उनका उद्धार हो जाया करेगा ।। १०९-११४ ।। उस शूद्रसमाजमें तुम्हारी बड़ी कीर्ति होगी। आज तुम हमारे हाथसे मरकर वैकुण्ठधामको प्राप्त होओगे। इसके अनन्तर उसने रामसे यह वर माँगा कि आप सीता तथा लक्ष्मणके साथ सर्वदा इस दर्भनगर निवास करें ॥ ११५ ॥ ११६ ॥ जो लोग यहाँ आकर पहले मेरा दर्शन करनेके पश्चात् आपका दर्शन करें, उनको मोक्षपद प्राप्त हुआ करे। इसके सिवाय जो लोग क्रमवर्ण बिना मेरा दर्शन किये ही आपका दर्शन कर लें उनका भी उद्धार हो जाय। रामने 'तथास्तु' कहकर भक्तिका वर दिया और उसे मारकर उन अकाल मृत्युसे मरे हुए लोग को जीवित किया, जो ब्राह्मण-क्षत्रियादि सात वर्षकी अवस्थामे मर पड़े थे ॥ ११७-१२० । हे विष्णुदास ! तभीसे इस पृथ्वीतलमे शूद्रलोग आपसमें प्रणाम-आशीषके अवसरपर 'राम-राम' कहा करते हैं। शूद्रको मारकर हर्षपूर्वक रामचन्द्रजी सीताको रास्तेके अनेक मनोहर दृश्योंको दिखाते हुए अयोध्याके लिए लौट पड़े। उसी बीच एक गृध्र और उलूक परस्पर विवाद करते हुए रामके दर्शनोंके लिए उनके सम्मुख आये। रामने उन्हें देखकर
सर्गः १० ] रामाश्वमेधम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४४९
सर्गः १० ] रामाश्वमेधम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४४९
तद्वाक्यवचनं श्रुत्वा तदोलूकोऽब्रवीत् प्रभुम् । मया पूर्वं कृतं राम नगोपरि गृहं वने ॥ १२५॥ तत्कालेन मया त्यक्तं तत्र गृध्रोऽस्ति संस्थितः । नानेन दीयते मद्य मम गेहं रघूत्तम ॥१२६॥ तदुलूकवचः श्रुत्वा गृध्रमाह रघूद्वहः । किमर्थं दीयते नास्य त्वया गृध्र गृहं वद ॥१२७॥ तदा गृध्रोऽब्रवीद्वाक्यं राघवं दीर्घनिःश्वसन् । मया पूर्वं कृतं राम नगोपरि गृहं वने ॥१२८॥ तत्कालेन मया त्यक्तं तदोलूकः कियद्दिनम् । स्थितस्तेनापि त्यक्तन्तं तत्राहं संस्थितः पुनः ॥१२९॥ वृथायं स्पर्द्धते राम मन्वा गेहं ममेति च । मध्यमं कुरु राजेन्द्र त्वद्वंशेऽभून्न पातकी ॥१३०॥ तावुवाच रघुश्रेष्ठो युष्मभ्यो हि यदा गृहम् । कृतं नद्याश्च कः साक्षी तदा तौ नेति वोचतुः ॥१३१॥ विमानस्थांस्तदा सर्वान्प्रापवः प्राह सस्मितः । इदमप्यत्र सम्प्राप्तं दुर्घटं मां पुरःस्थितम् ॥१३२॥ कथं न्यायोऽत्र वै कार्यः कस्मै गेहं प्रदीयताम् । तद्रामवचनं श्रुत्वाऽप्यन्येऽप्यतिविस्मिताः ॥१३३॥ तदोलूकं विभुः प्राह कृतं गेहं त्वया कदा । उलूकः प्राह भूश्चैव यदा जाता तदा कृतम् ॥१३४॥ तदुलूकवचः श्रुत्वा गृध्रं समवलोकयत् । गृध्रः प्राह यदा चेयं महानीरेऽवनिस्तदा । १३५॥ भूतधात्रे कृतं विद्धि पुरं गेहं मया विभो । तद्गृध्रवचनं श्रुत्वा तदा तं प्राह राघवः ॥१३६॥ कथं विनाऽऽश्रयेणासीन्महानीरे नगन्ददा । नौकाऽक्षयवटः सोऽपि वृक्षाक्षम्भवता स्मृतः ॥१३७॥ तस्माद्मृषा त्वया गृध्र स्पर्धतेऽनेन निश्चितम् । वृथाऽयं तत्र वाक्येन धिक् त्वां दुष्टपत्रीणम् ॥१३८॥ इत्युक्त्वा राघवो दूतैस्तं गृध्रं पर्वतोपरि । त्रिशूलाग्रेषु चारोप्य प्रपन्नाम स्वं पदम् ॥१३९। धन्यः स गृध्रो विज्ञेयो रामाग्रे यस्य वै मृतिः । अभूद्दर्शनमप्या यस्य देहविसर्जने ॥१४०॥
कहा कि तुम लोग क्यों लड़ रहे हो ? मुझे विस्तारपूर्वक कारण बतलाओ ॥ १२१-१२४ ॥ रामकी बात सुनकर उलूकने कहा कि मैने एक वृक्षपर रहनेके लिए एक घोंसला बनाया था। कालवश उसी समय उसे छोड़कर मुझे स्थानान्तरको चला जाना पड़ा और यह गृध्र उसमें रहने लगा। अब मेरे मागनेपर यह मुझे मेरा घोंसला नहीं दे रहा है। इस प्रकार उलूककी बात मानकर रामने गृध्रसे कहा कि तुम इसका घोंसला इसे क्यों नहीं देते ? गृध्रने तड़पकर कहा- हे राम ! बहुत दिन हुए वृक्षपर यह घोंसला बनाया था। कुछ दिनोंके लिए मैं बाहर चला गया तो यह उलूक उसमें रहने लगा। फिर वह जब उसे छोड़कर कहीं चला गया तो मैं आकर अपने घरमें रहने लगा। यह व्यर्थ हमसे लड़ाई कर रहा है। हे राम ! इसको बातोंमें आकर कहीं आप अधर्म न कीजियेगा। क्योंकि आपके वंशमें कभी कोई पातकी नहीं हुआ है ॥ १२५-१३० ॥ उन दोनोंसे रामने कहा कि तुमने उस घोंसलेको बनाया था, इसका कोई साक्षी दे सकते हो ? इस प्रकारके प्रश्न होनेपर वे दोनों चुप हो गये। क्योंकि उन दोनोंके पास कोई गवाह नहीं था। ऐसी दशामे मुसकराते हुए रामने विमानपर बैठे हुए लोगोंसे कहा कि यह विकट समस्या आगे आ गयी है। इस झगड़ेका कैसे न्याय हो ? किसको वह घोंसला दिया जाय ? इस तरह रामकी बात सुनकर सब लोग भौंचक्के रह गये। किसीको कोई युक्ति नहीं सूझी ॥ १३१-१३३ ॥ फिर रामने उलूकसे कहा कि तुमने कब अपना घोंसला बनाया था। उसने उत्तर दिया कि मैने अपना निवासस्थान उस समय बनाया था, जब इस पृथ्वीकी रचना हुई थी। इस प्रकार उलूककी बात सुनकर रामने गृध्रकी ओर देखा। गृध्रने उत्तर दिया कि मैंने उस घोंसलेको आम्रके वृक्षपर उसी समय बना लिया था, जब पृथ्वी जलमग्न थी- उसका उद्धार ही नहीं हुआ था। गृध्रसे रामने कहा कि जब पृथ्वीकी उत्पत्ति ही नहीं हुई थी, तब वह आम्रका वृक्ष जिसके सहारे खड़ा था, वृक्षोम तुमने अक्षयवट भी नहीं बताया जो किसी तरह रह भी जाता है। इसलिए मालूम पड़ता है कि तुम्हारी बात झूठ है। तुम उलूकको व्यर्थ सता रहे हो। तुम जैसे दुष्ट पक्षीको धिक्कार है ॥ १३४-१३८ ॥ इतना कहकर रामने दूतों द्वारा गृध्रको शूल पर चढ़ाकर उसे अपना परम पद दे दिया। वह गृध्र धन्य था, जिसकी मृत्यु रामके सम्मुख हुई और रामका दर्शन करते हुए उसने अपने प्राणोंका परित्याग किया। इस प्रकार उसे
| ५५० | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १० |
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दत्त्वा गेहमुल्लूकाय ययौ रामो निजां पुरीम् । विवेश नगरीं नृत्यवाद्यगीतपुरःसरम् ॥१४१॥ शिशुं विप्रं क्षत्रियं च वैश्यं चापि चतुर्थकम् । तैलकारं पञ्चमं च लोहकारस्नुषां तथा ॥१४२॥ चर्मकारदुहितरं सप्तैतान्हि सुजीवितान् । दृष्ट्वा रामः समायातानात्मानं द्रष्टुमादरात् ॥१४३॥ तुतोष नितरां पत्न्या तैः सर्वैः संस्तुतो मुहुः । ततः संपूज्य तान् सर्वान् विससर्ज रघूद्वहः ॥१४४॥ तदा महोत्सवश्चासीदयोध्यायां समन्ततः । एवं नानाचरित्राणि चकार रघुनन्दनः ॥१४५॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे यतिशूद्रगृध्रशिशूपाकरणं नाम दशमः सर्गः ॥१०॥
एकादशः सर्गः
( चार विप्रकन्याओंको रामका वरदान )
श्रीरामदास उवाच
अथैकदा रामचन्द्रो मृगयार्थं वनं ययौ । सीतया बन्धुभिः सैन्यैर्हस्त्यश्वरथपत्तिभिः ॥१॥ पश्यन् वनानि सर्वाणि मृगयारसिको भृशम् । कौतूहलसमाविष्ट आखेटव्यूहसंवृतः ॥२॥ उपानद्गूढपादश्च नीलोष्णीषी हरिच्छदः । नीलगोधांगुलित्राणो धनुष्पाणिः शरी नृपः ॥३॥ अश्वारूढः खङ्गचर्मधारी भूपै पदातिभिः । वेष्टितः कवची रामो विवेश गहनं वनम् ॥४॥ सीतया जालरन्ध्रैश्च वारं वारं निरीक्षितः । स रामो बन्धुवर्गैश्च पुत्राभ्यां नृपसत्तमैः ॥५॥ क्रीडां तदाऽकरोत्तत्र कुञ्जेषु मृगयन्मृगान् । इम्यतां इम्यतामेषो मृगो वेगात्पलायते ॥६॥ इति जल्पन् स्वभृत्येषु स्वयमुत्पत्य हन्ति च । गंधारेषु च रम्येषु वनेषु विपुलेषु च ॥७॥ उल्लङ्घितमहाश्रोता युवा पञ्चास्यविक्रमः । इतस्ततः पुनर्याति क्वचित्पश्यन् वनस्थलीम् ॥८॥
दण्ड देकर घोंसला उलूकको दे दिया और वहाँसे अपनी अयोध्या नगरीकी ओर चल पड़े। अयोध्यामें पहुँचे तो क्या देखा कि वहीं नाच-गान हो रहे हैं। ब्राह्मणका लड़का, मधुरपुरवाला ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, तेली एवं लोहारकी पतोहू तथा चमारकी लड़की ये सब जीवित होकर रामके दर्शनोंको खड़े हैं। उनको जीवित देखकर सीता समेत राम अत्यन्त प्रसन्न हुए । वहाँ पहुँचे तो लोगोंने रामकी स्तुति की और रामने भी उनका सत्कार करके उनके ग्रामोंको भेज दिया। उस समय अयोध्या घरमें चारों ओर उत्सव ही उत्सव दीखता था। इस तरह राम अनेक प्रकारकी लीलायें करते रहते थे । १३६-१४५॥ इति श्रीमत्कोटिराम-चरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासमन्विते राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे दशमः सर्गः ॥१०॥
श्रीरामदास कहने लगे—इसके बहुत दिनों बाद रामचन्द्रजी एकसमय शिकार खेलनेके लिए सीता तथा भ्राताओं और बहुतसे हाथी-घोड़े आदिको साथ लेकर वनमें गये। मृगयाके आनन्दसे आनन्दित होकर वे बहुतसे वनोंको देखते हुए इधर-उधर घूम रहे थे। उस समय उनके साथ शिकार खेलनेवाले भीलोंका एक बहुत बड़ा दल था । रामचन्द्रजी जूता पहने थे, नीले रङ्गकी पगड़ी मस्तकपर बँधी थी हरे कपड़े पहने हुए थे और नीले ही रङ्गकी गोधांगुली उँगलियोंमें बँधी थी। हाथमें धनुष-बाण धारण किये थे, १-३॥ वे घोड़ेपर सवार थे, तलवार और ढाल बगलमें झूल रही थी। बहुतसे पैदल चलनेवाले राजे उनके साथ थे और उनके शरीर पर कवच पड़ा था। इस प्रकारका वेश धारण किये वे गहन वनमें जा पहुँचे। उस समय सीता पालकीकी खिड़कियोंसे रामकी ओर निहार रही थीं और रामचन्द्रजी अपने भ्राताओं और मित्रोंके साथ कुञ्जोंमें मृगोंको ढूँढ़ते हुए हर्षपूर्वक मृगया कर रहे थे। कभी-कभी 'मारो-मारो, यह मृग वेगसे भागा जा रहा है' इस प्रकार चिल्ला पड़ते । यदि कोई उसे मारनेको नहीं पहुंच पाता तो वे उसे स्वयं मार दिया करते थे। एक
सर्गः ११ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४५१
विटपोद्गीर्णसंस्वस्तलीनकेफिकुलाकुलाम् । हरिणीगणसन्त्रस्तां धावच्छायाददिश्रुताम् ॥९॥ क्वचित्केतच फूत्कारक्षिप्त गर्भावभीपनाम् । खड्गयूथैः क्वचिल्लक्ष्मीं दधानाभिव दन्तिनाम् ॥१०॥ क्वचित्कोटरमविशुक्रां नदत्पिनादिनाम् । मृग लिप्तमुदाभिमृदितां च क्वचित् क्वचित् ॥११॥ शार्दूलनखनिभिन्नरोहिद्रक्तारुणां क्वचित् । पायश्त्वङ्कभारानमुक्तिक्ष्मधविवाग्रजैः ॥१२॥ अवराधांग्लरोधाणि सुखपन्तीमिव क्वचित् । क्वचिदुवृक्षघमच्छायां वनपुष्पसुगन्धिनीम् ॥१३॥ क्वचिन्नागदशारमूमण्डलमवोरगाम् । सर्पनिःसुवनिर्मोकनागभीषणमण्डिताम् ॥१४॥ वृत्तस्याजगरं व्याप्तां क्वचिन्निर्मुक्तसर्पवीम् । क्वचिद्दावानलज्वालाशिग्वाद्याममहीरुहाम् ॥१५॥ ज्वलन्तिकुंजानिर्गच्छद्धरूपाश्रमसङ्कटाम् । व्यमुंचंस्तु शुनां यूथं शशकेषु कचित् कचित् ॥१६॥ पल्वलेषु च विश्रांतः पुनर्याति वनान्तरम् । ततो मध्याह्नसमये निवासं सरसस्तटे ।१७॥ कारयामास सेनायाः सीतायाश्च रघूत्तमः । स्वयं मृगद्वयोत्क्रीडामारभेटसुहृदंगतः ।१८॥ दूरस्थं मृगशरेण मुक्त्वा बाण जघान तान् एवं खेलति राजेंद्रै व्याघ्रगर्जं च वै द्विज ।१९॥ तत्र कोलाहलत्रस्तः पंचरभ्यो निर्गतो वनात् । स केसरी महावेगार्नाक्षाद्दष्ट्रा भयावहः ।२०॥ स्फुरद्दशममात्रौंतदुर्गममार्गमोहितः । कदाचिद्रगमासूढः कदाचिद्भूमिमाश्रितः ॥२१॥ न रयालश्यतां याति धन्विनां पृष्ठगामिनाम् । क्वचिद्दूरानिपथ याति दर्शनागोचरः क्वचित् ॥२२॥ वक्रमोद्योजितगंभीर कंटकीद्रुमसंकुलम् । शुकव्याघ्रममाकीर्ण पर्वतंञ्च भयंकरम् ॥२३॥ प्रविष्टो विषमरण्यं गमस्तस्य पदानुगः । दूरद्दूरं ततो गत्वा देशादेशं च निर्जनम् ॥२४॥
ठाठोंको छोड़कर दूसरेमें और दूसरेको छोड़कर तीसरेमें, इस तरह बार बार इधर उधर वनस्थलीमें दौड़ रहे थे ॥ ४-८ ॥ उस समय वही श्रृंगोपर रहनेवाले मयूरके परिवार भार दूषक वृक्षके शाखाम छिप जाने, हरिणियों चकित नत्राम इधर-उधर निवृत्त हुई भाग जाती, वनले जाब कालाहदृस त्रस्त होकर अपनी शौडसे निकल परन्त कही अपत्न विशम निकलकर सवपना फुफकार मारते थे ओर कश दौगुराकी भल्यन सनकर सुनाई देती थी। वही गेंडेके समान शोभाको धारण किये हुए हाथी भाव रहे थे, कही काटग्मे बेठे हुए तीन अनेक प्रकारकी बोलियां बोल रहे थे कही शरात्र पैशके निसान दिखाई देते थे ओर कही कियी सिंहके द्वारा मार गये हरिएाके रुधिरसे पृथ्वी रक्तवण हा गयी थी। कहीकी भूमि बड़े-बड़े स्तनोवाले भसांसे अन्त पुरके आंगनसदृश बाम सरला थी ओर कहीके पृथ्वी पन वृक्षाक छिपात छायामय्य हो गयी थी । कहीं वनपुष्योकी गानिपम यह स्थली सचगन्धयी हो रही थी और कही प्राकृतिक गैरिक स्तामण्डल बन गया था । उसपर जो भोरे मँडग रहे थे, वे उमक कारण सदृश जान पड़ते थे। कही मौर्यक शरीरसे आधा कवच छूटकर त्रिलक भूमपर लगी थी। इस प्रकार वडे वड सर्पोकी खिले दिखाई पड़ती थी । ९-१४। कहीं मुँह वाये हुए बड़े-बड़े अजगर हवं बैठे थे । कही सर्पोका केंचुवियां दिखायी देती थी । कहींपर दावानल लगनेके कारण जलते हुए निकुञ्जोमसे व्याघ्र पशू आदि बड़े-वड जन्तु निकल निकलकर भाग रहे थे। रामके सथ आये हुए शिकारी खरगोशांपर कुत्ते दौड़ा रहे थे। काई तलैया मिल जानपर वे लोग वहीं कुछ देर विश्राम करके आगे दूसरे वनमे चले जाते थे और मध्याह्नके समय किसी बड़े सरोवरपर सीता आदिके साथ आराम करते थे ॥ १५-१७॥ नौकर वहर उठकर फिर शिकारी लग जाने थे रामचन्द्रजी किसी भी मृगको देखकर उसके पीछे दौड़ पड़ते और उस बाणोंसे मार डालते थे। इस प्रकार रामचन्द्रजी मृगया कर ही रहे थे, तभो दूसरी ओरसे 'सिंह आया-सिंह आया' यह कोलाहल हान लगा। सिंह इसम ऊबकर और भी वेगस चला। उसके बड़े बड़े दाँत थे । देखनेमे वह बड़ा भयानक मालूम पड़ता था। वह बड़े भारी दुर्गम मार्गको त करता हुआ इन लोगोंकी ओर बढ़ता आ रहा था वह कभी छालां मारकर आकाशमार्गे चलता और कभी पृथ्वी-पर दौड़ता चलता था ॥ १८-२१॥ अतिशय वेगसे भागनेके कारण उसका पीछा करनेवाले लोग कभी उसे देख पाते थे-कभी नहीं इस तरह भागता हुआ वह एक ऐसे दुर्गम स्थानपर पहुँच गया, जहाँ एक टेढ़ा-
४६२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ११
एकाकी हयमारूढो विवेश गिरिगह्वरम् सर्व व्याधाश्च दूताश्च लक्ष्मणाद्याश्च बान्धवाः ॥२५॥
रामादर्शनमग्नांस्ता बभ्रमुस्त इतस्ततः। अथ रामः केसरीणं जघान निशितपत्रिणा ॥२६॥
ततः स दिव्यरूपेण नत्वा प्राह रघूत्तमम् । पुरा विद्याधरश्चाहं मया भुक्ता पतिव्रता ॥२७॥
मुनिपत्नी हठेनेव तया शप्तस्त्वहं क्रुधा। सिंहत्वन्निग्रहो यस्मान्मया मयि कृतोऽद्य हि ॥२८॥
अतस्त्वं मन्दिरात्सिंहा भवाग्रेऽथ महारने। तदा मया प्रार्थिता सा पुनर्मामाह राघव ॥२९॥
चिराद्रामशरस्पर्शाच्छापान्मुक्तिर्भवेत्तव । अतोऽद्य त्वच्छरस्पर्शाच्छापान्मुक्तश्चिरादहम् ॥३०॥
इत्युक्त्वा राममामन्त्र्य स स्वर्गं प्रययौ मुदा । ततः स रामचन्द्रोऽपि तुरगस्थो मुदान्वितः ॥३१॥
तत्र तस्थौ क्षणं यावद्यावत्तद्रिरिगह्वरे। गुहाद्वारे शिलामेकां ददर्श योजनायताम् ॥३२॥
महतीं तां शिलां दृष्ट्वा रामो विस्मितमानसः। धनुष्कोट्याऽक्षिपद्दूरं गुहायां प्रविवेश ह ॥३३॥
कियद्दूरं ततो गत्वाऽग्रे प्रकाशं ददर्श सः। तत्र द्रोण्यां पवनस्य तपस्यन्त्यः स्त्रियः प्रभुः ॥३४॥
ददर्श रामश्चतस्रः किंचिदन्तरसंस्थिताः । अस्थिचर्मावशिष्टैश्च देहैर्दृग्गोचरीकृताः ॥३५॥
घर्मैः सजीविताश्चेति ज्ञात्वाम्ना रघूत्तम. ॥३६।
निजरूपाणि चत्वारि कृत्वादौ तत्पुर स्थितः । अब्रवीन्मधुरं वाक्यं भिन्नरूपेण ताः पृथक् ॥३७॥
वरयध्वं वरान्नार्यः प्रसन्नोऽहं रघूत्तमः । ततस्ता रामसंस्पर्शान्मांसकादिधातुभिः । ३८।
पूरितानि शरीराणि ददृशुर्नयनैर्निजैः । श्रुत्वा तद्रामवाक्यं तास्तदा स्वपुरतोऽक्षिभिः ॥३९॥
मँदा नाला बह रहा था बहुतसे कँटीले वृक्षोंकी झाड़ियां इसके आसपास लगी थीं। आगे बांसके दरोंत-की दीवारें खड़ी थीं और झांड्य तथा व्याघ्र आदि हिंसक जीव उभय भरे पड़े थे। ऐसी अवस्थामें भी राम उसके पीछे-पीछे दौड़त चल जा रहे थे। उस समय रामचन्द्रजी अपने साथियोंसे बिछुड़कर बहुत दूर निर्जन वनमें उसके साथ निकल गये । अन्तमें वह सिंह पर्वतकी एक विशाल कन्दरामे घुस गया और रामचन्द्रजी भी घोड़ेपर चढ़े हुए उसके साथ कन्दरामे घुस गये । इधर रामके लक्ष्मणादि भ्राता, उनके दूत तथा शिकार खेलानेवाले बहलिये घबड़ाकर रामको इधर-उधर खोजने लगे। उसी समय रामने सिंहको एक विकराल बाणसे मारा ॥ २५-२६ ॥ तब वह एक दिव्य पुरुषके रूपमे परिणत हो और उनको प्रणाम करके कहने लगा हे राम मै पहिले विद्याधर था ; मैंने एक बार एक पतिव्रता मुनिपत्नीके साथ हठात् भोग किया। जिससे कुपित होकर उसने मुझे शाप दे दिया कि तूने सिंहके समान बरबस मेरी आबरू उतारी है, इसलिए मेरा बाण से तू व्याघ्र सिंह हो जा। इस प्रकार शाप का जानेपर मैने उससे विनती की तो उसने कहा कि बहुतसे बहुत दिनों बाद जब रामचन्द्रजी तुझे अपने बाणसे मारेंगे तब तू शरस्पर्श होते ही शापसे मुक्त हो जायगा। सो बहुत समय बाद आपकी दयासे मै आज उस शापसे मुक्त हो गया। इस तरह अपना पूर्ववृत्तान्त सुनानेके बाद उसने रामसे आज्ञा मांगी और अपने लोकको चला गया । रामचन्द्रजी अपने घोड़े-पर बैठे ही बैठे थोड़ी देर वहाँ ठहर हो उन्होने क्या देखा कि उस गुहाद्वारपर याजनो लम्बी चौड़ी एक शिला लगी हुई है। इतनी बड़ी शिला देखकर राम विस्मित हुए और अपने धनुषकी कोरसे उसे दूर हटा दिया । तब वे उसके भीतर घुसे । कुछ दूर आगे जानेपर उन्हे कुछ प्रकाश सा दिखायी पड़ा। और आगे बढ़े तो उन्होंने क्या देखा कि चार स्त्रियां तपस्या करती हुई बैठी हैं उनके शरीरमे हड्डी और चमड़ेके शिवाय मांसका नाम भी नहीं था। उनका श्वास चल रहा था। इससे उनको यह ज्ञात हुआ कि वे स्त्रियां अभी मरीं नहीं, प्रत्युत जीवित हैं। ऐसी अवस्थामें रामने अपना चार शरीर बनाया और सबके सम्मुख जाकर कहने लगे - 'हे नारियों! तुम्हारी जो इच्छा हो, वह वर मांग लो। मै राम तुम लोगोंको तपस्या-से प्रसन्न हूं।' इसके अनन्तर रामने अपने हाथो उनके शरीरका स्पर्श किया । जिससे उनकी सूखी देहमे रक्त-मांसादिका संचार हो गया ॥ २७-३८ ॥ शरीर भर जानेपर उन सबोने अपने नेत्रोसे रामको देखा । उस समय प्रत्येक स्त्रीके सामनेवाले राम कोटि सूर्यकी दीप्तिके समान देदीप्यमान
सर्गः ११ ] राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धम् । ४५१
सर्गः ११ ] राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धम् । ४५१
नार्यो विलोकयामासुः सर्वाः सांगुष्ठसायकान् । कराकृष्टधनुर्दण्डान्खड्गहस्तान्निशितैरसिभिः ॥४०॥
हयारूढान्नरवेषेण सर्वासां पुरतः स्थितान् । समुत्तस्थुर्जवेनैव दृष्ट्वा कञ्जलोचनाः ॥४१॥
अतिविस्मयमापन्नास्तदाऽपृच्छन्पृथक् पृथक् । के यूयं क्व गमिष्यध्वं कुतः खलु समागताः ॥४२॥
यूयं देवा दानवा वा सम्यग्ने स्वाधुना पुरः । ब्रूतानृतं वचः सर्वं यद्वै नः प्रतिभासते ॥४३॥
अस्माकं दुःशरीराणि कमनीयानि वै कथम् । जानीथ यद्यसौ दुष्टो दुन्दुभिर्जीवति वा मृतः ॥४४॥
इति तासां वचः श्रुत्वा राघवस्ता वचोऽब्रवीत् । अहं सूर्यकुले जातो रामो नाम्ना न संशयः ॥४५॥
सम्राडधिपतिः श्रीमान् सूर्यवंशसमुद्भवः । मृगयार्थमिहायातः केशरी निहतो वने ॥४६॥
धनुष्कोट्या शिलां स्पृष्ट्वा क्षिप्त्वा चोपरिभागतः । त्यक्त्वा त्वं निःशनैर्गत्वा गुहायान्निर्गताः स्म हि ॥४७॥
मया कृतानि युष्माकं गात्राणि सुदृढान्यतः । स मया निहतो वाली रावणस्थानकारकः ॥४८॥
समाश्विता वरान्दातुं यूयं नेत्रा भयाऽद्य हि । नात्रोऽस्ति मम कार्यं हि परस्वर्ग्यं पुरीं व्रजे ॥४९॥
यत्पृष्टं तन्मया चोक्तं का यूयं कथ्यतां मम । किमर्थं दुन्दुभिः पृष्टः का वांछा प्रियतां वरान् ॥५०॥
तद्राघववचः श्रुत्वा दुन्दुभिर्निहतोऽभवत् । शिलां निष्कास्यतां चापि सर्वास्तु प्रमदा ययुः ॥५१॥
ऊचुः सर्वास्तदा राममानन्दोत्फुल्ललोचनाः । वयं ब्राह्मणपुत्र्यश्च चत्वारस्त्वथ पाठकाः ॥५२॥
सहस्राणि नृपाणां च कन्यानां कश्यपात्पुरः । समानीता बलाइव तेन दुन्दुभिना प्रभो ॥५३॥
लक्ष्म्यामितिविवाहार्थं सप्तानां कदिने सहन् । कृशोऽस्मीति मन्यमानः श्रीरन्वान्ने नहार सः ॥५४॥
यानि यानि जहार स्त्रीरत्नानि रघुनन्दन । अस्यां द्रोण्यां स्थापयित्वा दत्त्वा द्वारं शिलावगम् ॥५५॥
अचलां स्थण्डिलान्यैश्च क्षीरः समानेतुमनादरम् । पुनःशरं गतो दैत्यो वयमत्रैव संस्थिताः ॥५६॥
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हो रहे थे और धनुष-बाण तथा तलवार लिये हुए थे । ३९ ॥ ४० ॥ वे मनुष्यका वेश धारण करके घोड़ेपर सवार होकर एकाएक स्वच्छन्द उन बाणोंके सम्मुख लड़े थे और उन सब स्त्रियोंका भी समान स्वरूप था और एक ही तरहकी वेष-भूषा थी । ऐसे रामको देखकर उन स्त्रियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ और वे कहने लगीं— "आप लोग कौन हैं ? घोड़ेपर सवार होकर कहाँसे आप आ रहे हैं ? आप सब देवता हैं या दानव ? आप कहाँ जायेंगे ? कृपया हम यह भी बतलाइये कि आप हमसे क्यों बात करना चाहते हैं ? हम लोगोंका यह हीन-शीर्ण शरीर इस प्रकार सुन्दर कैसे हो गया ? वह दुष्ट दुन्दुभि जीवित है या मर गया ?" ॥ ४१-४४ ॥ इस प्रकार उनका बात सुनकर रामने उन सबसे कहा 'सूर्यवंशमें उत्पन्न और सीता डोपके अधिपति हम राम नामका मैं एक राजा हूँ । इस समय अपने एक ही रूपको चार भागों में विभक्त करके तुम सबके सम्मुख उपस्थित हुआ हूँ । मैं यहाँ जङ्गलमें शिकार करने आया था और उसी कन्दरामें मैंने एक सिंहको मारा है । फिर तुम्हारे गुफा द्वारपर एक लम्बा-चौड़ी शिला देखा । उसे अपने धनुषका अग्रसे दूर हटाकर तुम्हारे समीप आया और अपने हाथके स्पर्शसे तुम्हारे जर्जर अंगों शरीरोंको पवित्र तथा सुन्दर बना दिया है । दुन्दुभी राक्षसको बालिने मार डाला । रावणका विनाश करनेके निमित्त मैंने उस बालिको भी मार डाला है ॥ ४५-४८ ॥ केवल तुम्हें वरदान देनेकी इच्छासे मैंने तुमसे संभाषण किया है । अब यहाँसे आगे जानेका हमारा कोई कार्यक्रम नहीं है । इससे अपनी अयोध्या नगरीको लौट जाऊँगा । तुमने मुझसे जो कुछ पूछा, मैंने उसका उत्तर दे दिया । अब यह बताओ कि तुम कौन हो ? दुन्दुभीको तुमने क्यों पूछा ? तुम्हारा क्या कामना है ? इच्छित वर मुझसे माँग लो ।" जब उन सबने रामके मुखसे यह सुना कि दुन्दुभी मार डाला गया और हमारे द्वारपर लगी हुई शिला भी हट गयी है तो वे बहुत प्रसन्न हुईं और आनन्दमें प्रफुल्लित होकर उन्होंने कहा हे नाथ ! बहुत दिन हुए वह दुन्दुर्भ राक्षस हम चार ब्राह्मणकी पुत्रियों तथा सोलह हजार क्षत्रियों तथा वैश्योंकी कन्याओंको हर लाया था । उसकी यह हार्दिक इच्छा थी कि मैं एक ही दिनमें एक लाख स्त्रियोंके साथ विवाह करूँगा । इसी विचारसे वह अच्छे-अच्छे कन्याओंका अपहरण किया करता था ॥ ४९-५४ ॥ हे रघुनन्दन वह जिन सुन्दरियोंको लाता था, उन्हें इसी कन्दरामें डालकर दरवाज़ेपर एक इतनी बड़ी शिला लगा दिया करता
४५४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ११
वसन्तेऽग्रे नृपाणां च वैश्यानां बालिकाः प्रभो । वायुपर्णाशनाः सर्वाः श्रीविष्ण्वर्पितमानसाः ॥५७॥ तत्तासां वचनं श्रुत्वा भिन्नरूपैः पुनः प्रभुः । ता उवाच स्त्रियः सोऽहं विष्णुरेव न संशयः ॥५८॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा पुनस्ता भपमब्रुवन् । दर्शयस्व निजं विष्णुरूपं चेन्मन्यवागसि ॥५९॥ ततस्ता दर्शयामास विष्णुरूपं निजं प्रभुः । तानि चत्वारि रूपाणि पगवर्थ्य रघूत्तमः ॥६०॥ ततस्ताः पुरतो विष्णुं दृष्ट्वा नेमुः स्वमस्तकैः । ततो विष्णुः स ताः प्राह वः संदेहो गतो न वा ॥६१॥ ता ऊचुर्दर्शनात्तेऽद्य भवक्लेशा गता हि नः । कियत्किंतु तत्र संदेहस्त्वज्ञानाजजनितः प्रभो ॥६२॥ ततः पुनः क्षणाद्रामो रूपं ता दर्शयन्मुदा । एकमेव हि सर्वासां मध्ये जनकजापतिः ॥६३॥ ततो रामोऽब्रवीत्ताः स वरं वरयतामिति । ता ऊचुः कामबाणेन पीडिता राघवं मुदा ॥६४॥ भव भर्ता त्वमेवाद्य गांधर्वविधिना वने । अस्माभिश्च कुरुष्वात्र सुखं क्रीडां चिरं प्रभो ॥६५॥ ततो नय पुरीं स्वीयां नस्त्वं भाव्यद्यद्विचितप । तत्तासां वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥६६॥ एकपत्नीव्रतं मेऽस्ति न शक्नोम्यत्र वै मृषा । ततस्ता विह्वला भूत्वा निपेतुर्जगतीतले ॥६७॥ पुनस्ताः प्राह रामः स शृणुध्वं वचनं मम । द्वापरे कृष्णरूपेण यूयं क्रीडां भजिष्यथ ॥६८॥ मित्रविंदा नाग्नजिती भद्राऽन्या लक्ष्मणाव्हया एवं नामानि युष्माकं भविष्यंति तदा मया ॥६९॥ भविष्यंति विवाहाश्च सर्वासां नात्र संशयः । तदा नानाविधान् भोगान् भजध्वं वै मया सह ॥७०॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा किंचित्तुष्टमनाः स्त्रियः । रामं प्रोचुः पुनर्वोक्यं त्वमग्रे गन्तुमर्हसि ॥७१॥ ताभिः शनैस्ततो रामो ययौ तुरगमस्थितः । योजनोपरि सः सर्वाः सहस्रं षोडशाः शुभाः ॥७२॥
था कि जिस आपके सिवाय किसी अन्य व्यक्तिम हटनेका सामर्थ्य नहीं था, वह हम लोगोंका इस कन्दराम डालकर कहीं चला गया है। तदनन्तर हम ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्योंकी कन्याएं यहां पड़ी हुई हैं। वायु तथा वृक्षोंका पत्तियां हमारा भाजन है और श्रीविष्णुभगवान्के चरणाम हमन अपने मन लगा दिया है। इस प्रकार उनकी बात सुनकर सबके समक्ष एक-एक स्वरूपसे खड़े श्रीरामचन्द्रजीने कहा कि जिस विष्णुम तुमने अपना मन लगा रखा है, वह मैं ही हूं। रामका बात सुनकर उन स्त्रियोने कहा कि यदि तुम यह सच कह रहे हो तो अपना विष्णुरूप हम दिखाओ, इसके अनन्तर भगवान्ने अपने उन चारों स्वरूपोंको अपनम समट लिया और विष्णुरूपसे सबका दर्शन दिया। जब उन्होंने विष्णुभगवान्को अपन सम्मुख देखा तो मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। विष्णुभगवान्ने उनसे पूछा कि अब तो तुम्हारा सन्देह निवृत्त हुआ? उन्हान कहा कि आपके इन पुनीत दर्शनास मग सब क्लेश दूर हा गया तो फिर अज्ञानसे जायमान सन्देहक विषयम क्या कहना है ॥ ५५-६२ ॥ क्षणभरके बाद में फिर रामके स्वरूपस उनके सम्मुख खड़े दिखाई दिये और उनसे बाल कि तुम लागोकी जा इच्छा हो, वह वर मांगो। तब कामबाणस पीडित होकर उन स्त्रियान कहा कि यदि आप हमारे ऊपर प्रसन्न हैं तो हम लागांक साथ गान्धर्व विवाह करके हमारे पति बनिये और अधिक समयतक आनन्दपूर्वक इस कन्दराम हम लागोंके साथ विहार कीजिए। उनके यह प्रार्थना सुनकर रामन कहा कि ऐसा ता नहीं हा सकता। क्योंक मे एकपत्नीव्रतवचारी हूं। मै कभी झूठ नहीं बाल्ता, तुमस सच कह रहा हूं यह बात सुनते ही व स्त्रियां मूछित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ ६३-६७ ॥ ऐसी दशाम राम उनका समझाते हुए कहन लगा- इस प्रकार अधीर न होकर मेरी बात सुनो । अभो तो नहीं द्वापर युगमें कृष्णरूपसे मैं तुम लोगोंक साथ विहार करूंगा। मित्रविन्दा, नाग्नजिती, भद्रा तथा लक्ष्मणा इस प्रकार तुम लाग का नाम पड़ेगा और उस समय तुम सबका विवाह मेरे साथ होगा। इसम कोई सन्देह नहीं है। उस समय तुम सद मेरे साथ नाना प्रकारके सुख भोगना। रामकी बातोंको सुनकर उनका मन कुछ सन्तुष्ट हुआ और कहा कि अब आप चाहे तो जा सकते हैं। राम उन चारों कन्याओंके साथ धीरे-धीरे आगे बढ़। एक योजन आगे जाकर गण्डका नदाक किनार एक झाड में
सर्गः ११ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४६५
ददर्श गण्डकीतीरे वृक्षषण्डे रघूद्वहः। निमीलिताक्षः शुष्काङ्गतपसा ह्यर्धयौवनाः ॥ ७३॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्धे
द्विजकन्याचतुष्टयवरदानं नामैकादशः सर्गः ॥ ११ ॥
द्वादशः सर्गः
( सोलह हजार ललनाओं तथा कालिन्दी आदि चार स्त्रियोंको रामका वरदान )
श्रीरामदास उवाच
अथ रामः शनैः सर्वाः स्पृष्ट्वा निजकरेण ताः । कृत्वा तारुण्यपूर्णाश्चपूरिताः प्राह सादरम् ॥ १ ॥
पूर्ववत्सकलं वृत्तं सर्वाः सथाऽथ विस्तरात् । वरं वरयतां शीघ्रमित्युक्त्वा च रघूत्तमः ॥ २ ॥
हतं तं दुन्दुभिं श्रुत्वा दर्पोत्फुल्लानना स्त्रियः। पूर्ववद्विष्णुरूपाणि सहस्राणि हि षोडश ॥ ३ ॥
सन्दर्शितानि रामेण तावंति च स्थितानि हि । रामरूपाणि ता दृष्ट्वा ज्ञात्वा विष्णुं परात्परम् ॥ ४ ॥
तं वरान्द्वरयामासुस्त्वन्नो भर्ता भव प्रभो । ततो राममुवाचाऽऽत्मन्येकपत्नीव्रतस्थितम् ॥ ५ ॥
परस्परं ताः सम्मन्त्र्य प्रोचुः भर्ता मृगीदृशः । मया वृतस्त्वया चायं त्वया वृतस्तथा मया ॥ ६ ॥
एवं तासु च सर्वासु वदन्तीषु रघूत्तमः । श्रुत्वा तद्वचनं शिष्य तदा चित्तेऽव्यचारयत् ॥ ७ ॥
इमा वदंति किं सर्वा मां ज्ञात्वाऽपि व्रतस्थितम् । बलात्कारेण मां भोक्तुं मन्त्रयन्ति परस्परम् ॥ ८ ॥
ब्रह्मरुद्रमघवादयः सुरा ये च सिद्धमुनयः पुरातनाः ।
तेऽपि योगबलिनो विमोहिताः लीलया तदबलाभिरद्भुतम् ॥ ९ ॥
योषितां नयनतीक्ष्णसायकैर्धनुर्लतासमुद्धृतापनिर्गतैः ।
धन्विना मकरकेतुना हतः कस्य नो पतितो मनोमृगः ॥ १० ॥
तावदेव दृढचित्तता नृणां तावदेव गणना कुलस्य च ।
तावदेव तपसः प्रगल्भता तावदेव नियमव्रतादयः ॥ ११ ॥
उस सोलह हजार स्त्रियोंको देखा। वे सब आंखें मूंदे थीं, तपस्यासे उनका शरीर सूख गया था और यौवन नष्ट हो चला था ॥ ६८-७३ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीय सं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहिते राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे एकादश सर्गः ॥ ११ ॥
श्रीरामदास बोले—इसके अनन्तर रामने ज्ञान हाथके स्पर्शसे उन सबको यौवनसम्पूर्ण कर दिया तो वे भी पहलेवाली चारों स्त्रियोंके समान अपना वृत्तान्त बता गयीं । रामने उनसे कहा कि तुम्हारो जो इच्छा हो, वह वरदान मुझसे मांग लो । उन्होंने भी जब दुन्दुभीके मरनेका समाचार सुना तो बहुत प्रसन्न हुईं। इसके अनन्तर रामने उन्हें भी अपना विष्णुरूप दिखा तथा सोलह हजार रामरूप धरकर प्रत्येक स्त्रीको अलग-अलग दर्शन दिया । स्त्रियोंने इस प्रकार रामरूपको देखकर उन्हें सर्वश्रेष्ठ विष्णुभगवान् जाना । १-४ ॥ उन्होंने भी पहलेवालियोंकी तरह रामसे प्रार्थना की कि आप मेरे पति बनें। जब उनको रामने अपनेको एकपत्नीव्रती बतलाया तो वे आपसमें सलाह करके कहने लगीं कि जैसे मैने इनको पसन्द किया है, उसी तरह तुमने भी तो किया है। सब आओ, हम सब मिलकर कोई ऐसा प्रयत्न करें कि जिसमे हमारी कामना पूर्ण हो जाय । इस प्रकार जब रामने उनकी सलाह सुनी तो अपने हृदयमे विचार करने लगे कि एकपत्नीव्रतमें स्थित देखकर भी ये स्त्रियां बरबस मेरे साथ संभोग करना चाहती हैं ॥ ५-८ ॥ ब्रह्मा रुद्र, इन्द्रादिक देवता एवं जितने पुरातन सिद्ध-मुनि हो गये हैं, वे सब योगी होकर भी कामिनियोंकी बदभुत लीलासे मुग्ध हो गये थे ॥ ९ ॥ स्त्रियोंके नेत्ररूपी सायकको धनुर्धारी कामदेव जिसके ऊपर छोड़ता है तो किसका मनरूपी
४५६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२
यावद्देवं गतिर्नास्त्यवसंवने मद्यति द्रुतमदेन पूरुषः ।
मोहयंतु मदयन्तु रागिणं योषितः स्वचरितैर्मनश्शरैः ॥ १२॥
मोहयन्ति मदयन्ति मामिमा धर्मलक्षणवरं हि कैर्गुणैः ।
मांसरक्तमलमूत्रपूरितं योषितां वपुरिह निर्गुणेऽशुचौ ॥१३॥
कामिनस्तु परिकल्प्य चारुतामारभन्ति सुविमूढचेतसः ।
दारुणः परिक्लान्तिदाऽनामनिनिधिविमलबुद्धिर्वानभिः ॥१४॥
यावद्देव न मत्समीपमागतास्तावदेव हि व्रजाम्यदृश्यताम् ।
तर्हि में व्रतमित्दं सुनिर्मलं नान्यथा कथमहं करोम्यदह ॥१५॥
अथवा किं करिष्यन्ति मामेकदयिताप्रियम् । इति निश्चिय श्रीरामश्चन्द्र तूष्णीं स्थितोऽभवत् ॥१६॥
एतस्मिन्नन्तरे सर्वास्तास्तं प्रोचुर्नृपात्मजम् । वृत्तञ्च वृत्तसम्भाविनात्र कार्या विचारणा । १७॥
एकपत्नीव्रतं किं ते पार्थिवस्य श्रुतम् । अस्ति चेत्संगता प्राप्तं फलं भोक्तुमर्हसि ॥१८॥
इत्युक्त्वा तास्तदा सर्वा गत्वा तन्मन्निधिं जवात् । सङ्गालभ्यन्दनैश्च भुजपाशान् प्रचक्रिरे ॥१९॥
तद्दृष्ट्वा राघवः प्राह शृणुध्वं वचनं मम । युष्माभिरुक्ते सद्गमनुकूलं प्रियं वचः । २०॥
यतिनस्तन्न योग्यं मे मा खेदं गन्तुमर्हथ आकर्ण्य रामवाक्यानि तमूचुस्ताः समन्ततः ॥२१॥
सकामध्वनिनोत्कण्ठाः कोकिला इव माधवे ।
गोपसाम्प्रदायिक ऊचु
धर्मादर्थोऽर्थतः काम कामाद्धर्मफलोदयः ॥२२॥
इत्येवं निश्चय शास्त्रे वर्णयन्ति विपश्चितः । स कामो अतबाहुल्यात्पुरस्ते समुपस्थितः । २३॥
सेव्यतां विविधैर्भोगैः स्वर्गभूर्मार्गण मनः । अन्वा तडच्न नागां गमन्ताः प्राह सम्मितः , २४॥
मृग उस वाणसे घायल नहीं हो जाता ॥ १० ॥ मनुष्यका चित्त तभी तक वश रहता है, तभी तक कुलकी मर्यादा रहती है, तथा तब तक याग मन त्याग है तभी तक नियम व्रत आदि होते हैं, जबतक स्त्रियोंके चञ्चल कटाक्षोंसे पुरुषका मन मतवाला नहीं हो जाता और जबतक स्त्रियाँ उनपर मोहिनी डालकर अपने मनोहारी हाव-भावोंसे मोहित नहीं बना देतीं ॥ ११ । १२ ॥ ... पुरुष अपना धर्मकाम तत्पर जानकर भी अपने गुणोंसे मुग्ध करना चाहता है । मांस रक्त और मल-मूत्रसे परिपूर्ण स्त्रियोंकी अपवित्र देहपर कामी पुरुष सौन्दर्यकी कल्पना करके आनन्द लूटते हैं । भयं सम्भवता तो केवल दुःखदायक है । क्योंकि विमल बुद्धिवाले लोगोंका कहना तो यह है कि स्त्रियोंका संग बड़ा ही दारुण पश्चात्तापका हेतु होता है । अच्छा, जबतक ये मेरे समीप नहीं आ जातीं, इसके पहले ही मैं अन्तर्धान होऊँ तो अच्छा है, मेरा व्रत निर्मल रह जाय । इसके सिवाय और कोई उपाय भी तो नहीं दीखता । १३-१५ । अच्छा, यह भी देख लूँ कि ये मेरे साथ क्या करती हैं, यह निश्चय करके रामचन्द्रजी चुपचाप बैठ गये । १६ । इतनेमें ही वे सब स्त्रियांने एक स्वरसे कहा कि हम लोगोने आपको अपना पति मान लिया है । अब आप इस प्रकारका विचार मत करिये ॥ १७ ॥ हे राम क्या आपने एकपत्नीव्रत धारण किया है ? यदि ऐसा है तो अब उससे प्राप्त फलका उपभोग कीजिए ॥ १८ ॥ ऐसा कहकर वे सब उनके पास पहुँची और दौड़ती-दौड़ती दोनों भुजाओंसे रामको अपने भुजपाशमें बांधनेकी चेष्टा करने लगीं । १९ ॥ ऐसी अवस्था में रामने उनसे कहा कि आप सब जो कुछ कह रही हैं, वह ठीक ही है। किन्तु हमारे जैसे वानप्रस्थियोंके लिए वह उचित नहीं है। इसलिए तुम सब किसी प्रकारका खेद न करके पुनः दुर्योधनके यहां जाओ । इधर तो वे सब रामके वचनोंको सुनकर बड़े आदरसे सब कहने लगीं । उस समय वास्तवमें उनके कण्ठकी ध्वनि वसन्त ऋतुके कोकिलके समान मधुर सुनाई देती थी ॥ २०-२१ । सोलह हजार स्त्रियां बोलीं—धर्मसे अर्थकी प्राप्ति होती है, अर्थसे काम प्राप्त होता है और कामसे धर्मफल मिलता है । विद्वान् लोग शास्त्रोका यही निर्णय बतलाते हैं । वही काम आपके