श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 462, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४४६ | आनन्दरामायणे | [सर्गः १० |
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बाल्येऽन्ते अस्यतो प्राप्तस्त्वोपायं विचिन्त्यताम् । | इति यावद्द्रुतं रामः प्रोवाच तावदम्बरात् ॥७३॥ नारदः प्रययौ वीणां रणयन् तत्सभां जयन् । | प्रत्युद्गम्याथ तं रामः परिपूज्य यथाविधि ॥७४॥ सम्भार्य्य सकलं वृत्तं पुनः पप्रच्छ तं मुनिम् । | त्वयोपायोऽत्र वक्तव्यः शिशोश्चास्य प्रजीवने ॥७५॥ पुत्राभ्यां हि प्रतिज्ञातं द्विजाय सीतया मया । | किमर्थं मम राज्येऽसौ मृतस्त्रीदृङ् न वेद्यहम् ॥७६॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा राघव प्राह नारदः । | राम स्वद्विषयेऽधर्मं न कोऽप्याचरते जनः ॥७७॥ भूम्यां सर्वत्र द्रष्टव्यं गत्वा गत्वाऽथ मद्गिरा । | यद्यप्यहं विजानामि भूम्यां वृत्तं च जानतः ॥७८॥ तथापि जनशिक्षार्थं त्वामेव प्रेषयाम्यहम् । | त्वं दृष्ट्वाऽधर्मनिरतं जनं शिक्षय सादरम् ॥७९॥ अधर्मोच्छेदनेनायं जीविष्यति वै द्विजः । | तथेति राघवश्चोक्त्वा विसर्ज्य नारदं मुनिम् ॥८०॥ सीतया नागरैः सर्वैर्भ्रातृभिर्गुरुणा सह । | पुत्राभ्यां मन्त्रिभिर्युक्तः पुष्पकं चारुरोह सः ॥८१॥ एतस्मिन्नन्तरेऽग्रेऽभून्महान्कोलाहलस्तदा । | तं श्रुत्वा चकितो रामः स ददर्श समन्ततः ॥८२॥ तावद्ददर्श पुरतः पौरैः संवेष्ठितां स्त्रियम् । | पृष्ठतोऽपरं शवमुद्वहन्तं समागतम् ॥८३॥ रामं दृष्ट्वा पुष्पकस्थं रुदती ब्राह्मणी पुरः । | दीनस्वरेण प्रोवाच हस्ताभ्यां हृदि ताड्य सा ॥८४॥ राम राम महाबाहो ते राज्ये गतमर्तृका । | अहं जाताऽस्मि त्वद्दोषान्मां दृष्ट्वा त्वं न लज्जसे ॥८५॥ मद्भर्तारं जीवयेनं नोचेच्छापं ददामि ते । | इति तस्या वचः श्रुत्वा राघवः विस्मयान्वितः ॥८६॥ स मयान्मधुरं वाक्यं ब्राह्मणीं तोषयन्मुहुः । | कोऽयं श्रमस्त्वया रम्भोरु ते भर्तारं प्रजीवये ॥८७॥ अस्यैव हेतोर्गच्छामि त्वं मद्गेहे सुखं वस । | इत्युक्त्वाऽऽश्वास्य तां रामस्तच्छवञ्चापिपूर्ववत् ॥८८॥ तैलद्रोण्यां स्थापयित्वा सुमन्त्रं वाक्यमब्रवीत् । | आगमिष्याम्यहं यावत्तावद्रक्ष्यसि मे शवम् ॥८९॥
इस ब्राह्मणके बालककी अकाल मृत्यु क्यों हुई ॥६०-२॥ इसके लिये कोई उपाय सोचना चाहिये। इस प्रकार रामने गुरु वसिष्ठसे प्रश्न किया ही था कि इतनेमें आकाशमार्गसे वीणा बजाते हुए नारदजी उस सभामण्डपमें आ पहुंचे। रामचन्द्रजीने उठकर नारदकी पूजा की और सारा वृत्तान्त कह सुनाया। इसके पश्चात् वे बोले- हे मुनिराज आप ही इस विप्रपुत्रके जीवनका कोई उपाय बतलाइये। हमने तथा सीताने यह प्रतिज्ञा की है कि यदि हम बालकको मैं जीवित न कर सका तो अपने दोनों पुत्र कुश तथा लव इस विप्रको अपर्ण कर दूंगा। मेरे राज्यम इस प्रकार अकाल मृत्यु कैसे हुई, यह मुझ मालूम नहीं हो रहा है॥७२-७६॥ इस प्रकार रामके वचन सुनकर नारदने कहा—हे राम! तुम्हारे राज्यम कोई भी मनुष्य किसी प्रकारका अधर्म नहीं करता। फिर भी मेरे कथनानुसार आपको यह उचित है कि आप गन्धर्वथरमे घूमकर देख यदि कहीं कोई किसी तरहका अधर्माचरण करता हुआ दीखे तो उसे आप दण्ड दें इस प्रकार अधर्मका मूलोच्छेद करनेपर यह ब्राह्मणबालक जीवित हो जायगा राजन आपकी सन्तुष्ट मान हैं। नारद मुनिको सादर विदा करके राम सीता, कुछ नगरवासी जना, अपने ३ ताभ्रा, गुरु वसिष्ठ दोनों पुत्रों तथा मन्त्रियोंको साथ लेकर पुष्पक विमानपर आरूढ़ हुए ॥७९-८१॥ उसी समय आगेके आगम जोरोंका कोलाहल सुनाई पड़ा। उसे सुनकर राम और भी विस्मित हुए और चहु ओर निहारन लगे। तबतक उन्होने देखा कि एक स्त्रीको चारो ओरसे बहुतसे पुरवासी घेरे हुए हैं। उनके आगे पृष्टतम्पुत्रकी सडकमे एक और शव लदा हुआ आ रहा है। स्त्रीने जब रामको पुष्पक विमानपर बैठे देखा तो अपने हथोस छाती पीटकर कहने लगी-हे राम ! हे राम !! तुम्हारे राजकाल्म दिववा होकर मैं यहाँ आरी हूँ मुझ इस दशाम देखकर तुम्हे लाजे नही आती? मेरे पतिका मृत्यु तुम्हारे ही अधर्मत हुई है। इस कारण जैसे बने, वैसे मेरे पतिको जिलाओ ! नही तो मै शाप दे दूँगी। इस प्रकार उस स्त्रीकी बात सुनकर रामने विस्मितहोकर मीठी वाणीसे आश्वासन देते हुए उत्तर दिया-हे रंभोरु तुम कायका क्षन्त्यिग करके शान्त हओ। मै तुम्हारे पतिकी जिला दूँगा। मैं भी इसी कामके लिए जा रहा हूँ। तुम आनन्दके साथ मेरे भवनम चलकर रहो। इस तरह उसे समझा-बुझाकर रामने उस शवको भी पहलेके समान तैलके नौकाम रखवाया और सुमन्त्रको वचन कर दिया कि