श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 461, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १०] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४४५
वसो विप्रप्रिया प्राह साता प्रोत्कण्ठयेव हि । कथञ्चेन्निधिनिद्रां गते मुत्रे शुभे ॥५८॥
त्वमप्यसि पुत्रवती मे दुःखं शाम्यन् कुरु । उपायं कारयाद्याद्य भर्त्राऽद्य जीवने शिशोः ॥५९॥
इति तद्दर्शनीवाक्यं श्रुत्वा सर्वे पुरीजनः । आपन्नद्रव्यनिक्षिप्तो प्रमत्तार्य मस्थिताः ॥६०॥
सीतारामावपि तयोर्वाक्यं श्रुत्वाऽतिविह्वलौ । विनिर्गतौ मणिशालाद्बहिस्तद्रुद्धहृद्दुःखितौ ॥६१॥
निवार्य वन्दिगीनानि गजद्दारं तयोः पुरः । वेगेन जग्मतुः सद्धिः सीतागमी गतभियौ ॥६२॥
दृष्ट्वा सीतां च रामं च तौ शोकं चक्रतुर्मुहुः नाद्याद्याम्य रामचन्द्रभ्बदाऽऽह गद्गदाक्षरः ॥६३॥
मा शोकं कुरुतोभोभी मद्भिरं शृणुताम्विति । कृत्योपायं हि युत्रयोः पुत्रं संजीव्यपाम्यहम् ॥६४॥
न जीवितंश्चेद्युवयोर पुत्रस्तर्पये कुशम् गिर् सत्याऽभिर्यो नोभो पश्यतस्स्विह मेऽय हि ॥६५॥
ततः सीता विप्रपत्नीम आख्याह गिरं शुभाभ् । रामेण ते प्रतिज्ञातं कुशदानेन मामिनि ॥६६॥
अहमप्यद्य ते दन्मि तव दुःखस्य शांतये । न जीविश्चेद्रामेण भयाऽय व्यधिदुः प्रियः ॥६७॥
तर्हि त्वमुद्भवोऽन्यं धर्मपेयेट् लवं प्रियम् नाभ्यां कुशलदाग्यां त्वं पुत्रदुःखं त्यजिष्यसि ॥६८॥
भजिष्यसि च धर्मौघयत्नतः शोकं कुरुष्व मा । ततः प्राह द्विजं रामस्त्वं पत्न्याऽत्र स्थितो भव ॥६९॥
मा कुरुष्व मुहुः खेदं त्वत्पुत्रं शिल्याभ्यहम् । इत्युक्त्वा लक्ष्मणैनैन तैलद्रोण्यां शव शिशोः ॥७०॥
निधाय कृमिदंग्येद्गन्धद्रुतप्रशांतये । स्वयं स्नात्वा निर्य्यादधि चाक्रानिस्त्रकशानमः ॥७१॥
ततः सभासन्धितः सन् वसिष्ठ प्राह राघवः । राज्यं शुमति धर्मेण नन्नायं वै शिशुः कथम् ॥७२॥
अपने प्रिय पुत्रके साथ चिताम जमकर भस्म हो जावेंगे ॥ ५६ । अनन्तर पूर्वोक्तका स्मरण कर जिस प्रकार तुम्हारे पिता द्वारा अपने पुत्रवधका दुःख हुआ होकर उमके मोर पण दशरथका शव देकर अपने प्राण त्याग दिये थे, वही दशा हमारा भा हागा ॥ ५७ ॥ इसके अनन्तर ब्राह्मण आराम साथ साताकी सम्भाषित करके कहा—हे शुभे ! तुम बतो पतिका आगमन करके आनन्दक साथ सा रहो हा ? तुम ता पुत्रवती हो । इस कारण मेर दुःखका भार श्यान दकर मर बच्चाका जिलानेके लिय अपन पति द्वारा काई उपाय करवाआ ॥ ५८ । ५९ ॥ इस प्रकार उस विप्रदम्पतीका गम्द सुनकर वहाँक सब पुरवासी व्याकुल हो उठे और उस शवका चारो बारस धरकर गड़ हा गय ॥ ६० ॥ इधर गम तथा साता दानों ब्राह्मणका बातांस विह्वल हांकर रतिशब्दाग बाहर निकल आये । नाच गाकर राजन वन्दानन का स्तुति तथा गान-बजानावालोंक गान-बाज गक दिय और वह सब दाड़त हुए उन दानांक पास पहुँचे । उस समय उस दुःखम सीता तथा रामका मुख धुन्धला गया था ॥ ६१ ॥ ६२ ॥ महाराज राम तथा साताका दख्कर व दानो ओर भी जोर-जारसे चिल्ला चिल्लाकर रोन लग ॥ उनमा आश्वासन दत हुए गद्गद कण्ठस रामन कहा कि आप लाग इतना व्याकुल न हा, में जो कुछ कह रहा हूँ उस सुना। म काई उपाय करक तुम्हारे पुत्रको जीवित करूँगा । ६३,। ६४।। याद तुम्हार बच्चा जीवित न कर सकूँगा ता मैं अपना पुत्र कुश आपको दे दूंगा । भग वाक्यो बात समझकर आप विश्वाम कर ॥ ६५ ॥ इसके अनन्तर साताने विप्रपल्न क पास जाकर कहा—ह भामना । तुम सुन रहा हा कि रामने क्या प्रतिज्ञा की है ? तुम्हार मतोषक लिए मैं भा प्रतिज्ञा करता हूँ कि यदि रामचन्द्रजा आपक बच्चे का जीवित न कर सक ता मैं अपन छाट पुत्र लवका दे दूंगा । उन दोना पुत्रांक पासस तुम्हारा पुत्रशाक दूर हो जायगा । ६६-६८ ॥ अब शोक मत करा । तुम्हारे पुत्र न जिला ता अधा जा मूल में भाग रहीं हूँ, वह तुमको प्राप्त होगा । इसके अनन्तर र मने ब्राह्मणस कहा कि आप अपना पत्नाक साथ यहाँ बैठ ओर किसी प्रकारका खेद न करें मैं आपके बटक जीवित करूँगा । इतन कहकर रामन लक्ष्मास कहकर एक तैलसे भरी हुई नौका मँगवायी । जिससे शव सड़े-गले नहीं, उसमह दुर्गन्ध न निकल या कीड़े न पड़ें । इस विचारसे उस शवको उसम रखवा दिया और स्वयं खिन्न होकर सम्पूनादि निष्कण्टक करनका चल गये । इसके अनन्तर समामें बैठकर रामन अपन कुलगुरु वसिष्ठसे कहा कि जब मैं धर्मपूर्वक राज्यशासन कर रहा हूँ तब