श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 460, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें४१४ आनन्दरामायणे [ सर्ग० १०
नृपगेहे प्रविष्टानां याचकानां निवारिणः । परद्रव्यपहर्तारः प्रत्यशिनाञ्चिकारिणः ॥४१॥ विप्रभोजनद्रव्यस्य होमद्रव्यस्य हारिणः । बहुद्रव्यापहर्त्तारश्चैते सर्व्वेऽप्यन्यन्मनि ॥४२॥ गच्छन्ति वै शुनो योनिं मत्समेतद्वचा मम । मया मठाधिपत्याञ्च लब्धा योनिः शुनः स्वयम् ॥४३॥ अतो मयाऽद्य यतये दित्सितं पदमीरितम् । इति तद्वाक्यमाकर्ण्य नागरादिच्छिन्नसंशयाः ॥४४॥ ते ययुः स्वीयगेहानि यथौवाऽपि निजस्थलम् । ईदाने स यतिजीतः शुनो योनौ स्वकिल्विषत् ॥४५॥ आप्तमश्चाशुभां मुक्ति भुक्त्वाऽसौ स्वीयकिल्विषम् । न तस्योऽयं यतिः शिष्य मार्केनेऽत्र मृतस्त्विति॥४६ स्थलान्तरे मृतश्चायं शतैः कार्यार्थमान्नरः । अयोध्यायां मृतानां च पुनर्जन्म न विद्यते ॥४७॥ क्व यतिः सारमेयत्वं क्व स श्वा मुक्तिमाप्तवान् । गहना कर्मणश्चात्र गतिस्तया महात्मनः ॥४८॥ क्व यतिः सारमेयः क्व न्यायश्चेत्थं समापने । आभीक्ष्म्यतः सर्व्वचात्र नान्यायस्तन्मुखेक्षणात् ॥४९॥ अथैकदा तु साकेतवासिनो भूसुरस्य च । पञ्चत्वं पञ्चवर्षीयः पुत्रः प्राप्तः शिशुः प्रियः ॥५०॥ तदा विप्रः सपत्नीकस्तन्प्रेतमरुणोदये । राजद्वार मपानीथ रुरोदोच्चैः सुविद्रुतः ॥५१॥ अब्रवीत् पुत्रशोकेन व्यथितः क्रोधसंयुतः । सीतामालिङ्गय गजेन्द्र कथं न्वं निद्रितोऽसि हि ॥५२॥ त्वद्राज्येऽधर्मतः कस्य मृतो मे बालकः प्रियः । त्वत्तोऽप्यधमॊऽथवान्याच्च अतोऽधर्मी न संशयम्५३॥ नृपे पापििन म्रियन्ते नरा ह्यल्पायुषः भुक्तम् । यस्य राज्ये जनैः सर्व्वैरापाधर्मः क्रियते भुवि ॥५४॥ सोऽपि ज्ञेयो नृपस्यैव यत्तन्नेषां न शिक्षितम् । अस्मन्नेऽधारिणो राज्ञो राज्ये मेऽय शिशुर्मृतः ॥५५॥ उपायं चिंतयस्वाम्य जीवनेऽद्य यवान्वभूः । नोचेदावां विनिं वारोहावस्तनपेन हि ॥५६॥ स्मर वृत्तं श्रवणस्य हेतोर्यत्तनकञ्च ने जानं शापादिकं पूर्व्वं तद्वदत्रापि ते भवेत् ॥५७॥
विप्र निज धनको ग्रहण करनेवाले व ज्ञानभाजनके लिये जुटाई सामग्रीसे चोरी करनेवाले और बेईमानी करके अधिक धन इकट्ठा करनेवाले लोग मरकर दूसरे जन्ममें कुत्तेकी योनिम जन्म पाते हैं ॥३६-४२॥ इस प्रसङ्गमें मैंने जो बात कही है, व सब सत्य है। मैंने स्वयं मठाधिपत्यके कारण ही कुत्तेकी योनि पायी है ॥४३॥ इस संन्यास को उसकी करनीका फल देने के लिए मैंने उसे यह पद दिलाया है। इस प्रकार उसकी बात सुनकर सारे पुरवासिजनका स देह निवृत्त हो गया और सब लोग अपने-अपने घरको चले गये। कुत्ता भी अपने स्थानको चला गया। उस संन्यासी ने मठाधिपत्यके मदमें आकर जा पाप किये, उत्तम जन्मान्तरम उसे कुत्तेकी योनि मिली ॥४४ ।४५। वह कुत्ता जिसको रामचन्द्रजीके यहाँ दावा किया था उसे कुछ दिनो बाद शुभ गति मिली, किन्तु वह पनि जो अपने पापोसे कुत्ता हुआ था अयोध्यामे न मरकर किसी दूसरे स्थानपर मरा। इम लिए उसे मुक्ति नहीं मिला। जो लोग अयोध्यामे शरीर त्याग करत है ये जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। कर्मनी गति बड़ी विचित्र होती है। कहाँ वह कुत्ता होकर भी मुक्त हो गया और वह यति होकर भी कुत्ता हो गया ॥४६॥४७॥४८॥ कहाँ तुत्ता और कहाँ मंन्यासी । रामने उस श्वानका कितना अच्छा न्याय किया । सच तो यह है कि रामक राज्यम किसोका मुँह देखकर न्याय नहीं किया जाता था। बल्कि जा न्याय्य बात होती, वही होती थी ॥४९। एक समय अयोध्यामे एक ब्राह्मणके पंचवर्षीय बालककी मृत्यु हो गयी ॥५०॥ सबेरा होते ही वे ब्राह्मणदम्पती बच्चेके शवको लेकर राजद्वारपर आये और बड़े जोर-जारसे रोने लगे ॥५१॥ पुत्रशोकसे कुपित होकर उस ब्राह्मणने कहा हे राम! सीताको गोदमे लेकर तुम भय भाः आनन्दके साथ पड़े सो रहे हो ? ॥५२॥ तुम्हारे राज्यमे किसीके अपराधस मेरे बच्चेको मृत्यु हुई है। इसमे तुम्हारा कोई अधर्म है अथवा किसी दूसरेका। यह मै नहीं जानता ॥५३॥ मैने ऐसा सुना है कि राजक अधर्मी होनेस ही उसके राज्यम अकाल मृत्यु होती है जिस राजाक राज्यम अधर्म होता है, उसका भी कारण राजा ही होता है क्योंकि वह अपनी प्रजाका अच्छी तरह शिक्षा नहीं देता। इससे यह निश्चित है कि तुम अधर्मी हो। इसी लिए मेरे बालककी मृत्यु हुई है ॥५४॥ ५५॥ अतएव हे राजन् ! इसके लिए शीप्र ही कोई उपाय करो, नही तो हम दोनों (स्त्री-पुरुष)